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संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

२१८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५०

२१८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५०
सीतां दृष्ट्वा स लङ्कायामशोकाख्ये महावने। सीताको देखकर बताया—'सीताजी लङ्कामें अशोकवनके
स्थितेति कथितं तेन जटायुस्तु मृतस्तव ॥ १५५ भीतर ठहरी हुई हैं।' तब वानरोंने कहा—'आपके भ्राता
जटायुने सीताजीकी रक्षाके लिये ही प्राणत्याग किया है।'
भ्रातेति चोचुः स स्नात्वा दत्त्वा तस्योदकाञ्जलिम्। यह सुनकर महामति सम्पातिने स्नान करके जटायुको
योगमास्थाय स्वं देहं विससर्ज महामतिः ॥ १५६ जलाञ्जलि दी और योगधारणाका आश्रय ले अपने शरीरको
त्याग दिया॥ १५२—१५६॥
ततस्तं वानरा दग्ध्वा दत्त्वा तस्योदकाञ्जलिम्। तदनन्तर वानरोंने सम्पातिके शवका दाह-संस्कार किया
गत्वा महेन्द्रशृङ्गं ते समारुह्य क्षणं स्थिताः ॥ १५७ और उन्हें जलाञ्जलि दे, महेन्द्रपर्वतपर जाकर तथा उसके
शिखरपर आरूढ़ हो, क्षणभर खड़े रहे। फिर समुद्रकी
सागरं वीक्ष्य ते सर्वे परस्परमथाब्रुवन्। ओर देख वे सभी परस्पर कहने लगे—'रावणने ही भगवान्
रावणेनैव भार्या सा नीता रामस्य निश्चितम् ॥ १५८ श्रीरामकी भार्या सीताका अपहरण किया है, यह बात
निश्चित हो गयी। सम्पातिके वचनसे आज सब बातें ठीक-
सम्पातिवचनादद्य संज्ञातं सकलं हि तत्। ठीक ज्ञात हो गयीं। शोभाशाली वानरो! अब आप सब
वानराणां तु कश्चात्र उत्तीर्य लवणोदधिम् ॥ १५९ लोग सोचकर बतायें कि यहाँ वानरोंमें कौन ऐसा वीर है,
जो इस क्षार समुद्रके पार जा लङ्कामें घुसे और परम
लङ्कां प्रविश्य दृष्ट्वा तां रामपत्नीं यशस्विनीम्। यशस्विनी श्रीरामपत्नी सीताजीका दर्शन करके पुनः समुद्रके
पुनश्चोदधितरणे शक्तिं ब्रूत हि शोभनाः ॥ १६० पार लौट आनेमें समर्थ हो सके'॥ १५७—१६०॥
वानरोंकी यह बात सुनकर जाम्बवान्ने कहा—'समुद्रको
इत्युक्तो जाम्बवान् प्राह सर्वे शक्तास्तु वानराः। पार करनेमें तो सभी वानर समर्थ हैं, परंतु यह कार्य एक
सागरोत्तरणे किंतु कार्यमन्यस्य सम्भवेत् ॥ १६१ अन्यतम वानरसे ही सिद्ध होगा। मेरे विचारमें तो यह
आता है कि इस कार्यको सिद्ध करनेमें केवल हनूमान्‌जी
तत्र दक्षोऽयमेवात्र हनूमानिति मे मतिः। ही समर्थ हैं। अब समय नहीं खोना चाहिये। हमारे
कालक्षेपो न कर्तव्यो मासार्धमधिकं गतम् ॥ १६२ लौटनेकी जो नियत अवधि थी। उससे पंद्रह दिन
अधिक बीत गये हैं। वानरेन्द्रगण! यदि हमलोग सीताको
यद्यदृष्ट्वा तु गच्छामो वैदेहीं वानरर्षभाः। देखे बिना ही लौट जायँगे तो कपिराज सुग्रीव हमारी नाक
कर्णनासादि नः स्वाङ्गं निकृन्तति कपीश्वरः ॥ १६३ और कान काट लेंगे। इसलिये मेरी राय यह है कि हम
सब लोग इस कार्यके लिये वायुनन्दन हनुमान्‌जीसे ही
तस्मात्प्रार्थ्यः स चास्माभिर्वायुपुत्रस्तु मे मतिः। प्रार्थना करें'॥ १६१—१६३१/२ ॥
इत्युक्तास्ते तथेत्यूचुर्वानरा वृद्धवानरम् ॥ १६४ यह सुनकर उन वानरोंने वृद्ध जाम्बवान्‌जीसे कहा,
'अच्छा, ऐसा ही हो।' तत्पश्चात् वे सभी वानर कार्यसाधनमें
ततस्ते प्रार्थयामासुर्वानराः पवनात्मजम्। विशेष कुशल महाबुद्धिमान् पवननन्दन हनूमान्‌जीसे प्रार्थना
हनूमन्तं महाप्राज्ञं दक्षं कार्येषु चाधिकम् ॥ १६५ करने लगे—'अञ्जनीनन्दन! आप श्रीरामचन्द्रजीके प्रिय
सेवक हैं। आप ही रावणको भय देनेके लिये लङ्कामें
गच्छ त्वं रामभृत्यस्त्वं रावणस्य भयाय च। जायँ और हमारे वानरवृन्दकी रक्षा करें।' वानरोंके यों
रक्षस्व वानरकुलमस्माकमञ्जनीसुत। कहनेपर पवनकुमार हनुमान्‌जीने 'तथास्तु' कहकर उनकी
