संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
१९८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३३
१९८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३३
शूलकण्टकनिष्क्रान्तास्ततस्ते पञ्च पाण्डवाः।
नारदोऽपि गतो नाकं जुष्टेदं तीर्थमुत्तमम्॥ १७
ततो युधिष्ठिरो राजा प्रस्थितस्तीर्थमुत्तमम्।
दर्शनं मुनिमुख्यस्य तीर्थधर्मोपदेशिनः॥ १८
चिन्तयति च धर्मात्मा क्रोधपैशुन्यवर्जितः।
दानवो बहुरोमा च तथा स्थूलशिरा नृप॥ १९
पाण्डवान् गच्छतो वीक्ष्य दानवो द्रौपदीच्छया।
कृत्वा भूप मुने रूपं बहुरोमाऽऽगतस्तदा॥ २०
प्रणिधानं विधायाथ आसीनः कुशविष्टरे।
बिभ्रत् कमण्डलुं पार्श्वे दर्भसूचीं तथा करे॥ २१
अक्षमालां जपन्मन्त्रं स्वनासाग्रं निरीक्षयन्।
स दृष्टः पाण्डवैस्तत्र रेवायां वनचारिभिः॥ २२
ततो युधिष्ठिरो राजा तं प्रणम्य सहानुजः।
जगाद वचनं दृष्ट्वा भाग्येनासि महामुने॥ २३
तीर्थानि रुद्रदेहायाः सुगोप्यानि निवेदय।
मुनीनां दर्शनं नाथ श्रुतं धर्मोपदेशकम्॥ २४
यावन्मुनिमुवाचेदं धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः।
तावत्स्थूलशिराः प्राप्तो मुनिरूपधरोऽपरः॥ २५
जल्पन्नित्यातुंर वाक्यं को नामास्त्यत्र रक्षकः।
भयातुरं नरो जीवं यो रक्षेच्छरणागतम्॥ २६
तस्यानन्तफलं स्याद्वै किं पुनर्मां द्विजोत्तमम्।
एकतो मेदिनीदानं मेरुभूधरदक्षिणम्॥ २७
अन्यतो ह्यार्तजीवानां प्राणसंशयवारणम्।
द्विजं धेनुं स्त्रियं बालं पीड्यमानं च दुर्जनैः॥ २८
उपेक्षेत नरो यस्तु स च गच्छति रौरवम्।
अथ मां हतसर्वस्वं प्राणत्यागपरायणम्॥ २९
को रक्षति नरो वीरः पराभूतं हि दानवैः।
गृहीत्वा चाक्षमालां मे तथा शुभकमण्डलुम्॥ ३०
निहतोऽहं कराघातैस्तथा खाटो मनोहरम्।
गृहीतं मम सर्वस्वं दानवेन दुरात्मना॥ ३१
घूमते वे पाँचों पाण्डव शूल और कण्टकमय मार्गको पार करके एक उत्तम तीर्थकी ओर प्रस्थित हुए। उसके पहले भगवान् नारदजी भी उस उत्तम तीर्थका सेवन करके स्वर्गलोकको लौट गये थे। क्रोध और पिशुनतासे रहित धर्मात्मा राजा युधिष्ठिर उस उत्तम तीर्थकी ओर प्रस्थान करके तीर्थधर्मका उपदेश करनेवाले किसी मुनिवरके दर्शनकी बात सोच रहे थे, इसी बीचमें बहुरोमा तथा स्थूलशिरा नामक दानव वहाँ आये। भूपाल! पाण्डवोंको जाते देख द्रौपदीका अपहरण करनेकी इच्छासे बहुरोमा नामक दानव मुनिका रूप धारण करके वहाँ आया। वह कुशके आसनपर बैठकर ध्यानमग्न हो गया। उसके पार्श्वमें कमण्डलु था और हाथमें उसने कुशकी पवित्री पहन रखी थी। वह नासिकाके अग्रभागका अवलोकन करता हुआ रुद्राक्षकी मालासे मन्त्र-जप कर रहा था। नर्मदा-तटवर्ती वनमें भ्रमण करते हुए पाण्डवोंने वहाँ उसे देखा॥ १६–२२॥
