संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
१०८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३१
१०८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३१
अत्रिरुवाच | अत्रि बोले—जिसने अच्युतके चरणोंकी अर्चना
अनर्चिताच्युतपदः पदमासादयेत् कथम्। | नहीं की है, वह पुरुष उस पदको, जो इन्द्रादि देवताओंके
इन्द्रादिदुरवापं यन्मानवैः सुदुरासदम्॥ ५८ | लिये भी दुर्लभ और मनुष्योंके लिये तो अत्यन्त
| दुष्प्राप्य है, कैसे पा सकता है ? ॥ ५८ ॥
अङ्गिरा उवाच | अङ्गिरा बोले—जो भगवान् कमलाकान्तके कमनीय
न हि दूरे पदं तस्य सर्वासां सम्पद्दामिह । | चरणकमलोंका अनुशीलन (चिन्तन) करता है, उसके
कमलाकान्तकान्ताङ्घ्रिकमलं यः सुशीलयेत्॥ ५९ | लिये त्रिभुवनकी सारी सम्पदाओंका स्थान दूर (दुर्लभ)
| नहीं है ॥ ५९ ॥
पुलस्त्य उवाच | पुलस्त्य बोले—ध्रुव ! जिनके स्मरणमात्रसे
यस्य स्मरणमात्रेण महापातकसंततिः। | महापातकोंकी परम्परा अत्यन्त नाशको प्राप्त हो जाती
परमान्तकमाप्नोति स विष्णुः सर्वदो ध्रुव ॥ ६० | है, वे भगवान् विष्णु ही सब कुछ देनेवाले हैं ॥ ६० ॥
पुलह उवाच | पुलह बोले—जिन्हें प्रधान (प्रकृति) और पुरुष
यदाहुः परमं ब्रह्म प्रधानपुरुषात् परम्। | (जीव)—से विलक्षण परब्रह्म कहते हैं, जिनकी मायासे
यन्मायया कृतं सर्वं स विष्णुः कीर्तितोऽर्थदः ॥ ६१ | समस्त प्रपञ्च रचा गया है, उन भगवान् विष्णुका यदि
| कीर्तन किया जाय तो वे अपने भक्तके अभीष्ट मनोरथको
क्रतुरुवाच | पूर्ण कर देते हैं ॥ ६१ ॥
यो यज्ञपुरुषो विष्णुर्वेदवेद्यो जनार्दनः । | क्रतु बोले—जो यज्ञपुरुष भगवान् विष्णु वेदोंके
अन्तरात्मास्य जगतः संतुष्टः किं न यच्छति ॥ ६२ | द्वारा जाननेयोग्य हैं तथा जो जनार्दन इस समस्त जगत्के
| अन्तरात्मा हैं, वे प्रसन्न हों तो क्या नहीं दे सकते ? ॥ ६२ ॥
वसिष्ठ उवाच | वसिष्ठ बोले—राजकुमार ! जिनकी भौंहोंके नर्तनमात्रमें
यद्भ्रूनर्तनवर्तिन्यः सिद्धयोऽष्टौ नृपात्मज। | आठों सिद्धियाँ वर्तमान हैं, उन भगवान् हृषीकेशकी
तमाराध्य हृषीकेशं चतुर्वर्गो न दूरतः ॥ ६३ | आराधना करनेसे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—ये चारों
| पुरुषार्थ दूर नहीं रहते ॥ ६३ ॥
ध्रुव उवाच | ध्रुव बोले—द्विजवरो ! भगवान् विष्णुकी आराधनाके
सत्यमुक्तं द्विजेन्द्रा वो विष्णोराराधनं प्रति। | सम्बन्धमें आपलोगोंने जो विचार प्रकट किया, वह
कथं स भगवानिज्यः स विधिश्चोपदिश्यताम् ॥ ६४ | सत्य है। अब मुझे यह बताइये कि उन भगवान्की पूजा
| कैसे करनी चाहिये ? उसकी विधिका मुझे उपदेश
प्रभूतदो भवेद्यो वै दुराराध्यतमो भवेत्। | कीजिये। जो बहुत कुछ दे सकते हैं, उनकी आराधना
बालोऽहं राजपुत्रोऽहं दुःखं नैव मया क्षमम्॥ ६५ | भी कठिन ही होगी। मैं राजकुमार हूँ और बालक हूँ;
