संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
१४४ | श्रीनरसिंहपुराण | [ अध्याय ४१
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१४४ | श्रीनरसिंहपुराण | [ अध्याय ४१
[संस्कृत श्लोक]
मार्कण्डेय उवाच
इत्युक्त्वाऽऽनम्य पितरं वासुदेवं हृदि स्मरन्।
प्रयातः पर्वतेनैव सार्धं स मुनिपुङ्गवः॥ १३
कलविङ्कौ तु तौ भूत्वा कैलासं पर्वतोत्तमम्।
यत्रास्ते दितिजश्रेष्ठो द्वित्रैर्मित्रैः परीवृतः॥ १४
कृतस्नानो मुनिस्तत्र वृक्षशाखासमाश्रितः।
शृण्वतस्तस्य दैत्यस्य प्राह गम्भीरया गिरा॥ १५
नमो नारायणायेति पुनः पुनरुदारधीः।
त्रिवारं प्रजपित्वा वै नारदो मौनमाश्रितः॥ १६
तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य कलविङ्कस्य सादरम्।
हिरण्यकशिपुर्दैत्यः क्रुद्धश्चापं समाददे॥ १७
बाणं धनुषि संधाय यावन्मुञ्चति तौ प्रति।
तावदुड्डीय तौ भूप गतौ नारदपर्वतौ॥ १८
सोऽपि क्रोधपरीताङ्गो हिरण्यकशिपुस्तदा।
त्यक्त्वा तमाश्रमं भूयो नगरं स्वं महीपते॥ १९
तस्यापि भार्या सुश्रोणी कयाधूर्नाम नामतः।
तदा रजस्वला भूत्वा स्नाताभूद्दैवयोगतः॥ २०
रात्रावेकान्तसमये तया पृष्टः स दैत्यराट्।
स्वामिन् यदा तपश्चर्यां कर्तुं गेहाद्वनं गतः॥ २१
तदा त्वयोक्तं वर्षाणामयुतं मे तपस्त्विदम्।
तत्किमर्थं महाराज साम्प्रतं त्यक्तवान् व्रतम्॥ २२
तथ्यं कथय मे नाथ स्नेहात्पृच्छामि दैत्यप।
हिरण्यकशिपरुवाच
शृणु चार्वङ्गि मे तथ्यां वाचं व्रतविनाशिनीम्॥ २३
क्रोधस्यातीव जननीं देवानां मुदवर्द्धनीम्।
कैलासशिखरे देवि महदानन्दकानने॥ २४
व्याहरन्तौ शुभां वाणीं नमो नारायणेति च।
वारद्वयं त्रयं चेति व्याहृतं वचनं शुभे॥ २५
[हिन्दी अनुवाद]
**मार्कण्डेयजी बोले—**अपने पितासे इस प्रकार कहकर मुनिश्रेष्ठ नारदजीने उन्हें प्रणाम किया और मन-ही-मन भगवान् वासुदेवका स्मरण करते हुए वे पर्वतमुनिके साथ वहाँसे चल दिये। वे दोनों मुनि कलविङ्क पक्षीका रूप धारणकर उस उत्तम कैलास पर्वतपर आये, जहाँ दैत्यश्रेष्ठ हिरण्यकशिपु अपने दो-तीन मित्रोंके साथ रहता था। वहाँ स्नान करके नारदमुनि वृक्षकी शाखापर बैठ गये और उस दैत्यके सुनते-सुनते गम्भीर वाणीमें भगवन्नामका उच्चारण करने लगे। उदारबुद्धि नारद लगातार तीन बार 'ॐ नमो नारायणाय'—इस मन्त्रका उच्च स्वरसे उच्चारण कर मौन हो गये। भूपाल! कलविङ्कके द्वारा किये गये उस आदरयुक्त नामकीर्तनको सुनकर हिरण्यकशिपुने कुपित हो धनुष उठाया और उसपर बाणका संधान करके ज्यों ही उन दोनों पक्षियोंके प्रति छोड़ने लगा, त्यों ही नारद और पर्वतमुनि उड़कर अन्यत्र चले गये। महीपते! तब हिरण्यकशिपु भी क्रोधसे भर गया और उसी समय वह उस आश्रमको त्यागकर अपने नगरको चला आया॥ १३-१९॥
वहाँ उसी समय उसकी कयाधू नामकी सुन्दरी पत्नी दैवयोगसे रजस्वला होकर ऋतु-स्नाता हुई थी। रात्रिमें एकान्तवासके समय कयाधूने दैत्यराजसे पूछा—
'स्वामिन्! आप जिस समय तप करनेके लिये घरसे वनको गये थे, उस समय तो आपने यह कहा था कि 'मेरी यह तपस्या दस हजार वर्षोंतक चलेगी।' फिर महाराज! आपने अभी क्यों उस व्रतको त्याग दिया? स्वामिन्! दैत्यराज! मैं प्रेमपूर्वक आपसे यह प्रश्न करती हूँ, कृपया मुझे सच-सच बताइये'॥ २०-२२½॥
**हिरण्यकशिपु बोला—**सुन्दरि! सुनो, मैं वह बात तुम्हें सच-सच सुनाता हूँ, जिसके कारण मेरे व्रतका भङ्ग हुआ है। वह बात मेरे क्रोधको अत्यन्त बढ़ानेवाली और देवताओंको आनन्द देनेवाली थी। देवि! कैलासशिखरपर जो महान् आनन्द-कानन है, उसमें दो पक्षी 'ॐ नमो नारायणाय'—इस शुभवाणीका उच्चारण करते हुए आ गये। शुभे! उन्होंने [मुझे सुना-सुनाकर] दो बार, तीन बार उक्त वचनको दुहराया।
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अध्याय ४१ ] प्रह्लादकी उत्पत्ति और उनकी हरि-भक्तिसे हिरण्यकशिपुकी उद्विग्नता १४५
तेन मे मनसि क्रोधो जातोऽतीव वरानने। वरानने! पक्षियोंके उस शब्दको सुनकर मेरे मनमें बड़ा
कोदण्डे शरमाधाय यावन्मुञ्चामि भामिनि॥ २६ क्रोध हुआ और भामिनि! उन्हें मारनेके लिये धनुषपर
बाण चढ़ाकर ज्यों ही मैंने छोड़ना चाहा, त्यों ही वे दोनों
तावत्तौ पक्षिणौ भीतौ गतौ देशान्तरं त्वहम्। पक्षी भयभीत हो उड़कर अन्यत्र चले गये। तब मैं भी
त्यक्त्वा व्रतं समायातो भाविकार्यबलेन वै॥ २७ भावीकी प्रबलतासे अपना व्रत त्यागकर यहाँ चला
आया ॥ २३—२७ ॥
मार्कण्डेय उवाच मार्कण्डेयजी कहते हैं—[हिरण्यकशिपु अपनी
इत्युच्यमाने वचने वीर्यद्रावोऽभवत्तदा। पत्नीके साथ] जब इस प्रकार बातें कर रहा था, उसी
ऋतुकाले तु सम्प्राप्ते जातो गर्भस्तदैव हि॥ २८ समय उसका वीर्य स्खलित हुआ; पत्नीका ऋतुकाल
तो प्राप्त था ही, तत्काल गर्भ स्थापित हो गया। माताके
पुनः प्रवर्धमानस्य गर्भे गर्भस्य धीमतः। उदरमें बढ़ते हुए उस गर्भसे बुद्धिमान् नारदजीके उपदेशके
नारदस्योपदेशेन वैष्णवः समजायत॥ २९ कारण विष्णुभक्त पुत्र उत्पन्न हुआ। भूप! इस प्रसङ्गको
आगे कहूँगा; इस समय जो प्रसङ्ग चल रहा है, उसे
तदग्रे कथयिष्यामि भूप श्रद्धापरो भव। श्रद्धापूर्वक सुनो। हिरण्यकशिपुका वह भक्त पुत्र प्रह्लाद
तस्य सूनुरभूद्भक्तः प्रह्लादो जन्मवैष्णवः॥ ३० जन्मसे ही वैष्णव हुआ। जैसे पापपूर्ण कलियुगमें संसार-
बन्धनसे मुक्त करनेवाली भगवान् श्रीहरिकी भक्ति बढ़ती
सोऽवर्धतासुरकुले निर्मलो मलिनाश्रये। रहती है, उसी प्रकार उस मलिन कर्म करनेवाले
यथा कलौ हरेर्भक्तिः पाशसंसारमोचनी॥ ३१ असुर-वंशमें भी प्रह्लाद निर्मल भावसे रहकर दिनोंदिन
बढ़ने लगा। वह बालक त्रिलोकीनाथ भगवान् विष्णुके
स वर्द्धमानो विरराज बालैः चरणोंमें बढ़ती हुई भक्तिके साथ ही स्वयं भी बढ़ता
सह त्रयीनाथपदेषु भक्त्या। हुआ शोभा पा रहा था। शरीर छोटा होनेपर भी उस
बालोऽल्पदेहो महतीं महात्मा बालकका हृदय महान् था; वह विष्णुभक्तिका प्रसार
विस्तारयन् भाति स विष्णु भक्तिम्॥ ३२ करता हुआ उसी तरह शोभा पाता था, जैसे चौथा युग
(कलियुग) [महत्त्वमें सब युगोंसे छोटा होकर भी]
यथा चतुर्थं युगमासधर्म- भगवद्भजनसे धर्म, अर्थ, काम और मोक्षको देनेवाला
कामार्थमोक्षं किल कीर्तिदं हि। तथा यशका विस्तार करनेवाला होता है। प्रह्लाद अन्य
स बाललीलासु सहान्यडिम्भैः बालकोंके साथ खेलते, पहेली बुझाते और खिलौने
प्रहेलिकाक्रीडनकेषु नित्यम्॥ ३३ आदिसे मनोरञ्जन करते समय तथा बातचीतके प्रसङ्गमें
भी सदा भगवान् विष्णुकी ही चर्चा करता था; क्योंकि
कथाप्रसङ्गेषु च कृष्णमेव उसका स्वभाव भगवन्मय हो गया था। इस प्रकार
प्रोवाच यस्मात् स हि तत्स्वभावः। शैशव-कालमें भी विचित्र कार्य करनेवाला वह प्रह्लाद
इत्थं शिशुत्वेऽपि विचित्रकारी भगवत्स्मरणरूपी अमृतका पान करता हुआ दिन-दिन
व्यवर्द्धतेऽशस्मरणामृताशः ॥ ३४ बढ़ने लगा॥ २८-३४॥
एक दिन बहुत-सी स्त्रियोंके बीचमें बैठे हुए दुष्ट
तं पद्मवक्त्रं दैत्येन्द्रः कदाचित्स्त्रीवृतः खलः। दैत्यराज हिरण्यकशिपुने गुरुजीके घरसे आये हुए कमल-
बालं गुरुगृहायातं ददर्श स्वायतेक्षणम्॥ ३५ से मुखवाले अपने बालक पुत्र प्रह्लादको देखा; उसकी
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