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संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

२०६ | श्रीनरसिंहपुराण | [ अध्याय ४१

यहाँ पृष्ठ का सम्पूर्ण पाठ प्रस्तुत है:


२०६ | श्रीनरसिंहपुराण | [ अध्याय ४१
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ततो जटायुः स्वं देहं विहाय गतवान्दिवम्।
विमानेन तु रम्येण सेव्यमानोऽप्सरोगणैः ॥ १२५
रामोऽपि दग्ध्वा तद्देहं स्नातो दत्त्वा जलाञ्जलिम्।
भ्रात्रा सगच्छन् दुःखार्तो राक्षसीं पथि दृष्टवान् ॥ १२६
उद्वमन्तीं महोल्काभां विवृतास्यां भयंकरीम्।
क्षयं नयन्तीं जन्तून् वै पातयित्वा गतो रुषा ॥ १२७
गच्छन् वनान्तरं रामः स कबन्धं ददर्श ह।
विरूपं जठरमुखं दीर्घबाहुं घनस्तनम् ॥ १२८
रुन्धानं राममार्गं तु दृष्ट्वा तं दग्ध्वाऽशनैः ।
दग्धोऽसौ दिव्यरूपी तु खस्थो राममभाषत ॥ १२९

तदनन्तर जटायु अपना शरीर त्यागकर एक सुन्दर विमानपर आरूढ़ हुए और अप्सरागणोंसे सेवित हो स्वर्गलोकको चले गये। श्रीरामचन्द्रजीने भी उनके शरीरका दाह-संस्कार करके स्नानके पश्चात् उनके निमित्त जलाञ्जलि दी। फिर सीताके लिये दुःखी हो भाई लक्ष्मणके साथ आगे जाने लगे। इतनेमें ही उन्हें रास्तेपर एक राक्षसी खड़ी दिखायी दी। वह मुँहसे बड़ी भारी उल्काके समान आगकी ज्वाला उगल रही थी। उसका मुँह फैला हुआ था। वह बड़ी डरावनी थी और पास आये हुए अनेकानेक जीवोंका संहार कर रही थी। श्रीरामने उसे रोषपूर्वक मार गिराया। फिर वे आगे बढ़ गये। जब श्रीराम दूसरे वनमें जाने लगे, तब उन्होंने कबन्धको देखा, जो बहुत ही कुरूप था। उसका मुख उसके पेटमें ही था, बाँहें बड़ी-बड़ी थीं और स्तन घने थे। श्रीरामने उसे अपना मार्ग रोकते देख उसे काठ-कबाड़द्वारा धीरे-धीरे जला दिया। जल जानेपर वह दिव्यरूप धारण करके प्रकट हुआ और आकाशमें स्थित होकर श्रीरामसे बोला— ॥ १२४-१२९॥


राम राम महाबाहो त्वया मम महामते ।
विरूपं नाशितं वीर मुनिशापाच्चिरागतम् ॥ १३०
त्रिदिवं यामि धन्योऽस्मि त्वत्प्रसादान्न संशयः ।
त्वं सीताप्राप्तये सख्यं कुरु सूर्यसुतेन भोः ॥ १३१
वानरेन्द्रेण गत्वा तु सुग्रीवे स्वं निवेद्य वै।
भविष्यति नृपश्रेष्ठ ऋष्यमूकगिरिं व्रज ॥ १३२

‘महाबाहु श्रीराम ! महामते वीरवर ! एक मुनिके शापवश चिरकालसे प्राप्त हुई मेरी कुरूपताको आपने नष्ट कर दिया; अब मैं स्वर्गलोकको जा रहा हूँ। इसमें संदेह नहीं कि आज मैं आपकी कृपासे धन्य हो गया। रघुनन्दन ! आप सीताकी प्राप्तिके लिये सूर्यकुमार वानरराज सुग्रीवके साथ मित्रता कीजिये। उनके यहाँ जाकर सुग्रीवसे सारा वृत्तान्त निवेदन कर देनेपर आपका कार्य सिद्ध हो जायगा। अतः नृपश्रेष्ठ ! आप यहाँसे ऋष्यमूक पर्वतपर जाइये’ ॥ १३०-१३२॥


इत्युक्त्वा तु गते तस्मिन् रामो लक्ष्मणसंयुतः ।
सिद्धैस्तु मुनिभिः शून्यमाश्रमं प्रविवेश ह ॥ १३३
तत्रस्थां तापसीं दृष्ट्वा तया संलाप्य संस्थितः ।
शबरीं मुनिमुख्यानां सपर्याहृतकल्मषाम् ॥ १३४
तया सम्पूजितो रामो बदरादिभिरीश्वरः ।
साप्येनं पूजयित्वा तु स्वामवस्थां निवेद्य वै ॥ १३५
सीतां त्वं प्राप्स्यसीत्युक्त्वा प्रविश्याग्निं दिवंगता ।
दिवं प्रस्थाप्य तां चापि जगामान्यत्र राघवः ॥ १३६

