संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
१८४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४८
१८४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४८
[संस्कृत श्लोक - बायाँ स्तम्भ]
रामाभिषेकं विपुलं श्वो भविष्यति जानथ।
श्रुत्वेत्थं मन्त्रिणः प्राहुस्तं नृपं प्रणिपत्य च॥ १०
शोभनं ते मतं राजन् यदिदं परिभाषितम्।
रामाभिषेकमस्माकं सर्वेषां च प्रियंकरम्॥ ११
इत्युक्तो दशरथस्तैस्तान् सर्वान् पुनरब्रवीत्।
आनीयन्तां द्रुतं सर्वे सम्भारा मम शासनात्॥ १२
सर्वतः सारभूता च पुरी चेयं समन्ततः।
अद्य शोभान्विता कार्या कर्तव्यं यागमण्डलम्॥ १३
इत्येवमुक्ता राज्ञा ते मन्त्रिणः शीघ्रकारिणः।
तथैव चक्रुस्ते सर्वे पुनःपुनरुदीरिताः॥ १४
प्राप्तहर्षः स राजा च शुभं दिनमुदीक्षयन्।
कौशल्या लक्ष्मणश्चैव सुमित्रा नागरो जनः॥ १५
रामाभिषेकमाकर्ण्य मुदं प्राप्यातिहर्षितः।
श्वश्रूश्वशुरयोः सम्यक् शुश्रूषणपरा तु सा॥ १६
मुदान्विता सिता सीता भर्तुराकर्ण्य शोभनम्।
श्वोभाविन्यभिषेके तु रामस्य विदितात्मनः॥ १७
दासी तु मन्थरानाम्नी कैकेय्याः कुब्जरूपिणी।
स्वां स्वामिनीं तु कैकेयीमिदं वचनमब्रवीत्॥ १८
शृणु राज्ञि महाभागे वचनं मम शोभनम्।
त्वत्पतिस्तु महाराजस्तव नाशाय चोद्यतः॥ १९
रामोऽसौ कौसलीपुत्रः श्वो भविष्यति भूपतिः।
वसुवाहनकोशादि राज्यं च सकलं शुभे॥ २०
भविष्यत्यद्य रामस्य भरतस्य न किंचन।
भरतोऽपि गतो दूरं मातुलस्य गृहं प्रति॥ २१
हा कष्टं मन्दभाग्यासि सापत्नयाद्दुःखिता भृशम्।
सैवमाकर्ण्य कैकेयी कुब्जामिदमथाब्रवीत्॥ २२
पश्य मे दक्षतां कुब्जे अद्यैव त्वं विचक्षणे।
यथा तु सकलं राज्यं भरतस्य भविष्यति॥ २३
[हिन्दी अनुवाद - दायाँ स्तम्भ]
जान लो कि कल बड़े समारोहके साथ श्रीरामचन्द्रजीका राज्याभिषेक होगा'॥ ५-९१/२॥
यह सुनकर मन्त्रियोंने राजाको प्रणाम करके उनसे कहा—'राजन्! आपने हमारे समक्ष अपना जो यह विचार व्यक्त किया है, बहुत ही उत्तम है। श्रीरामका अभिषेक हम सभीके लिये प्रियकारक है'॥ १०-११॥
उनके यों कहनेपर राजा पुनः उन सब लोगोंसे बोले—'अच्छा, अब मेरी आज्ञासे अभिषेकके सभी सामान शीघ्र लाये जायँ और समस्त वसुधाकी सारभूता इस अयोध्यापुरीको भी आज ही सब ओरसे सुसज्जित कर देना चाहिये। साथ ही एक यज्ञमण्डपकी रचना भी परम आवश्यक है'॥ १२-१३॥