इत्युक्तस्तांस्तथेत्याह वानरान् पवनात्मजः ॥ १६६ प्रार्थना स्वीकार की। एक तो श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञा थी,
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अध्याय ५१ ] हनुमान्जीका समुद्र पार करके लङ्कामें जाना, सीतासे भेंट और लङ्काका दहन २१९
रामप्रयुक्तश्च पुनः स्वभर्तॄणा फिर अपने स्वामी सुग्रीवने भी आदेश दिया था, इसके
पुनर्महेन्द्रे कपिभिश्च नोदितः । बाद महेन्द्रपर्वतपर उन वानरोंने भी उन्हें प्रेरित किया,
गन्तुं प्रचक्रे मतिमञ्जनीसुतः अतः अञ्जनीकुमार हनुमान्जीने समुद्र लाँघकर निशाचरपुरी
समुद्रमुत्तीर्य निशाचरालयम् ॥ १६७ ॥ लङ्कामें जानेका निश्चय कर लिया ॥ १६४-१६७॥
इति श्रीनरसिंहपुराणे रामप्रादुर्भावे पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५० ॥
इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'श्रीरामावतारकी कथाविषयक' पचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५० ॥
इक्यावनवाँ अध्याय
हनुमान्जीका समुद्र पार करके लङ्कामें जाना, सीतासे भेंट और
लङ्काका दहन करके श्रीरामको समाचार देना
मार्कण्डेय उवाच मार्कण्डेयजी बोले- हनुमान्जीने रावणद्वारा हरी
गयी सीताकी खोज करने तथा उनके स्थानका पता
स तु रावणनीतायाः सीतायाः परिमार्गणम् । लगानेके लिये चारणोंके मार्ग (आकाश)-से जानेकी
इयेष पदमन्वेष्टुं चारणाचरिते पथि ॥ १ इच्छा की। पूर्वाभिमुख हो, हाथ जोड़कर उन्होंने
देवगणोंसहित आत्मयोनि ब्रह्माजीको मन-ही-मन प्रणाम
अञ्जलिं प्राङ्मुखं कृत्वा सगणायात्मयोनये । किया तथा श्रीराम और महारथी लक्ष्मणको भी मनसे
मनसाऽऽवन्द्य रामं च लक्ष्मणं च महारथम् ॥ २ ही प्रणाम करके सागर तथा सरिताओंको मस्तक नवाया।
फिर अपने वानर-बन्धुओंको गले लगाकर उन सबकी
सागरं सरितश्चैव प्रणम्य शिरसा कपिः । प्रदक्षिणा की। तब अन्य सब वानरोंने यह आशीर्वाद
ज्ञातींश्चैव परिष्वज्य कृत्वा चैव प्रदक्षिणाम् ॥ ३ दिया- 'वीर ! तुम (सकुशल) लौट आनेके लिये पवित्र
वायुसे सेवित मार्गपर बिना विघ्न-बाधाके जाओ।' यों
अरिष्टं गच्छ पन्थानं पुण्यवायुनिषेवितम् । कहकर उन्होंने हनुमान्जीका सम्मान किया। फिर पराक्रमी
पुनरागमानायेति वानरैरभिपूजितः ॥ ४ पवनकुमार अपनी सहज शक्तिको प्राप्त हुए-उनमें
वायुके सदृश बलका आवेश हो गया। दूरतकके मार्गका
अञ्जसा स्वं तथा वीर्यमाविवेशाथ वीर्यवान् । अवलोकन करते हुए उन्होंने ऊपर दृष्टि डाली। अपने-
मार्गमालोकयन् दूरादूर्ध्वं प्रणिहितेक्षणः ॥ ५ आपमें षड्विध ऐश्वर्यकी पूर्णताका-सा अनुभव करते
हुए वे महाबली हनुमान् महेन्द्र पर्वतको पैरोंसे दबाकर
सम्पूर्णमिव चात्मानं भावयित्वा महाबलः । उसके शिखरसे आकाशकी ओर उछले ॥ १-६॥
उत्पात गिरेः शृङ्गान्निष्पीड्य गिरिमम्बरम् ॥ ६ बुद्धिमान् वायुपुत्र हनुमान्जी श्रीरामचन्द्रजीके कार्य-
साधनमें तत्पर हो जब अपने पिता वायुके मार्गसे चले
पितुर्मार्गेण यातस्य वायुपुत्रस्य धीमतः । जा रहे थे, उस समय उनको थोड़ी देरतक विश्राम देनेके
रामकार्यपरस्यास्य सागरेण प्रचोदितः ॥ ७ लिये, समुद्रद्वारा प्रेरित हो, मैनाक पर्वत पानीसे बाहर
ऊपरकी ओर उठ गया। उसे देख उन्होंने वहाँ थोड़ा-
विश्रामार्थं समुत्तस्थौ मैनाको लवणोदधेः । सा रुककर उससे आदरपूर्वक बातचीत की और फिर
तं निरीक्ष्य निपीड्याथ रयात्सम्भाष्य सादरम् ॥ ८ उसे अपने वेगसे दबाकर उछलते हुए वे दूर चले गये।
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२२० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५१


