संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
२०८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५०
२०८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५०
एवं वदन्तं तं प्राह लक्ष्मणो भ्रातुराज्ञया। इस प्रकार पूछते हुए हनुमान्जीसे अपने भाईकी आज्ञा
प्रवक्ष्यामि निबोध त्वं रामवृत्तान्तमादितः॥ ९ पाकर लक्ष्मण बोले—'मैं श्रीरामचन्द्रजीका वृत्तान्त आदिसे
ही वर्णन करता हूँ, सुनो। इस पृथिवीपर दशरथ नामके
राजा दशरथो नाम बभूव भुवि विश्रुतः। राजा बहुत प्रसिद्ध थे। महाबुद्धे! ये मेरे बड़े भाई श्रीराम
तस्य पुत्रो महाबुद्धे रामो ज्येष्ठो ममाग्रजः॥ १० उन्हीं महाराजके ज्येष्ठ पुत्र हैं। इनका राज्याभिषेक होने जा
रहा था, किंतु (मेरी छोटी सौतेली माता) कैकेयीने उसे
अस्याभिषेक आरब्धः कैकेय्या तु निवारितः। रोक दिया। फिर, पिताकी आज्ञाका पालन करते हुए ये
पितुराज्ञामयं कुर्वन् रामो भ्राता ममाग्रजः॥ ११ मेरे बड़े भ्राता श्रीराम मेरे तथा अपनी धर्मपत्नी सीताके
साथ घरसे निकल आये। वनमें आकर इन्होंने अनेकों
मया सह विनिष्क्रम्य सीतया सह भार्यया। मुनियोंसे युक्त दण्डकारण्यमें प्रवेश किया। वहाँ जनस्थानमें
प्रविष्टो दण्डकारण्यं नानामुनिसमाकुलम्॥ १२ निवास करते हुए इन महात्मा श्रीरामचन्द्रजीकी धर्मपत्नी
सीताको वनमें किसी पापीने हर लिया। उन सीताजीकी
जनस्थाने निवस्तो रामस्यास्य महात्मनः। ही खोज करते हुए ये वीरवर कमलनयन श्रीराम यहाँ
भार्या सीता तत्र वने केनापि पाप्मना हृता॥ १३ आये हैं, जिससे तुम्हें यहाँ इनका दर्शन हुआ है। बस,
यही हमारा वृत्तान्त है, जो तुमसे बता दिया'॥ ९–१४॥
सीतामन्वेषयन् वीरो रामः कमललोचनः।
इहायातस्त्वया दृष्ट इति वृत्तान्तमीरितम्॥ १४ महात्मा लक्ष्मणके वचन सुनकर उनपर विश्वास हो
आनेके कारण वायुनन्दन हनुमान्ने अपने स्वरूपको प्रकट
श्रुत्वा ततो वचस्तस्य लक्ष्मणस्य महात्मनः। नहीं किया और रघुकुलनायक रामचन्द्रसे यह कहकर कि
अव्यञ्जितात्मा विश्वासाद्धनूमान् मारुतात्मजः॥ १५ 'आप मेरे स्वामी हैं'—उन्हें सान्त्वना देते हुए अपने साथ
सुग्रीवके पास ले आकर उन दोनों भाइयोंकी सुग्रीवसे
त्वं मे स्वामी इति वदन् रामं रघुपतिं तदा। मित्रता करा दी। फिर श्रीरामचन्द्रजीके स्वरूपका परिचय
आश्वास्यानीय सुग्रीवं तयोः सख्यमकारयत्॥ १६ प्राप्त हो जानेके कारण उनके चरण-कमलोंको सिरपर
धारणकर वानरराज सुग्रीवने मधुर वाणीमें कहा—'राजेन्द्र!
शिरस्यारोप्य पादाब्जं रामस्य विदितात्मनः। इसमें संदेह नहीं कि आजसे आप हमारे स्वामी हुए और
सुग्रीवो वानरेन्द्रस्तु उवाच मधुराक्षरम्॥ १७ प्रभो! मैं समस्त वानरोंके साथ आपका सेवक हुआ।
रघुनन्दन! आपका जो शत्रु है, वह आजसे मेरा भी शत्रु
अद्यप्रभृति राजेन्द्र त्वं मे स्वामी न संशयः। है और जो आपका मित्र है, वह मेरा भी श्रेष्ठ मित्र है;
अहं तु तव भृत्यश्च वानरैः सहितः प्रभो॥ १८ इतना ही नहीं, आपका जो दुःख है, वह मेरा भी है तथा
आपकी प्रसन्नता ही मेरी भी प्रसन्नता है' यों कहकर
त्वच्छत्रुर्मम शत्रुः स्यादद्यप्रभृति राघव। सुग्रीवने पुनः श्रीरामचन्द्रजीसे कहा—॥ १५–१९१/२॥
मित्रं ते मम सन्मित्रं त्वद्दुःखं तन्ममापि च॥ १९
'प्रभो! 'वाली' नामक मेरा ज्येष्ठ भाई है, जो
त्वत्प्रीतिरेव मत्प्रीतिरित्युक्त्वा पुनराह तम्। महाबलवान् और बड़ा ही पराक्रमी है; किंतु वह
वाली नाम मम ज्येष्ठो महाबलपराक्रमः॥ २० हृदयका अत्यन्त दुष्ट है। उसने कामासक्त होकर मेरी
भार्याका अपहरण कर लिया है। पुरुषश्रेष्ठ! इस समय
भार्यापहारी दुष्टात्मा मदनासक्तमानसः। आपके सिवा दूसरा कोई वालीको मारनेवाला नहीं है।
त्वामृते पुरुषव्याघ्र नास्ति हन्ताद्य वालिनम्॥ २१ राजकुमार! पुराणवेत्ताओंने कहा है कि जो ताड़के इन
सात वृक्षोंको एक साथ ही काट डालेगा, वही वालीका
युगपत्सप्ततालांस्तु तरून् यो वै वधिष्यति। वध कर सकेगा'॥ २०–२२॥
स तं वधिष्यतीत्युक्तं पुराणज्ञैर्नृपात्मज॥ २२
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अध्याय ५० ] सुग्रीवसे मैत्री; वालिवध; सुग्रीवका प्रमाद और उसकी भर्त्सना २०९
तत्प्रियार्थं हि रामोऽपि श्रीमांश्छित्त्वा महातरून्। [यह सुनकर] श्रीमान् रामचन्द्रजीने भी सुग्रीवका
अर्धकृष्टेन बाणेन युगपद्रघुनन्दनः ॥ २३ प्रिय करनेके लिये आधे खींचे हुए बाणसे ही उन सात
महावृक्षोंको एक ही साथ काट डाला। उन महावृक्षोंका
विद्ध्वा महातरून् रामः सुग्रीवं प्राह पार्थिवम्। भेदन करके श्रीरामने राजा सुग्रीवसे कहा- 'सूर्यनन्दन
वालिना गच्छ युध्यस्व कृतचिह्नो रखेः सुत ॥ २४ सुग्रीव ! मेरे पहचाननेके लिये अपने शरीरमें कोई चिह्न
धारण करके तुम जाओ और वालीके साथ युद्ध करो।'
इत्युक्तः कृतचिह्नोऽयं युद्धं चक्रेऽथ वालिना। उनके यों कहनेपर सुग्रीवने चिह्न धारणकर वालीके साथ
रामोऽपि तत्र गत्वाथ शरेणैकेन वालिनम् ॥ २५ युद्ध किया और श्रीरामने भी वहाँ जाकर एक ही बाणसे
वालीको बींध दिया। इससे पराक्रमी वाली पृथ्वीपर गिरा
विव्याध वीर्यवान् वाली पपात च ममार च। और मर गया। तब श्रीरामचन्द्रजीने अत्यन्त डरे हुए वालि-
वित्रस्तं वालिपुत्रं तु अङ्गदं विनयान्वितम् ॥ २६ कुमार अङ्गदको, जो बहुत ही विनयी और संग्राममें
रणशौण्डं यौवराज्ये नियुक्त्वा राघवस्तदा। कुशल था, युवराजपदपर अभिषिक्त करके ताराको सुग्रीव-
तां च तारां तथा दत्त्वा रामश्च रविसूनवे ॥ २७ की सेवामें अर्पित कर दिया। तत्पश्चात् कमलनयन धर्मात्मा
सुग्रीवं प्राह धर्मात्मा रामः कमललोचनः । श्रीराम सुग्रीवसे बोले- 'तुम वानरोंके राज्यकी देख-भाल
राज्यमन्वेष्य स्वं त्वं कपीनां पुनराव्रज ॥ २८ कर लो, फिर मेरे पास आना और कपीश्वर ! सीताकी
खोज करानेका शीघ्र ही यत्न करना' ॥ २३-२८१/२ ॥
त्वं सीतान्वेषणे यत्नं कुरु शीघ्रं हरीश्वर। उनके द्वारा इस प्रकार कहे जानेपर सुग्रीवने लक्ष्मणसहित
इत्युक्तः प्राह सुग्रीवो रामं लक्ष्मणसंयुतम् ॥ २९ श्रीरामचन्द्रजीसे कहा- 'रघुनन्दन ! इस समय महान् वर्षाकाल
आ पहुँचा है; इन्द्रके वर्षा करते रहनेपर इस वनमें
प्रावृट्कालो महान् प्राप्तः साम्प्रतं रघुनन्दन। वानरोंका चलना-फिरना न हो सकेगा। राजेन्द्र ! वर्षा
वानराणां गतिर्नास्ति वने वर्षति वासवे ॥ ३० बीतने और शरत्काल आ जानेपर मैं समस्त दिशाओंमें
अपने वानर दूतोंको भेजूँगा।' यह कहकर वानरराज सुग्रीवने
गते तस्मिंस्तु राजेन्द्र प्राप्ते शरदि निर्मले । श्रीरामचन्द्रजीको प्रणाम किया और पम्पापुरमें प्रवेश करके
चारान् सम्प्रेषयिष्यामि वानरान्दिक्षु राघव ॥ ३१ वे ताराके साथ रमण करने लगे ॥ २९-३२ ॥
इत्युक्त्वा रामचन्द्रं स तं प्रणम्य कपीश्वरः । इधर महामति श्रीरामचन्द्रजी भी अपने भाई लक्ष्मणके
पम्पापुरं प्रविश्याथ रेमे तारासमन्वितः ॥ ३२ साथ उस महावनमें 'नीलकण्ठ' नामक पर्वतकी चोटीपर
विधिपूर्वक रहने लगे। (सीताके वियोगमें) उनका वर्षाकाल
रामोऽपि विधिवद्भ्रात्रा शैलसानौ महावने । बड़ी कठिनाईसे बीता। जब शरत्काल उपस्थित हुआ,
निवासं कृतवान् शैले नीलकण्ठे महामतिः ॥ ३३ तब श्रीरामचन्द्रजीने सीताके वियोगसे व्यथित हो
सुमित्रानन्दन लक्ष्मणसे इस विषयमें वार्तालाप किया।
प्रावृट्काले गते कृच्छ्रात् प्राप्ते शरदि राघवः । उस समयतक वहाँ न आकर सुग्रीवने अपनी पूर्व-
सीतावियोगाद्व्यथितः सौमित्रिं प्राह लक्ष्मणम् ॥ ३४ प्रतिज्ञाका उल्लङ्घन किया था। इसलिये भ्रातृवत्सल
उल्लङ्घितस्तु समयः सुग्रीवेण ततो रुषा। ककुत्स्थनन्दन श्रीरामने लक्ष्मणसे क्रोधपूर्वक कहा-
लक्ष्मणं प्राह काकुत्स्थो भ्रातरं भ्रातृवत्सलः ॥ ३५