संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
[ अध्याय ४८
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१८८
श्रीनरसिंहपुराण
[ अध्याय ४८
[Left Column: Sanskrit Shlokas]
तिस्रः श्वश्रूः समामन्त्र्य श्वशुरं च विसंज्ञितम्।
मुञ्चन्तमश्रुधाराणि नेत्रयोः शोकजानि च ॥ ६५
पश्यती सर्वतः सीता चारुरोह तथा रथम्।
रथमारुह्य गच्छन्तं सीतया सह राघवम् ॥ ६६
दृष्ट्वा सुमित्रा वचनं लक्ष्मणं चाह दुःखिता।
रामं दशरथं विद्धि मां विद्धि जनकात्मजाम् ॥ ६७
अयोध्यांमटवीं विद्धि व्रज ताभ्यां गुणाकर।
मात्रैवमुक्तो धर्मात्मा स्तनक्षीरार्द्रदेहया ॥ ६८
तां नत्वा चारुयानं तमारुरोह स लक्ष्मणः।
गच्छतो लक्ष्मणे भ्राता सीता चैव पतिव्रता ॥ ६९
रामस्य पृष्ठतो यातौ पुराद्बहीरौ महामते।
विधिच्छिन्नाभिषेकं तं रामं राजीवलोचनम् ॥ ७०
अयोध्याया विनिष्क्रान्तमनुयाताः पुरोहिताः।
मन्त्रिणः पौरमुख्याश्च दुःखेन महतान्विताः ॥ ७१
तं च प्राप्य हि गच्छन्तं राममूचुरिदं वचः।
राम राम महाबाहो गन्तुं नार्हसि शोभन ॥ ७२
राजन्नत्र निवर्तस्व विहायास्मान् क्व गच्छसि।
इत्युक्तो राघवस्तैस्तु तानुवाच दृढव्रतः ॥ ७३
गच्छध्वं मन्त्रिणः पौरा गच्छध्वं च पुरोधसः।
पित्रादेशं मया कार्यमभियास्यामि वै वनम् ॥ ७४
द्वादशाब्दं व्रतं चैतन्नीत्वाहं दण्डके वने।
आगच्छामि पितुः पादं मातृणां द्रष्टुमञ्जसा ॥ ७५
इत्युक्त्वा ताञ्जगामाथ रामः सत्यपरायणः।
तं गच्छन्तं पुनर्याताः पृष्ठतो दुःखिता जनाः ॥ ७६
पुनः प्राह स काकुत्स्थो गच्छध्वं नगरीमिमाम्।
मातृश्च पितरं चैव शत्रुघ्नं नगरीमिमाम् ॥ ७७
प्रजाः समस्तास्तत्रस्था राज्यं भरतमेव च।
पालयध्वं महाभागास्तपसे याम्यहं वनम् ॥ ७८
[Right Column: Hindi Translation]
तदनन्तर सीताजी भी अपनी तीनों सासुओंसे तथा नेत्रोंसे शोकाश्रुकी धारा बहाते हुए संज्ञाशून्य श्वशुर महाराज दशरथसे आज्ञा ले सब ओर देखती हुई रथपर आरूढ़ हुईं। सीताके साथ श्रीरामचन्द्रको रथपर चढ़कर वनमें जाते देख सुमित्रा अत्यन्त दुःखित हो लक्ष्मणसे बोलीं— 'सद्गुणोंकी खान बेटा लक्ष्मण ! तुम आजसे श्रीरामको ही पिता दशरथ समझो, सीताको ही मेरा स्वरूप मानो तथा वनको ही अयोध्या जानो। उन दोनोंके साथ ही सेवाके लिये तुम भी जाओ' ॥ ६५-६७१/२ ॥
स्नेहवश जिनके स्तनोंसे दूध बहकर समस्त शरीरको भिगो रहा था, उन माता सुमित्राके इस प्रकार कहनेपर लक्ष्मण उन्हें प्रणाम करके स्वयं भी उस सुन्दर रथपर जा बैठे। महामते ! इस प्रकार नगरसे वनमें जाते हुए श्रीरामचन्द्रजीके पीछे धीर-वीर भ्राता लक्ष्मण तथा सुस्थिर-हृदया पतिव्रता सीता—दोनों ही चले ॥ ६८-६९१/२ ॥
