संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
अध्याय ६७] मानसतीर्थ, व्रत तथा नरसिंहपुराणका माहात्म्य २९९
अध्याय ६७] मानसतीर्थ, व्रत तथा नरसिंहपुराणका माहात्म्य २९९
मनोनिर्मलता तीर्थं रागादिभिरनाकुला।
सत्यं तीर्थं दया तीर्थं तीर्थमिन्द्रियनिग्रहः॥ २
गुरुशुश्रूषणं तीर्थं मातृशुश्रूषणं तथा।
स्वधर्माचरणं तीर्थं तीर्थमग्नेरुपासनम्॥ ३
वास्तवमें राग-द्वेषादिसे रहित मनकी स्वच्छता ही उत्तम
तीर्थ है। सत्य, दया, इन्द्रियनिग्रह, गुरुसेवा, माता-
पिताकी सेवा, स्वधर्मपालन और अग्निकी उपासना—
ये परम उत्तम तीर्थ हैं। यह तो पावन तीर्थोंका वर्णन
हुआ, अब व्रतोंका वर्णन सुनिये॥१-३१/२॥
एतानि पुण्यतीर्थानि व्रतानि शृणु मेऽधुना।
एकभुक्तं तथा नक्तमुपवासं च वै मुने॥ ४
मुने! दिन-रातमें एक बार भोजन करके रहना
और विशेषतः रातमें भोजन न करना—यह व्रत है।
पूर्णिमा और अमावास्याको एक ही बार भोजन करके
रहना चाहिये। इन तिथियोंमें एक बार भोजन करके
रहनेवाला मनुष्य पावन गतिको प्राप्त करता है। जो
चतुर्थी, चतुर्दशी, सप्तमी, अष्टमी और त्रयोदशीको
रातमें उपवास करता है, उसे मनोवाञ्छित वस्तुकी
प्राप्ति होती है॥४-६॥
पूर्णमास्याममावास्यामेकभुक्तं समाचरेत्।
तत्रैकभुक्तं कुर्वाणः पुण्यां गतिमवाप्नुयात्॥ ५
चतुर्थ्यां तु चतुर्दश्यां सप्तम्यां नक्तमाचरेत्।
अष्टम्यां तु त्रयोदश्यां स प्राप्नोत्यभिवाञ्छितम्॥ ६
उपवासो मुनिश्रेष्ठ एकादश्यां विधीयते।
नरसिंहं समभ्यर्च्य सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ ७
मुनिश्रेष्ठ! एकादशीको दिन-रात उपवास करनेका
विधान है। उस दिन भगवान् विष्णुका पूजन करके
मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। यदि हस्त
नक्षत्रसे युक्त रविवार हो तो उस दिन रात्रिमें उपवास
करके सौरनक्त-व्रतका पालन करना चाहिये। उस
दिन स्नानके पश्चात् सूर्यमण्डलमें भगवान् विष्णुका
ध्यान करके मनुष्य रोगमुक्त हो जाता है। जब सूर्य
अपनी दुगुनी छायामें स्थित हों, उस दिन सौर नक्तव्रतका
समय है। उस समयसे लेकर राततक भोजन न
करे॥७-९॥
हस्तयुक्तेऽर्कदिवसे सौरनक्तं समाचरेत्।
स्नात्वार्कमध्ये विष्णुं च ध्यात्वा रोगात्प्रमुच्यते॥ ८
आत्मनो द्विगुणां छायां यदा संतिष्ठते रविः।
सौरनक्तं विजानीयान्न नक्तं निशि भोजनम्॥ ९
जो पुरुष बृहस्पतिवारको त्रयोदशी तिथि होनेपर
अपराह्नकालमें जलमें स्नान करके तिल और
तण्डुलोंद्वारा देवता, ऋषि एवं पितरोंका तर्पण करता
है तथा भगवान् नरसिंहका पूजन करके उपवास
करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो विष्णुलोकमें
प्रतिष्ठित होता है॥ १०-११॥
गुरुवार त्रयोदश्यामपराह्ने जले ततः।
तर्पयित्वा पितृन्देवानृषींश्च तिलतण्डुलैः॥ १०
नरसिंहं समभ्यर्च्य यः करोत्युपवासकम्।
सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोके महीयते॥ ११
महामुने! जब अगस्त्य तारेका उदय हो,
उस समयसे लगातार सात रात्रियोंतक अगस्त्य-
मुनिको पूजा करके उन्हें अर्घ्य देना चाहिये।
यदागस्त्योदये प्राप्ते तदा सप्तसु रात्रिषु।
अर्घ्यं दद्यात् समभ्यर्च्य अगस्त्याय महामुने॥ १२
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३०० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६७
शङ्खे तोयं विनिक्षिप्य सितपुष्पाक्षतैर्युतम्।
