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संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

२०४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४१

२०४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४१
पुष्पकेण गतः शीघ्रं लङ्कां दुष्टनिशाचरः। करके वह दुष्ट निशाचर पुष्पकविमानद्वारा शीघ्र ही लङ्कामें
अशोकवनिकामध्ये स्थापयित्वा स मैथिलीम् ॥ १०४ जा पहुँचा। वहाँ मिथिलेशकुमारी सीताको अशोक-वाटिका में
रखकर राक्षसियोंसे बोला- 'भयंकर मुखवाली निशाचरियो !
इमामत्रैव रक्षध्वं राक्षस्यो विकृताननाः। तुम लोग यहीं सीताकी रखवाली करो।' यह आदेश दे
इत्यादिश्य गृहं यातो रावणो राक्षसेश्वरः ॥ १०५ वह राक्षसराज रावण अपने भवनमें चला गया। उस
समय लङ्कानिवासी एकान्तमें परस्पर मिलकर बातें करने
लङ्कानिवासिनश्चोचुरेकान्तं च परस्परम्। लगे- 'दुरात्मा रावणने इस नगरीका विनाश करनेके लिये
अस्याः पुर्या विनाशार्थं स्थापितेयं दुरात्मना ॥ १०६ ही सीताको यहाँ ला रखा है' ॥ १०३-१०६॥
विकट आकारवाली राक्षसियोंद्वारा सब ओरसे सुरक्षित
राक्षसीभिर्विरूपाभी रक्ष्यमाणा समन्ततः। हुई सीता वहाँ दुःखमग्न हो केवल श्रीरामचन्द्रजीका ही
सीता च दुःखिता तत्र स्मरन्ती राममेव सा ॥ १०७ चिन्तन करती हुई रहने लगीं। वे सदा अत्यन्त शोकार्त
हो बड़े दुःखके साथ बहुत रोदन किया करती थीं।
उवास सा सुदुःखार्ता दुःखिता रुदती भृशम्। रावणके वशमें पड़ी हुई सीता ज्ञानको अपनेतक ही सीमित
यथा ज्ञानखले देवी हंसयाना सरस्वती ॥ १०८ रखनेवाले कृपणके अधीन हुई हंसवाहिनी सरस्वतीके
समान वहाँ शोभा नहीं पाती थी ॥ १०७-१०८॥
सुग्रीवभृत्या हरयश्चतुरश्च यदृच्छया। सीताने वस्त्रमें बँधे हुए अपने जिन आभूषणोंको
वस्त्रबद्धं तयोत्सृष्टं गृहीत्वा भूषणं द्रुतम् ॥ १०९ नीचे गिरा दिया था, उन्हें अकस्मात् घूमनेके लिये
आये हुए चार वानरोंने, जो वानरराज सुग्रीवके सेवक
स्वभर्त्रे विनिवेद्योचुः सुग्रीवाय महात्मने। थे, पाया और शीघ्रतापूर्वक ले जाकर अपने स्वामी
अरण्येऽभून्महायुद्धं जटायो रावणस्य च ॥ ११० महात्मा सुग्रीवको अर्पित करके यह समाचार भी
सुनाया कि 'आज वनके भीतर जटायु और रावणमें
अथ रामश्च तं हत्वा मारीचं माययाऽऽगतम्। बड़ा भारी युद्ध हुआ था।' इधर, जब श्रीरामचन्द्रजी
निवृत्तो लक्ष्मणं दृष्ट्वा तेन गत्वा स्वमाश्रमम् ॥ १११ मायामय वेष बनाकर आये हुए उस मारीचको मारकर
लौट पड़े, तब मार्गमें लक्ष्मणको देखकर उनके साथ
सीतामपश्यन्दुःखार्तः प्ररुरोद स राघवः। अपने आश्रमपर आये; किंतु वहाँ सीताको न देखकर
लक्ष्मणश्च महातेजा रुरोद भृशदुःखितः ॥ ११२ वे दुःखसे व्यथित हो फूट-फूटकर रोने लगे।
महातेजस्वी लक्ष्मण भी अत्यन्त दुःखी होकर रोदन
बहुप्रकारमस्वस्थं रुदन्तं राघवं तदा। करने लगे। उस समय श्रीरामचन्द्रजीको सर्वथा अस्वस्थ
भूतले पतितं धीमानुत्थाप्याश्वास्य लक्ष्मणः ॥ ११३ होकर रोते और पृथ्वीपर गिरा देख बुद्धिमान् लक्ष्मणने
उन्हें उठाकर धीरज बँधाया ॥ १०९-११३॥
उवाच वचनं प्राप्तं तदा यत्तच्छृणुष्व मे। राजन्! उस समय लक्ष्मणने उनसे जो समयोचित
अतिवेलं महाराज न शोकं कर्तुमर्हसि ॥ ११४ बात कही थी, वह तुम मुझसे सुनो। (लक्ष्मण बोले-)
'महाराज! आप अधिक शोक न करें। प्रभो! अब
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ शीघ्रं त्वं सीतां मृगयितुं प्रभो। सीताकी खोज करनेके लिये आप शीघ्रतापूर्वक उठिये,