दुर्दैवने जिनके राज्याभिषेकको बीचमें ही छिन्न-भिन्न कर दिया था, वे कमलनयन श्रीराम जब अयोध्यापुरीसे निकले, उस समय पुरोहित, मन्त्री और प्रधान-प्रधान पुरवासी भी बहुत दुःखी होकर उनके पीछे-पीछे चले तथा वनकी ओर जाते हुए श्रीरामके निकट पहुँचकर उनसे यों बोले— 'राम ! राम ! महाबाहो ! तुम्हें वनमें नहीं जाना चाहिये। शोभाशाली नरेश्वर ! नगरको लौट चलो; हमें छोड़कर कहाँ जा रहे हो ?' ॥ ७०-७२१/२ ॥
उनके यों कहनेपर दृढ़प्रतिज्ञ श्रीराम उनसे बोले— 'मन्त्रियो ! पुरवासियो ! और पुरोहितगण ! आप लोग लौट जायें। मुझे अपने पिताजीकी आज्ञाका पालन करना है, इसलिये मैं वनमें अवश्य जाऊँगा। वहाँ दण्डकारण्यमें बारह वर्षोंतक वनवासके नियमको पूर्ण करनेके पश्चात् मैं पिता और माताओंके चरण-कमलोंका दर्शन करनेके लिये शीघ्र ही यहाँ लौट आऊँगा' ॥ ७३-७५ ॥
नगर-निवासियाेंसे यों कहकर सत्यपरायण श्रीराम आगे बढ़ गये। उन्हें जाते देख पुनः सब लोग दुःखी हो उनके पीछे-पीछे चलने लगे। तब ककुत्स्थनन्दन श्रीरामने फिर कहा—महाभागगण ! आपलोग इस अयोध्यापुरीको लौट जाइये और मेरे पिता-माताओंकी, भरत-शत्रुघ्नकी, इस अयोध्यानगरीकी, यहाँकि समस्त प्रजाजनोंकी तथा इस राज्यकी भी रक्षा कीजिये। मैं वनमें तपस्याके लिये जाता हूँ' ॥ ७६-७८ ॥
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अध्याय ४८ ] श्रीराम-वनवास; राजा दशरथका निधन तथा वनमें राम-भरतकी भेंट १८९
अथ लक्ष्मणमाहेदं वचनं राघवस्तदा। | तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजीने उस समय लक्ष्मणसे यह
सीतामर्पय राजानं जनकं मिथिलेश्वरम् ॥ ७९ | बात कही—'लक्ष्मण! तुम सीताको ले जाकर मिथिलापति
| राजा जनकको सौंप आओ और स्वयं पिता-माताके
पितृमातृवशे तिष्ठ गच्छ लक्ष्मण याम्यहम्। | अधीन रहो। लौट जाओ, लक्ष्मण! मैं वनको अकेला ही
इत्युक्तः प्राह धर्मात्मा लक्ष्मणे भ्रातृवत्सलः ॥ ८० | जाऊँगा।' उनके यों कहनेपर भ्रातृवत्सल धर्मात्मा लक्ष्मणने
| कहा—'प्रभो! करुणानिधान! आप मुझे ऐसी कठोर
मैवमाज्ञापय विभो मामद्य करुणाकर। | आज्ञा न दीजिये। आप जहाँ भी जाना चाहते हैं, वहाँ मैं
गन्तुमिच्छसि यत्र त्वमवश्यं तत्र याम्यहम् ॥ ८१ | अवश्य चलूँगा।' लक्ष्मणके यों कहनेपर श्रीरामचन्द्रजीने
| सीतासे कहा—'शोभने सीते! तुम मेरी आज्ञासे अपने