| मुझसे विशेष कष्ट नहीं सहा जा सकता ॥ ६४-६५ ॥
मुनय ऊचुः | मुनिगण बोले—खड़े होते, चलते, सोते-जागते,
तिष्ठता गच्छता वापि स्वपता जाग्रता तथा। | लेटते और बैठते हुए प्रतिक्षण भगवान् नारायणका स्मरण
शयानेनोपविष्टेन वेद्यो नारायणः सदा ॥ ६६ | करना चाहिये। भगवान् वासुदेवके नामका जप करनेवाला
पुत्रान् कलत्रं मित्राणि राज्यं स्वर्गापवर्गकम्। | मनुष्य पुत्र, स्त्री, मित्र, राज्य, स्वर्ग तथा मोक्ष—सब कुछ
वासुदेवं जपन् मर्त्यः सर्वं प्राप्नोत्यसंशयम् ॥ ६७ |
अध्याय ३१ ] ध्रुव-चरित्र तथा ग्रह, नक्षत्र एवं पातालका संक्षिप्त वर्णन १०९
द्वादशाक्षरमन्त्रेण वासुदेवात्मकेन च। पा लेता है—इसमें संशय नहीं है। वासुदेवस्वरूप द्वादशाक्षर
ध्यायंश्चतुर्भुजं विष्णुं जप्त्वा सिद्धिं न को गतः ॥ ६८ मन्त्र ( ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ) -के द्वारा चार
पितामहेन चाप्येष महामन्त्र उपासितः। भुजाधारी भगवान् विष्णुका ध्यान और जप करके किसने
मनुना राज्यकामेन वैष्णवेन नृपात्मज ॥ ६९ सिद्धि नहीं प्राप्त कर ली ? राजकुमार ! पितामह (ब्रह्माजी) -
त्वमप्येतेन मन्त्रेण वासुदेवपरो भव। ने भी इस महामन्त्रकी उपासना की थी। विष्णुभक्त मनुने
यथाभिलषितामृद्धिं क्षिप्रं प्राप्स्यसि सत्तम ॥ ७० भी राज्यकी कामनासे इस मन्त्रद्वारा भगवान्की आराधना
की थी। सत्पुरुषशिरोमणे ! तुम भी इस मन्त्रद्वारा भगवान्
वासुदेवकी आराधनामें लग जाओ। इससे बहुत शीघ्र ही
सूत उवाच अपनी मनोवाञ्छित समृद्धि प्राप्त कर लोगे ॥ ६६–७० ॥
इत्युक्त्वान्तर्हिताः सर्वे महात्मानो मुनीश्वराः। सूतजी कहते हैं—यों कहकर वे सभी महात्मा
वासुदेवमना भूत्वा ध्रुवोऽपि तपसे ययौ ॥ ७१ मुनीश्वर वहीं अन्तर्हित हो गये और ध्रुव भी भगवान्
ध्रुवः सर्वार्थदं मन्त्रं जपन् मधुवने तपः। वासुदेवमें मन लगाकर तपस्याके लिये चला गया।
स चक्रे यमुनातीरे मुनिदिष्टेन वर्त्मना ॥ ७२ द्वादशाक्षर मन्त्र सम्पूर्ण मनोरथोंको देनेवाला है। ध्रुव
श्रद्धान्वितेन जपता च तपःप्रभावात् मधुवनमें यमुनाके तटपर मुनियोंकी बतायी हुई पद्धतिसे
साक्षाद्दिवाब्जनयनं ददृशे हृदीशम्। उस मन्त्रका जप करने लगा। श्रद्धापूर्वक उस मन्त्रका
दिव्याकृतिं सपदि तेन ततः स एव जप करते हुए राजकुमार ध्रुवने तपके प्रभावसे तत्काल
हर्षात् पुनः स प्रजजाप नृपात्मभूतः ॥ ७३ ही हृदयमें भगवान् कमलनयनको प्रकट प्रत्यक्षवत् देखा।
क्षुत्तर्षवर्षघनवातमहोष्णतादि- उनकी आकृति बड़ी दिव्य थी। भगवान्के दर्शनसे उसका
शारीरदुःखकुलमस्य न किंचनाभूत्। हर्ष बढ़ गया। अब तो वह राजपुत्र पुनः बड़े उत्साहसे
मग्ने मनस्यनुपमेयसुखाम्बुराशौ उस मन्त्रका जप करने लगा। उस समय भूख, प्यास,
