संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
८६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय २५
८६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय २५
अनन्तभोगशयने योगनिद्रां गतो हरिः। अपनेमें लीन कर लिया और सनन्दन आदि मुनियोंसे
सनन्दनाद्यैर्मुनिभिः स्तूयमानो महामते॥ ३९ अपनी स्तुति सुनते हुए वे 'अनन्त' नामक शेषनागकी
शय्यापर योगनिद्राका आश्रय ले सो गये। राजन्! उन
तस्य सुप्तस्य नाभौ तु महत्पद्ममजायत। सोये हुए भगवान्की नाभिसे प्रकाशमान एक बहुत बड़ा
तस्मिन् पद्मे शुभे राजन् जातोऽहं वेदवित् पुरा॥ ४० कमल उत्पन्न हुआ। पूर्वकालमें उस प्रकाशमान कमलपर
सर्वप्रथम मुझ वेदवेत्ता ब्रह्माका ही आविर्भाव हुआ। तत्पश्चात्
ततो भूत्वा त्वधोदृष्टिर्दृष्टवान् कमलेक्षणम्। नीचेकी ओर दृष्टि करके मैंने खानसे काटकर निकाले हुए
अनन्तभोगपर्यङ्के भिन्नाञ्जननिभं हरिम्॥ ४१ कोयलेके समान श्यामवर्णवाले भगवान् विष्णुको शेषनागकी
शय्यापर सोते देखा। उनके श्रीअङ्गोंकी कान्ति अलसीके
अतसीकुसुमाभासं शयानं पीतवाससम्। फूलकी भाँति सुन्दर जान पड़ती थी, दिव्य रत्नोंके आभरणोंसे
दिव्यरत्नविचित्राङ्गं मुकुटेन विराजितम्॥ ४२ उनके श्रीविग्रहकी विचित्र शोभा हो रही थी और उनका
मस्तक मुकुटसे शोभायमान था॥ ३७-४२॥
कुन्देन्दुसदृशाकारमनन्तं च महामते। 'महामते! उस समय मैंने उन अनन्तदेव शेषनागका
सहस्रफणमध्यस्थैर्मणिभिर्दीप्तिमत्तरम् ॥४३ भी दर्शन किया, जिनका आकार कुन्द और चन्द्रमाके
समान श्वेत था तथा जो हजारों फणोंकी मणियोंसे
क्षणमात्रं तु तं दृष्ट्वा पुनस्तत्र न दृष्टवान्। अत्यन्त देदीप्यमान हो रहे थे। नृपश्रेष्ठ! क्षणभर ही वहाँ
दुःखेन महताऽऽविष्टो बभूवाहं नृपोत्तम॥ ४४ उन्हें देखकर मैं फिर उनका दर्शन न पा सका, इससे
अत्यन्त दुःखी हो गया। तब मैं कौतूहलवश निरामय
ततो न्ववातरं तस्मात् पद्मनालं समाश्रितः। भगवान् नारायणका दर्शन करनेके लिये कमलनालका
कौतूहलेन तं द्रष्टुं नारायणमनामयम्॥ ४५ सहारा ले वहाँसे नीचे उतरा; परंतु राजेन्द्र! उस समय
जलके भीतर बहुत खोजनेपर भी मैं उन लक्ष्मीपतिका
ततस्त्वन्विष्य राजेन्द्र सलिलान्ते न दृष्टवान्। पुन: दर्शन न पा सका। तब मैं फिर उसी कमलका
श्रीशं पुनस्तमेवाहं पद्माश्चित्य चिन्तयन्॥ ४६ आश्रय ले वासुदेवके उसी रूपका चिन्तन करता हुआ
उनके दर्शनके लिये बड़ी भारी तपस्या करने लगा।