[संस्कृत श्लोक]

उत्पतंश्च वने वीरः सिंहिकास्यं महाकपिः।
आस्यप्रान्तं प्रविश्याथ वेगेनान्तर्विनिस्सृतः॥ ९

निस्सृत्य गतवाञ्शीघ्रं वायुपुत्रः प्रतापवान्।
लङ्घयित्वा तु तं देशं सागरं पवनात्मजः॥ १०

त्रिकूटशिखरे रम्ये वृक्षाग्रे निपपात ह।
तस्मिन् स पर्वतश्रेष्ठे दिनं नीत्वा दिनक्षये॥ ११

संध्यामुपास्य हनुमान् रात्रौ लङ्कां शनैर्निशि।
लङ्काभिधां विनिर्जित्य देवतां प्रविवेश ह॥ १२

लङ्कामनेकरत्नाढ्यां बह्वाश्चर्यसमन्विताम्।
राक्षसेषु प्रसुप्तेषु नीतिमान् पवनात्मजः॥ १३

रावणस्य ततो वेश्म प्रविवेशाथ ऋद्धिमत्।
शयानं रावणं दृष्ट्वा तल्पे महति वानरः॥ १४

नासापुटैर्घोरकारैर्विंशद्भिर्वायुमोचकैः ।
तथैव दशभिर्वक्त्रैर्दंष्ट्रोपेतैस्तु संयुतम्॥ १५

स्त्रीसहस्रैस्तु दृष्ट्वा तं नानाभरणभूषितम्।
तस्मिन् सीतामदृष्ट्वा तु रावणस्य गृहे शुभे॥ १६

तथा शयानं स्वगृहे राक्षसानां च नायकम्।
दुःखितो वायुपुत्रस्तु सम्पातेर्वचनं स्मरन्॥ १७

अशोकवनिकां प्राप्तो नानापुष्पसमन्विताम्।
जुष्टां मलयजातेन चन्दनेन सुगन्धिना॥ १८

प्रविश्य शिंशपावृक्षमाश्रितां जनकात्मजाम्।
रामपत्नीं समद्राक्षीद् राक्षसीभिः सुरक्षिताम्॥ १९

अशोकवृक्षमारुह्य पुष्पितं मधुपल्लवम्।
आसांचक्रे हरिरस्तत्र सेयं सीतेति संस्मरन्॥ २०

सीतां निरीक्ष्य वृक्षाग्रे यावदास्तेऽनिलात्मजः।
स्त्रीभिः परिवृतस्तत्र रावणस्तावदागतः॥ २१

आगत्य सीतां प्राहार्थ प्रिये मां भज कामुकम्।
भूषिता भव वैदेहि त्यज रामगतं मनः॥ २२

इत्येवं भाषमाणं तमन्तर्धाय तृणं ततः।
प्राह वाक्यं शनैः सीता कम्पमन्नाथ रावणम्॥ २३

गच्छ रावण दुष्ट त्वं परदारपरायण।
अचिराद्रामबाणास्ते पिबन्तु रुधिरं रणे॥ २४


[हिन्दी अनुवाद]

मार्गमें सिंहिका नामकी राक्षसी थी। उसने जलमें मुँह फैला रखा था। महाकपि हनुमान्‌जी उसके मुँहमें जा पड़े। मुँहमें पड़ते ही वे वेगपूर्वक उसके भीतर घुसकर पुनः बाहर निकल आये। इस प्रकार सिंहिकाके मुखसे निकलकर प्रतापी पवनकुमार उस समुद्र-प्रदेशको लाँघते हुए त्रिकूट पर्वतके सुरम्य शिखरपर एक महान् वृक्षके ऊपर जा उतरे। उसी उत्तम पर्वतपर दिन बिताकर हनुमान्‌जीने वहीं सायंकालकी संध्योपासना की। फिर रातमें धीरे-धीरे वे लङ्काकी ओर चले। मार्गमें मिली हुई ‘लङ्का’ नामकी नगर-देवताको जीतकर उन्होंने नाना रत्नोंसे सम्पन्न और अनेक प्रकारके आश्चर्योंसे युक्त लङ्कापुरीमें प्रवेश किया॥ ७-१२ १/२॥

तदनन्तर जब सब राक्षस गहरी नींदमें सो गये, तब नीतिज्ञ हनुमान्‌जीने रावणके समृद्धिशाली भवनमें प्रवेश किया। वहाँ रावण एक बहुत बड़े पलंगपर सो रहा था। हनुमान्‌जीने देखा—साँस छोड़नेवाले बीस भयंकर नासिका-छिद्रोंसे युक्त उसके दसों मुखोंमें बड़ी भयानक दाढ़ें थीं। नाना प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित रावण हजारों स्त्रियोंके साथ वहाँ सोया था। किंतु रावणके उस सुन्दर भवनमें सीताजी कहीं नहीं दिखायी दीं। वह राक्षसराज अपने घरके भीतर गाढ़ निद्रामें सो रहा था। सीताजीका दर्शन न होनेसे वायुनन्दन हनुमान्‌जी बहुत दुःखी हुए। फिर सम्पातिके कथनको याद करके वे अशोकवाटिकाforegroundमें आये, जो विविध प्रकारके पुष्पोंसे सुशोभित और अत्यन्त सुगन्धित मलयज-चन्दनसे व्याप्त थी॥ १३-१८॥

वाटिकामें प्रवेश करके हनुमान्‌जीने अशोकवृक्षके नीचे बैठी हुई जनकनन्दिनी श्रीरामपत्नी सीताको देखा, जो राक्षसियोंसे सुरक्षित थीं। वह अशोकवृक्ष सुन्दर मृदुल पल्लवोंसे विलसित और पुष्पोंसे सुशोभित था। कपिवर हनुमान्‌जी उस वृक्षपर चढ़ गये और ‘ये ही सीता हैं’—यह सोचते हुए वहीं बैठ गये। सीताजीका दर्शन करके वे पवनकुमार ज्यों ही वृक्षके शिखरपर बैठे, त्यों ही रावण बहुत-सी स्त्रियोंसे घिरा हुआ वहाँ आया। आकर उसने सीतासे कहा—‘प्रिये! मैं कामपीड़ित हूँ, मुझे स्वीकार करो। वैदेहि! अब शृङ्गार धारण करो और श्रीरामकी ओरसे मन हटा लो।' इस प्रकार कहते हुए रावणसे भयवश काँपती हुई सीताजी बीचमें तिनकेकी ओट रखकर धीरे-धीरे बोलीं—'परस्त्रीसेवी दुष्ट रावण! तू चला जा। मैं शाप देती हूँ—भगवान् श्रीरामके बाण शीघ्र ही रणभूमिमें तुम्हारा रक्त पीयें'॥ १९-२४॥