राज्ञः शिशोर्न च विवेद शरीरवार्ताम् ॥ ७४ वर्षा, आँधी और अधिक गर्मी आदि दैहिक दुःखोंमेंसे
विघ्नाश्च तस्य किल शङ्कितदेवसृष्टा कोई भी उसे नहीं व्यापा। उस राजकुमारका मन अनुपम
बालस्य तीव्रतपसो विफला बभूवुः। आनन्द-महासागरमें गोता लगा रहा था। अतः उस समय
शीतातपादिरिव विष्णुमयं मुनिं हि उसे अपने शरीरकी भी सुध नहीं रह गयी थी। कहते
प्रादेशिका न खलु धर्षयितुं क्षमन्ते ॥ ७५ हैं, उसकी तपस्यासे शङ्कित हुए देवताओंने कितने ही
विघ्न खड़े किये; परंतु उस तीव्र तपस्वी बालकके लिये
अथ भक्तजनप्रियः प्रभुः वे सभी निष्फल ही सिद्ध हुए। शीत और धूप आदिकी
शिशुना ध्यानबलेन तोषितः। ही तरह ये एकदेशीय विघ्न भी उस विष्णुस्वरूप मुनिको
वरदः पतगेन्द्रवाहनो व्यथित नहीं कर पाते थे ॥ ७१–७५ ॥
हरिरागात् स्वजनं समीक्षितुम् ॥ ७६ कुछ समयके बाद भक्तजनोंके प्रियतम वरदाता
मणिपिण्डकमौलिरोजितो भगवान् विष्णु बालक ध्रुवके ध्यान-बलसे संतुष्ट होकर
विलसद्रत्नमहाघनच्छविः । पक्षिराज गरुडपर सवार हो, अपने उस भक्तको देखनेके
स बभावुदयाद्रिमत्सरा- लिये आये। मणिसमूहद्वारा निर्मित मुकुटसे मण्डित और
द्धृतबालार्क इवासिताचलः ॥ ७७ शोभाशाली कौस्तुभरत्नसे समलंकृत, महामेघके समान
श्यामकन्तिवाले वे भगवान् श्रीहरि ऐसी शोभा पा रहे थे,
मानो उदयाचलके प्रति डाह रखनेके कारण अपने शृङ्गपर
बालरविकों धारण किये साक्षात् कज्जलगिरि प्रकाशित हो
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११० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३१
मूल संस्कृत श्लोक
स राजसूनुं तपसि स्थितं तं
ध्रुवं ध्रुवस्निग्धदृगित्युवाच।
दन्तांशुसङ्गैरमितप्रवाहैः
प्रक्षालयन् रेणुमिवास्य गात्रे ॥ ७८
वरं वरं वत्स वृणीष्व यस्ते
मनोगतस्त्वत्तपसास्मि तुष्टः।
ध्यानेन ते चेन्द्रियनिग्रहेण
मनोनिरोधेन च दुष्करेण ॥ ७९
शृण्वन् वचस्तत्सकलं गभीर-
मुन्मीलिताक्षः सहसा ददर्श।
स्वे चिन्त्यमानं त्विदमेव मूर्तं
पुरःस्थितं ब्रह्म चतुर्भुजं सः ॥ ८०
दृष्ट्वा क्षणं राजसुतः सुपूज्यं
पुरस्त्रयीशं किमिह ब्रवीमि।
किं वा करोमीति ससम्भ्रमः स तु
न चाब्रवीत् किंचन नो चकार ॥ ८१
हर्षाश्रुपूर्णः पुलकाञ्चिताङ्ग-
स्त्रिलोकनाथेति वदन्नथोच्चैः।
दण्डप्रणामाय पपात भूमौ
प्रवेपमानभ्रु हरेः पुरः स हि ॥ ८२
दण्डवत् प्रणिपत्याथ परितः परिलुण्ठ्य च।
रुरोद हर्षेण चिरं दृष्ट्वा तं जगतो गुरुम् ॥ ८३
नारदेन सनन्देन सनकेन च संश्रुतम्।
अन्यैः सनत्कुमाराद्यैर्योगिभिर्योगिनां वरम् ॥ ८४
कारुण्यबाष्पनीरार्द्रं पुण्डरीकविलोचनम्।
ध्रुवमुत्थापयांचक्रे चक्री धृत्वा करेण तम् ॥ ८५
हरिस्तु परिपस्पर्श तदङ्गं धूलिधूसरम्।
कराभ्यां कोमलाभ्यां स परिष्वज्याह तं हरिः ॥ ८६
वरं वरय भो बाल यत्ते मनसि वर्तते।
तद्ददामि न संदेहो नादेयं विद्यते तव ॥ ८७