तद्रूपं वासुदेवस्य द्रष्टुं तेपे महत्तपः। तत्पश्चात् अन्तरिक्षके भीतरसे किसी अव्यक्त शरीरवाली
ततो मामन्तरिक्षस्था वागुवाचाशरीरिणी॥ ४७ वाणीने मुझसे कहा॥ ४३-४७॥
वृथा किं क्लिश्यते ब्रह्मन् साम्प्रतं कुरु मे वचः। "ब्रह्मन्! क्यों व्यर्थ क्लेश उठा रहे हो? इस समय
न दृश्यो भगवान् विष्णुस्तपसा महतापि ते॥ ४८ मेरी बात मानो। बहुत बड़ी तपस्यासे भी तुम्हें भगवान्
विष्णुका दर्शन नहीं हो सकेगा। यदि यहाँ शुद्ध स्फटिक-
सृष्टिं कुरु तदाज्ञप्तो यदि द्रष्टुमिहेच्छसि। मणिके समान श्वेत नाग-शय्यापर शयन करनेवाले भगवान्
शुद्धस्फटिकसंकाशनागपर्यङ्कशायिनम् ॥४९ विष्णुका दर्शन करना चाहते हो तो उनके आज्ञानुसार सृष्टि
करो। महामते! तुमने 'शार्ङ्ग' धनुष धारण करनेवाले उन
यद्दृष्टं शार्ङ्गिणो रूपं भिन्नाञ्जनसमप्रभम्। भगवान्का, जो अञ्जन-पुञ्जके समान श्याम सुषमासे युक्त
प्रतिभानियतं रूपं विमानस्थं महामते॥ ५० तथा स्वभावतः प्रतिभाशालीरूप विमान (शेषशय्या) - पर
स्थित देखा है, उसीका आलस्यरहित होकर भजन-ध्यान
भज नित्यमनालस्यस्ततो द्रक्ष्यसि माधवम्। करो, तब उन माधवको देख सकोगे॥ ४८-५०½ ॥
तयेत्थं चोदितो राजंस्त्यक्त्वा तममनुक्षणम्॥ ५१ "राजन्! उस आकाशवाणीद्वारा इस प्रकार प्रेरित
हो मैंने निरन्तर की जानेवाली तीव्र तपस्याका अनुष्ठान
In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
अध्याय २५ ] इक्ष्वाकुकी तपस्या और ब्रह्माजीद्वारा विष्णुपतिमाकी प्राप्ति ८७
सृष्टवान् लोकभूतानां सृष्टिं सृष्ट्वा स्थितस्य च। त्यागकर इस जगत्के प्राणियोंकी सृष्टि की। सृष्टि करके
आविर्बभूव मनसि विश्वकर्मा प्रजापतिः॥५२ स्थित होनेपर मेरे हृदयमें प्रजापति विश्वकर्माका प्राकट्य
हुआ। उन्होंने 'अनन्त' नामक शेषनाग और भगवान्
अनन्तकृष्णयोस्तेन द्वे रूपे निर्मिते शुभे। विष्णुकी दो चमकीली प्रतिमाएँ बनायीं। नरेश्वर ! मैंने
विमानस्थो यथापूर्वं मया दृष्टो जले नृप॥ ५३ पहले जलके भीतर शेष-शय्यापर जिस रूपमें देख चुका
था, उसी रूपमें भगवान् श्रीहरिकी वह प्रतिमा बनायी
तथैव तं ततो भक्त्या सम्पूज्याहं हरिं स्थितः। गयी थी। तब मैं उन श्रीहरिके उस श्रीविग्रहकी भक्तिपूर्वक
तत्प्रसादात्तपः श्रेष्ठं मया ज्ञानमनुत्तमम् ॥ ५४ पूजा करके और उन्हींके प्रसादसे श्रेष्ठ तपरूप परम
उत्तम ज्ञान प्राप्त करके विकाररहित नित्यानन्दमय मोक्ष-
लब्ध्वा मुक्तिं च पश्यामि अविकारक्रियासुखम्। सुखका अनुभव करने लगा॥ ५१-५४ १/२ ॥