राजाके यों कहने और बार-बार प्रेरणा करनेपर उन सब शीघ्रकारी मन्त्रियोंने उनके कथनानुसार सब कार्य पूर्ण कर दिये। राजा इस शुभ दिनकी प्रतीक्षा करते हुए बड़े ही आनन्दित हुए। कौशल्या, सुमित्रा, लक्ष्मण तथा अन्य पुरवासी श्रीरामचन्द्रजीके राज्याभिषेकका शुभ समाचार सुनकर आनन्दके मारे फूले नहीं समाये। सास-ससुरकी सेवामें भलीभाँति लगी रहनेवाली सीता भी अपने पतिके लिये इस शुभ संवादको सुनकर बहुत ही प्रसन्न हुईं॥ १४-१६१/२॥
आत्मतत्त्वके ज्ञाता अथवा सबके मनकी बात जाननेवाले भगवान् श्रीरामका अभिषेक दूसरे ही दिन होनेवाला था। इसी बीचमें कैकेयीकी कुबड़ी दासी मन्थराने अपनी स्वामिनी कैकेयीके पास जाकर यह बात कही—'बड़भागिनी रानी! मैं एक बहुत अच्छी बात सुनाती हूँ, सुनो। तुम्हारे पति महाराज दशरथ अब तुम्हारा नाश करनेपर तुले हुए हैं। शुभे! वे जो कौशल्या-पुत्र राम हैं, कल ही राजा होंगे। धन, वाहन और कोश आदिके साथ यह सारा राज्य अब रामका हो जायगा; भरतका कुछ भी नहीं रहेगा। देखो, भाग्यकी बात; इस अवसरपर भरत भी बहुत दूर—अपने मामाके घर चले गये हैं। हाय! यह सब कितने कष्टकी बात है! तुम मन्दभागिनी हो। अब तुम्हें सौतकी ओरसे बहुत ही कष्ट उठाना पड़ेगा'॥ १७-२११/२॥
ऐसी बात सुनकर कैकेयीने कुब्जासे कहा—'बुद्धिमति कुब्जे! तू मेरी दक्षता तो देख—आज ही मैं ऐसा यत्न करती हूँ, जिससे यह सारा राज्य भरतका
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अध्याय ४८ ] श्रीराम-वनवास; राजा दशरथका निधन तथा वनमें राम-भरतकी भेंट १८५
रामस्य वनवासश्च तथा यत्नं करोम्यहम्। हो जाय और रामका वनवास हो'॥ २२-२३१/२॥
इत्युक्त्वा मन्थरां सा तु उन्मुच्य स्वाङ्गभूषणम् ॥ २४ मन्थरासे यों कहकर कैकेयीने अपने अङ्गोंके
आभूषण उतार दिये। सुन्दर वस्त्र और फूलोंके हार भी
वस्त्रं पुष्पाणि चोन्मुच्य स्थूलवासोधराभवत्। उतार फेंके और मोटा वस्त्र पहन लिया। फिर निर्माल्य
निर्माल्यपुष्पधृक्कष्टा कश्मलाङ्गी विरूपिणी ॥ २५ (पूजासे उतरे हुए) पुष्पोंको धारण किया, देहमें राख
और धूल लपेट ली और कुरूप वेष बनाकर वह
भस्मधूल्यादिनिर्दिग्धा भस्मधूल्या तथा श्रिते। शरीरमें कष्ट और मूर्च्छाका अनुभव करने लगी। वह
भूभागे शान्तदीपे सा संध्याकाले सुदुःखिता ॥ २६ भामिनी ललाटमें श्वेत वस्त्र बाँध, संध्याके समय दीपक
बुझा, अँधेरेमें ही राख और धूलसे भरे भूभागमें अत्यन्त
ललाटे श्वेतचैलं तु बद्ध्वा सुष्वाप भामिनी। दुःखित हो लेट गयी ॥ २४-२६१/२॥
मन्त्रिभिः सह कार्याणि सम्मन्त्र्य सकलानि तु ॥ २७ इधर मन्त्रियोंके साथ सारे कार्योंके विषयमें मन्त्रणा
