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संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

१०६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३१

१०६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३१


सुनीतिरुवाच

अनुज्ञातुं न शक्नोमि त्वामुत्तानशयाङ्ग-ज ॥ ३३
सप्ताष्टवर्षदेशीयः क्रीडायोग्योऽसि पुत्रक ।
त्वदेकतनया तात त्वदाधारैकजीविता ॥ ३४
लब्धोऽसि कतिभिः कष्टैरिष्टाः सम्प्रार्थ्य देवताः ।
यदा यदा बहिर्यासि रन्तुं त्रिचतुरं पदम् ।
तदा तदा मम प्राणस्तात त्वामुपगच्छति ॥ ३५

सुनीति बोली—बेटा! उत्तानपादनन्दन! मैं तुम्हें आज्ञा नहीं दे सकती। मेरे बच्चे! इस समय तुम्हारी सात-आठ वर्षकी अवस्था है। अभी तो तुम खेलने-कूदनेके योग्य हो। तात! एकमात्र तुम्हीं मेरी संतान हो; मेरा जीवन एक तुम्हारे ही आधारपर टिका हुआ है। कितने ही कष्ट उठाकर, अनेक इष्ट देवी-देवताओंकी प्रार्थना करके मैंने तुम्हें पाया है। तात! तुम जब-जब खेलनेके लिये भी तीन-चार कदम बाहर जाते हो, तब-तब मेरे प्राण तुम्हारे पीछे-ही-पीछे लगे रहते हैं॥ ३३—३५॥


ध्रुव उवाच

अद्य यावत् पिता माता त्वं चोत्तानपदो विभुः ।
अद्य प्रभृति मे माता पिता विष्णुर्न संशयः ॥ ३६

ध्रुव बोला—माँ! अबतक तो तुम और राजा उत्तानपाद ही मेरे माता-पिता थे; परंतु आजसे मेरे माता और पिता दोनों भगवान् विष्णु ही हैं, इसमें संदेह नहीं है॥ ३६॥


सुनीतिरुवाच

विष्णोराराधने नाहं वारये त्वां सुपुत्रक ।
जिह्वा मे शतधा यातु यदि त्वां वारयामि भोः ॥ ३७

सुनीति बोली—मेरे सुयोग्य पुत्र! मैं भगवान् विष्णुकी आराधना करनेसे तुम्हें रोकती नहीं। यदि रोकूँ तो मेरी जिह्वाके सैकड़ों टुकड़े हो जायँ ॥ ३७॥


इत्यनुज्ञामिव प्राप्य जननीचरणाम्बुजौ ।
परिक्रम्य प्रणम्याथ तपसे च ध्रुवो ययौ ॥ ३८
तयापि धैर्यसूत्रेण सुनीत्या परिगुम्प्य च।
तत्रेन्दीवरजा माला ध्रुवस्योपायनीकृता ॥ ३९
मात्रा तन्मार्गरक्षार्थं तदा तदनुगीकृताः ।
परैरवार्यप्रसराः स्वाशीर्वादाः परैश्शताः ॥ ४०

इस प्रकार आज्ञा-सी पाकर ध्रुव माताके चरणकमलोंकी परिक्रमा और उन्हें प्रणाम करके तपस्याके लिये प्रस्थित हुआ। सुनीतिने धैर्यपूर्वक सूत्रमें नील कमलकी माला गूँथकर पुत्रको उपहार दिया। मार्गमें पुत्रकी रक्षाके लिये माताने अपने शत-शत आशीर्वाद, जिनका प्रभाव शत्रु भी नहीं रोक सकते थे, उसके पीछे लगा दिये ॥ ३८—४०॥


सर्वत्रावतु ते पुत्र शङ्खचक्रगदाधरः ।
नारायणो जगद्व्यापी प्रभुः कारुण्यवारिधिः ॥ ४१

[वह बोली—] ‘पुत्र! शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले दयासागर जगद्व्यापी भगवान् नारायण सर्वत्र तुम्हारी रक्षा करें'॥ ४१॥


सूत उवाच

स्वसौधात् स विनिर्गत्य बालो बालपराक्रमः ।
अनुकूलेन मरुता दर्शिताध्वाविशद्वनम् ॥ ४२
स मातृदैवतोऽभिज्ञः केवलं राजवर्त्मनि ।
न वेद काननाध्वानं क्षणं दध्यौ नृपात्मजः ॥ ४३

सूतजी बोले—बालोचित पराक्रम करनेवाले बालक ध्रुवने अपने महलसे निकलकर अनुकूल वायुके द्वारा दिखायी हुई राह पकड़कर उपवनमें प्रवेश किया। माताको ही देवता माननेवाला और केवल राजमार्गको ही जाननेवाला वह राजकुमार वनके मार्गको नहीं जानता था, अतः एक क्षणतक आँखें बंद करके कुछ सोचने लगा॥ ४२-४३॥


पुरोपवनमासाद्य चिन्तयामास सोऽर्भकः ।
किं करोमि क्व गच्छामि को मे साहाय्यदो भवेत् ॥ ४४
एवमुन्मील्य नयने यावत् पश्यति स ध्रुवः ।
तावद्ददर्श सप्तर्षीन् अतर्कितगतीन् वने ॥ ४५
अथ दृष्ट्वा स सप्तर्षीन् समसप्ततितेजसः ।
भाग्यसूत्रैरिवाकृष्योपनीतान् प्रमुमोद ह ॥ ४६

