संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 274, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ५८ ] क्षत्रियादि वर्णोंके धर्म और ब्रह्मचर्य तथा गृहस्थाश्रमके धर्मोंका वर्णन २६३
आचम्य देवतामिष्टां संस्मरेदुदरं स्पृशन्। बाद मुँह-हाथ धो, आचमन (कुल्ला) करके, अपने
इतिहासपुराणाभ्यां कंचित्कालं नयेद्बुधः ॥ १०५ उदरका स्पर्श करते हुए इष्टदेवका स्मरण करे। फिर
विद्वान् पुरुष इतिहास-पुराणोंके अध्ययनमें कुछ समय
ततः संध्यामुपासीत बहिर्गत्वा विधानतः। व्यतीत करे। तदनन्तर सायंकाल आनेपर बाहर (नदी
कृतहोमश्च भुञ्जीत रात्रावतिथिमार्चयेत् ॥ १०६ या जलाशयके तटपर) जाकर विधिपूर्वक संध्योपासन
करे। पुनः रात्रिकालमें हवन करके अतिथि-सत्कारके
सायं प्रातर्द्विजातीनामशनं श्रुतिचोदितम्। पश्चात् भोजन करे। द्विजातियोंके लिये प्रातः और सायं—
नान्तरा भोजनं कुर्यादग्निहोत्रसमो विधिः ॥ १०७ दो ही समय भोजन करना वेदविहित है; इसके बीचमें
भोजन नहीं करना चाहिये। जैसे अग्निहोत्र प्रातः और
शिष्यानध्यापयेत्तद्वदनध्यायं विवर्जयेत् । सायंकालमें किया जाता है, वैसे ही दो ही समय भोजनकी
स्मृत्युक्तान् सकलान् पूर्वपुराणोक्तानपि द्विजः ॥ १०८ भी विधि है ॥ १०३–१०७॥
इसके अतिरिक्त विद्वान् द्विजको चाहिये कि वह
महानवम्यां द्वादश्यां भरण्यामपि चैव हि। प्रतिदिन शिष्योंको पढ़ाये, परंतु अध्ययनके लिये वर्जित
तथाक्षय्यतृतीयायां शिष्यान्नाध्यापयेद्बुधः ॥ १०९ समयका त्याग करे। स्मृतिमें बताये हुए तथा पहलेके
पुराणोंमें वर्णित सम्पूर्ण अनध्याय-कालको त्याग दे।
माघमासे तु सप्तम्यां रथ्यामध्ययनं त्यजेत् । महानवमी (आश्विन शुक्ला नवमी) और द्वादशी तिथि,
अध्यापनमथाभ्यज्य स्नानकाले विवर्जयेत् ॥ ११० भरणी नक्षत्र और अक्षयतृतीयामें विद्वान् पुरुष शिष्योंको
न पढ़ाये। माघ मासकी सप्तमीको अध्ययन न करे,
दानं च विधिना देयं गृहस्थेन हितैषिणा । सड़कपर चलते समय और उबटन लगाकर स्नान करते
हिरण्यदानं गोदानं भूमिदानं विशेषतः ॥ १११ समय भी अध्ययनका त्याग करे ॥ १०८–११० ॥
एतानि यः प्रयच्छेत श्रोत्रियेभ्यो द्विजोत्तमः । अपना हित चाहनेवाले गृहस्थको चाहिये कि विधिपूर्वक
सर्वपापविनिर्मुक्तः स्वर्गलोके महीयते ॥ ११२ दान करे। विशेषतः सुवर्णदान, गोदान और भूमिदान
करे। जो द्विजश्रेष्ठ सुवर्ण आदि पूर्वोक्त वस्तुएँ श्रोत्रिय
मङ्गलाचारयुक्तश्च शुचिः श्रद्धापरो गृही। ब्राह्मणोंको दानमें देता है, वह सब पापोंसे मुक्त होकर
श्राद्धं च श्रद्धया कुर्यात्स याति ब्रह्मणः पदम् ॥ ११३ स्वर्गलोकमें सम्मानित होता है। जो गृहस्थ शुभाचरणोंसे
युक्त, पवित्र और श्रद्धालु रहकर श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करता
जातावुत्कर्षमायाति नरसिंहप्रसादतः । है, वह ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है। वह भगवान् नरसिंहकी
स तस्मान्मुक्तिमाप्नोति ब्रह्मणा सह सत्तमाः ॥ ११४ कृपासे जातिमें उत्कर्ष प्राप्त करता है और सत्तमो ! ब्रह्माजीके
साथ ही वह मुक्त हो जाता है। विप्रगण ! इस प्रकार मैंने
एवं हि विप्राः कथितो मया वः आप लोगोंसे यह सनातन धर्मसमूहका संक्षेपसे वर्णन
समासतः शाश्वतधर्मराशिः । किया। जो पुरुष सद्गृहस्थके उक्त धर्मका भलीभाँति
सम्यग्गृहस्थस्य सतो हि धर्मं प्रयत्नपूर्वक पालन करता है, वह मुक्त होकर भगवान्
कुर्वन् प्रयत्नाद्धरिमेति मुक्तः ॥ ११५ श्रीहरिको प्राप्त करता है ॥ १११–११५ ॥
इति श्रीनरसिंहपुराणे गृहस्थधर्मो नामाष्टपञ्चाशोऽध्यायः ॥ ५८ ॥
इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'गृहस्थधर्म' नामक अट्ठावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५८ ॥
In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth