संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
अध्याय ३६ ] अवतार-कथाका उपक्रम १२९
अध्याय ३६ ] अवतार-कथाका उपक्रम १२९
ततो व्याहृतिभिः पश्चाज्जुहुयाच्च तिलान्वितम्।
केवल गायत्रीसे हवन कर लेनेके पश्चात् ['भूर्भुवः
यावत्प्रपूर्यते संख्या लक्षं वा कोटिरेव वा ॥ १९
स्वः'-इन ] तीन व्याहृतियोंसहित गायत्री-मन्त्रसे केवल
तिलका हवन करे। जबतक हवनकी संख्या एक लाख
तावद्धोमं तिलैः कुर्यादच्युतार्चनपूर्वकम्।
या एक करोड़ न हो जाय, तबतक भगवान् विष्णुके
दीनानाथजनेभ्यस्तु यजमानः प्रयत्नतः ॥ २०
पूजनपूर्वक तिलद्वारा हवन करते रहना चाहिये और
तावच्च भोजनं दद्याद् यावद्धोमं समाचरेत्।
जबतक हवन करे, तबतक यजमानको चाहिये कि वह
समाप्ते दक्षिणां दद्याद् ऋत्विग्भ्यः श्रद्धयान्वितः ॥ २१
यत्नपूर्वक दीनों और अनाथोंको भोजन दे। हवन समाप्त
होनेपर ऋत्विजोंको श्रद्धापूर्वक लोभ त्यागकर यथोचित
यथार्हता न लोभेन ततः शान्त्युदकेन च।
दक्षिणा दे। तत्पश्चात् [प्रथम स्थापित किये हुए] शान्ति-
प्रोक्षयेद् ग्राममध्ये तु व्याधितांस्तु विशेषतः ॥ २२
कलशके जलसे उस ग्राममें रहनेवाले सभी मनुष्यों-
एवं कृते तु होमस्य पुरस्य नगरस्य च।
विशेषतः रोगियोंको अभिषेक करे। महाभाग ! इस प्रकार
विधिवत् होमका अनुष्ठान करनेपर पुर (गाँव), नगर,
राष्ट्रस्य च महाभाग राज्ञो जनपदस्य च।
जनपद (प्रान्त) और समस्त राष्ट्रकी सारी बाधाको दूर
सर्वबाधाप्रशमनी शान्तिर्भवति सर्वदा ॥ २३
करनेवाली शान्ति निरन्तर बनी रहती है ॥ १९-२३ ॥
मार्कण्डेय उवाच
मार्कण्डेयजी बोले- नृपनन्दन ! इस प्रकार शौनक
इत्येतच्छौनकोक्तं कथितं नृपनन्दन।
मुनिका बताया हुआ लक्षहोम-विधिका अनुष्ठान जो
लक्षहोमादिकविधिं कार्यं राष्ट्रे सुशान्तिदम् ॥ २४
समस्त राष्ट्रमें शुभ शान्ति प्रदान करनेवाला है, मैंने तुम्हें
ग्रामे गृहे वा पुरबाह्यदेशे
बताया। यदि ब्राह्मणोंद्वारा यह पूर्वोक्त होम-विधि ग्राममें,
द्विजैरयं यत्नकृतः पुरोविधिः।
घरमें अथवा पुरके बाहर प्रयत्नपूर्वक करायी जाय तो
तत्रापि शान्तिर्भविता नराणां
वहाँ भी मनुष्योंको, गौओंको और अनुचरोंसहित राजाको
गवां च भृत्यैः सह भूपतेश्च ॥ २५
पूर्णतया शान्ति प्राप्त हो सकती है ॥ २४-२५ ॥
इति श्रीनरसिंहपुराणे लक्षहोमविधिर्नाम पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३५ ॥
इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'लक्षहोमविधिका वर्णन' नामक पैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३५ ॥
छतीसवाँ अध्याय
अवतार-कथाका उपक्रम
मार्कण्डेय उवाच
मार्कण्डेयजी बोले-महीपाल! अब मैं देवदेव
अवतारानहं वक्ष्ये देवदेवस्य चक्रिणः।
भगवान् विष्णुके पवित्र एवं पापनाशक अवतारोंका
ताञ्शृणुष्व महीपाल पवित्रान् पापनाशनान् ॥ १
वर्णन करूँगा; उन्हें सुनो ॥ १ ॥
महात्मा भगवान् विष्णुने जिस प्रकार मत्स्यरूप
यथा मत्स्येन रूपेण दत्ता वेदाः स्वयम्भुवे।
धारणकर [प्रलयकालीन समुद्रमें खोये हुए] वेद लाकर
मधुकैटभौ च निधनं प्रापितौ च महात्मना ॥ २
ब्रह्माजीको अर्पित किये और मधु तथा कैटभ नामक
यथा कौर्मेण रूपेण विष्णुना मन्दरो धृतः।
दैत्योंको मौतके घाट उतारा; फिर उन भगवान् विष्णुने
तथा पृथ्वी धृता राजन् वाराहेण महात्मना ॥ ३
जिस प्रकार कूर्मरूपसे मन्दराचल पर्वत धारण किया और
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