नगरके उपवनमें आकर बालक ध्रुव इस प्रकार चिन्ता करने लगा—'क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? कौन मुझे सहायता देनेवाला होगा?' ऐसा विचार करते हुए उसने ज्यों ही आँखें खोलकर देखा, त्यों ही उस उपवनमें अप्रत्याशित गतिवाले सप्तर्षि उसे दिखायी दिये। उन सूर्यतुल्य तेजस्वी सप्तर्षियोंको, जो मानो भाग्यसूत्रसे ही खिंचकर ले आये गये थे, देखकर ध्रुव बहुत प्रसन्न

अध्याय ३१ ] ध्रुव-चरित्र तथा ग्रह, नक्षत्र एवं पातालका संक्षिप्त वर्णन १०७
तिलकाङ्कितसद्भालान् कुशोपग्रहिताङ्गुलीन् । हुआ। उनके सुन्दर ललाटमें तिलक लगे थे। उन्होंने
कृष्णाजिनोपविष्टांश्च ब्रह्मसूत्रैरलंकृतान् ॥ ४७ अँगुुलियोंमें कुशकी पवित्री पहन रखी थी तथा
यज्ञोपवीतोंसे विभूषित होकर वे काले मृगचर्मपर बैठे
उपगम्य विनम्रांसः प्रबद्धकरसम्पुटः । हुए थे। उनके पास जाकर ध्रुवने गर्दन झुका दी, दोनों
ध्रुवो विज्ञापयांचक्रे प्रणम्य ललितं वचः ॥ ४८ हाथ जोड़ लिये और प्रणाम करके मधुर वाणीमें उन्हें
अपना अभिप्राय निवेदित किया॥ ४४-४८॥
ध्रुव उवाच
ध्रुव बोला—मुनिवरो ! आप मुझे सुनीतिके गर्भसे
अवैत मां मुनिवराः सुनीत्युदरसम्भवम्। उत्पन्न राजा उत्तानपादका पुत्र ध्रुव जानें। इस समय मेरा
उत्तानपादतनयं ध्रुवं निर्विण्णमानसम् ॥ ४९ चित्त जगत्की ओरसे विरक्त है॥ ४९॥
सूत उवाच सूतजी कहते हैं—अमूल्य नीति ही जिसका भूषण
तं दृष्ट्वौजस्वलं बालं स्वभावमधुराकृतिम्। है—ऐसे मधुर और गम्भीर भाषण करनेवाले एवं स्वभावतः
अनर्घ्यनयनेपथ्यं मृदुगम्भीरभाषिणम् ॥ ५० मनोहर आकृतिवाले उस तेजस्वी बालकको देखकर
ऋषियोंने अत्यन्त विस्मित हो उसे अपने पास बिठाया
उपोपवेश्य शिशुकं प्रोचुस्ते विस्मिता भृशम् । और कहा—'वत्स ! अभीतक तुम्हारे वैराग्य या निर्वेदका
तवाद्यापि न जानीमो वत्स निर्वेदकारणम् ॥ ५१ कारण हम नहीं जान सके। वैराग्य तो उन मनुष्योंको
होता है, जिनकी मनःकामनाएँ पूर्ण नहीं हो पातीं। तुम
अनवाप्ताभिलाषाणां वैराग्यं जायते नृणाम्। तो सातों द्वीपोंके अधीश्वर सम्राट्के पुत्र हो; तुम अपूर्णमनोरथ
सप्तद्वीपपते राज्ञः कुमारस्त्वं तथा कथम् ॥ ५२ कैसे हो सकते हो? हमसे तुम्हें क्या काम है ? तुम्हारी
किमस्माभिरहो कार्यं कस्तवास्ति मनोरथः। मनोवाञ्छा क्या है'॥ ५०-५२ १/२ ॥
ध्रुव उवाच ध्रुव बोला—'मुनिगण ! मेरे जो उत्तमोत्तम बन्धु
मुनयो मम यो बन्धुरुत्तमश्चोत्तमोत्तमः ॥ ५३ उत्तमकुमार हैं—उनके ही लिये पिताका दिया हुआ शुभ
सिंहासन रहे। उत्तम व्रतका पालन करनेवाले मुनीश्वरो !
पित्रा प्रदत्तं तस्यास्तु तद्भद्रासनमुत्तमम्। मैं आपलोगोंसे इतनी ही सहायता चाहता हूँ कि जिस
भवत्कृतं हि साहाय्यं एतदिच्छामि सुव्रताः ॥ ५४ स्थानका किसी दूसरे राजाने उपभोग न किया हो, जो
अन्य सभी स्थानोंसे उत्कृष्ट हो और इन्द्रादि देवताओंके
अनन्यनृपभुक्तं यद् यदन्येभ्यः समुच्छ्रितम्। लिये भी दुर्लभ हो, वह स्थान मुझे किस उपायसे प्राप्त
इन्द्रादिदुरवापं यत् कथं लभ्येत तत्पदम् ॥ ५५ हो सकता है, यह बता दें।' उस समय उस बालककी
इति श्रुत्वा वचस्तस्य मुनयो बालकस्य तु। ये बातें सुनकर मरीचि आदि ऋषियोंने उसे यथार्थ ही
यथार्थमेव प्रत्यूचुर्मरीच्याद्यास्तदा ध्रुवम् ॥ ५६ उत्तर दिया ॥ ५३–५६ ॥
मरीचिरुवाच मरीचि बोले—जिसने गोविन्द-चरणारविन्दोंके
परागके रसका आस्वादन नहीं किया, वह मनोरथ-
अनास्वादितगोविन्दपदाम्बुजरजोरसः । पथसे अतीत (ध्यानमें भी न आ सकनेवाले) पर्मोज्ज्वल
मनोरथपथातीतं स्फीतं नाकलयोत् फलम् ॥ ५७ फलको नहीं प्राप्त कर सकता ॥ ५७॥