तदहं ते प्रवक्ष्यामि हितं नृपवरेश्वर ॥ ५५ "राजराजेश्वर ! इस समय मैं तुम्हारे हितकी बात बता
रहा हूँ, सुनो-राजन् ! इस घोर तपस्याको छोड़कर अब
विसृज्यैतत्तपो घोरं पुरीं व्रज निजां नृप। अपनी पुरीको लौट जाओ। प्रजाओंका पालन करना ही
प्रजानां पालनं धर्मस्तपश्चैव महीभृताम् ॥ ५६ राजाओंका धर्म तथा तप है। मैं सिद्धों और ब्राह्मणोंसहित
उस विमानको, जिसपर भगवान्की प्रतिमा है, तुम्हारे
विमानं प्रेषयिष्यामि सिद्धद्विजगणान्वितम्। पास भेजूँगा। उसीमें तुम सुन्दर बाह्य उपचारोंद्वारा उन
तत्राराध्य देवेशं बाह्यार्थैरखिलैः शुभैः ॥ ५७ देवेश्वरकी आराधना करो। नृपश्रेष्ठ ! तुम यज्ञोंद्वारा 'अनन्त'
नामक शेषनागकी शय्यापर शयन करनेवाले भगवान्
नारायणमनन्ताख्ये शयानं क्रतुभिर्यजन्। नारायणका निष्कामभावसे यज्ञोंद्वारा आराधन करते हुए
निष्कामो नृपशार्दूल प्रजा धर्मेण पालय ॥ ५८ धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करो। नृप ! भगवान् वासुदेवकी
कृपासे अवश्य ही तुम्हारी मुक्ति हो जायगी।" राजासे
प्रसादाद्वासुदेवस्य मुक्तिस्ते भविता नृप। यों कहकर लोकपितामह ब्रह्माजी अपने धामको चले
इत्युक्त्वा तं जगामाथ ब्रह्मलोकं पितामहः ॥ ५९ गये॥ ५५-५९ ॥
द्विज ! ब्रह्माजीके चले जानेपर राजा इक्ष्वाकु उनकी
इक्ष्वाकुश्चिन्तयन्नास्ते पद्मयोनिवचो द्विज। बातोंपर विचार ही कर रहे थे, तबतक उनके समक्ष
आविर्बभूव पुरतो विमानं तन्महीभृतः ॥ ६० वह विष्णु और अनन्तकी प्रतिमाओंका शुभ विमान,
जिसे ब्रह्माजीने दिया था, सिद्ध ब्राह्मणोंसहित प्रकट हो
ब्रह्मदत्तं द्विजयुतं माधवानन्तयोः शुभम्। गया। उन भगवान् पुरुषोत्तमका दर्शन करके उन्होंने
तं दृष्ट्वा परया भक्त्या नत्वा च पुरुषोत्तमम् ॥ ६१ बड़ी भक्तिके साथ उन्हें प्रणाम किया तथा साथमें
आये हुए ऋषियों एवं ब्राह्मणोंको भी नमस्कार करके
ऋषीन् प्रणम्य विप्रांश्च तदादा ययौ पुरीम्। वे उस विमानको लेकर अपनी पुरीको गये। वहाँ
पौरैर्जनैश्च नारीभिर्दृष्टः शोभासमन्वितैः ॥ ६२ नगरके सभी शोभायमान स्त्री-पुरुषोंने राजाका दर्शन
किया और लावा छींटते हुए वे उन्हें राजभवनमें ले
लाजा विनिक्षिपद्भिश्च नीतो राजा स्वकं गृहम्। गये। राजाने अपने विशाल मन्दिरमें उस सुन्दर वैष्णव-
स्वमन्दिरे विशाले तु विमानं वैष्णवं शुभम् ॥ ६३ विमानको स्थापित किया और साथ आये हुए उन
In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth