संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
१९२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४८
१९२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४८
लक्ष्मणश्च महावीर्यो गुणवान् भ्रातृवत्सलः।
तत्र यास्यामि कैकेयि महत्पापं त्वया कृतम्॥ ११७
राम एव मम भ्राता ज्येष्ठो मतिमतां वरः।
स एव राजा दुष्टात्मे भृत्योऽहं तस्य वै सदा ॥ ११८
इत्युक्त्वा मातरं तत्र रुरोद भृशदुःखितः।
हा राजन् पृथिवीपाल मां विहाय सुदुःखितम् ॥ ११९
क्व गतोऽस्यद्य वै तात किं करोमीह तद्वद ।
भ्राता पित्रा समः क्वास्ते ज्येष्ठो मे करुणाकरः ॥ १२०
सीता च मातृतुल्या मे क्व गतो लक्ष्मणश्च ह।
इत्येवं विलपन्तं तं भरतं मन्त्रिभिः सह ॥ १२१
वसिष्ठो भगवानाह कालकर्मविभागवित्।
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ वत्स त्वं न शोकं कर्तुमर्हसि ॥ १२२
कर्मकालवशादेव पिता ते स्वर्गमास्थितः।
तस्य संस्कारकार्याणि कर्माणि कुरु शोभन ॥ १२३
रामोऽपि दुष्टनाशाय शिष्टानां पालनाय च।
अवतीर्णो जगत्स्वामी स्वांशेन भुवि माधवः ॥ १२४
प्रायस्तत्रास्ति रामेण कर्तव्यं लक्ष्मणेन च ।
यत्रासौ भगवान् वीरः कर्मणा तेन चोदितः ॥ १२५
तत्कृत्वा पुनरायाति रामः कमललोचनः।
इत्युक्तो भरतस्तेन वसिष्ठेन महात्मना ॥ १२६
संस्कारं लम्भयामास विधिदृष्टेन कर्मणा ।
अग्निहोत्राग्निना दग्ध्वा पितुर्देहं विधानतः ॥ १२७
स्नात्वा सरय्वाः सलिले कृत्वा तस्योदकक्रियाम्।
शत्रुघ्नेन सह श्रीमान्मातृभिर्बान्धवैः सह ॥ १२८
तस्यौर्ध्वदेहिकं कृत्वा मन्त्रिणा मन्त्रिनायकः।
हस्त्यश्वरथपत्तीभिः सह प्रायान्महामतिः ॥ १२९
और जहाँ भाईमें भक्ति रखनेवाले, सद्गुणसम्पन्न, महान्
पराक्रमी लक्ष्मणजी गये हैं, वहीं मैं भी जाऊँगा। कैकेयि !
तूने रामको वनवास देकर महान् पाप किया है।
दुष्टहृदये ! बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजी ही मेरे ज्येष्ठ
भ्राता हैं, वे ही राजा होनेके अधिकारी हैं। मैं तो सदा
उनका दास हूँ' ॥ १११-११८॥
मातासे यों कहकर भरतजी अत्यन्त दुःखी हो, वहाँ
फूट-फूटकर रोने लगे और विलाप करने लगे—'हा
राजन् ! हा वसुधाप्रतिपालक ! हा तात ! मुझ अत्यन्त
दुःखी बालकको छोड़कर आप कहाँ चले गये ? बताइये,
मैं अब यहाँ क्या करूँ ? पिताके तुल्य दया करनेवाले
मेरे ज्येष्ठ भ्राता श्रीराम कहाँ हैं ? माताके समान पूजनीया
सीता कहाँ हैं और मेरा प्यारा भाई लक्ष्मण कहाँ चला
गया ?' ॥ ११९-१२०१/२ ॥
भरतको इस प्रकार विलाप करते देख काल और
कर्मके विभागको जाननेवाले भगवान् वसिष्ठजी मन्त्रियोंके
साथ वहाँ आकर बोले—'बेटा ! उठो, उठो; तुम्हें शोक
नहीं करना चाहिये। भद्र ! काल और कर्मके वशीभूत
होकर ही तुम्हारे पिता स्वर्गवासी हुए हैं; अब तुम उनके
अन्त्येष्टिसंस्कार आदि कर्म करो। भगवान् श्रीराम
साक्षात् लक्ष्मीपति नारायण हैं। वे जगदीश्वर दुष्टोंका नाश
और साधुपुरुषोंका पालन करनेके लिये ही अपने अंशसे
इस पृथ्वीपर अवतीर्ण हुए हैं। वनमें श्रीराम और लक्ष्मणके
द्वारा बहुत-से कार्य होनेवाले हैं। वहाँ वीरवर कमललोचन
श्रीरामचन्द्रजी उन्हीं कर्तव्यकर्मोंसे प्रेरित होकर रहेंगे और
उन्हें पूर्ण करके यहाँ लौट आयेंगे' ॥ १२१-१२५१/२ ॥
उन महात्मा वसिष्ठजीके यों कहनेपर भरतजीने
शास्त्रोक्त विधिके अनुसार पिताका और्ध्वदेहिक संस्कार
किया। उस समय उन्होंने अग्निहोत्रकी अग्निसे पिताके
शवका विधिपूर्वक दाह किया। फिर सरयूके जलमें
स्नान करके श्रीमान् भरतने भाई शत्रुघ्न, सब माताओं
तथा अन्य बन्धुजनोंके साथ परलोकगत पिताके लिये
तिलसहित जलकी अञ्जलि दी॥ १२६-१२८॥
इस प्रकार पिताका और्ध्वदैहिक संस्कार करके
मन्त्रियोंके अधिपति साधुश्रेष्ठ महाबुद्धिमान् भरतजी
अपने मन्त्रियों तथा हाथी, घोड़े, रथ एवं पैदल,
सेनाओंके साथ (माताओं तथा बन्धुजनोंको भी साथ
अध्याय ४८ ] श्रीराम-वनवास; राजा दशरथका निधन तथा वनमें राम-भरतकी भेंट १९३
भरतो राममन्वेष्टुं राममार्गेण सत्तमः।
तमायान्तं महासैनं रामस्यानुविरोधिनम्॥ १३०
मत्वा तं भरतं शत्रुं रामभक्तो गुहस्तदा।
स्वं सैन्यं वर्तुलं कृत्वा संनद्धः कवची रथी॥ १३१
महाबलपरीवारो रुरोध भरतं पथि॥ १३२
सभ्रातृकं सभार्यं मे रामं स्वामिनमुत्तमम्।
प्रापयस्त्वं वनं दुष्ट साम्प्रतं हन्तुमिच्छसि॥ १३३
गमिष्यसि दुरात्मंस्त्वं सेनया सह दुर्मते।
इत्युक्तो भरतस्तत्र गुहेन नृपनन्दनः॥ १३४
तमुवाच विनीतात्मा रामायाथ कृताञ्जलिः।
यथा त्वं रामभक्तोऽसि तथाहमपि भक्तिमान्॥ १३५
प्रोषिते मयि कैकेय्या कृतमेतन्महामते।
रामस्यानयनार्थाय व्रजाम्यद्य महामते॥ १३६
सत्यपूर्वं गमिष्यामि पन्थानं देहि मे गुह।
इति विश्वासमानीय जाह्नवीं तेन तारितः॥ १३७
नौकावृन्दैरनेकैस्तु स्नात्वासौ जाह्नवीजले।
भरद्वाजाश्रमं प्राप्तो भरतस्तं महामुनिम्॥ १३८
प्रणम्य शिरसा तस्मै यथावृत्तमुवाच ह।
भरद्वाजोऽपि तं प्राह कालेन कृतमीदृशम्॥ १३९
दुःखं न तावत् कर्तव्यं रामार्थेऽपि त्वयाधुना।
वर्तते चित्रकूटोऽसौ रामः सत्यपराक्रमः॥ १४०
त्वयि तत्र गते वापि प्रायोऽसौ नागमिष्यति।
तथापि तत्र गच्छ त्वं यदसौ वक्ति तत्कुरु॥ १४१
रामस्तु सीतया सार्धं वनखण्डे स्थितः शुभे।
लक्ष्मणस्तु महावीर्यो दुष्टालोकनतत्परः॥ १४२
ले) श्रीरामचन्द्रजीका अन्वेषण करनेके लिये जिस मार्गसे वे गये थे, उसी मार्गसे चले। उस समय भरत (और शत्रुघ्न)-को इतनी बड़ी सेनाके साथ आते देख, उन्हें श्रीरामचन्द्रजीका विरोधी शत्रु समझकर रामभक्त गुहने युद्धके लिये सुसज्जित हो, अपनी सेना गोलाकार खड़ी की और कवच धारणकर, रथारूढ़ हो, उस विशाल सेनासे घिरे हुए उसने मार्गमें भरतको रोक दिया। उसने कहा—'दुष्ट! दुरात्मन्! दुर्बुद्धे! तूने मेरे श्रेष्ठ स्वामी श्रीरामको भाई और पत्नीसहित वनमें तो भिजवा ही दिया; क्या अब उन्हें मारना भी चाहते हो, जो (इतनी बड़ी) सेनाके साथ वहाँ जा रहे हो?'॥ १२९-१३३ १/२ ॥
गुहके यों कहनेपर राजकुमार भरत श्रीरामके उद्देश्यसे हाथ जोड़कर विनययुक्त होकर उससे बोले—'गुह! जैसे तुम श्रीरामचन्द्रजीके भक्त हो, वैसे ही मैं भी उनमें भक्ति रखता हूँ। महामते! मैं नगरसे बाहर (मामाके घर) चला गया था, उस समय कैकेयीने यह अनर्थ कर डाला। महाबुद्धे! आज मैं श्रीरामचन्द्रजीको लौटा लानेके लिये जा रहा हूँ। तुमसे यह सत्य बात बताकर वहाँ जाना चाहता हूँ। तुम मुझे मार्ग दे दो'॥ १३४-१३६ १/२ ॥
इस प्रकार विश्वास दिलानेपर गुह उन्हें गङ्गातटपर ले आया और झुंड-की-झुंड नौकाएँ मँगाकर उनके द्वारा उन सबको पार कर दिया। फिर गङ्गाजीके जलमें स्नान करके भरतजी भरद्वाजमुनिके आश्रमपर पहुँचे और उन महामुनिके चरणोंमें मस्तक झुका, प्रणाम करके उन्होंने उनसे अपना यथार्थ वृत्तान्त कह सुनाया॥ १३७-१३८ १/२ ॥
भरद्वाजजीने भी उनसे कहा—'भरत! कालके ही प्रभावसे ऐसा काण्ड घटित हुआ है। अब तुम्हें श्रीरामके लिये भी खेद नहीं करना चाहिये। सत्यपराक्रमी वे श्रीरामचन्द्रजी इस समय चित्रकूटमें हैं। वहाँ तुम्हारे जानेपर भी वे प्रायः नहीं आ सकेंगे; तथापि तुम वहाँ जाओ और जैसे वे कहें, वैसे ही करो। श्रीरामचन्द्रजी सीताके साथ एक सुन्दर वनखण्डमें निवास करते हैं और महान् पराक्रमी लक्ष्मण दुष्ट जीवोंपर दृष्टि रखते हैं—उनकी रक्षामें तत्पर रहते हैं'॥ १३९-१४२ ॥
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