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संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय १

८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय १
नत्वा तु माधवं देवं कृत्वा च पितृतर्पणम्। उन्होंने भगवान् वेणीमाधवको नमस्कार किया; फिर पितरोंका
दृष्ट्वा तत्र भरद्वाजं पुण्यतीर्थनिवासिनम्॥ ९ तर्पण करके उस पावन तीर्थके निवासी भरद्वाज मुनिका
तं पूजयित्वा विधिवत्तेनैव च सुपूजिताः। दर्शन किया। वहाँ उन ऋषियोंने भरद्वाजजीका भलीभाँति
आसनेषु विचित्रेषु वृष्यादिषु यथाक्रमम्॥ १० पूजन किया और स्वयं भी भरद्वाजजीके द्वारा पूजित हुए।
भरद्वाजेन दत्तेषु आसीनास्ते तपोधनाः। तत्पश्चात् वे सभी तपोधन भरद्वाज मुनिके दिये हुए वृषी*
कृष्णाश्रिताः कथाः सर्वे परस्परमथाब्रुवन् ॥ ११ आदि विचित्र आसनोंपर विराजमान हुए और परस्पर भगवान्
श्रीकृष्णसे सम्बन्ध रखनेवाली कथाएँ कहने लगे। उन
कथान्तेषु ततस्तेषां मुनीनां भावितात्मनाम्। शुद्ध अन्तःकरणवाले मुनियोंकी कथा हो ही रही थी कि
आजगाम महातेजास्तत्र सूतो महामतिः ॥ १२ व्यासजीके शिष्य लोमहर्षण नामक सूतजी वहाँ आ पहुँचे।
व्यासशिष्यः पुराणज्ञो लोमहर्षणसंज्ञकः। वे अत्यन्त तेजस्वी, परम बुद्धिमान् और पुराणोंके विद्वान्
तान् प्रणम्य यथान्यायं स च तैश्चाभिपूजितः ॥ १३ थे। सूतजीने वहाँ बैठे हुए सभी ऋषियोंको यथोचित विधिसे
प्रणाम किया और स्वयं भी उनके द्वारा सम्मानित हुए।
उपविष्टो यथायोग्यं भरद्वाजमतेन सः। फिर भरद्वाजजीकी अनुमतिसे वे यथायोग्य आसनपर बैठे।
व्यासशिष्यं सुखासीनं ततस्तं लोमहर्षणम्। इस प्रकार जब वे सुखपूर्वक विराजमान हुए, तब उस
स पप्रच्छ भरद्वाजो मुनीनामग्रतस्तदा॥ १४ समय उन व्यासशिष्य लोमहर्षणजीसे भरद्वाजजीने सभी
मुनियोंके समक्ष यह प्रश्न किया ॥ ८-१४॥
भरद्वाज उवाच भरद्वाजजी बोले- सूतजी! पूर्वकालमें शौनकजीके
शौनकस्य महासत्रे वाराहाख्या तु संहिता।
महान् यज्ञमें हम सभी लोगोंने आपसे 'वाराह-संहिता'
त्वत्तः श्रुता पुरा सूत एतैरस्माभिरेव च॥ १५
सुनी थी। अब हम 'नरसिंहपुराण' की संहिता सुनना
साम्प्रतं नारसिंहाख्यां त्वत्तः पौराणसंहिताम्।
चाहते हैं तथा ये ऋषि लोग भी उसे ही सुननेके लिये
श्रोतुमिच्छाम्यहं सूत श्रोतुकामा इमे स्थिताः ॥ १६
यहाँ उपस्थित हैं। अतः महामुने सूतजी! आज प्रातःकाल
अतस्त्वां परिपृच्छामि प्रश्नमेतं महामुने।
इन महात्मा मुनियोंके समक्ष हम आपसे ये प्रश्न पूछते
ऋषीणामग्रतः सूत प्रातर्ह्येषां महात्मनाम् ॥ १७
हैं- 'यह चराचर जगत् कहाँसे उत्पन्न हुआ है? कौन इसकी
कुत एतत् समुत्पन्नं केन वा परिपाल्यते। रक्षा करता है? अथवा किसमें इसका लय होता है?
कस्मिन् वा लयमध्येति जगदेतच्चराचरम् ॥ १८ महाभाग! इस भूमिकामान क्या है तथा महामते!
किं प्रमाणं च वै भूमेर्नृसिंहः केन तुष्यति। भगवान् नृसिंह किस कर्मसे संतुष्ट होते हैं- यह हमें
कर्मणा तु महाभाग तन्मे ब्रूहि महामते ॥ १९ बताइये। सृष्टिका आरम्भ कैसे हुआ? उसका अवसान
कथं च सृष्टेरादिः स्यादवसानं कथं भवेत्। (अन्त) किस प्रकार होता है? युगोंकी गणना कैसे होती
कथं युगस्य गणना किं वा स्यात्तु चतुर्युगम् ॥ २० है? चतुर्युगका स्वरूप क्या है? उन चारों युगोंमें क्या
अन्तर होता है? कलियुगमें लोगोंकी क्या अवस्था होती
को वा विशेषस्तेष्वत्र का वावस्था कलौ युगे।
है? तथा देवतालोग भगवान् नरसिंहकी किस प्रकार
कथमाराध्यते देवो नरसिंहोऽप्यमानुषैः ॥ २१ आराधना करते हैं? पुण्यक्षेत्र कौन-कौन हैं? पावन
क्षेत्राणि कानि पुण्यानि के च पुण्याः शिलोच्चयाः। पर्वत कौन-से हैं? और मनुष्योंके पापोंको हर लेनेवाली
नद्यश्च काः पराः पुण्या नृणां पापहराः शुभाः ॥ २२ परम पावन एवं उत्तम नदियाँ कौन-कौन-सी हैं?

  • व्रतपरायण पुरुषके लिये कुशका बना हुआ एक विशेष प्रकारका आसन।
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अध्याय १ ] प्रयागमें ऋषियोंका समागम; सूतजीके प्रति भरद्वाजजीका प्रश्न ९
देवादीनां कथं सृष्टिर्मनोर्मन्वन्तरस्य तु। देवताओंकी सृष्टि कैसे हुई? मनु, मन्वन्तर एवं विद्याधर
तथा विद्याधरादीनां सृष्टिरादौ कथं भवेत्॥ २३ आदिकी सृष्टि किस प्रकार होती है? कौन-कौन राजा
यज्ञ करनेवाले हुए हैं और किस-किसने परम उत्तम
यज्वानः के च राजानः के च सिद्धिं परां गताः। सिद्धि प्राप्त की है?' महाभाग! ये सारी बातें आप
एतत्सर्वं महाभाग कथयस्व यथाक्रमम्॥ २४ क्रमशः बताइये ॥ १५-२४॥
सूत उवाच सूतजी बोले-तपोधनो! मैं जिन गुरुदेव व्यासजीके
व्यासप्रसादाज्जानामि पुराणानि तपोधनाः। प्रसादसे पुराणोंका ज्ञान प्राप्त कर सका हूँ, उनकी
भक्तिपूर्वक वन्दना करके आपलोगोंसे नरसिंहपुराणकी
तं प्रणम्य प्रवक्ष्यामि पुराणं नारसिंहकम्॥ २५ कथा कहना आरम्भ करता हूँ। जो समस्त देवताओंके
पाराशर्यं परमपुरुषं विश्वदेवैकयोनिं एकमात्र कारण और वेदों तथा उनके छहों अङ्गोंद्वारा
जाननेयोग्य परम पुरुष विष्णुके स्वरूप हैं; जो विद्यावान्,
विद्यावन्तं विपुलमतिदं वेदवेदाङ्गवेद्यम्। विमल बुद्धिदाता, नित्य शान्त, विषयकामनाशून्य और
शश्वच्छान्तं शमितविषयं शुद्धतेजो विशालं पापरहित हैं, उन विशुद्ध तेजोमय महात्मा पराशरनन्दन
वेदव्यासं विगतशमलं सर्वदाहं नमामि॥ २६ वेदव्यासजीको मैं सदा प्रणाम करता हूँ। उन अमित
नमो भगवते तस्मै व्यासायामिततेजसे। तेजस्वी भगवान् व्यासजीको नमस्कार है, जिनकी कृपासे
मैं भगवान् वासुदेवकी इस कथाको कह सकूँगा।
यस्य प्रसादाद्वक्ष्यामि वासुदेवकथामिमाम्॥ २७ मुनिगण! आपलोगोंने भलीभाँति विचार करके मुझसे
सुनिर्णीतो महान् प्रश्नस्त्वया यः परिकीर्तितः। जो महान् प्रश्न पूछे हैं, उनका उत्तर भगवान् विष्णुकी
विष्णुप्रसादेन विना वक्तुं केनापि शक्यते ॥ २८ कृपा हुए बिना कौन बतला सकता है? तथापि भरद्वाजजी!
भगवान् नरसिंहकी कृपाके बलसे ही आपके प्रश्नोंके
तथापि नरसिंहस्य प्रसादादेव तेऽधुना। उत्तरमें अत्यन्त पवित्र नरसिंहपुराणकी कथा आरम्भ
प्रवक्ष्यामि महापुण्यं भारद्वाज शृणुष्व मे॥ २९ करता हूँ। आप ध्यानसे सुनें। अपने शिष्योंके साथ जो-
जो मुनि यहाँ उपस्थित हैं, वे सब लोग भी सावधान
शृण्वन्तु मुनयः सर्वे सशिश्यास्त्वत्र ये स्थिताः। होकर सुनें। मैं सभीको यथावत् रूपसे नरसिंहपुराणकी
पुराणं नरसिंहस्य प्रवक्ष्यामि यथातथा॥ ३० कथा सुनाता हूँ॥ २५-३०॥
नारायणादिदं सर्वं समुत्पन्नं चराचरम्। यह समस्त चराचर जगत् भगवान् नारायणसे ही
तेनैव पाल्यते सर्वं नरसिंहादिमूर्तिभिः ॥ ३१ उत्पन्न हुआ और वे ही नरसिंहादि रूपोंसे सबका पालन
करते हैं। इसी प्रकार अन्तमें यह जगत् उन्हीं ज्योतिःस्वरूप
तथैव लीयते चान्ते हरौ ज्योतिःस्वरूपिणि। भगवान् विष्णुमें लीन हो जाता है। भगवान् जिस प्रकार
यथैव देवः सृजति तथा वक्ष्यामि तच्छृणु॥ ३२ सृष्टि करते हैं, उसे मैं बतलाता हूँ, आप सुनें। सृष्टिकी
कथा पुराणोंमें ही विस्तारके साथ वर्णित है, अतः
पुराणानां हि सर्वेषामयं साधारणः स्मृतः। पुराणोंका लक्षण बतानेके लिये यह एक श्लोक साधारणतया
श्लोको यस्तं मुने श्रुत्वा निःशेषं त्वं ततः शृणु॥ ३३ सभी पुराणोंमें कहा गया है। मुने! इस श्लोकको पहले
सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च। सुनकर फिर सारी बातें सुनियेगा। यह श्लोक इस
प्रकार है-सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर और वंशानुचरित-
वंशानुचरितं चैव पुराणं पञ्चलक्षणम्॥ ३४ इन्हीं पाँच लक्षणोंसे युक्त 'पुराण' होता है। आदिसर्ग,
आदिसर्गोऽनुसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च। अनुसर्ग, वंश, मन्वन्तर और वंशानुचरित-इन सबका
वंशानुचरितं चैव वक्ष्याम्यनुसमासतः ॥ ३५ मैं क्रमशः संक्षेपस्वरूपसे वर्णन करता हूँ॥ ३१-३५॥
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