अध्याय ५१ ] हनुमान्‌जीका समुद्र पार करके लङ्कामें जाना, सीतासे भेंट और लङ्काका दहन २२१

तथेत्युक्तो भर्त्सितश्च राक्षसीराह राक्षसः।
द्विमासाभ्यन्तरे चैनां वशीकुरुत मानुषीम्॥ २५
यदि नेच्छति मां सीता ततः खादत मानुषीम्।
इत्युक्त्वा गतवान् दुष्टो रावणः स्वं निकेतनम्॥ २६
ततो भयेन तां प्राहू राक्षस्यो जनकात्मजाम्।
रावणं भज कल्याणि सधनं सुखिनी भव॥ २७
इत्युक्ता प्राह ताः सीता राघवोऽलघुविक्रमः।
निहत्य रावणं युद्धे सगणं मां नयिष्यति॥ २८
नाहमन्यस्य भार्या स्यामृते रामं रघूत्तमम्।
स ह्यागत्य दशग्रीवं हत्वा मां पालयिष्यति॥ २९
इत्याकर्ण्य वचस्तस्या राक्षस्यो ददृशुर्भयम्।
हन्यतां हन्यतामेषा भक्ष्यतां भक्ष्यतामियम्॥ ३०
ततस्तास्त्रिजटा प्राह स्वप्ने दृष्टमनिन्दिता।
शृणुध्वं दुष्टराक्षस्यो रावणस्य विनाशनः॥ ३१
रक्षोभिः सह सर्वैस्तु रावणस्य मृतिप्रदः।
लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा रामस्य विजयप्रदः॥ ३२
स्वप्नः शुभो मया दृष्टः सीतायाश्च पतिप्रदः।
त्रिजटावाक्यमाकर्ण्य सीतापाश्र्वं विसृज्य ताः॥ ३३
राक्षस्यस्ता ययुः सर्वाः सीतामाहाञ्जनीसुतः।
कीर्तयन् रामवृत्तान्तं सकलं पवनात्मजः॥ ३४
तस्यां विश्वासमानीय दत्त्वा रामाङ्गुलीयकम्।
सम्भाष्य लक्षणं सर्वं रामलक्ष्मणयोस्ततः॥ ३५
महत्या सेनया युक्तः सुग्रीवः कपिनायकः।
तेन सार्धमिहागत्य रामस्तव पतिः प्रभुः॥ ३६
लक्ष्मणश्च महावीरो देवरस्ते शुभानने।
रावणं सगणं हत्वा त्वामितोऽदाय गच्छति॥ ३७
इत्युक्ते सा तु विश्वस्ता वायुपुत्रमथाब्रवीत्।
कथमत्रागतो वीर त्वमुत्तीर्य महोदधिम्॥ ३८
इत्याकर्ण्य वचस्तस्याः पुनस्तामाह वानरः।
गोष्पदवन्मयोत्तीर्णः समुद्रोऽयं वरानने॥ ३९

सीताजीका यह उत्तर और फटकार पाकर राक्षसराज रावणने राक्षसियोंसे कहा—'तुम लोग इस मानव-कन्याको दो महीनेके भीतर समझाकर मेरे वशीभूत कर दो। यदि इतने दिनोंतक इसका मन मेरी ओर न झुके तो इस मानुषीको तुम खा डालना।' यों कहकर दुष्ट रावण अपने महलमें चला गया। तब रावणके डरसे डरी हुई राक्षसियोंने जनकनन्दिनी सीतासे कहा—'कल्याणि! रावण बहुत धनी है, इसे स्वीकार कर लो और सुखसे रहो।' राक्षसियोंके यों कहनेपर सीताने उनसे कहा—'महापराक्रमी भगवान् श्रीराम युद्धमें रावणको उसके सेवकगणोंसहित मारकर मुझे ले जायँगे। मैं रघुकुलश्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजीके सिवा दूसरेकी भार्या नहीं हो सकती। वे ही आकर रावणको मारकर मेरी रक्षा करेंगे'॥ २५-२९॥