हिन्दी अनुवाद
रहा हो। निश्चल और स्नेहपूर्ण दृष्टिवाले वे भगवान् अपने दाँतोंकी किरणरूप जलके अमित प्रवाहद्वारा तपस्यामें लगे हुए राजकुमार ध्रुवके शरीरकी धूलिको धोते हुए-से उससे इस प्रकार बोले ॥ ७६–७८॥
'वत्स! मैं तुम्हारी तपस्या, ध्यान, इन्द्रिय-निग्रह और दुस्साध्य मनःसंयमसे तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। अतः तुम्हारे मनमें जो अभीष्ट हो, वह उत्तम वर मुझसे माँग लो' ॥ ७९ ॥
भगवान्की वह सम्पूर्ण गम्भीर वाणी सुनते ही ध्रुवने सहसा आँखें खोल दीं। उस समय उन्हीं चतुर्भुज ब्रह्मको, जिनका वह अपने हृदयमें चिन्तन कर रहा था, उसने सामने मूर्तिमान् होकर खड़ा देखा ॥ ८० ॥
उन परम पूजनीय त्रिभुवनपतिको सहसा सामने देख वह राजकुमार सकपका गया और 'मैं यहाँ इनसे क्या कहूँ? क्या करूँ?' इत्यादि बातें सोचता हुआ क्षणभर न तो कुछ बोला और न कुछ कर ही सका। उसके नेत्रोंमें आनन्दके आँसू भरे थे, शरीरके रोएँ खड़े हो गये थे। वह भगवान्के सामने उच्चस्वरसे 'हे त्रिभुवननाथ!' यों कहता हुआ दण्डवत्-प्रणाम करनेके लिये पृथ्वीपर पड़ गया। उस समय उसकी भौंहें काँप रही थीं। दण्डकी भाँति प्रणाम करके जगद्गुरु भगवान्की ओर एकटक दृष्टि लगाये वह आनन्दातिरेकसे चारों ओर लोट-पोट होकर देरतक रोता रहा। नारद, सनन्दन, सनक और सनत्कुमार आदि तथा अन्य योगी जिन योगीश्वरका श्रवण-कीर्तन एवं स्तवन किया करते हैं और जिनके नेत्र करुणाके आँसुओंसे भीगे हुए थे, उन्हीं कमललोचन भगवान्को आज ध्रुवने प्रत्यक्ष देखा। उस समय चक्रधर भगवान्ने अपने हाथसे पकड़कर ध्रुवको उठा लिया। इतना ही नहीं, उन्होंने अपने दोनों कोमल हाथोंसे उसके धूलिधूसरित शरीरको सब ओरसे पोंछा और उसे हृदयसे लगाकर कहा ॥ ८१–८६॥
'बच्चा! तुम्हारे मनमें जो भी इच्छा है, उसके अनुसार वर माँग लो। मैं निस्संदेह वह सब तुम्हें दे दूँगा। तुम्हारे लिये कोई भी वस्तु अदेय नहीं है' ॥ ८७ ॥
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अध्याय ३१ ] ध्रुव-चरित्र तथा ग्रह, नक्षत्र एवं पातालका संक्षिप्त वर्णन १११
ततो वरं राजशिशुर्ययाचे | तब राजकुमारने भगवान् विष्णुसे यही वर माँगा कि
विष्णुं वरं ते स्तवशक्तमेव। | 'मुझे आपकी स्तुति करनेकी शक्ति प्राप्त हो।' यह सुनकर
तं मूर्तविज्ञाननिभेन देवः | भगवान्ने मूर्तिमान् विज्ञानके समान निर्मल शङ्खसे ध्रुवके
पस्पर्श शङ्खेन मुखेऽमलेन ॥ ८८ | मुखको छुआ दिया। मरीचि आदि देवर्षियोंके दिये हुए
| ज्ञानरूपी चन्द्रमाकी किरणोंसे क्षालित होकर ध्रुवका चित्त
अथ सुरमुनिदत्तज्ञानचन्द्रेण सम्यग् | पूर्णतया निर्मल हो गया था। फिर त्रिभुवनगुरु भगवान्के
विमलितमिव चित्तं पूर्णमेव ध्रुवस्य। | शङ्ख-स्पर्शसे उसके अन्तःकरणमें ज्ञानरूपी सूर्यका उदय
