संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 194, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ४८ ] श्रीराम-वनवास; राजा दशरथका निधन तथा वनमें राम-भरतकी भेंट १८३
समर्प्य रामं स मुनिः सहानुजं | इस प्रकार महामति मुनि विश्वामित्रजीने छोटे भाई
सभार्यमग्रे पितुरेकवल्लभम्। | लक्ष्मण तथा भार्या सीताके साथ श्रीरामजीको, जो अपने
पुनः पुनः श्राव्य हसनमहामति- | पिताको एकान्त प्रिय थे, समर्पित कर दिया और उनके
जगाम सिद्धाश्रममेवमात्मनः॥ १५९ | समक्ष बारम्बार उनका गुणगान करके हँसते हुए वे
| अपने श्रेष्ठ सिद्धाश्रमको चले गये॥ १५७-१५९॥
इति श्रीनरसिंहपुराणे रामप्रादुर्भावे सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४७॥
इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'रामावतारविषयक' सैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४७॥
अड़तालीसवाँ अध्याय
श्रीराम-वनवास; राजा दशरथका निधन तथा वनमें राम-भरतकी भेंट
मार्कण्डेय उवाच | मार्कण्डेयजी कहते हैं—विवाह करनेके पश्चात्
कृतदारो महातेजा रामः कमललोचनः। | महातेजस्वी कमललोचन श्रीराम अयोध्यावासियोंका आनन्द
पित्रे सुमहतीं प्रीतिं जनानामुपपादयन्॥ १ | बढ़ाते हुए सब प्रकारके भोगोंसे सम्पन्न हो, पिताके
| संतोषके लिये अयोध्यामें ही रहने लगे। नरेश्वर ! जब
अयोध्यायां स्थितो रामः सर्वभोगसमन्वितः। | रघुकुलनायक श्रीराम प्रसन्नतापूर्वक अयोध्यामें सानन्द
प्रीत्या नन्दत्ययोध्यायां रामे रघुपतौ नृप॥ २ | निवास करने लगे, तब उनके भाई भरत शत्रुघ्नको साथ
| लेकर अपने मामाके यहाँ चले गये। तदनन्तर राजा
भ्राता शत्रुघ्नसहितो भरतो मातुलं ययौ। | दशरथने अपने ज्येष्ठ पुत्र श्रीरामको अप्रतिम सुन्दर, बलिष्ठ,
ततो दशरथो राजा प्रसमीक्ष्य सुशोभनम्॥ ३ | नवयुवक, विद्वान् और राजा बनाये जानेके योग्य समझकर
| सोचा कि 'अब श्रीरामको राजपद्पर अभिषिक्त करके
युवानं बलिनं योग्यं भूपसिद्धयै सुतं कविम्। | राज्यका भार इन्हें सौंप दूँ और स्वयं भगवान् विष्णुके
अभिषिच्य राज्यभारं रामे संस्थाप्य वैष्णवम्॥ ४ | धामको प्राप्त करनेके लिये महान् यत्न करूँ॥ १-४१/२॥
| यह सोचकर राजा इस कार्यमें तत्पर हो गये और
पदं प्राप्तुं महद्यत्नं करिष्यामीत्यचिन्तयत्। | समस्त दिशाओंमें रहनेवाले बुद्धिमान् भृत्यों, अधीनस्थ
संचिन्त्य तत्परो राजा सर्वदिक्षु समादिशत्॥ ५ | राजाओं तथा मन्त्रियोंको तुरन्त आज्ञा दी—'भृत्यगण!
| श्रीरामचन्द्रजीके राज्याभिषेकके लिये जो-जो सामान
प्राज्ञान् भृत्यान् महीपालान्मन्त्रिणश्च त्वरान्वितः।| मुनियोंने बताये हैं, वे सब एकत्र करके शीघ्र ही आओ।
रामाभिषेकद्रव्याणि ऋषिप्रोक्तानि यानि वै॥ ६ | दूतो और मन्त्रियो ! तुम लोग भी मेरी आज्ञासे सब दिशाओंके
| राजाओंको बुलाकर, उन्हें साथ ले, शीघ्र यहाँ आ जाओ।
तानि भृत्याः समाहृत्य शीघ्रमागन्तुमर्हथ। | पुरवासिजनो ! तुम इस अयोध्यानागरीको उत्तम रीतिसे सजाकर
दूतामात्याः समादेशात्सर्वदिक्षु नराधिपान्॥ ७ | सर्वथा शोभा-सम्पन्न बना दो तथा सर्वत्र नृत्य-गीत आदि
| उत्सवका ऐसा प्रबन्ध करो, जिससे यह नगर समस्त
आहूय तान् समाहृत्य शीघ्रमागन्तुमर्हथ। | पुरवासियोंको आनन्द देनेवाला हो जाय और सम्पूर्ण देशके
अयोध्यापुरमत्यर्थं सर्वशोभासमन्वितम्॥ ८ | निवासियोंको मनोहर प्रतीत होने लगे। तुम सब लोग यह
जनाः कुरुत सर्वत्र नृत्यगीतादिनन्दितम्।
पुरवासिजनानन्दं देशवासिमनःप्रियम्॥ ९
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