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संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

२५८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५८

२५८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५८
नर्क्षवृक्षनदीनाम्नीं नान्तपर्वतनामिकाम्। हीन हो और जिसकी सूरत डरावनी हो, ऐसी कन्यासे
न पक्ष्यहिप्रेष्यनाम्नीं न च भीषणनामिकाम्॥ ४२ विवाह न करे। जिसका नाम नक्षत्र, वृक्ष या नदीके नामपर
रखा गया हो, अथवा जिसके नामके अन्तमें पर्वतवाचक
अव्यङ्गाङ्गीं सौम्यनाम्नीं हंसवारणगामिनीम्। शब्द हो, अथवा जो पक्षी, साँप और दास आदि अर्थवाले
तन्वोष्ठकेशदशनां मृद्वङ्गीमुद्वहेत् स्त्रियम्॥ ४३ नामोंसे युक्त हो, या जिसका भयंकर नाम हो, ऐसी
कन्यासे भी विवाह न करे। जिसके शरीरके सभी अवयव
ब्राह्मेण विधिना कुर्यात् प्रशस्तेन द्विजोत्तमः। सुडौल हों, नाम कोमल और मधुर हो, जो हंस या
गजराजके समान मन्द एवं लीलायुक्त गतिसे चलनेवाली
यथायोगं तथा ह्येवं विवाहं वर्णधर्मतः॥ ४४ हो, जिसके अधर, दाँत और केश पतले हों एवं जिसका
शरीर कोमल हो, ऐसी कन्यासे विवाह करे। श्रेष्ठ द्विजातिको
उषःकाले समुत्थाय कृतशौचो द्विजोत्तमः। चाहिये कि यथासम्भव सर्वोत्तम ब्राह्मविधिसे विवाह करे।
कुर्यात् स्नानं ततो विद्वान्दन्तधावनपूर्वकम्॥ ४५ इस प्रकार वर्णधर्मके अनुसार विवाह-संस्कार पूर्ण करना
चाहिये॥ ३९-४४॥
मुखे पर्युषिते नित्यं यतोऽपूतो भवेन्नरः। इसके बाद विद्वान् द्विजको चाहिये कि प्रतिदिन
तस्माच्छुष्कमथार्द्रं वा भक्षयेद्दन्तधावनम्॥ ४६ सूर्योदयसे पूर्व उठकर शौचादिके अनन्तर दन्तधावन
करके तुरंत स्नान कर ले। प्रतिदिन रातमें सोकर उठनेके
खदिरं च कदम्बं च करञ्जं च वटं तथा। बाद मुख पर्युषित होनेके कारण मनुष्य अपवित्र रहता है,
अपामार्गं च बिल्वं च अर्कश्चोदुम्बरस्तथा॥ ४७ अतः शुद्धि के लिये सूखा या गीला दन्तधावन अवश्य
चबाना चाहिये। दाँतुनके लिये खदिर, कदम्ब, करञ्ज,
एते प्रशस्ताः कथिता दन्तधावनकर्मणि। वट, अपामार्ग, बिल्व, मदार और गूलर—ये वृक्ष उत्तम
दन्तधावनकाष्ठं च वक्ष्यामि तत्प्रशस्तताम्॥ ४८ माने गये हैं। दन्तधावनके लिये उपयुक्त काष्ठ और उसकी
उत्तमताका लक्षण बता रहा हूँ॥ ४५-४८॥
सर्वे कण्टकिनः पुण्याः क्षीरिणस्तु यशस्विनः। जितने काँटेवाले वृक्ष हैं, वे सभी पवित्र हैं। जितने
अष्टाङ्गुलेन मानेन तत्प्रमाणमिहोच्यते॥ ४९ दूधवाले वृक्ष हैं, वे सभी यश देनेवाले हैं। दाँतुनकी लकड़ीकी
लम्बाई आठ अंगुलकी बतायी जाती है। अथवा बित्तामात्र
प्रादेशमात्रमथवा तेन दन्तान् विशोधयेत्। उसकी लम्बाई होनी चाहिये। ऐसी दाँतुनसे दाँतोंको स्वच्छ
प्रतिपद्दर्शषष्ठीषु नवम्यां चैव सत्तमाः॥ ५० करना चाहिये। परंतु साधुशिरोमणियो! प्रतिपदा, अमावास्या,
षष्ठी और नवमीको काठकी दाँतुन नहीं करनी चाहिये;
दन्तानां काष्ठसंयोगाद् दहत्यासप्तमं कुलम्। क्योंकि उक्त तिथियोंको यदि दाँतसे काठका संयोग हो
अलाभे दन्तकाष्ठस्य प्रतिषिद्धे च तद्दिने॥ ५१ जाय तो वह सात पीढ़ीत्तकके कुलको दग्ध कर डालता
है। जिस दिन दाँतुन न मिले या जिस दिन दाँतुन करना
अपां द्वादशगण्डूषैर्मुखशुद्धिर्विधीयते। निषिद्ध है, उस दिन बारह बार जलका कुल्ला करके
मुखकी शुद्धि कर लेनेकी विधि है॥ ४९-५१ १/२॥
स्नात्वा मन्त्रवदाचम्य पुनराचमनं चरेत्॥ ५२ दाँतुनके बाद स्नान करे। फिर मन्त्रपाठपूर्वक आचमन
करके पुनः आचमन करना चाहिये। मन्त्रपाठपूर्वक अपने
मन्त्रवान् प्रोक्ष्य चात्मानं प्रक्षिपेदुदकाञ्जलिम्। ऊपर भी जल छिड़के और सूर्यके लिये अर्घ्यके तौरपर
आदित्येन सह प्रातर्मन्देहा नाम राक्षसाः॥ ५३ जलाञ्जलि भरकर उछाले। अव्यक्तजन्मा ब्रह्माजीके वरदानसे
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अध्याय ५८ ] क्षत्रियादि वर्णोंके धर्म और ब्रह्मचर्य तथा गृहस्थाश्रमके धर्मोंका वर्णन २५९
युध्यन्ति वरदानेन ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः । प्रबल हुए 'मन्देह' नामक राक्षस प्रतिदिन प्रातःकाल
उदकाञ्जलिविक्षेपो गायत्र्या चाभिमन्त्रितः ॥ ५४ आकर सूर्यके साथ युद्ध करते हैं; किंतु जब गायत्रीसे
अभिमन्त्रित जलाञ्जलि सूर्यदेवके सामने उछाली जाती है,
तान् हन्ति राक्षसान् सर्वान् मन्देहान् रविवैरिणः । तब वह उन समस्त सूर्य-वैरी मन्देह नामके राक्षसोंको
ततः प्रयाति सविता ब्राह्मणै रक्षितो दिवि ॥ ५५ मार भगाती है।* तत्पश्चात् महाभाग मरीचि आदि ब्राह्मणों
और सनकादिक योगियोंद्वारा रक्षित हो, भगवान् सूर्यदेव
मरीच्याद्यैर्महाभागैः सनकाद्यैश्च योगिभिः । आकाशमें आगे बढ़ते हैं। इसलिये द्विजको चाहिये कि
तस्मान्न लङ्घयेत्संध्यां सायं प्रातःर्द्विजः सदा ॥ ५६ सायं और प्रातःकालकी संध्याका कभी उल्लङ्घन न करे।
जो मोहवश संध्याका उल्लङ्घन करता है, वह अवश्य
उल्लङ्घयति यो मोहात्स याति नरकं ध्रुवम् । ही नरकमें पड़ता है। यदि सायंकालमें मन्त्रपाठपूर्वक
सायं मन्त्रवदाचम्य प्रोक्ष्य सूर्यस्य चाञ्जलिम् ॥ ५७ आचमन करके अपने ऊपर जल छिड़ककर फिर भगवान्
सूर्यको जलाञ्जलि अर्पित की जाय और उनकी परिक्रमा