त्रिभुवनगुरुशङ्खस्पर्शजज्ञानभाना- | हो जानेपर उसमें पूर्ण प्रकाश हो गया। इससे वह आनन्दित
नुदयति नितरान्तः साधु तुष्टाव हृष्टः ॥ ८९ | होकर भगवान्की सुन्दर स्तुति करने लगा ॥ ८८-८९ ॥
| ध्रुव बोला—समस्त मुनिगण जिनके चरणकमलोंकी
ध्रुव उवाच | वन्दना करते हैं, जो खर राक्षस अथवा गर्दभरूपधारी
| धेनुकासुरका संहार करनेवाले हैं, जिनकी बाललीलाएँ
अखिलमुनिजननिवहनमितचरणः। खरकदन- | चपलतासे पूर्ण हैं, देवगण जिनके चरणोदक (गङ्गाजी)-
करः। चपलचरितः। देवाराधितपादजलः। | की आराधना करते हैं, सजल मेघके समान जिनका
| श्याम वर्ण है, सौभ विमानके अधिपति शाल्वके धाम
सजलजलधरश्यामः शमितसौभपतिशाल्वधामा। | (तेज)-को जिन्होंने सदाके लिये शान्त कर दिया है,
| जिन्होंने सुन्दर गोपवनिताओंके अत्यन्त विनयवश नूतन
अभिरामरामातिविनयकृतनवरसरसापहतेन्द्रिय- | प्रेमरसमय रासलीलाको प्रकट किया और उससे मोहित
सुररमणीविहितान्तःकरणानन्दः। अनादिनिधनः। | होनेवाली देववनिताओँके अन्तःकरणमें भी आनन्दका
| संचार किया, जिनका आदि और अन्त नहीं है, जिन्होंने
अधननिरजद्विजमित्रोद्धरणधीरः। अवधीरितसुरनाथ- | अपने निर्धन मित्र सुदामा नामक ब्राह्मणका धीरतापूर्वक
| दैन्यदुःखसे उद्धार किया, देवराज इन्द्रकी प्रार्थनासे जिन्होंने
नाथितविपक्षपक्षः। ऋक्षराजबिलप्रवेशापहृत- | उनके शत्रुपक्षको पराजित किया, ऋक्षराज जाम्बवान्की
| गुहामें प्रवेश करके खोयी हुई स्यमन्तक मणिको लाकर
स्यमन्तकापमार्जितनिजापवाददुरितहृतत्रैलोक्यभारः। | जिन्होंने अपने ऊपर लगे हुए कलङ्करूप दुरितको दूर
| करके त्रिभुवनका भार हल्का किया है, जो द्वारकापुरीमें
द्वारकावासनिरतः। स्वरितमधुरवेणुवादनश्रवणामृत- | नित्य निवास करते हैं, जो अपनी मधुर मुरली बजाकर
| श्रुतिमधुर अतीन्द्रिय-ज्ञानको प्रकट करते तथा यमुनाटटपर
प्रकटितातीन्द्रियज्ञानः। यमुनाटटचरः। द्विजधेनुभृङ्ग- | विचरते हैं, जिनके वंशीनादको सुननेके लिये पक्षी, गौ
| और भृङ्गगण अपना-अपना आहार त्याग देते हैं, जिनके
गणैस्त्यक्तनिजनिजाहारः। संसारदुस्तरपारावार- | चरणकमल दुस्तर संसार-सागरसे पार करनेके लिये
समुत्तरणाङ्घ्रिपोतः। स्वप्रतापानलहुतकालयवनः। | जहाजरूप हैं, जिन्होंने अपनी प्रतापाग्निमें कालयवनको
| होम दिया है, जो वनमालाधारी हैं, जिनके श्रवण
वनमालाधरवरमणिकुण्डलालंकृतश्रवणः। नाना- | सुन्दर मणिमय कुण्डलोंसे अलंकृत हैं, जिनके अनेक
प्रसिद्धाभिधानः। निगमविबुधमुनिजनवचन- | प्रसिद्ध नाम हैं, जो वेदवाणी तथा देवता और मुनियोंके
| भी मन-वाणीके अगोचर हैं, जो भगवान् सुवर्णके समान
मनोऽगोचरः। कनकपिशङ्गकौशेयवासोभगवान् | पीत रेशमी वस्त्र धारण करते हैं, जिनका वक्षःस्थल
भृगुपदकौस्तुभविभूषितोरःस्थलः। स्वदयिता- | भृगुजीके चरण-चिह्न तथा कौस्तुभमणिसे अलंकृत है,