मन्त्रेणानेन वै दद्याच्छितपुष्पादिनार्चिते ॥ १३
काशपुष्पप्रतीकाश अग्निमारुतसम्भव।
मित्रावरुणयोः पुत्र कुम्भयोने नमोऽस्तु ते ॥ १४
आतापी भक्षितो येन वातापी च महासुरः।
समुद्रः शोषितो येन सोऽगस्त्यः प्रीयतां मम ॥ १५
एवं तु दद्याद्यो सर्वमगस्त्ये वै दिशं प्रति।
सर्वपापविनिर्मुक्तस्तमस्तरति दुस्तरम् ॥ १६
शङ्खमें श्वेत पुष्प और अक्षतसहित जल रखकर श्वेत पुष्प आदिसे पूजित हुए अगस्त्यजीके प्रति निम्नाङ्कित मन्त्र-वाक्य पढ़कर अर्घ्य निवेदन करे—'अग्नि और वायु देवतासे प्रकट हुए अगस्त्यजी! काश पुष्पके समान उज्ज्वल वर्णवाले कुम्भज मुने! मित्र और वरुणके पुत्र भगवान् कुम्भयोने! आपको नमस्कार है। जिन्होंने महान् असुर आतापी और वातापीको भक्षण कर लिया और समुद्रको भी सोख डाला, वे अगस्त्यजी मुझपर प्रसन्न हों।' इस प्रकार कहकर जो पुरुष अगस्त्यकी दिशा (दक्षिण)-के प्रति अर्घ्य अर्पण करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो, दुस्तर मोहान्धकारसे पार हो जाता है॥ १२—१६॥
एवं ते कथितं सर्वं भरद्वाज महामुने।
पुराणं नारसिंहं च मुनीनां संनिधौ मया ॥ १७
सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च।
वंशानुचरितं चैव सर्वमेव प्रकीर्तितम् ॥ १८
ब्रह्मणैव पुरा प्रोक्तं मरीच्यादिषु वै मुने।
तेभ्यश्च भृगुणा प्रोक्तं मार्कण्डेयाय वै ततः ॥ १९
मार्कण्डेयेन वै प्रोक्तं राज्ञो नागकुलस्य ह।
प्रसादान्नारसिंहस्य प्राप्तं व्यासेन धीमता ॥ २०
तत्प्रसादान्मया प्राप्तं सर्वपापप्रणाशनम्।
पुराणं नरसिंहस्य मया च कथितं तव ॥ २१
मुनीनां संनिधौ पुण्यं स्वस्ति तेऽस्तु व्रजाम्यहम्।
महामुने! भरद्वाजजी! इस प्रकार मैंने मुनियोंके निकट यह पूरा 'नरसिंहपुराण' आपको सुनाया। इसमें मैंने सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर और वंशानुचरित—सभीका वर्णन किया है। मुने! इस पुराणको सर्वप्रथम ब्रह्माजीने मरीचि आदि मुनियोंके प्रति कहा था। उन मुनियोंमेंसे भृगुजीने मार्कण्डेयजीके प्रति इसे कहा और मार्कण्डेयजीने नागकुलोत्पन्न राजा सहस्रानीकको इसका श्रवण कराया। फिर भगवान् नरसिंहकी कृपासे इस पुराणको बुद्धिमान् श्रीव्यासजीने प्राप्त किया। उनकी अनुकम्पासे मैंने इस सर्वपापनाशक पवित्र पुराणका ज्ञान प्राप्त किया और इस समय मैंने यह नरसिंहपुराण इन मुनियोंके निकट आपसे कहा। अब आपका कल्याण हो, मैं जा रहा हूँ॥ १७—२११/२॥
यः शृणोति शुचिर्भूत्वा पुराणं ह्येतदुत्तमम् ॥ २२
माघे मासि प्रयागे तु स स्नानफलमाप्नुयात्।
यो भक्त्या श्रावयेद्भक्तान्रित्यं नरहरेरिदम् ॥ २३
सर्वतीर्थफलं प्राप्य विष्णुलोके महीयते।
जो मनुष्य पवित्र होकर इस उत्तम पुराणका श्रवण करता है, वह माघ मासमें प्रयागतीर्थमें स्नान करनेका फल प्राप्त करता है। जो मनुष्य इस नरसिंहपुराणको भगवान्के भक्तोंके प्रति नित्य सुनाता है, वह सम्पूर्ण तीर्थोंके सेवनका फल प्राप्त करके विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥ २२—२३१/२॥
श्रुत्वैवं स्नातकौः सार्धं भरद्वाजो महामतिः ॥ २४
सूतमभ्यर्च्य तत्रैव स्थितवान् मुनयो गताः।
इस प्रकार स्नातकोंके साथ इस पुराणको सुन महामति भरद्वाजजीने सूतजीका पूजन-सत्कार किया और स्वयं वहीं रह गये। अन्य सब मुनि अपने-अपने स्थानको चले गये ॥ २४१/२॥
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