सीताकी यह बात सुनकर राक्षसियोंने उन्हें भय दिखाते हुए कहा—'अरी! इसे मार डालो, मार डालो; खा जाओ, खा जाओ।' उन राक्षसियोंमें एकका नाम त्रिजटा था। वह उत्तम विचार रखनेवाली-साध्वी स्त्री थी। उसने उन सभी राक्षसियोंको स्वप्नमें देखी हुई बात बतायी। वह बोली—'अरी दुष्टा राक्षस्यो! सुनो; मैंने एक शुभ स्वप्न देखा है, जो रावणके लिये विनाशकारी है, समस्त राक्षसोंके साथ रावणको मौतके मुँहमें डालनेवाला है, भ्राता लक्ष्मणके साथ श्रीरामचन्द्रजीकी विजयका सूचक है और सीताको पतिसे मिलानेवाला है।' त्रिजटाकी बात सुनकर वे सभी राक्षसियाँ सीताके पाससे हटकर दूर चली गयीं। तब अञ्जनीनन्दन हनुमान्‌जीने अपनेको सीताके सामने प्रकट किया और 'श्रीराम-नाम' का कीर्तन करते हुए उन्होंने श्रीरामचन्द्रजीके सम्पूर्ण वृत्तान्तका उनके समक्ष वर्णन किया। इस प्रकार सीताके मनमें विश्वास उत्पन्न करके उन्हें श्रीरामचन्द्रजीकी अँगूठी दी। फिर उनसे श्रीराम और लक्ष्मणके शरीरके लक्षण बताये और कहा—'सुमुखि! वानरोंके राजा सुग्रीव बहुत बड़ी सेनाके स्वामी हैं। उन्हींके साथ आपके पतिदेव भगवान् श्रीरामचन्द्रजी तथा आपके देवर महावीर लक्ष्मणजी यहाँ पधारेंगे और रावणको सेनासहित मारकर आपको यहाँसे ले जायँगे'॥ ३०-३७॥

हनुमान्‌जीके यह कहनेपर सीताजीका उनपर विश्वास हो गया। वे बोलीं—'वीर! तुम किस तरह महासागरको पार करके यहाँ चले आये?' उनका यह वचन सुनकर हनुमान्‌जीने पुनः उनसे कहा—'वरानने! मैं इस समुद्रको उसी प्रकार लाँघ गया, जैसे कोई गौके खुरसे बने हुए

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२२२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५१

