संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
१८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५
१८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५
सर्गे तु भूतानि धियश्च खानि
ख्यातानि सर्वं सृजते महात्मा।
स एव पश्चाच्चतुरास्यरूपी
मुनिस्वरूपी च सृजत्यनन्तः ॥ ९
सर्ग अर्थात् आदिसृष्टिमें महात्मा भगवान् नारायण पाँच
महाभूत, बुद्धि तथा पूर्वोक्त इन्द्रियवर्ग-इन सबको उत्पन्न
करते हैं। इसके पश्चात् (अनुसर्गकालमें) वे अनन्तदेव
स्वयं ही चतुर्मुख ब्रह्मा और मरीचि आदि मुनियोंके
रूपसे प्रकट हो जगत्की सृष्टि करते हैं॥५-९॥
इति श्रीनरसिंहपुराणे चतुर्थोऽध्यायः ॥४॥
इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें चौथा अध्याय पूरा हुआ॥४॥
पाँचवाँ अध्याय
रुद्र आदि सर्गों और अनुसर्गोंका वर्णन; दक्ष प्रजापतिकी कन्याओंकी संततिका विस्तार
भरद्वाज उवाच
रुद्रसर्गं तु मे ब्रूहि विस्तरेण महामते।
पुनः सर्वे मरीच्याद्याः ससृजुस्ते कथं पुनः ॥ १
मित्रावरुणपुत्रत्वं वसिष्ठस्य कथं भवेत्।
ब्रह्मणो मनसः पूर्वमुत्पन्नस्य महामते॥ २
सूत उवाच
रुद्रसृष्टिं प्रवक्ष्यामि तत्सर्गांश्चैव सत्तम।
प्रतिसर्गं मुनीनां तु विस्तराद्वदतः शृणु॥ ३
कल्पादावात्मनस्तुल्यं सुतं प्रध्यायतःस्ततः।
प्रादुरासीत् प्रभोरङ्के कुमारो नीललोहितः॥ ४
अर्धनारीनरवपुः प्रचण्डोऽतिशरीरवान्।
तेजसा भासयन् सर्वा दिशश्च प्रदिशश्च सः॥ ५
तं दृष्ट्वा तेजसा दीप्तं प्रत्युवाच प्रजापतिः।
विभजात्मानमद्य त्वं मम वाक्यान्महामते॥ ६
इत्युक्तो ब्रह्मणा विप्र रुद्रस्तेन प्रतापवान्।
स्त्रीभावं पुरुषत्वं च पृथक् पृथगथाकरोत्॥ ७
बिभेद पुरुषत्वं च दशधा चैकधा च सः।
तेषां नामानि वक्ष्यामि शृणु मे द्विजसत्तम॥ ८
अजैकपादहिर्बुध्न्यः कपाली रुद्र एव च।
हरश्च बहुरूपश्च त्र्यम्बकश्चापराजितः॥ ९
वृषाकपिश्च शम्भुश्च कपर्दी रैवतस्तथा।
एकादशैते कथिता रुद्रास्त्रिभुवनेश्वराः॥ १०
श्रीभरद्वाजजी बोले- महामते! अब मुझसे
'रुद्रसर्ग' का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये तथा यह भी
बताइये कि मरीचि आदि ऋषियोंने पहले किस प्रकार
सृष्टि की? महाबुद्धिमान् सूत ! वसिष्ठजी तो पहले
ब्रह्माजीके मनसे उत्पन्न हुए थे; फिर वे मित्रावरुणके पुत्र
कैसे हो गये? ॥१-२॥
सूतजी बोले-साधुशिरोमणे! आपके प्रश्नानुसार
मैं अब रुद्र-सृष्टिका तथा उसमें होनेवाले सर्गोंका वर्णन
करूँगा, साथ ही मुनियोंद्वारा सम्पादित प्रतिसर्ग
(अनुसर्ग)-को भी मैं विस्तारके साथ बताऊँगा; आपलोग
ध्यानसे सुनें। कल्पके आदिमें प्रभु ब्रह्माजी अपने ही
समान शक्तिशाली पुत्र होनेका चिन्तन कर रहे थे। उस
समय उनकी गोदमें एक नीललोहित वर्णका बालक
प्रकट हुआ। उसका आधा शरीर स्त्रीका और आधा
पुरुषका था। वह प्रचण्ड एवं विशालकाय था और
अपने तेजसे दिशाओं तथा अवान्तर दिशाओंको प्रकाशित
कर रहा था। उसे तेजसे देदीप्यमान देख प्रजापतिने
कहा- 'महामते ! इस समय मेरे कहनेसे तुम अपने
शरीरके दो भाग कर लो।' विप्र! ब्रह्माजीके ऐसा
कहनेपर प्रतापी रुद्रने अपने स्त्रीरूप और पुरुषरूपको
अलग-अलग कर लिया। द्विजश्रेष्ठ ! फिर पुरुषरूपको
उन्होंने ग्यारह स्वरूपोंमें विभक्त किया; मैं उन सबके
नाम बतलाता हूँ, सुनें। अजैकपात्, अहिर्बुध्न्य, कपाली,
हर, बहुरूप, त्र्यम्बक, अपराजित, वृषाकपि, शम्भु, कपर्दी
और रैवत-ये 'ग्यारह रुद्र' कहे गये हैं, जो तीनों
अध्याय ५ ] रुद्र आदि सर्गों और अनुसर्गोंका वर्णन; दक्ष प्रजापतिकी कन्याओंकी संततिका विस्तार १९
स्त्रीत्वं चैव तथा रुद्रो बिभेद दशधैकधा। भुवनोंके स्वामी हैं। पुरुषकी भाँति स्त्रीरूपके भी रुद्रने
उमैव बहुरूपेण पत्नी सैव व्यवस्थिता॥ ११ ग्यारह विभाग किये। भगवती उमा ही अनेक रूप
धारण कर इन सबकी पत्नी हैं॥ ३—११॥
तपः कृत्वा जले घोरमुत्तीर्णः स यदा पुरा। विप्रेन्द्र! पूर्वकालमें प्रतापी रुद्रदेव जलमें घोर तपस्या
तदा स सृष्टवान् देवो रुद्रस्तत्र प्रतापवान्॥ १२ करके जब बाहर निकले, तब अपने तपोबलसे उन्होंने
तपोबलेन विप्रेन्द्र भूतानि विविधानि च। वहाँ नाना प्रकारके भूतोंकी सृष्टि की। सिंह, ऊँट और
पिशाचान् राक्षसांश्चैव सिंहोष्ट्रमकराननान्॥ १३ मगरके समान मुँहवाले पिशाचों, राक्षसों तथा वेताल
वेतालप्रमुखान् भूतानन्यांश्चैव सहस्रशः। आदि अन्य सहस्रों भूतोंको उत्पन्न किया। साढ़े तीस
विनायकानामुग्राणां त्रिंशत्कोट्यर्थमेव च॥ १४ करोड़ उग्र स्वभाववाले विनायकगणोंकी सृष्टि की तथा
अन्यकार्यं समुद्दिश्य सृष्टवान् स्कन्दमेव च। दूसरे कार्यके उद्देश्यसे स्कन्दको उत्पन्न किया। इस
एवं प्रकारो रुद्रोऽसौ मया ते कीर्तितः प्रभुः॥ १५ प्रकार भगवान् रुद्र तथा उनके सर्गका मैंने आपसे वर्णन
किया॥ १२—१५॥
अनुसर्गं मरीच्यादेः कथयामि निबोध मे। अब मरीचि आदि ऋषियोंके अनुसर्गका वर्णन
देवादिस्यावरान्ताश्च प्रजाः सृष्टाः स्वयम्भुवा॥ १६ करता हूँ, आप सुनें। स्वयम्भू ब्रह्माजीने देवताओंसे