इत्येवं वदता तेन लक्ष्मणेन महात्मना ॥ ११५ उठिये।' इत्यादि बातें कहते हुए दुःखी महात्मा लक्ष्मणने
अपने शोक-ग्रस्त भाई राजा रामचन्द्रजीको उठाया और
उत्थापितो नरपतिर्दुःखितो दुःखितेन तु। उनके साथ स्वयं सीताकी खोज करनेके लिये वनमें
भ्रात्रा सह जगामाथ सीतां मृगयितुं वनम् ॥ ११६ चले ॥ ११४-११६॥
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अध्याय ४९ ] श्रीरामका जयन्तको दण्ड देना; शरभङ्ग, सुतीक्ष्ण और अगस्त्यसे मिलना २०५
वनानि सर्वाणि विशोध्य राघवो उस समय श्रीरामचन्द्रजीने सारे वनोंको छान
गिरीन् समस्तान् गिरिसानुगोचरान्। डाला, समस्त पर्वतों तथा उनकी चोटियोंपर
तथा मुनीनामपि चाश्रमान् बहून्- जानेवाले मार्गोंका भी निरीक्षण कर लिया। इसी
स्तृणादिवल्लीगहनेषु भूमिषु॥ ११७ प्रकार उन्होंने मुनियोंके बहुत-से आश्रम भी देखे;
तृण एवं लताओंसे आच्छादित वनस्थलियों तथा
नदीतटे भूविवरे गुहायां खुले मैदानोंमें, नदीके किनारे, गड्ढोंमें और कन्दराओंमें
निरीक्षमाणोऽपि महानुभावः। देखनेपर भी जब उन महानुभावको अपनी प्रिया
प्रियामपश्यन् भृशदुःखितस्तदा सीताका पता नहीं लगा, तब वे बहुत दुःखी हुए।
जटायुषं वीक्ष्य च घातितं नृपः॥ ११८ उसी समय राजा रामचन्द्रजीने रावणद्वारा मारे गये
जटायुको देखा और कहा—'अहो! आपको किसने
अहो भवान् केन हतस्त्वमीदृशीं मारा? आह! आप ऐसी दुर्दशाको पहुँच चुके हैं?
दशामवाप्तोऽसि मृतोऽसि जीवसि। पता नहीं, जीवित हैं या मर गये। पत्नीके
ममाद्य सर्वं समदुःखितस्य भोः वियोगवश आपके समान ही दुःखी होकर यहाँ
पत्नीवियोगादिह चागतस्य वै॥ ११९ आये हुए मुझ रामके लिये आजकल आप ही
सब कुछ थे'॥ ११७—११९॥
इत्युक्तमात्रे विहगोऽथ कृच्छ्रा- भगवान् रामके इतना कहते ही वह पक्षी उस
दुवाच वाचं मधुरां तदानीम्। समय बड़े कष्टसे मधुर वाणीमें बोला—'राजन्! इस
शृणुष्व राजन् मम वृत्तमत्र समय मैंने जो कुछ देखा है और तत्काल ही
वदामि दृष्टं च कृतं च सद्यः॥ १२० उसके लिये जो कुछ किया है, वह मेरा सारा
वृत्तान्त आप सुनें। दशमुख रावणने मायासे सीताका
दशाननस्तामपनीय मायया अपहरण करके उसे उत्तम विमानपर चढ़ा लिया
सीतां समारोप्य विमानमुत्तमम्। और आकाशमार्गसे वह दक्षिण दिशाकी ओर चल
जगाम खे दक्षिणदिङ्मुखोऽसौ दिया। उस समय माता सीता बड़े दुःखके साथ
सीता च माता विललाप दुःखिता॥ १२१ विलाप कर रही थीं। रघुनन्दन! सीताकी आवाज
सुनकर मैंने उन्हें अपने ही बलसे छुड़ानेके लिये
आकर्ण्य सीतास्वनमागतोऽहं रावणके साथ महान् युद्ध छेड़ दिया। फिर उस
सीतां विमोक्तुं स्वबलेन राघव। राक्षसने अपनी तलवारके बलसे मुझे मार डाला।
युद्धं च तेनाहमतीव कृत्वा विदेहकुमारी सीताके ही आशीर्वादसे मैं अभीतक
हतः पुनः खड्गबलेन रक्षसा॥ १२२ जीवित था, अब यहाँसे स्वर्गलोकको जाऊँगा।
पृथ्वीपालक राम! आप शोक न कीजिये, अब तो
वैदेहिवाक्यादिह जीवता मया उस दुष्ट राक्षसको उसके गणोंसहित मार ही
दृष्टो भवान् स्वर्गमितो गमिष्ये। डालिये'॥ १२०—१२३॥
मा राम शोकं कुरु भूमिपाल जटायुके यों कहनेपर श्रीरामने पुनः
जह्यद्य दुष्टं सगणं तु नैर्ऋतम्॥ १२३ शोकपूर्वक उनसे कहा—'पक्षिराज! आपका
रामो जटायुषेत्युक्तः पुनस्तं चाह शोकतः। कल्याण हो और आपको उत्तम गति मिले।'
स्वस्त्यस्तु ते द्विजवर गतिस्तु परमास्तु ते॥ १२४
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