जपतो रामरामेति सागरो गोष्पदायते। | गड्ढेको लाँघ जाय। जो 'राम-राम' का जप करता
दुःखमग्नासि वैदेहि स्थिरा भव शुभानने॥ ४० | है, उसके लिये समुद्र गौके खुरके चिह्नके समान हो
| जाता है। शुभानने वैदेहि ! आप दुःखमग्ना दिखायी देती
क्षिप्रं पश्यसि रामं त्वं सत्यमेतद्ब्रवीमि ते। | हैं, अब धैर्य धारण कीजिये। मैं आपसे सत्य-सत्य कह
इत्याश्वास्य सतीं सीतां दुःखितां जनकात्मजाम्॥ ४१ | रहा हूँ, आप बहुत शीघ्र श्रीरामचन्द्रजीका दर्शन करेंगी।'
| इस प्रकार दुःखमें डूबी हुई पतिव्रता जनकनन्दिनी
ततश्चूडामणिं प्राप्य श्रुत्वा काकपराभवम्। | सीताको आश्वासन दे, उनसे पहचानके लिये चूड़ामणि
नत्वा तां प्रस्थितो वीरो गन्तुं कृतमतिः कपिः॥ ४२ | पाकर और श्रीरामके प्रभावसे काकरूपी जयन्तके
| पराभवकी कथा सुनकर, वहाँसे चल देनेका विचार
ततो विमृश्य तद्भङ्क्त्वा क्रीडावनमशेषतः। | करके हनुमान्‌जीने सीताको नमस्कार करनेके पश्चात्
तोरणस्थो ननादोच्चै रामो जयति वीर्यवान्॥ ४३ | प्रस्थान किया॥ ३८-४२॥
| तत्पश्चात् कुछ सोचकर पराक्रमी हनुमान्‌जीने रावणके
अनेकान् राक्षसान् हत्वा सेनाः सेनापतींश्च सः। | उस सम्पूर्ण क्रीडावन (अशोकवाटिका)-को नष्ट-भ्रष्ट कर
तदा त्वक्षकुमारं तु हत्वा रावणसैनिकम्॥ ४४ | डाला और वनके द्वारपर स्थित हो, उच्चस्वरसे सिंहनाद
| करते हुए बोले—'भगवान् श्रीरामचन्द्रजीकी जय हो!' फिर
साश्वं ससारथिं हत्वा इन्द्रजित्तं गृहीतवान्। | तो युद्धके लिये सामने आये हुए अनेक राक्षसोंको मारकर
रावणस्य पुरः स्थित्वा रामं संकीर्त्य लक्ष्मणम्॥ ४५ | सेना और सेनापतियोंका संहार किया। इसके बाद रावणके
| सेनापति अक्षकुमारको अश्व तथा सारथिसहित यमलोक
सुग्रीवं च महावीर्यं दग्ध्वा लङ्कामशेषतः। | पहुँचा दिया। इसपर रावणपुत्र इन्द्रजित्ने वरके प्रभावसे उन्हें
निर्भर्त्स्य रावणं दुष्टं पुनः सम्भाष्य जानकीम्॥ ४६ | बंदी बना लिया। इसके बाद वे रावणके सम्मुख उपस्थित
| किये गये। वहाँसे छूटकर उन्होंने श्रीराम, लक्ष्मण और
भूयः सागरमुत्तीर्य ज्ञातीनासाद्य वीर्यवान्। | महाबली सुग्रीवके यशका कीर्तन करते हुए सम्पूर्ण लङ्कापुरीको
सीतादर्शनमावेद्य हनूमांश्चैव पूजितः॥ ४७ | जलाकर भस्म कर दिया। तदनन्तर दुष्टात्मा रावणको डाँट
| बताकर पुनः सीताजीसे वार्तालाप किया। फिर पराक्रमी
वानरैः सार्धमागत्य हनुमान्मधुवनं महत्। | हनूमान्‌जी समुद्रके इस पार आकर अपने वानर बन्धुओंसे
निहत्य रक्षपालांस्तु पाययित्वा च तन्मधु॥ ४८ | मिले और सीताजीके दर्शनका समाचार सुनाकर सबसे
| सम्मानित हुए॥ ४३-४७॥
सर्वे दधिमुखं पात्य हर्षितो हरिभिः सह। | तत्पश्चात् हनुमान्‌जी सभी वानरोंके साथ मधुवनमें आये।
खमुत्पत्य च सम्प्राप्य रामलक्ष्मणपादयोः॥ ४९ | उसके रखवालोंको मारकर उन्होंने वहाँ सब साथियोंको
| मधु-पान कराया और स्वयं भी पीया। इस कार्यमें बाधा
नत्वा तु हनुमांस्तत्र सुग्रीवं च विशेषतः। | देनेवाले दधिमुख नामके वानरको सबने धरतीपर दे मारा।
आदितः सर्वमावेद्य समुद्रतरणादिकम्॥ ५० | इसके बाद हनुमान्‌जी सब वानरोंके साथ आनन्दित हो,
| आकाशमें उछलते हुए श्रीराम और लक्ष्मणके निकट जा
कथयामास रामाय सीता दृष्टा मयेति वै। | पहुँचे। वहाँ उन दोनोंके चरणोंमें प्रणाम कर, विशेषतः
अशोकवनिकामध्ये सीता देवी सुदुःखिता॥ ५१ | सुग्रीवको मस्तक झुकाकर उन्होंने समुद्र लाँघनेसे लेकर
| सारा समाचार आद्योपान्त सुनाया और यह भी कहा कि
| 'मैंने अशोक-वाटिकाके भीतर सीतादेवीका दर्शन किया।

