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सर्वकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 66, कुल 318 में से

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पृष्ठ 66

अध्याय १३ ] पतिव्रताकी शक्ति; उसके साथ एक ब्रह्मचारीका संवाद ५५
पक्षी दग्धः सुदुर्बुद्धे पापात्मन् साम्प्रतं वृथा। शक्ति प्राप्त हुई है। दुर्बुद्धि पापात्मन् ! तुमने व्यर्थ ही
वृथा स्नानं वृथा तीर्थं वृथा जप्तं वृथा हुतम् ॥ ४४ पक्षियोंको जलाया। इस समय तुम्हारा किया हुआ स्नान,
तीर्थसेवन, जप और होम—सब व्यर्थ है। ब्रह्मन् ! जिसकी
स जीवति वृथा ब्रह्मन् यस्य माता सुदुःखिता। माता अत्यन्त दुःखमें पड़ी हो, वह व्यर्थ ही जीवन धारण
यो रक्षेत् सततं भक्त्या मातरं मातृवत्सलः ॥ ४५ करता है। जो पुत्र मातापर दया करके भक्तिपूर्वक निरन्तर
उसकी रक्षा करता है, उसका किया हुआ सब कर्म यहाँ
तस्येहानुष्ठितं सर्वं फलं चामुत्र चेह हि। और परलोकमें भी फलप्रद होता है। ब्रह्मन् ! जिन उत्तम
मातृश्च वचनं ब्रह्मन् पालितं यैर्नरोत्तमैः ॥ ४६ पुरुषोंने माताके वचनका पालन किया है, वे इस लोक
ते मान्यास्ते नमस्कार्या इह लोके परत्र च। और परलोकमें भी माननीय तथा नमस्कारके योग्य हैं।
अतस्त्वं तत्र गत्वाद्य यत्र माता व्यवस्थिता ॥ ४७ अतः जहाँ तुम्हारी माता है, वहाँ जाकर उसके जीते-जी
उसीकी रक्षा करो। उसकी रक्षा करना ही तुम्हारे लिये
तां त्वं रक्षय जीवन्तीं तद्रक्षा ते परं तपः। परम तपस्या है। इस क्रोधको त्याग दो; क्योंकि यह
क्रोधं परित्यजैनं त्वं दृष्टादृष्टविघातकम् ॥ ४८ तुम्हारे दृष्ट और अदृष्ट—सभी कर्मोंको नष्ट करनेवाला
है। उन पक्षियोंकी हत्याके पापसे अपनी शुद्धिके लिये
तयोः कुरु वधे शुद्धिं पक्षिणोरात्मशुद्धये। तुम प्रायश्चित्त करो। यह सब मैंने तुमसे यथार्थ बातें कही
याथातथ्येन कथितमेतत्सर्वं मया तव ॥ ४९ हैं। ब्रह्मचारिन् ! यदि तुम सत्पुरुषोंकी गतिको प्राप्त करना
चाहते हो तो मेरे कहे अनुसार करो' ॥ ३४-४९१/२ ॥
ब्रह्मचारिन् कुरुष्व त्वं यदीच्छसि सतां गतिम्।
इत्युक्त्वा विररामाथ द्विजपुत्रं पतिव्रता ॥ ५० ब्राह्मणकुमारसे यों कहकर वह पतिव्रता चुप हो
गयी। तब ब्रह्मचारी भी पुनः अपने अपराधके लिये
सोऽपि तामाह भूयोऽपि सावित्रीं तु क्षमापयन्। क्षमा माँगता हुआ सावित्रीसे बोला—'वरवर्णिनि ! अनजानमें
अज्ञानात्कृतपापस्य क्षमस्व वरवर्णिनि ॥ ५१ किये हुए मेरे इस पापको क्षमा करो। महाभागे! पतिव्रते !
तुमने मेरे हितकी ही बात कही है। मैंने जो क्रोधपूर्वक
मया तवाहितं यच्च कृतं क्रोधनिरीक्षणम्। तुम्हारी ओर देखकर तुम्हारा अपराध किया था, उसे
तत् क्षमस्व महाभागे हितमुक्तं पतिव्रते ॥ ५२ क्षमा कर दो। शुभव्रते ! अब मुझे माताके पास जाकर
जिन कर्तव्योंका पालन करना चाहिये, उन्हें बताओ,
तत्र गत्वा मया यानि कर्माणि तु शुभव्रते। जिनके करनेसे मेरी शुभगति हो' ॥ ५०-५३ ॥
कार्याणि तानि मे ब्रूहि यथा मे सुगतिर्भवेत् ॥ ५३
उसके इस प्रकार कहनेपर उस पूछनेवाले ब्राह्मणसे
तेनैवमुक्ता साप्याह तं पृच्छन्तं पतिव्रता। पतिव्रता सावित्री पुनः बोली— 'ब्रह्मन् ! वहाँ तुमको
यानि कार्याणि वक्ष्यामि त्वया कर्माणि मे शृणु ॥ ५४ जो कर्म करने चाहिये, उन्हें बतलाती हूँ; सुनो—
'तुम्हें भिक्षावृत्तिसे जीवननिर्वाह करते हुए वहाँ माताका
पोष्या माता त्वया तत्र निश्चयं भैक्षवृत्तिना। निश्चय ही पोषण करना चाहिये और पक्षियोंकी हत्याका
अत्र वा तत्र वा ब्रह्मन् प्रायश्चित्तं च पक्षिणोः ॥ ५५ प्रायश्चित्त यहाँ अथवा वहाँ अवश्य करना चाहिये।
यज्ञशर्माकी* पुत्री तुम्हारी पत्नी होगी। उसे ही तुम
यज्ञशर्मसुता कन्या भार्या तव भविष्यति। धर्मपूर्वक ग्रहण करो। तुम्हारे जानेपर यज्ञशर्मा अपनी
तां गृह्णीष्व च धर्मेण गते त्वयि स दास्यति ॥ ५६ कन्या तुम्हें दे देंगे। उसके गर्भसे तुम्हारी वंश-परम्पराको
बढ़ानेवाला एक पुत्र होगा। पिताकी भाँति यायावर-
पुत्रस्ते भविता तस्यामेकः संततिवर्धनः ।
यायावरधनाद्वृत्तिः पितृवत्ते भविष्यति ॥ ५७ वृत्तिसे प्राप्त हुए धनसे ही तुम अपनी जीविका चलाओगे।

  • ये यज्ञशर्मा देवशर्माके पितासे भिन्न थे।