संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
अध्याय २८ ] शांतनुका चरित्र ९३
अध्याय २८ ] शांतनुका चरित्र ९३
शांतनुः ॥ १५ ॥ तस्य देवदत्तस्यन्दनारोहणमशक्यं
बहुरूपके गर्भसे शांतनु नामक पुत्र प्राप्त हुआ, जिनमें
बभूव पुरतः शक्यं च ॥ १६ ॥
देवताओंके दिये हुए रथपर चढ़नेकी पहले शक्ति
नहीं थी, परंतु पीछे उसपर चढ़नेकी शक्ति हो
गयी ॥ १३–१६ ॥
इति श्रीनरसिंहपुराणे सोमवंशवर्णनं नाम सप्तविंशोऽध्यायः ॥ २७ ॥
इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'सोमवंशवर्णन' नामक सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २७ ॥
अट्ठाईसवाँ अध्याय
शांतनुका चरित्र
भरद्वाज उवाच
भरद्वाजजीने पूछा- शांतनुको पहले देवताओंके
स्यन्दनारोहणे पूर्वमशक्तिः शांतनोः कथम्।
रथपर चढ़नेकी शक्ति क्यों नहीं थी ? और फिर उनमें
वह शक्ति कैसे आ गयी ? इसे आप हमें बतलायें ॥ १ ॥
पश्चाच्छक्तिः कथं चासीत् तस्य वै तद्वदस्व नः ॥ १
सूत उवाच
सूतजी बोले - भरद्वाजजी ! यह पुराना इतिहास है;
इसे मैं कहता हूँ, सुनिये। शांतनुका चरित्र मनुष्योंके
भरद्वाज शृणुष्वैतत् पुरावृत्तं वदामि ते।
समस्त पापोंका नाश करनेवाला है। शांतनु पूर्वकालमें
सर्वपापहरं तद्धि चरितं शांतनोर्नृणाम् ॥ २
नृसिंहरूपधारी भगवान् विष्णुके भक्त थे और नारदजीकी
बतायी हुई विधिसे भगवान् लक्ष्मीपतिकी सदा पूजा
बभूव शांतनुर्भक्तो नरसिंहतनौ पुरा।
किया करते थे। विप्रवर ! एक बार राजा शांतनु भूलसे
नारदोक्तविधानेन पूजयामास माधवम् ॥ ३
श्रीनृसिंहदेवके निर्माल्यको लाँघ गये, अतः वे उसी
नरसिंहस्य देवस्य निर्माल्यं तेन लङ्घितम् ।
क्षण देवताओंके दिये हुए उत्तम रथपर चढ़नेमें असमर्थ
हो गये। तब वे सोचने लगे - 'यह क्या बात है ?
राज्ञा शांतनुना विप्र तस्मात् स्यन्दनमुत्तमम् ॥ ४
इस रथपर चढ़नेमें हमारी गति सहसा कुण्ठित क्यों
देवदत्तं तदारोढुमशक्तस्तत्क्षणादभूत् ।
हो गयी ?' कहते हैं, इस प्रकार दुःखी होकर सोचते
किमियं मे गतिर्भग्ना सहसा वै रथात्ततः ॥ ५
हुए उन राजाके पास नारदजी आये और उन्होंने
राजा शांतनुसे पूछा- 'राजन् ! तुम क्यों विषादमें डूबे
दुःखं चिन्तयतस्तस्य सम्प्राप्तो नारदः किल ।
हुए हो ?' ॥ २-६॥
किं विषण्णः स्थितो राजन्निति पृष्टः स शांतनुः ॥ ६
राजाने कहा - 'नारदजी ! मेरी गति कुण्ठित कैसे
नारदैतन्न जानामि गतिभङ्गस्य कारणम् ।
हुई, इसका कारण मुझे ज्ञात नहीं हो रहा है, इसीसे मैं
इत्युक्तो नारदो ध्यात्वा ज्ञात्वा तत्कारणं ततः ॥ ७
चिन्तित हूँ।' उनके यों कहनेपर नारदजीने ध्यान लगाया
और उसका कारण जानकर राजा शांतनुसे, जो विनीतभावसे
शांतनुं प्राह राजानं विनयेन यतः स्थितः ।
वहाँ खड़े थे, कहा- 'राजन् ! अवश्य ही तुमने कहीं-
यत्र क्वापि त्वया राजन् नरसिंहस्य वै ध्रुवम् ॥ ८
न-कहीं भगवान् नृसिंहके निर्माल्यका लङ्घन किया है।
निर्माल्यो लङ्घितस्तस्माद्रथारोहणकर्मणि ।
इसीसे रथपर चढ़नेमें तुम्हारी गति अवरुद्ध हो गयी है।
गतिर्भग्ना महाराज श्रूयतामत्र कारणम् ॥ ९
महाराज ! इसका कारण सुनो ॥ ७-९ ॥
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