संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 222, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ५० ] सुग्रीवसे मैत्री; वालिवध; सुग्रीवका प्रमाद और उसकी भर्त्सना २१९
जनवृत्तविदां लोके सर्वज्ञानां महात्मनाम्।
न तं पश्यामि लोकेऽस्मिन् कृतं प्रतिकरोति यः ॥ ५०
शास्त्रेषु निष्कृतिर्दृष्टा महापातकिनामपि।
कृतघ्नस्य कपे दुष्ट न दृष्टा निष्कृतिः पुरा ॥ ५१
कृतघ्नता न कार्या ते त्वत्कृतं समयं स्मर।
एह्येह्यागच्छ शरणं काकुत्स्थं हितपालकम् ॥ ५२
यदि नायासि च कपे रामवाक्यमिदं शृणु।
नयिष्ये मृत्युसदनं सुग्रीवं वालिनं यथा ॥ ५३
स शरो विद्यतेऽस्माकं येन वाली हतः कपिः।
लक्ष्मणेनैवमुक्तोऽसौ सुग्रीवः कपिनायकः ॥ ५४
निर्गत्य तु नमश्चक्रे लक्ष्मणं मन्त्रिणोदितः।
उवाच च महात्मानं लक्ष्मणं वानराधिपः ॥ ५५
अज्ञानकृतपापानामस्माकं क्षन्तुमर्हसि।
समयः कृतो मया राज्ञा रामेणामिततेजसा ॥ ५६
यस्तदानीं महाभाग तमद्यापि न लङ्घये।
यास्यामि निखिलैश्च कपिभिर्नृपनन्दन ॥ ५७
त्वया सह महाबीर रामपार्श्वं न संशयः।
मां दृष्ट्वा तत्र काकुत्स्थो यद्वक्ष्यति च मां प्रति ॥ ५८
तत्सर्वं शिरसा गृह्य करिष्यामि न संशयः।
सन्ति मे हरयः शूराः सीतान्वेषणकर्मणि ॥ ५९
तान्यहं प्रेषयिष्यामि दिक्षु सर्वासु पार्थिव।
इत्युक्तः कपिराजेन सुग्रीवेण स लक्ष्मणः ॥ ६०
एहि शीघ्रं गमिष्यामो रामपार्श्वमितोऽधुना।
सेना चाहूयतां वीर ऋक्षाणां हरिणामपि ॥ ६१
यां दृष्ट्वा प्रीतिमभ्येति राघवस्ते महामते।
इत्युक्तो लक्ष्मणेनाथ सुग्रीवः स तु वीर्यवान् ॥ ६२
पार्श्वस्थं युवराजानमङ्गदं संज्ञयाब्रवीत्।
सोऽपि निर्गत्य सेनानीमाह सेनापतिं तदा ॥ ६३
तेनाहूताः समागत्य ऋक्षवानरकोटयः।
गुहास्थाश्च गिरिस्थाश्च वृक्षस्थाश्चैव वानराः ॥ ६४
तैः सार्धं पर्वताकारैर्वानरैर्भीमविक्रमैः।
सुग्रीवः शीघ्रमागत्य ववन्दे राघवं तदा ॥ ६५
लक्ष्मणोऽपि नमस्कृत्य रामं भ्रातरमब्रवीत्।
प्रसादं कुरु सुग्रीवे विनीते चाधुना नृप ॥ ६६
मुझे तुझमें ही ठीक-ठीक घटती-सी दीख रही है। संसारमें जो मनुष्योचित सद्व्यवहारका ज्ञान रखनेवाले हैं, उन सर्वज्ञ महात्माओंमेंसे मैं किसीको भी ऐसा नहीं देखता, जो लोकमें दूसरोंके द्वारा किये हुए उपकारको न मानता हो। शास्त्रोंमें महापातकी पुरुषोंके भी उद्धारका उपाय (प्रायश्चित्त) देखा गया है, किंतु दुष्ट वानर ! कृतघ्न पुरुषके उद्धारका उपाय मैंने पहले कभी नहीं देखा है। इसलिये तुझे कभी कृतघ्नता नहीं करनी चाहिये। अपनी की हुई प्रतिज्ञाको याद कर। अब आ, तेरे हितकी रक्षा करनेवाले ककुत्स्थकुलनन्दन भगवान् श्रीरामकी शरणमें चल। वानर ! यदि तू नहीं आना चाहता तो यह श्रीरामका वचन सुन। [उन्होंने कहा है-] 'मैं वालिकी ही भाँति सुग्रीवको भी यमपुर भेज दूँगा। जिससे वानरराज वालि मारा गया है, वह बाण अब भी मेरे पास मौजूद है' ॥ ४१-५३ १/२ ॥
लक्ष्मणके इस प्रकार कहनेपर कपिराज सुग्रीव मन्त्रीकी प्रेरणासे बाहर निकले। उन्होंने लक्ष्मणको प्रणाम किया और उन महात्मासे कहा- 'महाभाग! हमारे अज्ञानवश किये हुए अपराधोंको आप क्षमा करें। मैंने उस समय अमिततेजस्वी राजा रामचन्द्रके साथ जो प्रतिज्ञा की थी, उसका अब भी उल्लङ्घन नहीं करूँगा। महावीर राजकुमार ! मैं अब समस्त वानरोंको साथ लेकर आपके साथ श्रीरामके पास चलूँगा। मुझे वहाँ देखकर श्रीरामचन्द्रजी मुझसे जो कुछ भी कहेंगे, उसे मैं शिरोधार्य करके निस्सन्देह पूर्ण करूँगा। राजन् ! मेरे यहाँ बड़े-बड़े वीर वानर हैं। उन सबको मैं सीताजीकी खोज करनेके लिये समस्त दिशाओंमें भेजूँगा' ॥ ५४-५९ १/२ ॥
वानरराज सुग्रीवके यों कहनेपर लक्ष्मणने कहा- 'आओ! अब यहाँसे शीघ्र ही श्रीरामके पास चलें। वीर! महामते ! वानरों और भालुओंकी सेना भी बुला लो, जिसे देखकर श्रीरामचन्द्रजी तुमपर प्रसन्न हों।' लक्ष्मणद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर परम पराक्रमी सुग्रीवने पास ही खड़े हुए युवराज अङ्गदसे इशारेमें कुछ कहा। अङ्गदने भी जाकर सेनाका संचालन करनेवाले सेनापतिको प्रेरित किया। सेनापतिके बुलानेसे पर्वत, कन्दरा और वृक्षोंपर रहनेवाले करोड़ों वानर आये। पर्वतोंके समान आकारवाले उन भयंकर पराक्रमी वानरोंके साथ सुग्रीवने उस समय शीघ्रतापूर्वक पहुँचकर श्रीरामचन्द्रजीको प्रणाम किया। साथ ही लक्ष्मणजीने भी अपने भाईको प्रणाम करके कहा- 'राजन् ! इन विनयशील सुग्रीवपर अब आप कृपा करें' ॥ ६०-६६ ॥