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संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

१४८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४२

१४८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४२
स देवः सकलाध्यक्षो यथाहं त्रिजगज्जयी। | ''वही सबका अध्यक्ष देवता है, जैसा कि तीनों
त्यज जाड्यमतः शौर्यं भजस्व स्वकुलोचितम्॥ ५८ | लोकोंपर विजय पानेवाला मैं हूँ। इसलिये तू अपनी यह
| जडता त्याग दे और अपने कुलके लिये उचित वीरताका
अन्येऽपि त्वां हनिष्यन्ति वदिष्यन्ति जनास्त्विदम्। | आश्रय ले। तेरी यह कायरता देखकर दूसरे लोग भी तुझे
असुरोऽयं सुरान् स्तौति मार्जार इव मूषकन्॥ ५९ | मारेंगे और कहेंगे कि 'अरे! यह असुर होकर भी
| देवताओंकी उसी प्रकार स्तुति करता है, जैसे बिल्ली
द्वेष्यान् शिखीव फणिनो दुर्निमित्तमिदं ध्रुवम्। | चूहेकी स्तुति करे और मोर अपने द्वेषपात्र सर्पोंकी प्रार्थना
लब्ध्वापि महदैश्वर्यं लाघवं यान्त्यबुद्धयः॥ ६० | करे। ऐसा करना अवश्य ही अनिष्टका सूचक है। मूर्ख
| प्राणी महान् ऐश्वर्य पाकर भी [अपने खोटे कर्मोंके द्वारा]
यथायं मत्सुतः स्तुत्यः स्तावकान् स्तौति नीचवत्। | नीचे गिर जाते हैं, जैसे मेरा पुत्र प्रह्लाद, जो स्वयं स्तुतिके
रे मूढ दृष्ट्वाप्यैश्वर्यं मम ब्रूषे पुरो हरिम्॥ ६१ | योग्य था, आज नीच जनोंकी भाँति उन लोगोंकी स्तुति
| कर रहा है, जो स्वयं हमारी स्तुति करनेवाले हैं। रे मूर्ख!
असदृशस्य तु हरेः स्तुतिरेषा विडम्बना। | तू मेरा ऐश्वर्य देखकर भी मेरे सामने ही हरिका नाम ले
इत्युक्त्वा तनयं भूप जातक्रोधो भयानकः॥ ६२ | रहा है? वह हरि इस सम्मानके योग्य नहीं है, उसकी
| स्तुति विडम्बनामात्र है''॥ ५८—६११/२॥
जिह्मं निरीक्ष्य च प्राह तद्गुरुं कम्पयन् रुषा। | भूप! अपने पुत्रसे इस प्रकार कहकर वह इतना
याहि याहि द्विजपशो साधु शाधि सुतं मम॥ ६३ | कुपित हुआ कि उसका स्वरूप भयानक हो गया; फिर
| प्रह्लादके गुरुको टेढ़ी नजरसे देखकर उन्हें अपने रोषसे
प्रसाद इत्येष वदन् स विप्रो | कँपाता हुआ बोला—'मूर्ख ब्राह्मण! यहाँसे चला जा,
जगाम गेहं खलराजसेवी। | चला जा। अबकी बार मेरे पुत्रको अच्छी शिक्षा देना।'
विष्णुं विसृज्यान्वसरच्च दैत्यं | दुष्ट राजाकी सेवा करनेवाला वह ब्राह्मण 'बड़ी कृपा
किं वा न कुर्युर्भरणीय लुब्धाः॥ ६४॥ | हुई' यों कहता हुआ घर चला गया और विष्णुका भजन
| त्यागकर दैत्यराज (हिरण्यकशिपु)-का अनुसरण करने
| लगा। सच है, लोभी मनुष्य अपना पेट पालनेके लिये
| क्या नहीं कर सकते?॥ ६२—६४॥
इति श्रीनरसिंहपुराणे नृसिंहप्रादुर्भावे एकचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४१॥
इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'नरसिंहावतार' नामक इकतालिसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ४१॥

बयालीसवाँ अध्याय
प्रह्लादपर हिरण्यकशिपुका कोप और प्रह्लादका वध करनेके लिये उसके द्वारा किये गये अनेक प्रयत्न
मार्कण्डेय उवाच | मार्कण्डेयजी कहते हैं—भगवान् विष्णुकी भक्ति ही
सोऽप्याशु नीतो गुरुवेश्म दैत्यै- | जिनका भूषण है, वे दैत्यराजकुमार योगी प्रह्लादजी शीघ्र
दैत्येन्द्रसूनुर्हरिभक्तिभूषणः । | ही सारथिके साथ गुरुके घर भेजे गये। वहाँ वे कालक्रमसे
अशेषविद्यानिवहेन साकं |
कालेन कौमारमवाप योगी॥ १ | सम्पूर्ण विद्याओंके ज्ञानके साथ कुमारावस्थाको प्राप्त
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अध्याय ४२ ] प्रह्लादपर हिरण्यकशिपुका कोप और प्रह्लादका वध करनेके लिये प्रयत्न १४९
प्रायेण कौमारमवाप्य लोकः | हुए। संसारके अन्य लोग कौमार अवस्थाको पाकर
पुष्णाति नास्तिक्यमसद्रतिं च। | प्रायः नास्तिक विचार और बुरे आचार-व्यवहारके पोषक
तस्मिन् वयःस्थस्य बहिर्विरक्ति- | बन जाते हैं, परंतु उसी उम्रमें प्रह्लादको बाह्य विषयोंसे
र्भवत्यभूच्चित्रमजे च भक्तिः॥ २ | वैराग्य हुआ और भगवान्‌में उनकी भक्ति हो गयी—यह
| अद्भुत बात है। तदनन्तर जब प्रह्लादने गुरुके यहाँ अपनी
अथ सम्पूर्णविद्यं तं कदाचिद्दितिजेश्वरः। | पढ़ाई समाप्त कर ली, तब एक दिन दैत्यराजने उन्हें अपने
आनाय्य प्रणतं प्राह प्रह्लादं विदितेश्वरम्॥ ३ | पास बुलवाया और ईश्वर-तत्त्वके ज्ञाता प्रह्लादको अपने
| सामने प्रणाम करके खड़े देख उनसे कहा— ॥ १-३॥
साध्वज्ञाननिधेर्बाल्यान्मुक्तोऽसि सुरसूदन। | सुरसूदन ! तुम अज्ञानकी निधिरूपा बाल्यावस्थासे मुक्त
इदानीं भ्राजसे भास्वान् नीहारादिव निर्गतः ॥ ४ | हो गये—यह बहुत अच्छा हुआ। इस समय तुम कुहिरेसे
| निकले हुए सूर्यकी भाँति अपने तेजसे प्रकाशित हो रहे हो।
बाल्ये वयं च त्वमिव द्विजैर्जाड्याय मोहिताः । | पुत्र ! बचपनमें तुम्हारी ही तरह हमें भी जडबुद्धि सिखानेके
वयसा वर्धमानेन पुत्रकैवं सुशिक्षिताः ॥ ५ | लिये ब्राह्मणोंने मोहित कर रखा था; किंतु अवस्था बढ़नेपर
| जब हम समझदार हुए, तब इस प्रकार अपने कुलके अनुरूप
तदद्य त्वयि धुर्येऽहं संसकण्टकताधुरम्। | सुन्दर शिक्षा ग्रहण कर सके थे। अतः शत्रुरूपी काँटोंसे युक्त
विन्यस्य स्वां चिरधृतां सुखी पश्यन् श्रियं तव ॥ ६ | इस राज्य-शासनके भारको, जिसे मैंने बहुत दिनोंसे धारण कर
| रखा है, अब तुझ सामर्थ्यवान् पुत्रपर रखकर मैं तुम्हारी राज्य-
यदा यदा हि नैपुण्यं पिता पुत्रस्य पश्यति । | लक्ष्मीको देखते हुए सुखी होना चाहता हूँ। पिता जब-जब
तदा तदाऽऽधिं त्यक्त्वा नु महत्सौख्यमवाप्नुयात् ॥ ७ | अपने पुत्रकी निपुणता देखता है, तब-तब अपनी मानसिक
| चिन्ता त्यागकर महान् सुखका अनुभव करता है। तुम्हारे गुरुने
गुरुश्चातीव नैपुण्यं ममाग्रेऽवर्णयत्तव । | भी मेरे समक्ष तुम्हारी योग्यताका बड़ा बखान किया है। यह
न चित्रं पुत्र तच्छ्रोतुं किं नु मे वाञ्छतः श्रुती ॥ ८ | तुम्हारे लिये कोई आश्चर्यकी बात नहीं है। आज मेरे कान तुम्हारी
| कुछ बातें सुनना चाहते हैं। नेत्रोंके सामने शत्रु की दरिद्रता
नेत्रयोः शत्रुदारिद्र्यं श्रोत्रयोः सुतसूक्तयः । | देखना, कानोंमें पुत्रकी सुन्दर वाणीका पड़ना और अङ्गोंमें
युद्धव्रणं च गात्रेषु मायिनां च महोत्सवः॥ ९ | युद्धके आघातसे घाव होना—यह सब ऐश्वर्यवान् वीरों अथवा
| मायावी दैत्योंके लिये महान् उत्सवके समान है ॥ ४-९॥
श्रुत्वेति निकृतिप्रज्ञं दैत्याधिपवचस्ततः। | उस समय दैत्यराजके ये शठतापूर्ण वचन सुनकर
जगाद योगी निश्शङ्कं प्रह्लादः प्रणतो गुरुम् ॥ १० | योगी प्रह्लादने पिताको प्रणाम करके निर्भीकतापूर्वक
| कहा— ॥ १०॥
सूक्तयः श्रोत्रयोः सत्यं महाराज महोत्सवः। | 'महाराज! आपका यह कथन सत्य है कि अच्छी
किंतु ता वैष्णवीर्वाचो मुक्त्वा नान्या विचारयेत् ॥ ११ | बातें सुनना कानोंके लिये महान् उत्सवके समान है; किंतु
| वे बातें भगवान् विष्णुसे सम्बन्ध रखनेवाली हों, तभी ऐसा
नीतिःसूक्तिःकथाःश्राव्याःश्राव्यं काव्यं च तद्वचः। | होता है। उनको छोड़कर दूसरी बातें सुननेका विचार भी
यत्र संसृतिदुःखौघकक्षाग्निर्गोयिते हरिः॥ १२ | नहीं करना चाहिये। जो संसारके दुःखसमुदायरूपी तृणोंको
| भस्म करनेके लिये अग्निके समान हैं, उन भगवान् विष्णुका
| जिसमें गुणगान किया जाता हो, वही वचन नीतियुक्त है,
| वही सूक्ति (सुन्दर वाक्य) है, वही सुनने योग्य कथा