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संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

५२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय १३

५२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय १३
स्वधर्मकार्यनिरतः परधर्मपराङ्मुखः। | अपने धर्मके अनुकूल कार्योंमें तत्पर और परधर्मसे विमुख
ऋतुकालाभिगामी च अग्निहोत्रपरायणः॥ ४ | रहनेवाले थे। वे ऋतुकाल आनेपर ही पत्नी-समागम करते
सायंप्रातर्महाभाग हुत्वाग्निं तर्पयन् द्विजान्। | और प्रतिदिन अग्निहोत्र किया करते थे। महाभाग! कश्यपजी
अतिथीनागतान् गेहं नरसिंहं च पूजयत्॥ ५ | नित्य सायं और प्रातःकाल अग्निमें हवन करनेके पश्चात्
तस्य पत्नी महाभागा सावित्री नाम नामतः। | ब्राह्मणों तथा घरपर आये हुए अतिथियोंको तृप्त करते हुए
पतिव्रता महाभागा पत्युः प्रियहिते रता॥ ६ | भगवान् नृसिंहका पूजन किया करते थे। उनकी परम
भर्तुः शुश्रूषणेनैव दीर्घकालमनिन्दिता। | सौभाग्यशालिनी पत्नीका नाम सावित्री था। महाभागा सावित्री
परोक्षज्ञानमापन्ना कल्याणी गुणसम्मता॥ ७ | पतिव्रता होनेके कारण पतिके ही प्रिय और हित-साधनमें
तया सह स धर्मात्मा मध्यदेशे महामतिः। | लगी रहती थी। अपने गुणोंके कारण उसका बड़ा सम्मान
नन्दिग्रामे वसन् धीमान् स्वानुष्ठानपरायणः॥ ८ | था। वह कल्याणमयी अनिन्दिता सती-साध्वी दीर्घकालतक
अथ कौशलिको विप्रो यज्ञशर्मा महामतिः। | पतिकी शुश्रूषामें संलग्न रहनेके कारण परोक्ष-ज्ञानसे सम्पन्न
तस्य भार्याभवत् साध्वी रोहिणी नाम नामतः॥ ९ | हो गयी थी—परोक्षमें घटित होनेवाली घटनाओंका भी उसे
सर्वलक्षणसम्पन्ना पतिशुश्रूषणे रता। | ज्ञान हो जाता था। मध्यदेशके निवासी वे धर्मात्मा एवं परम
सा प्रसूता सुतं त्वेकं तस्माद्भर्तुरनिन्दिता॥ १० | बुद्धिमान् कश्यपजी अपनी उसी धर्मपत्नीके साथ नन्दिग्राममें
स यायावरवृत्तिस्तु पुत्रे जाते विचक्षणः। | रहते हुए स्वधर्मके अनुष्ठानमें लगे रहते थे॥ २-८॥
जातकर्म तदा चक्रे स्नात्वा पुत्रस्य मन्त्रतः॥ ११ | उन्हीं दिनों कोशलदेशमें उत्पन्न यज्ञशर्मा नामक एक
द्वादशेऽहनि तस्यैव देवशर्मेति बुद्धिमान्। | परम बुद्धिमान् ब्राह्मण थे, जिनकी सती-साध्वी स्त्रीका
पुण्याहं वाचयित्वा तु नाम चक्रे यथाविधि॥ १२ | नाम रोहिणी था। वह समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न थी
उपनिष्क्रमणं चैव चतुर्थे मासि यत्नतः। | और पतिकी सेवामें सदा तत्पर रहती थी। उस उत्तम
तथाऽन्नप्राशनं षष्ठे मासि चक्रे यथाविधि॥ १३ | आचार-विचारवाली स्त्रीने अपने स्वामी यज्ञशर्मासे एक
संवत्सरे ततः पूर्णे चूडाकर्म च धर्मवित्। | पुत्र उत्पन्न किया। पुत्रके उत्पन्न होनेपर यायावर-
कृत्वा गर्भाष्टमे वर्षे व्रतबन्धं चकार सः॥ १४ | वृत्तिवाले बुद्धिमान् पण्डित यज्ञशर्माने स्नान करके
सोपनीतो यथान्यायं पित्रा वेदमधीतवान्। | मन्त्रोंद्वारा उसका जातकर्म-संस्कार किया और जन्मके
स्वीकृते त्वेकवेदे तु पिता स्वर्लोकमास्थितः॥ १५ | बारहवें दिन उन्होंने विधिपूर्वक पुण्याहवाचन कराकर
मात्रा सहास दुःखी स पितुर्युपरते सुतः। | उसका 'देवशर्मा' नाम रखा। इसी प्रकार चौथे महीनेमें
धैर्यमास्थाय मेधावी साधुभिः प्रेरितः पुनः॥ १६ | यत्नपूर्वक उसका उपनिष्क्रमण हुआ अर्थात् वह घरसे
प्रेतकार्याणि कृत्वा तु देवशर्मा गतः सुतः। | बाहर लाया गया और छठे मासमें उन्होंने उस पुत्रका
गङ्गादिषु सुतीर्थेषु स्नानं कृत्वा यथाविधि॥ १७ | विधिपूर्वक अन्नप्राशन-संस्कार किया॥ ९-१३॥
तमेव प्राप्तवान् ग्रामं यत्रास्ते सा पतिव्रता। | तदनन्तर एक वर्ष पूर्ण होनेपर धर्मज्ञ पिताने उसका
सम्प्राप्य विश्रुतः सोऽथ ब्रह्मचारी महामते॥ १८ | चूडाकर्म और गर्भसे आठवें वर्षपर उपनयन-संस्कार
किया। पिताके द्वारा यथोचितरूपसे उपनयन-संस्कार
हो जानेपर उसने वेदाध्ययन किया। उसके द्वारा एक
वेदका अध्ययन पूर्ण हो जानेपर उसके पिता स्वर्गगामी
हो गये। पिताकी मृत्यु होनेपर वह अपनी माताके साथ
बहुत दुःखी हो गया। फिर श्रेष्ठ पुरुषोंकी आज्ञासे उस
बुद्धिमान् पुत्रने धैर्य धारण करके पिताका प्रेतकार्य
किया। इसके पश्चात् ब्राह्मणकुमार देवशर्मा घरसे निकल
गया (विरक्त हो गया)। वह गङ्गा आदि उत्तम तीर्थोंमें
विधिपूर्वक स्नान करके घूमता हुआ वहीं जा पहुँचा,
जहाँ वह पतिव्रता सावित्री निवास करती थी। महामते!
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अध्याय १३ ] पतिव्रताकी शक्ति; उसके साथ एक ब्रह्मचारीका संवाद ५३
भिक्षाटनं तु कृत्वासौ जपन् वेदममन्द्रितः। | वहाँ जाकर वह 'ब्रह्मचारी' के रूपमें विख्यात हुआ।
कुर्वन्नेवाग्निकार्यं तु नन्दिग्रामे च तस्थिवान् ॥ १९ | भिक्षाटन करके जीवन-निर्वाह करता हुआ वह
| आलस्यरहित हो वेदके स्वाध्याय तथा अग्निहोत्रमें तत्पर
मृते भर्तरि तन्माता पुत्रे प्रव्रजिते तु सा। | रहकर उसी नन्दिग्राममें रहने लगा। इधर उसकी माता
दुःखाद्दुःखमनुप्राप्ता नियतं रक्षकं विना ॥ २० | अपने स्वामीके मरने और पुत्रके विरक्त होकर घरसे
| निकल जानेके बाद किसी नियत रक्षकके न होनेसे
अथ स्नात्वा तु नद्यां वै ब्रह्मचारी स्वकर्पटम्। | दुःख-पर-दुःख भोगने लगी ॥ १४-२० ॥
क्षितौ प्रसार्य शोषार्थं जपन्नासीत वाग्यतः ॥ २१ | तदनन्तर एक दिन ब्रह्मचारीने नदीमें स्नान करके
| अपना वस्त्र सुखानेके लिये पृथ्वीपर फैला दिया और
काको बलाका तद्वस्त्रं परिगृह्याशु जग्मतुः। | स्वयं मौन होकर जप करने लगा। इसी समय एक
तौ दृष्ट्वा भर्त्सयामास देवशर्मा ततो द्विजः ॥ २२ | कौआ और बगुला—दोनों वह वस्त्र लेकर शीघ्रतासे
| उड़ चले। तब उन्हें इस प्रकार करते देख देवशर्मा
विष्ठामुत्सृज्य वस्त्रे तु जग्मतुस्तस्य भर्त्सनात्। | ब्राह्मणने डाँट बतायी। उसकी डाँट सुनकर वे पक्षी उस
रोषेण वीक्षयामास खे यान्तौ पक्षिणौ तु सः ॥ २३ | वस्त्रपर बीट करके उसे वहीं छोड़कर चले गये। तब
| ब्राह्मणने आकाशमें जाते हुए उन पक्षियोंकी ओर क्रोधपूर्वक
तद्रोषवह्निना दग्धौ भूम्यां निपतितौ खगौ। | देखा। वे पक्षी उसकी क्रोधाग्निसे भस्म होकर पृथ्वीपर
स दृष्ट्वा तौ क्षितिं यातौ पक्षिणौ विस्मयं गतः ॥ २४ | गिर पड़े। उन्हें पृथ्वीपर गिरा देख ब्रह्मचारी बहुत ही
| विस्मित हुआ। फिर वह यह समझकर कि इस पृथ्वीपर
तपसा न मया कश्चित् सदृशोऽस्ति महीतले। | तपस्यामें मेरी बराबरी करनेवाला कोई नहीं है, अनायास
इति मत्वा गतो भिक्षामटितुं ग्राममञ्जसा ॥ २५ | ही गाँवमें भिक्षा माँगने चला ॥ २१-२५ ॥
|
अटन् ब्राह्मणगेहेषु ब्रह्मचारी तपःस्मयी। | वत्स ! तपस्याका अभिमान रखनेवाला वह ब्रह्मचारी
प्रविष्टस्तद्गृहं वत्स गृहे यत्र पतिव्रता ॥ २६ | ब्राह्मणोंके घरोंमें भीख माँगता हुआ उस घरमें गया, जहाँ
| वह पतिव्रता सावित्री रहती थी। पतिव्रताने उसे देखा,
तं दृष्ट्वा याच्यमानापि तेन भिक्षां पतिव्रता। | ब्रह्मचारीने भिक्षाके लिये उससे याचना की, तो भी
वाग्यता पूर्वं विज्ञाय भर्तुः कृत्वानुशासनम् ॥ २७ | वह मौन ही रही। पहले उसने अपने स्वामीके
| आदेशकी ओर ध्यान दे उसीका पालन किया; फिर
क्षालयामास तत्पादौ भूय उष्णेन वारिणा। | गरम जलसे पतिके चरण धोये—इस प्रकार स्वामीको
आश्वास्य स्वपतिं सा तु भिक्षां दातुं प्रचक्रमे ॥ २८ | आराम देकर वह भिक्षा देनेको उद्यत हुई। तब ब्रह्मचारी
| क्रोधसे लाल आँखें करके अपने तपोबलके द्वारा
ततः क्रोधेन रक्ताक्षो ब्रह्मचारी पतिव्रताम्। | पतिव्रताको जला देनेकी इच्छासे उसकी ओर बारंबार
दग्धुकामस्तपोवीर्यात् पुनः पुनरुदैक्षत। | देखने लगा। सावित्री उसे यों करते देख हँसती हुई
सावित्री तु निरीक्ष्यैवं हसन्ती सा तमब्रवीत् ॥ २९ | बोली—'ऐ क्रोधी ब्राह्मण! मैं कौआ और बगुला नहीं
| हूँ, जो आज नदीके तटपर तुम्हारे कोपसे जलकर भस्म
न काको न बलाकाहं त्वत्क्रोधेन तु यौ मृतौ। | हो गये थे। मुझसे यदि भीख चाहते हो, तो चुपचाप
नदीतीरेऽद्य कोपात्मन् भिक्षां मत्तो यदीच्छसि ॥ ३० | ले लो' ॥ २६-३० ॥
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