यह कहकर कबन्ध स्वर्गको चला गया। कहते हैं, तब लक्ष्मणके साथ श्रीरामचन्द्रजीने एक ऐसे आश्रममें प्रवेश किया, जो सिद्धों और मुनियोंसे शून्य था। उसमें उन्होंने एक ‘शबरी’ नामकी तपस्विनी देखी, जो बड़े-बड़े मुनियोंकी सेवा-पूजा करनेसे निष्पाप हो गयी थी। उसके साथ वार्तालाप करके वे वहाँ ठहर गये। शबरीने बेर आदि फलोंके द्वारा भगवान् रामका भलीभाँति सत्कार किया। आवभगतके पश्चात् उनसे अपनी अवस्था निवेदन की और यह कहकर कि ‘आप सीताको प्राप्त कर लेंगे’ वह शबरी भी उनके सामने ही अग्निमें प्रवेश करके स्वर्गको चली गयी। उसे भी स्वर्गलोकमें पहुँचाकर भगवान् श्रीरामचन्द्रजी अन्यत्र चले गये ॥ १३३-१३६॥


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अध्याय ५० ] सुग्रीवसे मैत्री; वालिवध; सुग्रीवका प्रमाद और उसकी भर्त्सना २०७
ततो विनीतेन गुणान्वितेन तदनन्तर विनयशील और गुणी भाई लक्ष्मणके
भ्रात्रा समेतो जगदेकनाथः । साथ जगदीश्वर भगवान् राम प्रियाके वियोगसे अत्यन्त
प्रियावियोगेन सुदुःखितात्मा
जगाम याम्यां स तु रामदेवः ॥ १३७ दुःखी हो वहाँसे दक्षिणकी ओर चल दिये ॥ १३७ ॥
इति श्रीनरसिंहपुराणे रामप्रादुर्भावे एकोनपञ्चाशोऽध्यायः ॥ ४९ ॥
इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'श्रीरामावतारविषयक' उनचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४९ ॥
पचासवाँ अध्याय
सुग्रीवसे मैत्री; वालिवध; सुग्रीवका प्रमाद और उसकी भर्त्सना;
सीताकी खोज और हनुमान्का लङ्कागमन
मार्कण्डेय उवाच मार्कण्डेयजी बोले-वालीसे वैर हो जानेके कारण
वालिना कृतवैरोऽथ दुर्गवर्ती हरीश्वरः । उसके लिये दुर्गम स्थानमें रहनेवाले वानरराज सुग्रीवने
सुग्रीवो दृष्टवान् दूराद्दृष्ट्वाऽऽह पवनात्मजम् ॥ १ दूरसे ही श्रीराम और लक्ष्मणको आते देखा और
देखकर पवनकुमार हनुमान्जीसे कहा- 'ये दोनों किसके
कस्येमौ सुधनुःपाणी चीरवल्कलधारिणौ । पुत्र हैं, जो हाथमें सुन्दर धनुष लिये, चीर एवं वल्कल-
पश्यन्तौ सरसीं दिव्यां पद्मोत्पलसमावृताम् ॥ २ वस्त्र धारण किये, कमलों एवं उत्पलोंसे आच्छन्न इस
दिव्य सरोवरको देख रहे हैं।' जान पड़ता है, ये दोनों
नानारूपधरावेतौ तापसं वेषमास्थितौ । वालीके भेजे हुए बहुविधरूपधारी दूत हैं, जो इस समय
वालिदूताविह प्राप्ताविति निश्चित्य सूर्यजः ॥ ३ तपस्वीका वेष धारण किये यहाँ आ पहुँचे हैं। यह
निश्चय करके सूर्यकुमार सुग्रीव भयभीत हो गये और
उत्पपात भयत्रस्तः ऋष्यमूकाद् वनान्तरम् । समस्त वानरोंके साथ ऋष्यमूक पर्वतसे कूदकर दूसरे
वानरैः सहितः सर्वैरगस्त्याश्रममुत्तमम् ॥ ४ वनमें स्थित अगस्त्यमुनिके उत्तम आश्रमपर चले
गये ॥ १-४ ॥
तत्र स्थित्वा स सुग्रीवः प्राह वायुसुतं पुनः । वहाँ स्थित होकर सुग्रीवने पुनः पवनकुमारसे कहा-
हनूमन् पृच्छ शीघ्रं त्वं गच्छ तापसवेषधृक् ॥ ५ 'हनूमन् ! तुम भी तपस्वीका वेष धारण करके शीघ्र जाओ
और पूछो कि 'वे कौन हैं? किसके पुत्र हैं? और किस
कौ हि कस्य सुतौ जातौ किमर्थं तत्र संस्थितौ । लिये वहाँ ठहरे हुए हैं?' महाबुद्धिमान् वायुनन्दन ! ये सब
ज्ञात्वा सत्यं मम ब्रूहि वायुपुत्र महामते ॥ ६ बातें सच-सच जानकर मुझसे बताओ' ॥ ५-६ ॥
उनके इस प्रकार कहनेपर हनुमान्जी संन्यासीके
इत्युक्तो हनुमान् गत्वा पम्पातटमनुत्तमम् । रूपमें पम्पासरके उत्तम तटपर गये और भाई लक्ष्मणके
भिक्षुरूपी स तं प्राह रामं भ्रात्रा समन्वितम् ॥ ७ साथ विद्यमान श्रीरामचन्द्रजीसे बोले- 'महामते ! आप
कौन हैं? यहाँ कैसे आये हैं? इस जनशून्य घोर वनमें
को भवानिह सम्प्राप्तस्तथ्यं ब्रूहि महामते । आप कहाँसे आ गये ? यहाँ आनेका क्या प्रयोजन है ?-
अरण्ये निर्जने घोरे कुतस्त्वं किं प्रयोजनम् ॥ ८ ये सब बातें मेरे समक्ष ठीक-ठीक बताइये' ॥ ७-८ ॥