इत्युक्तो लक्ष्मणेनासौ सीतां तामाह राघवः। | पिताके यहाँ चली जाओ अथवा माता कौशल्या और
सीते गच्छ ममादेशात् पितरं प्रति शोभने ॥ ८२ | सुमित्राके भवनमें जाकर रहो। सुन्दरि! तुम तबतकके
| लिये वहाँ लौट जाओ, जबतक कि मैं वनसे फिर यहाँ
सुमित्राया गृहे चापि कौशल्यायाः सुमध्यमे। | आ न जाऊँ' ॥ ७९–८३ ॥
निवर्तस्व हि तावत्त्वं यावदागमनं मम ॥ ८३ | श्रीरामचन्द्रजीके इस प्रकार आदेश देनेपर सीता भी
| हाथ जोड़कर बोली—'महाबाहो! हे शत्रुदमन! आप
इत्युक्ता राघवेनापि सीता प्राह कृताञ्जलिः। | वनमें जहाँ जाकर निवास करेंगे, वहाँ चलकर मैं भी
यत्र गत्वा वने वासं त्वं करोषि महाभुज ॥ ८४ | आपके ही साथ रहूँगी। राजन्! सत्यव्रतका पालन
| करनेवाले आप पतिदेवका वियोग मैं क्षणभरके लिये
तत्र गत्वा त्वया सार्धं वसाम्यहमरिंदम। | भी नहीं सह सकती; इसलिये प्रभो! मैं प्रार्थना करती
वियोगं नो सहे राजंस्त्वया सत्यवता क्वचित् ॥ ८५ | हूँ, मुझपर दया करें। प्राणनाथ! आप जहाँ जाना चाहते
| हैं, वहाँ मैं भी अवश्य ही चलूँगी' ॥ ८४–८६ ॥
अतस्त्वां प्रार्थयिष्यामि दयां कुरु मम प्रभो। | इसके बाद श्रीरामचन्द्रजीने देखा कि मेरे पीछे
गन्तुमिच्छसि यत्र त्वमवश्यं तत्र याम्यहम् ॥ ८६ | बहुत-से पुरुष नाना प्रकारके वाहनोंपर चढ़कर आ गये
| हैं तथा झुंड-की-झुंड स्त्रियाँ भी आ गयी हैं; तब
नानायानैरुपगताञ्जनान् वीक्ष्य स पृष्ठतः। | धर्मवेत्ता श्रीरामने उन सबको साथ चलनेसे मना किया
योषितां च गणान् रामो वारयामास धर्मवित् ॥ ८७ | और कहा—'पुरुषो! और स्त्रियो! आप सब लोग
| लौटकर अयोध्यामें स्वच्छन्दतापूर्वक रहें। मैं तपस्याके
निवृत्य स्थीयतां स्वैरमयोध्यायां जनाः स्त्रियः। | लिये चित्त एकाग्र करके दण्डकारण्यको जा रहा हूँ।
गत्वाहं दण्डकारण्यं तपसे धृतमानसः ॥ ८८ | वहाँ कुछ ही वर्षोंतक रहनेके बाद मैं अपनी पत्नी सीता
| और भाई लक्ष्मणके साथ यहाँ लौट आऊँगा, यह मैंने
कतिपयाब्दादायास्ये नान्यथा सत्यमीरितम्। | सच्ची बात बतायी है। इसे अन्यथा नहीं मानना
लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा वैदेह्या च स्वभार्यया ॥ ८९ | चाहिये' ॥ ८७–८९ ॥
| इस प्रकार अयोध्यावासी लोगोंको लौटाकर
जनान्निवर्त्य रामोऽसौ जगाम च गुहाश्रमम्। | श्रीरामने गुहके आश्रमपर पदार्पण किया। गुह स्वभावसे
गुहस्तु रामभक्तोऽसौ स्वभावादेव वैष्णवः ॥ ९० | ही वैष्णव तथा श्रीरामचन्द्रजीका परम भक्त था।
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