तदनन्तर उसे देखकर राजा युधिष्ठिरने भाइयोंसहित प्रणाम करके उससे यह बात कही—महामुने! भाग्यसे आप यहाँ विद्यमान हैं। इस रुद्रदेहा (रेवा)-के समीपवर्ती परम गोपनीय तीर्थोंको हमें बताइये। नाथ! हमने सुना है कि मुनियोंका दर्शन धर्मका उपदेश करनेवाला होता है॥ २३–२४॥
धर्मपुत्र युधिष्ठिर जबतक उस मायावी मुनिसे बात कर ही रहे थे, तबतक ही स्थूलशिरा नामक दूसरा दानव मुनिरूप धारण किये वहाँ आ पहुँचा। वह बड़े ही आतुरभावसे इस प्रकार पुकार रहा था—अहो! यहाँ कौन हमारी रक्षा करनेवाला है? जो मनुष्य शरणमें आये हुए किसी भी भयपीड़ितकी रक्षा करता है, वह अनन्त पुण्यफलका भागी होता है; फिर जो मुझ उत्तम ब्राह्मणकी रक्षा करेगा, उसके पुण्यफलका तो कहना ही क्या है। एक ओर मेरु पर्वतकी दक्षिणापूर्वक सम्पूर्ण पृथिवीका दान और दूसरी ओर पीड़ित प्राणियोंके प्राण-संकटका निवारण—दोनों बराबर हैं। जो पुरुष दुष्टोंद्वारा सताये जाते हुए ब्राह्मण, गौ, स्त्री और बालकोंकी उपेक्षा करता है, वह रौरव नरकमें पड़ता है। मेरा सर्वस्व लूट लिया गया है। मैं दानवोंसे अपमानित होकर प्राण त्याग देनेको उद्यत हूँ। इस समय कौन ऐसा वीर पुरुष है, जो मेरी रक्षा कर सके? दुष्ट दानवने मेरी स्फटिककी माला, सुन्दर कमण्डलु और मनोहर खाट छीनकर मुझे थप्पड़से मारा है और सर्वस्व लूट लिया है॥ २५–३१॥
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अध्याय ३३ ] भगवान्के मन्दिरमें झाडू देने और उसको लीपनेका महान् फल ११९
इत्याकर्ण्य वचः क्लीबं पाण्डवा जातसम्भ्रमाः । | इस प्रकारके कातर वचन सुनकर पाण्डव हड़बड़ा
यान्ति रोमाञ्चिता भूयो विधायौग्निं च तं मुनिम् ॥ ३२ | गये। वे रोमाञ्चित हो, आग जलाकर उस मुनिके पीछे
चले। द्रौपदीको उन लोगोंने पहलेवाले महात्मा मुनिके
विमुच्य द्रौपदीं तत्र मुनेः पार्श्वे महात्मनः । | पास ही छोड़ दिया और स्वयं रोषसे भरकर वहाँसे
ततो दूरतरं प्राप्ताः संरम्भात्ते च पाण्डवाः ॥ ३३ | बहुत दूर निकल गये॥ ३२-३३॥
तदनन्तर युधिष्ठिरने कहा—हमें तो यहाँ कुछ भी
ततो युधिष्ठिरोऽवोचत् किं च नो नात्र दृश्यते । | दिखायी नहीं देता। अर्जुन ! तुम द्रौपदीकी रक्षाके लिये
कृष्णासंरक्षणार्थाय व्रज व्यावृत्य चार्जुन ॥ ३४ | यहाँसे लौट जाओ। तब भाईके वचनसे प्रेरित होकर
अर्जुन वहाँसे चल दिये। राजन् ! फिर राजा युधिष्ठिरने
ततोऽर्जुनो विनिष्क्रान्तो बन्धुवाक्यप्रणोदितः । | उस गहन वनके भीतर सूर्यमण्डलकी ओर देखकर यह
