संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
२९४ | श्रीनरसिंहपुराण | [ अध्याय ५०
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२९४ | श्रीनरसिंहपुराण | [ अध्याय ५०
स्थिता प्रायेण ते देवी सीता दुःखपरायणा। | प्रायः आपके ही वियोग-दुःखमें डूबी रहती हैं। इसलिये
हितमेव च ते राजन्नुदधेर्लङ्घने क्षमम्॥ ९५ | राजन्! इस समय आपके हितकी ही बात बता रहा हूँ,
वायुपुत्रं हनूमन्तं त्वमत्रादेष्टुमर्हसि। | आप इस कार्यके लिये वायुपुत्र हनूमान्जीको आज्ञा दें; क्योंकि ये ही समुद्र लाँघनेमें समर्थ हैं और सुग्रीव ! आपको
त्वं चाप्यर्हसि सुग्रीव प्रेषितुं मारुतात्मजम्॥ ९६ | भी चाहिये कि पवनकुमार हनूमान्जीको ही वहाँ भेजें;
तमृते सागरं गन्तुं वानराणां न विद्यते। | क्योंकि वानरोंमें उनके अतिरिक्त कोई भी ऐसा नहीं है, जो
बलं कस्यापि वा वीर इति मे मनसि स्थितम्॥ ९७ | समुद्रके पार जा सके तथा हे वीर! इनके बराबर किसीका बल भी नहीं है। बस, मेरे मनमें यही विचार है। मेरे
क्रियतां मद्द्वचः क्षिप्रं हितं पथ्यं च नः सदा। | कथनका शीघ्र पालन किया जाय; क्योंकि यह हमारे लिये
उक्ते जाम्बवतैवं तु नीतिस्वल्पाक्षरान्विते॥ ९८ | सदा ही हितकर और लाभकारी होगा' ॥ ८६–९७१/२ ॥
वाक्ये वानरराजोऽसौ शीघ्रमुत्थाय चासनात्। | जाम्बवान्के इस प्रकार थोड़े अक्षरोंमें नीतियुक्त वचन कहनेपर वानरराज सुग्रीव शीघ्र ही अपने आसनसे
वायुपुत्रसमीपं तु तं गत्वा वाक्यमब्रवीत्॥ ९९ | उठे और वायुनन्दन हनूमान्जीके निकट जाकर उनसे बोले- ॥ ९८-९९ ॥
शृणु मद्द्वचनं वीर हनूमन्मारुतात्मज। | "पवनकुमार वीर हनूमान्जी ! तुम मेरी बात सुनो।
अयमिक्ष्वाकुतिलको राजा रामः प्रतापवान्॥ १०० | ये प्रतापी राजा श्रीरामचन्द्रजी इक्ष्वाकुवंशके भूषण हैं।
पितुरादेशमादाय भ्रातृभार्यासमन्वितः। | ये अपने पिताकी आज्ञा मानकर भाई और पत्नीके सहित
प्रविष्टो दण्डकारण्यं साक्षाद्धर्मपरायणः॥ १०१ | दण्डकारण्यमें चले आये थे। सदैव धर्ममें तत्पर रहनेवाले
सर्वात्मा सर्वलोकेशो विष्णुर्मानुषरूपवान्। | ये श्रीराम समस्त लोकोंके ईश्वर और सबके आत्मा
अस्य भार्या हृता तेन दुष्टेनापि दुरात्मना॥ १०२ | साक्षात् भगवान् विष्णु ही हैं। इस समय मनुष्यरूपमें अवतीर्ण हुए हैं। इनकी धर्मपत्नी सीताको दुष्ट दुरात्मा
तद्वियोगजदुःखार्तो विचिन्वंस्तां वने वने। | रावणने हर लिया है। ये प्रतापी वीर राजा उन्हींके
त्वया दृष्टो नृपः पूर्वमयं वीरः प्रतापवान्॥ १०३ | वियोगजन्य दुःखसे पीड़ित हो वन-वनमें उन्हींकी खोज करते हुए आ रहे थे, जबकि तुमने इन्हें पहले-पहल
एतेन सह संगम्य समयं चापि कारितम्। | देखा था। इनके साथ मिलकर हमने प्रतिज्ञा भी की थी।
अनेन निहतः शत्रुमम वालिर्महाबलः॥ १०४ | इन्होंने मेरे शत्रु महाबली वालिका वध किया तथा कपे!
अस्य प्रसादेन कपे राज्यं प्राप्तं मयाधुना। | इन्हींकी कृपासे मैंने इस समय अपना राज्य प्राप्त किया
मया च तत्प्रतिज्ञातमस्य साहाय्यकर्मणि॥ १०५ | है और मैंने भी इनकी सहायताके लिये प्रतिज्ञा की है।
तत्सत्यं कर्तुमिच्छामि त्वद्बलान्मारुतात्मज। | पवननन्दन ! मैं अपनी उस प्रतिज्ञाको तुम्हारे ही बलपर
उत्तीर्य सागरं वीर दृष्ट्वा सीतामनिन्दिताम्॥ १०६ | पूर्ण करना चाहता हूँ। वीर! समुद्रके पार जा पतिव्रता सीताको देखकर पुनः समुद्रके इस पार लौट आनेकी
भूयस्तर्तुं बलं नास्ति वानराणां त्वया विना। | सामर्थ्य तुम्हारे सिवा वानरोंमेंसे किसीमें भी नहीं है।
अतस्त्वमेव जानासि स्वामिकार्यं महामते॥ १०७ | अतः महामते ! तुम्हीं अपने स्वामीके कार्यको ठीक-
बलवान्नीतिमांश्चैव दक्षस्त्वं दौत्यकर्मणि। | ठीक जान सकते हो; क्योंकि तुम बलवान्, नीतिज्ञ और दूतकर्ममें दक्ष हो" ॥ १००–१०७१/२ ॥
तेनैवमुक्तो हनुमान् सुग्रीवेण महात्मना॥ १०८ | महात्मा सुग्रीवके यों कहनेपर हनूमान्जी बोले-
स्वामिनोऽर्थं न किं कुर्यामीदृशं किं नु भाषसे। | 'आप ऐसी बात क्यों कहते हैं? भला, अपने स्वामी
इत्युक्तो वायुपुत्रेण रामस्तं पुरतः स्थितम्॥ १०९ | भगवान् श्रीरामका कार्य क्या मैं नहीं करूँगा?' वायुनन्दनके
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अध्याय ५० ] सुग्रीवसे मैत्री; वालिवध; सुग्रीवका प्रमाद और उसकी भर्त्सना २१५
प्राह वाक्यं महाबाहुर्बाष्पसम्पूर्णलोचनः। इस प्रकार उत्तर देनेपर शत्रुविजयी महाबाहु राम सीताकी
सीतां स्मृत्वा सुदुःखार्तः कालयुक्तममित्रजित् ॥ ११० यादसे अत्यन्त दुःखी हो, आँखोंमें आँसू भरकर, सामने
बैठे हुए हनुमान्जीसे समयोचित वचन बोले—'महामते !
त्वयि भारं समारोप्य समुद्रतरणादिकम्। मैं समुद्रके पार जाने आदिका भार तुम्हारे ही ऊपर
सुग्रीवः स्थाप्यते ह्यत्र मया सार्धं महामते ॥ १११ रखकर सुग्रीवको अपने साथ रखता हूँ। हनूमन् ! तुम
हनूमंस्तत्र गच्छ त्वं मत्प्रीतौ कृतनिश्चयः। मेरी, इन वानर-बन्धुओंकी और विशेषतः सुग्रीवकी
ज्ञातीनां च तथा प्रीतौ सुग्रीवस्य विशेषतः ॥ ११२ प्रसन्नताके लिये दृढ़ निश्चय करके वहाँ (लङ्कामें)
जाओ। महावीर ! प्रायः यही जान पड़ता है कि रावण
प्रायेण रक्षसा नीता भार्या मे जनकात्मजा। नामक राक्षस ही सीताको ले गया है; अतः जहाँ सीता
तत्र गच्छ महावीर यत्र सीता व्यवस्थिता ॥ ११३ रखी गयी हो, वहाँ जाना। यदि वे पूछें कि 'तुम जिनके
यदि पृच्छति सादृश्यं मदाकारमशेषतः। पाससे आते हो, उन श्रीराम और लक्ष्मणका स्वरूप
अतो निरीक्ष्य मां भूयो लक्ष्मणं च ममानुजम् ॥ ११४ कैसा है?' तो इसका उत्तर देनेके लिये तुम मेरे
शरीरको तथा मेरे छोटे भाई लक्ष्मणको भी अच्छी तरह
ज्ञात्वा सर्वाङ्गगं लक्ष्म सकलं चावयोरिह । देख लो। हम दोनोंके शरीरका प्रत्येक चिह्न देखकर
नान्यथा विश्वसेत्सीता इति मे मनसि स्थितम् ॥ ११५ उनसे बताना। नहीं तो सीता तुमपर विश्वास नहीं कर
सकतीं—यह मेरे मनका दृढ़ विचार है' ॥ १०८–११५॥
इत्युक्तो रामदेवेन प्रभञ्जनसुतो बली। भगवान् श्रीरामके यों कहनेपर महाबली वायुनन्दन
उत्थाय तत्पुरः स्थित्वा कृताञ्जलिरुवाच तम् ॥ ११६ हनुमान् उठकर उनके सामने खड़े हो गये और हाथ
जोड़कर उनसे बोले—'मैं आप दोनोंके सब लक्षण
जानामि लक्षणं सर्वं युवयोस्तु विशेषतः । विशेषरूपसे जानता हूँ; अब मैं वानरोंके साथ जा रहा हूँ,
गच्छामि कपिभिः सार्धं त्वं शोकं मा कुरुष्व वै ॥ ११७ आप खेद न करें। कमललोचन राजन् ! इसके अतिरिक्त
अन्यच्च देह्यभिज्ञानं विश्वासो येन मे भवेत् । आप मुझे कोई पहचानकी वस्तु दीजिये, जिससे आपकी
सीतायास्तव देव्यास्तु राजन् राजीवलोचन ॥ ११८ महारानी सीताका मुझपर विश्वास हो ॥ ११६–११८॥
इत्युक्तो वायुपुत्रेण रामः कमललोचनः । वायुनन्दन हनुमान्के इस प्रकार अनुरोध करनेपर
कमलनयन श्रीरामने अपनी अँगूठी निकालकर दे दी,
अङ्गुलीयकमुन्मुच्य दत्तवान् रामचिह्नितम् ॥ ११९ जिसपर 'राम' नाम खुदा हुआ था। उसे लेकर पवनकुमार
तद्गृहीत्वा तदा सोऽपि हनूमान्मारुतात्मजः। हनूमान्ने भी श्रीराम, लक्ष्मण और वानरराज सुग्रीवकी
रामं प्रदक्षिणीकृत्य लक्ष्मणं च कपीश्वरम् ॥ १२० परिक्रमा की। फिर उन्हें प्रणामकर वे अञ्जनीनन्दन हनूमान्
नत्वा ततो जगामाशु हनूमानञ्जनीसुतः । वहाँसे शीघ्रतापूर्वक चले। तब सुग्रीव भी अपने आज्ञाकारी
सुग्रीवोऽपि च ताञ्छ्रुत्वा वानरान् गन्तुमुद्यतान् ॥ १२१ एवं बलाभिमानी वानरोंके विषयमें यह जानकर कि वे
आज्ञेयानाज्ञापयति वानरान् बलदर्पितान् । जानेके लिये उद्यत हैं, उन्हें आदेश देते हुए बोले—'सभी
वानर इस समय मेरी आज्ञा सुन लें—तुम पर्वतों और
शृण्वन्तु वानराः सर्वे शासनं मम भाषितम् ॥ १२२ वनोंमें विलम मत जाना। शीघ्र जाकर महाभागा रामपत्नी
विलम्बनं न कर्तव्यं युष्माभिः पर्वतादिषु । पतिव्रता सीताका पता लगाकर लौट आना; मैं श्रीरामचन्द्रजी-
द्रुतं गत्वा तु तां वीक्ष्य आगन्तव्यमनिन्दिताम् ॥ १२३ के पास ठहरता हूँ। यदि तुम मेरी आज्ञाके विपरीत चलोगे
रामपत्नीं महाभागां स्थास्येऽहं रामसंनिधौ । तो मैं तुम्हारी नाक और कान काट लूँगा' ॥ ११९–१२४॥
कर्तनं वा करिष्यामि अन्यथा कर्णनास्योः ॥ १२४
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