दत्त्वा प्रदक्षिणं कृत्वा जलं स्पृष्ट्वा विशुध्यति । करके पुनः जलका स्पर्श किया जाय तो वह द्विज शुद्ध
पूर्वा संध्यां सनक्षत्रामुपक्रम्य यथाविधि ॥ ५८ हो जाता है। प्रातःकालकी संध्या तारोंके रहते-रहते
विधिपूर्वक आरम्भ करे और जबतक तारोंका दर्शन हो,
गायत्रीमभ्यसेत्तावद्यावदृक्षाणि पश्यति । तबतक गायत्रीका जप करता रहे। तत्पश्चात् घरमें आकर
ततस्त्वावसथं प्राप्य होमं कुर्यात्स्वयं बुधः ॥ ५९ विद्वान् पुरुषको स्वयं हवन करना चाहिये। फिर जो
भृत्य-पालनीय कुटुम्बीजन तथा दास आदि हों, उनके
संचिन्त्य भृत्यवर्गस्य भरणार्थं विचक्षणः । भरण-पोषणके लिये विद्वान् गृहस्थ चिन्ता (आवश्यक
ततः शिष्यहितार्थाय स्वाध्यायं किंचिदाचरेत् ॥ ६० प्रबन्ध) करे। उसके बाद शिष्योंके हितके लिये कुछ
देरतक स्वाध्याय करे। उत्तम द्विजको चाहिये कि अपनी
ईश्वरं चैव रक्षार्थमभिगच्छेद्द्विजोत्तमः । रक्षाके लिये ईश्वरका सहारा ले। फिर दूर जाकर पूजाके
कुशपुष्पेन्धनादीनि गत्वा दूरात्समाहरेत् ॥ ६१ लिये कुश, फूल और हवनके लिये समिधा आदि ले
आये और पवित्र स्थानमें एकाग्रचित्तसे बैठकर मध्याह्नकालिक
माध्याह्निकीं क्रियां कुर्याच्छुचौ देशे समाहितः । क्रिया (संध्योपासना आदि) करे ॥ ५२-६११/२ ॥
विधिं स्नानस्य वक्ष्यामि समासात् पापनाशनम् ॥ ६२
अब हम थोड़ेमें स्नानकी विधि बतला रहे हैं जो
स्नात्वा येन विधानेन सद्यो मुच्येत किल्बिषात् । समस्त पापोंको नष्ट करनेवाली है। उस विधिसे स्नान
सुधीः स्नानार्थमादाय शुक्लां कुशतिलैः सह ॥ ६३ करके मनुष्य तत्काल पापोंसे मुक्त हो जाता है। बुद्धिमान्
पुरुषको चाहिये कि स्नानके लिये कुश और तिलोंके साथ
सुमनाश्च ततो गच्छेन्नदीं शुद्धां मनोरमाम् । शुद्ध मिट्टी ले ले तथा प्रसन्नचित्त होकर शुद्ध और मनोहर
नद्यां तु विद्यमानायां न स्नायादल्पवारिषु ॥ ६४ नदीके तटपर जाय। नदीके होते हुए छोटे जलाशयोंमें स्नान
न करे। वहाँ पवित्र स्थानपर उसे छिड़ककर कुश और
शुचौ देशे समभ्युक्ष्य स्थापयेत्कुशमृत्तिकाम् । मृत्तिका आदि रख दे। फिर विद्वान् पुरुष मिट्टी और जलसे
मृत्तोयेन स्वकं देहमभिप्रक्षाल्य यत्नतः ॥ ६५

  • यहाँ 'मन्देह' राक्षस आलस्यके प्रतीक हैं। जिस देशमें जब रात बीतकर प्रातःकाल होता है, वहाँके लोगोंको उसी समय
    आलस्य दबाये रहता है। 'सूर्य आत्मा जगतः' के अनुसार सूर्य सबके आत्मा हैं, अतः किसी भी प्राणीपर आलस्यका आक्रमण सूर्यपर
    मन्देहका आक्रमण है। स्नान और सूर्यार्घ्यसे इस मन्देह या आलस्यका निवारण सबके प्रत्यक्ष अनुभवमें आता है।