करके, वसिष्ठ आदि ऋषियोंद्वारा पुण्याहवाचन,
पुण्याहः स्वस्तिमाङ्गल्यैः स्थाप्य रामं तु मण्डले। स्वस्तिवाचन और मङ्गलपाठादि करवाकर, श्रीरामको
ऋषिभिस्तु वसिष्ठाद्यैः सार्धं सम्भारमण्डपे ॥ २८ यज्ञ-सामग्रीसे युक्त मण्डपमें बिठाया और वृद्धि
वृद्धिजागरणीयैश्च सर्वतस्तूर्यनादिते। (नान्दीश्राद्ध) एवं जागरण-सम्बन्धी कृत्यके लिये उपयुक्त
गीतनृत्यसमाकीर्णे शङ्खकाहलनिःस्वनैः ॥ २९ तथा सब ओर शहनाई एवं शङ्ख, काहल आदिके
शब्दोंसे निनादित एवं गान और नृत्यके कार्यक्रमोंसे पूर्ण
स्वयं दशरथस्तत्र स्थित्वा प्रत्यागतः पुनः। उस मण्डपमें थोड़ी देरतक स्वयं भी ठहरकर राजा
कैकेय्या वेश्मनो द्वारं जरद्भिः परिरक्षितम् ॥ ३० दशरथ वहाँसे लौट आये। राजा कैकेयीसे श्रीरामचन्द्रजीके
अभिषेकका शुभ समाचार सुनानेकी इच्छासे कैकेयीके
रामाभिषेकं कैकेयीं वक्तुकामः स पार्थिवः। भवनके दरवाजेपर पहुँचे, जहाँ बूढ़े सिपाही पहरा देते
कैकेयीभवनं वीक्ष्य सान्धकारमथाब्रवीत् ॥ ३१ थे। कैकेयीके घरको अन्धकारयुक्त देख राजाने
कहा ॥ २७-३१॥
अन्धकारमिदं कस्मादद्य ते मन्दिरे प्रिये। 'प्रिये ! आज तुम्हारे मन्दिरमें अन्धकार क्यों है ?
रामाभिषेकं हर्षाय अन्त्यजा अपि मेनिरे ॥ ३२ आज तो इस नगरके चाण्डालोंने भी श्रीरामचन्द्रके
अभिषेकको आनन्दजनक माना है। सभी लोग अपने
गृहालंकरणं कुर्वन्त्यद्य लोका मनोहरम्। घरको सुन्दर ढंगसे सजा रहे हैं। तुमने अपने भवनको
त्वयाद्य न कृतं कस्मादित्युक्त्वा च महीपतिः ॥ ३३ क्यों नहीं सुसज्जित किया?'-यों कहकर राजाने घरमें
दीप प्रज्वलित कराये; फिर उसके भीतर प्रवेश किया।
ज्वालयित्वा गृहे दीपान् प्रविवेश गृहं नृपः। वहाँ कैकेयी धरतीपर पड़ी सो रही थी। उसका प्रत्येक
अशोभनाङ्गीं कैकेयीं स्वपन्तीं पतितां भुवि ॥ ३४ अङ्ग अशोभन जान पड़ता था। उसे इस अवस्थामें
देख राजाने उठाकर हृदयसे लगाया और उसको प्रिय
दृष्ट्वा दशरथः प्राह तस्याः प्रियमिदं त्विति। लगनेवाले ये वचन कहे - 'प्रिये ! मेरी उत्तम बात
आश्लिष्योत्थाय तां राजा शृणु मे परमं वचः ॥ ३५ सुनो। सुन्दरि ! जो तुम्हारे प्रति अपनी मातासे भी अधिक
प्रेम रखते हैं, उन्हीं श्रीरामचन्द्रका कल राज्याभिषेक
स्वमातुरधिकां नित्यं यस्ते भक्तिं करोति वै। होगा' ॥ ३२-३६॥
तस्याभिषेकं रामस्य श्वो भविष्यति शोभने ॥ ३६
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