संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
अध्याय ६१ ] योगसार २६७
अध्याय ६१ ] योगसार २६७
योगाभ्यासरतस्येह नश्येयुः पातकानि च। | योगाभ्यासपरायण पुरुषके समस्त पाप नष्ट हो जाते
तस्माद्योगपरो भूत्वा ध्यायेन्नित्यं क्रियान्तरे॥ ३ | हैं, अतः कर्तव्य कर्मसे अवकाश मिलनेपर प्रतिदिन
| योगनिष्ठ होकर ध्यान करना चाहिये। पहले प्राणायामके
प्राणायामेन वचनं प्रत्याहारेण चेन्द्रियम्। | द्वारा वाणीको, प्रत्याहारसे इन्द्रियोंको और धारणाके द्वारा
धारणाभिर्वशीकृत्य पुनर्दुर्धर्षणं मनः॥ ४ | दुर्धर्ष मनको वशमें करे। तत्पश्चात् जो सबके एकमात्र
| कारण, ज्ञानानन्दस्वरूप, अनामय और सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म
एकं कारणमानन्दबोधं च तमनामयम्। | तत्त्व हैं, उन जगदाधार अच्युतका ध्यान करे। एकान्त
सूक्ष्मात्सूक्ष्मतरं ध्यायेज्जगदाधारमच्युतम्॥ ५ | स्थानमें अकेले बैठकर अपने हृदयमें कमलके आसनपर
| विराजमान, तपाये हुए सुवर्णके समान कान्तिमान् अपने
आत्मानमरविन्दस्थं तप्तचामीकरप्रभम्। | आत्मस्वरूप भगवान्का चिन्तन करे। जो सबके प्राणों
रहस्येकान्तमासीत ध्यायेदात्महृदि स्थितम्॥ ६ | और चित्तकी चेष्टाओंको जानता है, सभीके हृदयमें विराजमान
| है तथा समस्त प्राणियोंद्वारा जाननेयोग्य है—वह परमात्मा
यः सर्वप्राणचित्तज्ञो यः सर्वेषां हृदि स्थितः। | मैं ही हूँ, ऐसी भावना करे। जबतक आत्मसाक्षात्कारजन्य
यश्च सर्वजनैर्ज्ञेयः सोऽहमस्मीति चिन्तयेत्॥ ७ | सुखकी प्रतीति हो, तभीतक ध्यान करना आवश्यक
| बताया गया है। उसके उपरान्त श्रौत और स्मार्त कर्मोंका
आत्मलाभसुखं यावत्तावद्ध्यानमुदाहृतम्। | आचरण सुचारूरूपसे करे॥ ३-८॥
श्रुतिस्मृत्युदितं कर्म तत्तदूर्ध्वं समाचरेत्॥ ८
| जैसे रथके बिना घोड़े और घोड़ोंके बिना रथ
यथाश्वा रथहीनाश्च रथाश्चाश्वैर्विना यथा। | उपयोगी नहीं हो सकते, उसी प्रकार तपस्वीके तप और
एवं तपश्च विद्या च उभावपि तपस्विनः॥ ९ | विद्याकी सिद्धि भी एक-दूसरेके आश्रित हैं। जिस
| प्रकार अन्न मधु (चीनी आदि)-से युक्त होनेपर मीठा
यथान्नं मधुसंयुक्तं मधु चान्नेन संयुतम्। | होता है और मधु भी अन्नके साथ ही सुस्वादु प्रतीत
एवं तपश्च विद्या च संयुक्ते भेषजं महत्॥ १० | होता है, उसी प्रकार तप और विद्या—दोनों साथ रहकर
| ही भवरोगके महान् औषध होते हैं। जिस प्रकार पक्षी
द्वाभ्यामेव हि पक्षाभ्यां यथा वै पक्षिणां गतिः। | दोनों पंखोंसे ही उड़ सकते हैं, उसी प्रकार ज्ञान और
तथैव ज्ञानकर्मभ्यां प्राप्यते ब्रह्म शाश्वतम्॥ ११ | कर्म—दोनोंसे ही सनातन ब्रह्मकी प्राप्ति हो सकती है।
| विद्या और तपसे सम्पन्न योगतत्पर ब्राह्मण दैहिक द्वन्द्वोंको
विद्यातपोभ्यां सम्पन्नो ब्राह्मणो योगतत्परः। | शीघ्र ही त्यागकर भवबन्धनसे मुक्त हो जाता है।
देहद्वन्द्वं विहायाशु मुक्तो भवति बन्धनात्॥ १२ | जबतक देवयानमार्गसे जाकर जीवको परमपदकी प्राप्ति
| नहीं होती, तबतक लिङ्गशरीरका विनाश कभी हो नहीं
न देवयानमार्गेण यावत्प्राप्तं परं पदम्। | सकता। द्विजवरो! इस प्रकार वर्णों और आश्रमोंके
न तावद्देहलिङ्गस्य विनाशो विद्यते क्वचित्॥ १३ | विभागपूर्वक मैंने उन आश्रमोंके सम्पूर्ण सनातन धर्मका
| संक्षेपसे वर्णन कर दिया॥ ९-१४॥
मया वः कथितः सर्वो वर्णाश्रमविभागशः।
संक्षेपेण द्विजश्रेष्ठा धर्मस्तेषां सनातनः॥ १४
| मार्कण्डेयजी कहते हैं—इस प्रकार हारीत मुनिके
मार्कण्डेय उवाच | मुखसे स्वर्ग और मोक्षरूप फलको देनेवाले धर्मका
श्रुत्वैवमृषयो धर्मं स्वर्गमोक्षफलप्रदम्। | वर्णन सुनकर वे ऋषिगण उन मुनीश्वरको प्रणाम
प्रणम्य तमृषिं जग्मुर्मुदितास्ते स्वमालयम्॥ १५ | कर प्रसन्नतापूर्वक अपने-अपने स्थानको चले गये।
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