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संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

२९० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५०

२९० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५०
गच्छ लक्ष्मण दुष्टोऽसौ नागतः कपिनायकः ।
गते तु वर्षाकालेऽहमागमिष्यामि तेऽन्तिकम् ॥ ३६
अनेकैर्वानरैः सार्धमित्युक्त्वासौ तदा गतः ।
तत्र गच्छ त्वरायुक्तो यत्रास्ते कपिनायकः ॥ ३७
तं दुष्टमग्रतः कृत्वा हरिसैनासमन्वितम् ।
रमन्तं तारया सार्धं शीघ्रमानय मां प्रति ॥ ३८
नात्रागच्छति सुग्रीवो यद्यसौ प्राप्तभूतिकः ।
तदा त्वयैवं वक्तव्यः सुग्रीवोऽनृतभाषकः ॥ ३९
वालिहन्ता शरो दुष्ट करे मेऽद्यापि तिष्ठति ।
स्मृत्वैतदाचर कपे रामवाक्यं हितं तव ॥ ४०
इत्युक्तस्तु तथेत्युक्त्वा रामं नत्वा च लक्ष्मणः ।
पम्पापुरं जगामाथ सुग्रीवो यत्र तिष्ठति ।
दृष्ट्वा स तत्र सुग्रीवं कपिराजं बभाष वै ॥ ४१
ताराभोगविषक्तस्त्वं रामकार्यपराङ्मुखः ।
किं त्वया विस्मृतं सर्वं रामाग्रे समयं कृतम् ॥ ४२
सीतामन्विष्य दास्यामि यत्र क्वापीति दुर्मते ।
हत्वा तु वालिनं राज्यं येन दत्तं पुरा तव ॥ ४३
त्वामृते कोऽवमन्येत कपीन्द्र पापचेतस ।
प्रतिश्रुत्य च रामस्य भार्याहीनस्य भूपते ॥ ४४
साहाय्यं ते करोमीति देवाग्निजलासन्निधौ ।
ये ये च शत्रवो राजंस्ते ते च मम शत्रवः ॥ ४५
मित्राणि यानि ते देव तानि मित्राणि मे सदा ।
सीतामन्वेषितुं राजन् वानरैर्बहुभिर्वृतः ॥ ४६
सत्यं यास्यामि ते पार्श्वमित्युक्त्वा कोऽन्यथाकरोत् ।
त्वामृते पापिनं दुष्टं रामदेवस्य संनिधौ ॥ ४७
कारयित्वा तु तेनैवं स्वकार्यं दुष्टवानर ।
ऋषीणां सत्यवद्वाक्यं त्वयि दृष्टं मयाधुना ॥ ४८
सर्वस्य हि कृतार्थस्य मतिरन्या प्रवर्तते ।
वत्सः क्षीरक्षयं दृष्ट्वा परित्यजति मातरम् ॥ ४९
'लक्ष्मण ! तुम पम्पापुरमें जाओ। देखो, क्या कारण है
कि वह दुष्ट वानरराज अभीतक नहीं आया। पहले तो
वह यही कहकर गया था कि 'वर्षाकाल बीतनेपर मैं
अनेक वानरोंके साथ आपके पास आऊँगा।' अब तुम
जहाँ वह वानरराज रहता है, वहाँ शीघ्रतापूर्वक जाओ।
ताराके साथ रमण करनेवाले उस दुष्ट वानरको आगे
करके समस्त वानरसेनाके सहित मेरे पास शीघ्र ले आओ।
यदि ऐश्वर्य प्राप्त कर लेनेके कारण मदमें चूर हो सुग्रीव
यहाँ न आये तो तुम उस असत्यवादीसे यों कहना—
'अरे दुष्ट ! श्रीरामने कहा है कि जिससे वालिका वध
किया गया था, वह बाण आज भी मेरे हाथमें मौजूद है;
अतः वानर ! इस बातको याद करके तू श्रीरामचन्द्रजीकी
आज्ञाका पालन कर; इसीमें तेरा भला है' ॥ ३३–४० ॥
श्रीरामचन्द्रजीके ऐसी आज्ञा देनेपर लक्ष्मणने 'बहुत
अच्छा' कहकर उसे शिरोधार्य किया और उनको नमस्कार
करके वे पम्पापुरमें गये, जहाँ सुग्रीव रहता था। वहाँ
उन्होंने वानरराज सुग्रीवको देखकर कहा—'अरे ! तू
श्रीरामचन्द्रजीके कार्यसे मुँह मोड़कर यहाँ ताराके साथ
भोग-विलासमें फँसा हुआ है ? रे दुर्बुद्धे ! तूने श्रीरामके
सामने जो यह प्रतिज्ञा की थी कि 'जहाँ-कहीं भी हो,
सीताको ढूँढ़कर मैं आपको अर्पित करूँगा' उसे क्या
भूल गया ? अरे पापात्मा वानरराज ! जिन्होंने वालिको
मारकर पहले ही तुम्हें राज्य दे दिया, ऐसे परोपकारी
मित्रका तेरे सिवा कौन अनादर कर सकता है ? तूने
देवता, अग्नि और जलके निकट श्रीरामसे यह प्रतिज्ञा
की थी कि 'राजन् ! मैं पत्नीसे वियुक्त हुए आपकी सहायता
करूँगा। राजन् ! जो-जो आपके शत्रु हैं, वे-वे मेरे भी
शत्रु हैं तथा देव ! जो-जो आपके मित्र हैं, वे-वे मेरे भी
सदा ही मित्र हैं। राजन् ! मैं बहुत-से वानरोंके साथ
सीताकी खोज करानेके लिये अवश्य ही आपके पास
आऊँगा।' भगवान् श्रीरामके निकट यों कहकर तुझ-
जैसे दुष्ट पापीके सिवा दूसरा कौन है, जो इसके विपरीत
आचरण करता। अरे दुष्ट वानर ! इस प्रकार तूने अपना
काम तो उनसे करा लिया और उनका कार्य करना तू
भूल गया! इस समय ऋषियोंकी यह यथार्थ बात कि
'अपना काम सिद्ध हो जानेपर सभीकी बुद्धि बदल
जाती है, जैसे बछड़ा माताके थनोंमें दूधकी कमी देखकर
उसे छोड़ देता है [फिर माताकी परवा नहीं करता]'
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अध्याय ५० ] सुग्रीवसे मैत्री; वालिवध; सुग्रीवका प्रमाद और उसकी भर्त्सना २१९


जनवृत्तविदां लोके सर्वज्ञानां महात्मनाम्।
न तं पश्यामि लोकेऽस्मिन् कृतं प्रतिकरोति यः ॥ ५०
शास्त्रेषु निष्कृतिर्दृष्टा महापातकिनामपि।
कृतघ्नस्य कपे दुष्ट न दृष्टा निष्कृतिः पुरा ॥ ५१
कृतघ्नता न कार्या ते त्वत्कृतं समयं स्मर।
एह्येह्यागच्छ शरणं काकुत्स्थं हितपालकम् ॥ ५२
यदि नायासि च कपे रामवाक्यमिदं शृणु।
नयिष्ये मृत्युसदनं सुग्रीवं वालिनं यथा ॥ ५३
स शरो विद्यतेऽस्माकं येन वाली हतः कपिः।
लक्ष्मणेनैवमुक्तोऽसौ सुग्रीवः कपिनायकः ॥ ५४
निर्गत्य तु नमश्चक्रे लक्ष्मणं मन्त्रिणोदितः।
उवाच च महात्मानं लक्ष्मणं वानराधिपः ॥ ५५
अज्ञानकृतपापानामस्माकं क्षन्तुमर्हसि।
समयः कृतो मया राज्ञा रामेणामिततेजसा ॥ ५६
यस्तदानीं महाभाग तमद्यापि न लङ्घये।
यास्यामि निखिलैश्च कपिभिर्नृपनन्दन ॥ ५७
त्वया सह महाबीर रामपार्श्वं न संशयः।
मां दृष्ट्वा तत्र काकुत्स्थो यद्वक्ष्यति च मां प्रति ॥ ५८
तत्सर्वं शिरसा गृह्य करिष्यामि न संशयः।
सन्ति मे हरयः शूराः सीतान्वेषणकर्मणि ॥ ५९
तान्यहं प्रेषयिष्यामि दिक्षु सर्वासु पार्थिव।
इत्युक्तः कपिराजेन सुग्रीवेण स लक्ष्मणः ॥ ६०
एहि शीघ्रं गमिष्यामो रामपार्श्वमितोऽधुना।
सेना चाहूयतां वीर ऋक्षाणां हरिणामपि ॥ ६१
यां दृष्ट्वा प्रीतिमभ्येति राघवस्ते महामते।
इत्युक्तो लक्ष्मणेनाथ सुग्रीवः स तु वीर्यवान् ॥ ६२
पार्श्वस्थं युवराजानमङ्गदं संज्ञयाब्रवीत्।
सोऽपि निर्गत्य सेनानीमाह सेनापतिं तदा ॥ ६३
तेनाहूताः समागत्य ऋक्षवानरकोटयः।
गुहास्थाश्च गिरिस्थाश्च वृक्षस्थाश्चैव वानराः ॥ ६४
तैः सार्धं पर्वताकारैर्वानरैर्भीमविक्रमैः।
सुग्रीवः शीघ्रमागत्य ववन्दे राघवं तदा ॥ ६५
लक्ष्मणोऽपि नमस्कृत्य रामं भ्रातरमब्रवीत्।
प्रसादं कुरु सुग्रीवे विनीते चाधुना नृप ॥ ६६


मुझे तुझमें ही ठीक-ठीक घटती-सी दीख रही है। संसारमें जो मनुष्योचित सद्व्यवहारका ज्ञान रखनेवाले हैं, उन सर्वज्ञ महात्माओंमेंसे मैं किसीको भी ऐसा नहीं देखता, जो लोकमें दूसरोंके द्वारा किये हुए उपकारको न मानता हो। शास्त्रोंमें महापातकी पुरुषोंके भी उद्धारका उपाय (प्रायश्चित्त) देखा गया है, किंतु दुष्ट वानर ! कृतघ्न पुरुषके उद्धारका उपाय मैंने पहले कभी नहीं देखा है। इसलिये तुझे कभी कृतघ्नता नहीं करनी चाहिये। अपनी की हुई प्रतिज्ञाको याद कर। अब आ, तेरे हितकी रक्षा करनेवाले ककुत्स्थकुलनन्दन भगवान् श्रीरामकी शरणमें चल। वानर ! यदि तू नहीं आना चाहता तो यह श्रीरामका वचन सुन। [उन्होंने कहा है-] 'मैं वालिकी ही भाँति सुग्रीवको भी यमपुर भेज दूँगा। जिससे वानरराज वालि मारा गया है, वह बाण अब भी मेरे पास मौजूद है' ॥ ४१-५३ १/२ ॥

लक्ष्मणके इस प्रकार कहनेपर कपिराज सुग्रीव मन्त्रीकी प्रेरणासे बाहर निकले। उन्होंने लक्ष्मणको प्रणाम किया और उन महात्मासे कहा- 'महाभाग! हमारे अज्ञानवश किये हुए अपराधोंको आप क्षमा करें। मैंने उस समय अमिततेजस्वी राजा रामचन्द्रके साथ जो प्रतिज्ञा की थी, उसका अब भी उल्लङ्घन नहीं करूँगा। महावीर राजकुमार ! मैं अब समस्त वानरोंको साथ लेकर आपके साथ श्रीरामके पास चलूँगा। मुझे वहाँ देखकर श्रीरामचन्द्रजी मुझसे जो कुछ भी कहेंगे, उसे मैं शिरोधार्य करके निस्सन्देह पूर्ण करूँगा। राजन् ! मेरे यहाँ बड़े-बड़े वीर वानर हैं। उन सबको मैं सीताजीकी खोज करनेके लिये समस्त दिशाओंमें भेजूँगा' ॥ ५४-५९ १/२ ॥

वानरराज सुग्रीवके यों कहनेपर लक्ष्मणने कहा- 'आओ! अब यहाँसे शीघ्र ही श्रीरामके पास चलें। वीर! महामते ! वानरों और भालुओंकी सेना भी बुला लो, जिसे देखकर श्रीरामचन्द्रजी तुमपर प्रसन्न हों।' लक्ष्मणद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर परम पराक्रमी सुग्रीवने पास ही खड़े हुए युवराज अङ्गदसे इशारेमें कुछ कहा। अङ्गदने भी जाकर सेनाका संचालन करनेवाले सेनापतिको प्रेरित किया। सेनापतिके बुलानेसे पर्वत, कन्दरा और वृक्षोंपर रहनेवाले करोड़ों वानर आये। पर्वतोंके समान आकारवाले उन भयंकर पराक्रमी वानरोंके साथ सुग्रीवने उस समय शीघ्रतापूर्वक पहुँचकर श्रीरामचन्द्रजीको प्रणाम किया। साथ ही लक्ष्मणजीने भी अपने भाईको प्रणाम करके कहा- 'राजन् ! इन विनयशील सुग्रीवपर अब आप कृपा करें' ॥ ६०-६६ ॥