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अध्याय ५१ ] हनुमान्‌जीका समुद्र पार करके लङ्कामें जाना, सीतासे भेंट और लङ्काका दहन २२३
राक्षसीभिः परिवृता त्वां स्मरन्ती च सर्वदा। उन्हें राक्षसियाँ घेरे हुए थीं और वे बहुत दुःखी होकर
अश्रुपूर्णमुखी दीना तव पत्नी वरानना ॥ ५२ निरन्तर आपका ही स्मरण कर रही थीं। उनके मुखपर
आँसुओंकी धारा बह रही थी और वे बड़ी दीन अवस्थामें
शीलवृत्तसमायुक्ता तत्रापि जनकात्मजा। थीं। रघुनन्दन ! आपकी धर्मपत्नी सुमुखी सीता वहाँ भी
सर्वत्रान्वेषमाणेन मया दृष्टा पतिव्रता ॥ ५३ शील और सदाचारसे सम्पन्न हैं। मैंने सब जगह ढूँढ़ते
हुए पतिव्रता जानकीको अशोकवनमें पाया, उनसे वार्तालाप
मया सम्भाषिता सीता विश्वस्ता रघुनन्दन । किया और उन्होंने भी मेरा विश्वास किया। प्रभो! उन्होंने
अलङ्कारश्च सुमणिस्तया ते प्रेषितः प्रभो ॥ ५४ आपको देनेके लिये अपना श्रेष्ठ मणिमय अलङ्कार भेजा
है' ॥ ४८-५४ ॥
इत्युक्त्वा दत्तवांस्तस्मै चूडामणिमनुत्तमम्। यह कहकर हनुमान्‌जीने भगवान् श्रीरामको वह
इदं च वचनं तुभ्यं पत्न्या सम्प्रेषितं शृणु ॥ ५५ उत्तम चूड़ामणि दे दी और कहा- 'प्रभो! आपकी
धर्मपत्नी श्रीसीताजीने यह संदेश भी कहला भेजा है,
चित्रकूट मदङ्के तु सुप्ते त्वयि महाव्रत। सुनिये—'महान् व्रतका पालन करनेवाले महाराज ! चित्रकूट
वायसाभिभवं राजंस्तत्किल स्मर्तुमर्हसि ॥ ५६ पर्वतपर जब आप मेरी गोदमें [सिर रखकर] सो गये
थे, उस समय काकवेषधारी जयन्तका जो आपने मान-
अल्पापराधे राजेन्द्र त्वया बलिभुजि प्रभो। मर्दन किया था, उसे स्मरण करें। राजेन्द्र ! प्रभो ! उस
यत्कृतं तन्न कर्तुं च शक्यं देवासुरैरपि ॥ ५७ कौएके थोड़े-से ही अपराधपर उसे दण्ड देनेके लिये
आपने जो अद्भुत कर्म किया था, उसे देवता और असुर
ब्रह्मास्त्रं तु तदोत्सृष्टं रावणं किं न जेष्यसि । भी नहीं कर सकते। उस समय तो आपने ब्रह्मास्त्रका
प्रयोग किया था? क्या इस समय इस रावणको पराजित
इत्येवमादि बहुशः प्रोक्त्वा सीता रुरोद ह।
नहीं करेंगे?' इस प्रकार बहुत-सी बातें कहकर सीताजी
एवं तु दुःखिता सीता तां मोक्तुं यत्नमाचर ॥ ५८ रोने लगी थीं। यह है दुःखिनी सीताका वृत्तान्त ! आप
उन्हें उस दुःखसे मुक्त करनेका प्रयत्न कीजिये।' पवनकुमार
इत्येवमुक्ते पवनात्मजेन
हनुमान्‌जीके इस प्रकार कहनेपर सीताजीका वह संदेश
सीतावचस्तच्छुभभूषणं च।
सुन और उनके उस सुन्दर आभूषणको देख, भगवान्
श्रुत्वा च दृष्ट्वा च रुरोद रामः
श्रीराम उन कपिवर हनुमान्‌जीको गलेसे लगाकर रोने
कपिं समालिङ्गय शनैः प्रतस्थे ॥ ५९ लगे और धीरे-धीरे वहाँसे प्रस्थित हुए ॥ ५५-५९॥
इति श्रीनरसिंहपुराणे रामप्रादुर्भावे एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५१ ॥
इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'श्रीरामावतारकी कथाविषयक' इक्यावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५१ ॥