यदास्य च प्रजाः सर्वा न व्यवर्धन्त धीमतः। लेकर स्थावरोंतक सारी प्रजाओंकी सृष्टि की। किंतु इन
तदा मानसपुत्रान् स सदृशानात्मनोऽसृजत्॥ १७ बुद्धिमान् ब्रह्माजीकी ये सब प्रजाएँ जब वृद्धिको प्राप्त
मरीचिमत्र्यङ्गिरसं पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम्। नहीं हुई, तब इन्होंने अपने ही समान मानस-पुत्रोंकी
प्रचेतसं वसिष्ठं च भृगुं चैव महामतिम्॥ १८ सृष्टि की। मरीचि, अत्रि, अङ्गिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु,
नव ब्रह्माण इत्येते पुराणे निश्चयं गताः। प्रचेता, वसिष्ठ और महाबुद्धिमान् भृगुको उत्पन्न किया।
अग्निश्च पितरश्चैव ब्रह्मपुत्रौ तु मानसौ॥ १९ ये लोग पुराणमें नौ ब्रह्मा निश्चित किये गये हैं। ब्रह्मन् !
सृष्टिकाले महाभागौ ब्रह्मन् स्वायम्भुवोद्गतौ। अग्नि और पितर भी ब्रह्माके ही मानस-पुत्र हैं। इन दोनों
शतरूपां च सृष्ट्वा तु कन्यां स मनवे ददौ॥ २० महाभागोंको सृष्टिकालमें स्वयम्भू ब्रह्माजीने उत्पन्न किया।
फिर उन्होंने 'शतरूपा' नामक कन्याकी सृष्टि करके
उसे मनुको दे दिया॥ १६—२०॥
तस्माच्च पुरुषाद्देवी शतरूपा व्यजायत। उन स्वायम्भुव मनुसे देवी शतरूपाने 'प्रियव्रत'
प्रियव्रतोत्तानपादौ प्रसूतिं चैव कन्यकाम्॥ २१ और 'उत्तानपाद' नामक दो पुत्र उत्पन्न किये और
ददौ प्रसूतिं दक्षाय मनुः स्वायम्भुवः सुताम्। 'प्रसूति' नामवाली एक कन्याको जन्म दिया। स्वायम्भुव
प्रसूत्यां च तदा दक्षश्चतुर्विंशतिकं तथा॥ २२ मनुने अपनी कन्या प्रसूति दक्षको ब्याह दी। दक्षने
ससर्ज कन्यकास्तासां शृणु नामानि मेऽधुना। प्रसूतिसे चौबीस कन्याएँ उत्पन्न कीं। अब मुझसे उन
श्रद्धा लक्ष्मीर्धृतिस्तुष्टिः पुष्टिर्मेधा तथा क्रिया॥ २३ कन्याओंके नाम सुनें—श्रद्धा, लक्ष्मी, धृति, तुष्टि, पुष्टि,
बुद्धिर्लज्जा वपुः शान्तिः सिद्धिः कीर्तिस्त्रयोदशी। मेधा, क्रिया, बुद्धि, लज्जा, वपु, शान्ति, सिद्धि और
अपत्यार्थं प्रजग्राह धर्मो दाक्षायणीः प्रभुः॥ २४ तेरहवीं कीर्ति थी। भगवान् धर्मने संतानोत्पत्तिके लिये
श्रद्धादीनां तु पत्नीनां जाताः कामादयः सुताः। इन तेरह कन्याओंका पाणिग्रहण किया। धर्मकी इन
धर्मस्य पुत्रपौत्राद्यैर्धर्मवंशो विवर्धितः॥ २५ श्रद्धा आदि पत्नियोंके गर्भसे काम आदि पुत्र उत्पन्न
हुए। अपने पुत्र और पौत्र आदिसे धर्मका वंश खूब
बढ़ा॥ २१—२५॥
In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth