संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
१७० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४६
१७० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४६
अथ मन्त्रिवरः प्राह ब्राह्मणो ब्राह्मणप्रियः। | यह सुनकर राजाके प्रधान मन्त्रीने कहा—'महाराज!
राजकार्यं न पश्येद् वै स्वपक्षस्यैव पोषणात्॥ २० | ब्राह्मण ब्राह्मणका ही प्रेमी होता है, वह अपने पक्षका
| पोषण करनेके कारण राजाके कार्यकी कोई परवाह नहीं
हे राजंस्त्वयि तिष्ठन्ति गृहाणि विविधानि च। | करता। राजन् ! उस गौको पाकर आपके पास तत्काल
तथा सुवर्णपात्राणि शयनादीनि च स्त्रियः॥ २१ | गुप्त हो जानेवाले नाना प्रकारके घर, सोनेके पात्र,
| शय्यादि तथा सुन्दरी स्त्रियाँ—ये सब सामान प्रस्तुत
तां धेनुं प्राप्य राजेन्द्र लीयमानानि तत्क्षणात्। | रहेंगे, जिन्हें हम लोगोंने वहाँ प्रत्यक्ष देखा है। इस उत्तम
अस्माभिस्तत्र दृष्टानि नीयतां धेनुरुत्तमा॥ २२ | धेनुको आप अवश्य ले चलें। महामते राजेन्द्र! यह गौ
| आपके ही योग्य है। भूपाल! यदि आपकी इच्छा हो
तवेयं योग्या राजेन्द्र यदीच्छसि महामते। | तो मैं स्वयं जाकर इसे ले आऊँगा। आप केवल मुझे
गत्वाहमानयिष्यामि आज्ञां मे देहि भूभुज॥ २३ | आज्ञा दीजिये'॥ २०—२३॥
इत्युक्तो मन्त्रिणा राजा तथेत्याह नृपोत्तम। | नृपवर! मन्त्रीके इस प्रकार कहनेपर राजाने 'बहुत
सचिवस्तत्र गत्वाथ सुरभिं हर्तुमारभत्॥ २४ | अच्छा' कहकर अनुमति दे दी। फिर राजमन्त्री आश्रमपर
| जाकर गौका अपहरण करने लगा। तब जमदग्नि मुनिने
वारयामास सचिवं जमदग्निः समन्ततः। | उसे सब ओरसे मना किया, किंतु उसने उनकी बात न
राजयोग्यामिमां ब्रह्मन् देहि राज्ञे महामते॥ २५ | मानते हुए कहा—'महाबुद्धिमान् ब्राह्मण! यह गौ राजाके
| योग्य है; अतः इसे राजाको ही दे दीजिये। आप तो साग
त्वं तु शाकफलाहारी किं धेन्वा ते प्रयोजनम्। | और फल खानेवाले हैं; आपको इस गायसे क्या काम
इत्युक्त्वा तां बलाद्धृत्वा नेतुं मन्त्री प्रचक्रमे॥ २६ | है?' यों कहकर मन्त्री उस गौको बलपूर्वक ले जाने
| लगा। राजन्! तब उस मुनिने स्त्रीसहित आकर उसे पुनः
पुनः सभार्यः स मुनिर्वारयामास तं नृपम्। | रोका। इसपर उस दुष्टात्मा और ब्रह्महत्यारे मन्त्रीने उस
ततो मन्त्री सुदुष्टात्मा मुनिं हत्वा तु तं नृप॥ २७ | मुनिका वध करके गौको ज्यों ही ले जाना चाहा, त्यों
| ही वह दिव्य गौ आकाशमार्गसे चली गयी और राजा
ब्रह्महा नेतुमारेभे वायुमार्गेण सा गता। | मन-ही-मन क्षुब्ध होकर माहिष्मती नगरीको लौट
राजा च क्षुब्धहृदयो ययौ माहिष्मतीं पुरीम्॥ २८ | आया॥ २४—२८॥
मुनिपत्नी सुदुःखार्ता रोदयन्ती भृशं तदा। | राजन्! उस समय मुनिकी पत्नी दुःखसे पीडित
त्रिस्सप्तकृत्वः स्वां कुक्षिं ताडयामास पार्थिव॥ २९ | होकर अत्यन्त विलाप करने लगी और प्राण त्याग देनेकी
| इच्छासे अपनी कुक्षि (उदर) में उसने इक्कीस बार
तच्छृण्वन्नागतो रामो गृहीतपरशुस्तदा। | मुक्का मारा। माताका विलाप सुनकर परशुरामजी वनसे
पुष्पादीनि गृहीत्वा तु वनान्मातरमब्रवीत्॥ ३० | फूल आदि लेकर हाथमें कुल्हाड़ी लिये उसी समय आये
| और मातासे बोले—'मा! इस प्रकार छाती पीटनेकी
अलमम्ब प्रहारेण निमित्ताद् विदितं मया। | आवश्यकता नहीं है। मैं सब कुछ शकुनसे जान गया हूँ।
हनिष्यामि दुराचारमर्जुनं दुष्टमन्त्रिणम्॥ ३१ | उस दुष्ट मन्त्रीवाले दुराचारी राजा अर्जुनका मैं अवश्य वध
| करूँगा। मातः! चूँकि तुमने अपनी कुक्षिमें इक्कीस बार
त्वयैकविंशवारेण यस्मात्कुक्षिश्च ताडिता। | प्रहार किया है, इसलिये मैं इस भूमण्डलके क्षत्रियोंका
त्रिस्सप्तकृत्वस्तस्मात्तु हनिष्ये भुवि पार्थिवान्॥ ३२ | इक्कीस बार संहार करूँगा'॥ २९—३२॥
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अध्याय ४७ ] श्रीरामवावतारकी कथा — श्रीरामके जन्मसे लेकर विवाहतकके चरित्र १७१
इति कृत्वा प्रतिज्ञां स गृहीत्वा परशुं ययौ । | इस प्रकार प्रतिज्ञा करके फरसा लेकर वे वहाँसे
माहिष्मतीं पुरीं प्राप्य कार्तवीर्यमथाह्वयत् ॥ ३३ | चल दिये और माहिष्मती पुरीमें जाकर उन्होंने राजा
युद्धार्थमागतः सोऽथ अनेकाक्षौहिणीयुतः । | कार्तवीर्य अर्जुनको ललकारा। तब वह अनेक अक्षौहिणी
तयोर्युद्धमभूत्तत्र भैरवं लोमहर्षणम् ॥ ३४ | सेनाके साथ युद्धके लिये आया। वहाँ उन दोनोंमें
पिशिताशिजनानन्दं शस्त्रास्त्रशतसंकुलम् । | महाभयानक रोमाञ्चकारी युद्ध हुआ, जो सैकड़ों अस्त्र-
ततः परशुरामोऽभून्महाबलपराक्रमः ॥ ३५ | शस्त्रोंके प्रहारसे व्याप्त तथा मांस खानेवाले प्राणियोंको
परं ज्योतिरचिन्त्यात्मा विष्णुः कारणमूर्तिमान् । | आनन्द देनेवाला था। उस समय परशुरामजी अपनेमें
कार्तवीर्यबलं सर्वमनेकैकः क्षत्रियैः सह ॥ ३६ | अचिन्त्यस्वरूप, परम ज्योतिर्मय, कारणमूर्ति भगवान्
हत्वा निपात्य भूमौ तु परमाद्भुतविक्रमः । | विष्णुकी भावना करके महान् बल और पराक्रमसे
कार्तवीर्यस्य बाहूनां वनं चिच्छेद रोषवान् । | सम्पन्न हो गये। उन्होंने परम आश्चर्यमय पौरुष प्रकट
छिन्ने बाहुवने तस्य शिरश्चिच्छेद भार्गवः ॥ ३७ | करते हुए कार्तवीर्यकी असंख्य क्षत्रियोंसे युक्त सम्पूर्ण
विष्णुहस्ताद्वधं प्राप्य चक्रवर्ती स पार्थिवः । | सेनाको मारकर भूमिपर गिरा दिया और रोषसे भरकर
दिव्यरूपधरः श्रीमान् दिव्यगन्धानुलेपनः ॥ ३८ | कार्तवीर्यकी समस्त भुजाएँ काट डालीं। उसके बाहुवनका
दिव्यं विमानमारुह्य विष्णुलोकमवासवान् । | उच्छेद हो जानेपर भृगुनन्दन परशुरामने उसका मस्तक
क्रोधात्परशुरामोऽपि महाबलपराक्रमः ॥ ३९ | भी धड़से अलग कर दिया ॥ ३३-३७॥
त्रिसप्तकृत्वो भूम्यां वै पार्थिवान्निजघान सः । | इस प्रकार वह चक्रवर्ती राजा कार्तवीर्य श्रीभगवान्
क्षत्रियाणां वधात्तेन भूमेर्भारोऽवतारितः ॥ ४० | विष्णुके हाथसे वधको प्राप्त होकर दिव्यरूप धारण करके,
भूमिश्च सकला दत्ता कश्यपाय महात्मने । | श्रीसम्पन्न एवं दिव्य चन्दनोंसे अनुलिप्त होकर, दिव्य
इत्येष जामदग्न्याख्यः प्रादुर्भावो मयोदितः ॥ ४१ | विमानपर आरूढ़ हो, विष्णुधामको प्राप्त हुआ। फिर
यश्च तच्छृणुयाद्भक्त्या सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ४२ | महान् बल और पराक्रमवाले परशुरामजीने भी इस पृथ्वीके
अवतीर्य भूमौ हरिरेष साक्षात् | क्षत्रियोंका इक्कीस बार संहार किया। इस प्रकार क्षत्रियोंका
त्रिसप्तकृत्वः क्षितिपान्निहत्य सः । | वध करके उन्होंने भूमिक भार उतारा और सम्पूर्ण पृथ्वी
क्षात्रं च तेजो प्रविभज्य राजन् | महात्मा कश्यपजीको दान कर दी ॥ ३८-४० १/२ ॥
रामः स्थितोऽद्यापि गिरौ महेन्द्रे ॥ ४३ | इस प्रकार मैंने तुमसे यह 'जामदग्न्य' (परशुराम)
नामक अवतारका वर्णन किया। जो भक्तिपूर्वक इसका
श्रवण करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है।
राजन्! इस तरह पृथ्वीपर अवतीर्ण होनेके बाद ये
साक्षात् भगवान् विष्णुस्वरूप परशुरामजी इक्कीस बार
क्षत्रियोंको मारकर, क्षत्रियतेजको छिन्न-भिन्न करके आज
भी महेन्द्र पर्वतपर विराजमान हैं ॥ ४१-४३॥
इति श्रीनरसिंहपुराणे परशुरामप्रादुर्भावो नाम षट्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४६ ॥
इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'परशुरामावतार' नामक छियालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४६ ॥
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सैंतालीसवाँ अध्याय
श्रीरामावतारकी कथा - श्रीरामके जन्मसे लेकर विवाहतकके चरित्र
श्रीमार्कण्डेय उवाच | श्रीमार्कण्डेयजी बोले - राजन् ! अब मैं भगवान्
शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि प्रादुर्भावं हरेः शुभम् । | विष्णुके उस शुभ अवतारका वर्णन करूँगा, जिसके द्वारा
निहतो रावणो येन सगणो देवकण्टकः ॥ १ | देवताओंके लिये कण्टकस्वरूप रावण अपने गणोंसहित
मारा गया। तुम [ध्यान देकर] सुनो ॥ १ ॥
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