ततो युधिष्ठिरो राजा सत्यां वाचमकल्पयत् ॥ ३५ | सत्य वचन कहा—मेरी सत्यवादिता, पुण्यकर्म तथा
धर्मपूर्वक भाषण करनेसे संतुष्ट होकर देवगण संशयमें
निरीक्ष्य मण्डलं भानोस्तदा सुगहने वने । | पड़े हुए मुझको सत्य बात बतला दें॥ ३४-३६१/२॥
मम सत्याच्च सुकृताद् धर्मसम्भाषणात् प्रभो ॥ ३६
राजन् ! युधिष्ठिरके यों कहनेपर आकाशमें इस
तथ्यं शंसन्तु त्रिदशा मम संशयभाजिनः । | प्रकारका शब्द हुआ, यद्यपि वहाँ बोलनेवाला कोई
ततोऽम्बरेऽभवद्वाणी तदा भूपाशरीरिणी ॥ ३७ | व्यक्ति नहीं था—महाराज ! यह (जो आपके पास खड़ा
है, वह मुनि नहीं) दानव है। स्थूलशिरा नामक मुनि
दानवोऽयं महाराज मुनिः स्थूलशिराः स्थितः । | तो सुखपूर्वक हैं, उनपर किसीके द्वारा कोई उपद्रव नहीं
नासावुपद्रुतः केन मायैषास्य दुरात्मनः ॥ ३८ | है। यह तो इस दुष्टकी माया है॥ ३७-३८॥
ततो भीमः कराघातैर्नश्यमानं हि दानवम् । | तब भीमने अत्यन्त क्रोधसे युक्त हो उस भागते हुए
संरम्भात्कुपितोऽत्यर्थं मौलिदेशे जघान तम् ॥ ३९ | दानवके मस्तकपर बड़े वेगसे मुष्टिप्रहार किया। फिर तो
दानवने भी अपना रौद्ररूप धारण किया और भीमको
सोऽपि रूपं निजं प्राप्य रौद्रं भीममताडयत् । | मुक्का मारा। इस प्रकार भीम और दानवमें वहाँ दारुण
तत्र युद्धं प्रवृत्तं दारुणं भीमदैत्ययोः ॥ ४० | संग्राम छिड़ गया। भीमने उस वनमें बड़े कष्टसे उसके
स्थूल मस्तकका छेदन किया॥ ३९-४०१/२॥
कष्टाद्बभञ्ज भीमोऽपि तस्य स्थूलं शिरो वने । | इधर अर्जुन भी जब मुनिके आश्रमपर पहुँचे, तब
अर्जुनोऽपि समायातो नैव पश्यति तं मुनिम् ॥ ४१ | वहाँ उन्हें न तो वह मुनि दिखायी दिया और न
प्राणप्रिया साध्वी भार्या द्रौपदी ही दीख पड़ी। तब
तथा च द्रौपदीं भूयः साध्वीं कान्तां च वल्लभाम् । | अर्जुनने वृक्षपर चढ़कर ज्यों ही इधर-उधर दृष्टि
ततो वृक्षं समारुह्य यावत्पश्यति चार्जुनः ॥ ४२ | डाली, त्यों ही देखा कि एक दानव द्रौपदीको अपने
कंधेपर बिठाकर बड़ी शीघ्रतासे भागा जा रहा है और
तावद्विधाय तां स्कन्धे शीघ्रं धावति दानवः । | उस दुष्टके द्वारा हरी गयी द्रौपदी कुररीकी भाँति
संहृता याति दुष्टेन रुदती कुररी यथा ॥ ४३ | ‘हा धर्मपुत्र! हा भीम!’ इत्यादि रटती हुई विलाप
कर रही है। द्रौपदीको उस अवस्थामें देखकर वीर
कुर्वती भीमभीमेति धर्मपुत्रेति वादिनी । | अर्जुन अपनी आवाजसे दिशाओंको गुँजाते हुए चले।
तां दृष्ट्वा स ययौ वीरः शब्दैः संनादयन् दिशः ॥ ४४
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