संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ
पृष्ठ 46, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 46हे कृष्ण कृष्ण कृष्णेति यो मां स्मरति नित्यशः। | भगवान् कहते हैं—'हे कृष्ण ! कृष्ण ! कृष्ण !'—
अध्याय ८ ] मृत्य और दूतोंको समझाते हुए यमका उन्हें वैष्णवोंके पास जानेसे रोकना ३५
हे कृष्ण कृष्ण कृष्णेति यो मां स्मरति नित्यशः। | भगवान् कहते हैं—'हे कृष्ण ! कृष्ण ! कृष्ण !'—
जलं भित्त्वा यथा पद्मं नरकादुद्धराम्यहम् ॥ २७ | इस प्रकार जो मेरा नित्य स्मरण करता है, उसको मैं
| उसी प्रकार नरकसे निकाल लेता हूँ, जैसे जलको
पुण्डरीकाक्ष देवेश नरसिंह त्रिविक्रम। | भेदकर कमल बाहर निकल आता है। 'पुण्डरीकाक्ष !
त्वामहं शरणं प्राप्त इति यस्तं समुद्धरे ॥ २८ | देवेश्वर नरसिंह ! त्रिविक्रम ! मैं आपकी शरणमें पड़ा
| हूँ'—यों जो कहता है, उसका मैं उद्धार कर देता हूँ।
त्वां प्रपन्नोऽस्मि शरणं देवदेव जनार्दन। | 'देवाधिदेव ! जनार्दन ! मैं आपकी शरणमें आ गया
इति यः शरणं प्राप्तस्तं क्लेशादुद्धराम्यहम् ॥ २९ | हूँ'—इस प्रकार जो मेरा शरणागत होता है, उसे मैं
| क्लेशसे मुक्त कर देता हूँ॥ २७-२९॥
व्यास उवाच | व्यासजी कहते हैं—वत्स ! यमराजके कहे हुए
इत्युदीरितमाकर्ण्य हरिवाक्यं यमेन च। | इस भगद्वाक्यको सुनकर नरकमें पड़े हुए जीव 'कृष्ण !
नारकाः कृष्णकृष्णेति नारसिंहेति चुक्रुशुः ॥ ३० | कृष्ण ! नरसिंह !' इत्यादि भगवन्नामोंका जोरसे उच्चारण
| करने लगे। नारकीय जीव वहाँ ज्यों-ज्यों भगवन्नामका
यथा यथा हरेर्नाम कीर्तयन्त्यत्र नारकाः। | कीर्तन करते थे, त्यों-ही-त्यों भगवद्भक्तिसे युक्त होते
तथा तथा हरेर्भक्तिमुद्वहन्तोऽब्रुवन्निदम् ॥ ३१ | जाते थे। इस तरह भक्तिभावसे पूर्ण हो वे इस प्रकार
| कहने लगे ॥ ३०-३१॥
नारका ऊचुः | नरकस्थ जीव बोले—'ॐ' जिनका नाम कीर्तन
ॐ नमो भगवते तस्मै केशवाय महात्मने। | करनेसे नरककी ज्वाला तत्काल शान्त हो जाती है, उन
यन्नामकीर्तनात् सद्यो नरकाग्निः प्रशाम्यति ॥ ३२ | महात्मा भगवान् केशवको नमस्कार है। जो यज्ञोंके
| ईश्वर, आदिमूर्ति, शान्तस्वरूप और संसारके स्वामी हैं,
भक्तप्रियाय देवाय रक्षाय हरये नमः। | उन भक्तप्रिय, विश्वपालक भगवान् विष्णुको नमस्कार
लोकनाथाय शान्ताय यज्ञेशायादिमूर्तये ॥ ३३ | है। अनन्त, अप्रमेय नरसिंहस्वरूप, शङ्ख-चक्र-गदा धारण
अनन्तायाप्रमेयाय नरसिंहाय ते नमः। | करनेवाले, लोकगुरु आप श्रीनारायणको नमस्कार है।
नारायणाय गुरवे शङ्खचक्रगदाभृते ॥ ३४ | वेदोंके प्रिय, महान् एवं विशिष्ट गतिवाले भगवान्को
| नमस्कार है। तर्कके अविषय, वेदस्वरूप, पृथ्वीको
वेदप्रियाय महते विक्रमाय नमो नमः। | धारण करनेवाले भगवान् वाराहको प्रणाम है। ब्राह्मणकुलमें
वाराहायाप्रतर्क्याय वेदाङ्गाय महीभृते ॥ ३५ | अवतीर्ण, वेद-वेदाङ्गोंके ज्ञाता और अनेक विषयोंका
नमो द्युतिमते नित्यं ब्राह्मणाय नमो नमः। | ज्ञान रखनेवाले कान्तिमान् भगवान् वामनको नमस्कार
वामनाय बहुज्ञाय वेदवेदाङ्गधारिणे ॥ ३६ | है। बलिको बाँधनेवाले, वेदके पालक, देवताओंके
| स्वामी, व्यापक, परमात्मा आप वामनरूपधारी
बलिबन्धनदक्षाय वेदपालाय ते नमः। | विष्णुभगवान्को प्रणाम है। शुद्ध द्रव्यमय, शुद्धस्वरूप
विष्णवे सुरनाथाय व्यापिने परमात्मने ॥ ३७ | भगवान् चतुर्भुजको नमस्कार है। दुष्ट क्षत्रियोंका अन्त
| करनेवाले जमदग्निनन्दन भगवान् परशुरामको प्रणाम है।
चतुर्भुजाय शुद्धाय शुद्धद्रव्याय ते नमः। | रावणका वध करनेवाले आप महात्मा श्रीरामको नमस्कार
जामदग्न्याय रामाय दुष्टक्षत्रान्तकारिणे ॥ ३८ | है। गोविन्द ! आपको बारंबार प्रणाम है। आप इस
रामाय रावणान्ताय नमस्तुभ्यं महात्मने। | दुर्गन्धपूर्ण नरकसे हमारा उद्धार करें ॥ ३२-३९॥
अस्मानुद्धर गोविन्द पूतिगन्धान्नमोऽस्तु ते ॥ ३९ |
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