संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
५० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय १२
५० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय १२
यम उवाच
स्वयम्भुवापि निन्द्येत लोकवृत्तं जुगुप्सितम्।
प्रधानपुरुषाचीर्णं लोकोऽयमनुवर्तते॥ २२
तस्मादनिन्दितं धर्मं प्रधानपुरुषश्चरेत्।
निन्दितं वर्जयेद्यत्नादेतद्धर्मस्य लक्षणम्॥ २३
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥ २४
अतिपापमहं मन्ये सुभगे वचनं तव।
विरुद्धं सर्वधर्मेषु लोकेषु च विशेषतः॥ २५
मत्तोऽन्यो यो भवेद्यो वै विशिष्टो रूपशीलतः।
तेन सार्धं प्रमोदस्व न ते भर्ता भवाम्यहम्॥ २६
नाहं स्पृशामि तन्वा ते तनुं भद्रे दृढव्रतः।
मुनयः पापमाहुस्तं यः स्वसारं निगृह्णति॥ २७
यम बोले— बहिन! कुत्सित लोकव्यवहारकी निन्दा ब्रह्माजीने भी की है। इस संसारके लोग श्रेष्ठ पुरुषोंद्वारा आचरित धर्मका ही अनुसरण करते हैं। इसलिये श्रेष्ठ पुरुषको चाहिये कि वह उत्तम धर्मका ही आचरण करे और निन्दित कर्मको यत्नपूर्वक त्याग दे—यही धर्मका लक्षण है। श्रेष्ठ पुरुष जिस-जिस कर्मका आचरण करता है, उसीको अन्य लोग भी आचरणमें लाते हैं और वह जिसे प्रमाणित कर देता है, लोग उसीका अनुसरण करते हैं। सुभगे! मैं तो तुम्हारे इस वचनको अत्यन्त पापपूर्ण समझता हूँ। इतना ही नहीं, मैं इसे सब धर्मों और विशेषतः समस्त लोकोंके विपरीत मानता हूँ। मुझसे अन्य जो कोई भी रूप और शीलमें विशिष्ट हो, उसके साथ तुम आनन्दपूर्वक रहो; मैं तुम्हारा पति नहीं हो सकता। भद्रे! मैं दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाला हूँ, अतः अपने शरीरसे तुम्हारे शरीरका स्पर्श नहीं करूँगा। जो बहिनको ग्रहण करता है, उसे मुनियोंने 'पापी' कहा है॥ २२—२७॥
यम्युवाच
दुर्लभं चैव पश्यामि लोके रूपमिहेदृशम्।
यत्र रूपं वयश्चैव पृथिव्यां क्व प्रतिष्ठितम्॥ २८
न विजानामि ते चित्तं कुत एतत् प्रतिष्ठितम्।
आत्मरूपगुणोपेतां न कामयसि मोहिताम्॥ २९
लतेव पादपे लग्ना कामं त्वच्चरणं गता।
बाहुभ्यां सम्परिष्वज्य निवसामि शुचिस्मिता॥ ३०
यमी बोली— मैं देखती हूँ, इस संसारमें ऐसा (तुम्हारे समान) रूप दुर्लभ है। भला, पृथ्वीपर ऐसा स्थान कहाँ है, जहाँ रूप और समान अवस्था—दोनों एकत्र वर्तमान हों। मैं नहीं समझती, तुम्हारा यह चित्त इतना स्थिर कैसे है, जिसके कारण तुम अपने समान रूप और गुणसे युक्त होनेपर भी मुझ मोहिता स्त्रीकी इच्छा नहीं करते हो। वृक्षमें संलग्न हुई लताके समान मैं स्वेच्छानुसार तुम्हारी शरणमें आयी हूँ। मेरे मुखपर पवित्र मुसकान शोभा पाती है। अब मैं अपनी दोनों भुजाओंसे तुम्हारा आलिङ्गन करके ही रहूँगी॥ २८—३०॥
यम उवाच
अन्यं श्रयस्व सुश्रोणि देवं देव्यसितेक्षणे।
यस्तु ते काममोहेन चेतसा विभ्रमं गतः।
तस्य देवस्य देवी त्वं भवेथा वरवर्णिनि॥ ३१
ईप्सितां सर्वभूतानां वर्यां शंसन्ति मानवाः।
सुभद्रां चारुसर्वाङ्गीं संस्कृतां परिचक्षते॥ ३२
तत्कृतेऽपि सुविद्वांसो न करिष्यन्ति दूषणम्।
परितापं महाप्राज्ञे न करिष्ये दृढव्रतः॥ ३३
चित्तं मे निर्मलं भद्रे विष्णौ रुद्रे च संस्थितम्।
अतः पापं नु नेच्छामि धर्मचित्तो दृढव्रतः॥ ३४
यम बोले— श्यामलोचने! सुश्रोणि! मैं तुम्हारी इच्छा पूर्ण करनेमें असमर्थ हूँ। तुम किसी दूसरे देवताका आश्रय लो। वरवर्णिनि! तुम्हें देखकर काममोहसे जिसका चित्त विभ्रान्त हो उठे, उसी देवताकी तुम देवी हो जाओ। जिसे समस्त प्राणी चाहते हैं, मानवगण जिसे वरणीय बतलाते हैं, कल्याणमयी, सर्वाङ्गसुन्दरी और सुसंस्कृता कहते हैं, उसके लिये भी विद्वान् पुरुष कभी दूषित कर्म नहीं करेंगे। महाप्राज्ञे! मेरा व्रत अटल है। मैं यह पश्चात्तापजनक पाप कदापि नहीं करूँगा। भद्रे! मेरा चित्त निर्मल है, भगवान् विष्णु और शिवके चिन्तनमें लगा हुआ है। इसलिये मैं दृढ़संकल्प एवं धर्मात्मा होकर निश्चय ही यह पापकर्म नहीं करना चाहता॥ ३१—३४॥
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अध्याय १३ ] पतिव्रताकी शक्ति; उसके साथ एक ब्रह्मचारीका संवाद ५१
व्यास उवाच
असकृत् प्रोच्यमानोऽपि तया चैवं दृढव्रतः।
कृतवान् न यमः कार्यं तेन देवत्वमाप्तवान् ॥ ३५
नराणां दृढचित्तानामेवं पापमकुर्वताम्।
अनन्तं फलमित्याहुस्तेषां स्वर्गफलं भवेत् ॥ ३६
एतत्तु यम्युपाख्यानं पूर्ववृत्तं सनातनम्।
सर्वपापहरं पुण्यं श्रोतव्यमनसूयया ॥ ३७
यश्चैतत् पठते नित्यं हव्यकव्येषु ब्राह्मणः।
संतृप्ताः पितरस्तस्य न विशन्ति यमालयम् ॥ ३८
यश्चैतत् पठते नित्यं पितृणामनृणो भवेत्।
वैवस्वतीभ्यस्तीव्राभ्यो यातनाभ्यः प्रमुच्यते ॥ ३९
पुत्रैतदाख्यानमनुत्तमं मया
तवोदितं वेदपदार्थनिश्चितम्।
पुरातनं पापहरं सदा नृणां
किमन्यदद्यैव वदामि शंस मे ॥ ४०
श्रीव्यासजी कहते हैं— शुकदेव! यमीके बारंबार कहनेपर भी दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाले यमने वह पाप-कर्म नहीं किया; इसलिये वे देवत्वको प्राप्त हुए। इस प्रकार स्थिरचित्त होकर पाप न करनेवाले मनुष्योंके लिये अनन्त पुण्यफलकी प्राप्ति बतलायी गयी है। ऐसे लोगोंको स्वर्गरूप फल उपलब्ध होता है। यह यमीका उपाख्यान, जो प्राचीन एवं सनातन इतिहास है, सब पापोंको दूर करनेवाला और पवित्र है। असूया त्यागकर इसका श्रवण करना चाहिये। जो ब्राह्मण देवयाग और पितृयागमें सदा इसका पाठ करता है, उसके पितृगण पूर्णतः तृप्त होते हैं। उन्हें कभी यमराजके भवनमें प्रवेश नहीं करना पड़ता। जो इसका नित्य पाठ करता है, वह पितृऋणसे मुक्त हो जाता है तथा उसे तीव्र यम-यातनाओंसे छुटकारा मिल जाता है। बेटा शुकदेव! मैंने तुमसे यह सर्वोत्तम एवं पुरातन उपाख्यान कह सुनाया, जो वेदके पदों तथा अर्थोंद्वारा निश्चित है। इसका पाठ करनेपर यह सदा ही मनुष्योंका पाप हर लेता है। मुझे बताओ, अब मैं तुम्हें और क्या सुनाऊँ ? ॥ ३५—४० ॥
इति श्रीनरसिंहपुराणे यमीयमसंवादो नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥
इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'यमी-यम-संवाद' नामक बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२ ॥
तेरहवाँ अध्याय
पतिव्रताकी शक्ति; उसके साथ एक ब्रह्मचारीका संवाद; माताकी
रक्षा परम धर्म है, इसका उपदेश
श्रीशुक उवाच
विचित्रेयं कथा तात वैदिकी मे त्वयेरिता।
अन्याः पुण्याश्च मे ब्रूहि कथाः पापप्रणाशिनीः ॥ १
व्यास उवाच
अहं ते कथयिष्यामि पुरावृत्तमनुत्तमम्।
पतिव्रतायाः संवादं कस्यचिद्ब्रह्मचारिणः ॥ २
कश्यपो नीतिमान् नाम ब्राह्मणो वेदपारगः।
सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञो व्याख्याने परिनिष्ठितः ॥ ३
श्रीशुकदेवजी बोले— तात! आपने जो यह वैदिक कथा मुझे सुनायी है, बड़ी विचित्र है। अब दूसरी पापनाशक कथाओंका मेरे सम्मुख वर्णन कीजिये ॥ १ ॥
व्यासजी बोले— बेटा! अब मैं तुमसे उस परम उत्तम प्राचीन इतिहासका वर्णन करूँगा, जो किसी ब्रह्मचारी और एक पतिव्रता स्त्रीका संवादरूप है। (मध्यदेशमें) एक कश्यप नामक ब्राह्मण रहते थे, जो बड़े ही नीतिज्ञ, वेद-वेदाङ्गोंके पारंगत विद्वान्, समस्त शास्त्रोंके अर्थ एवं तत्त्वके ज्ञाता, व्याख्यानमें प्रवीण,
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