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सर्वकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 226, कुल 318 में से

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पृष्ठ 226

अध्याय ५० ] सुग्रीवसे मैत्री; वालिवध; सुग्रीवका प्रमाद और उसकी भर्त्सना २१५
प्राह वाक्यं महाबाहुर्बाष्पसम्पूर्णलोचनः। इस प्रकार उत्तर देनेपर शत्रुविजयी महाबाहु राम सीताकी
सीतां स्मृत्वा सुदुःखार्तः कालयुक्तममित्रजित् ॥ ११० यादसे अत्यन्त दुःखी हो, आँखोंमें आँसू भरकर, सामने
बैठे हुए हनुमान्‌जीसे समयोचित वचन बोले—'महामते !
त्वयि भारं समारोप्य समुद्रतरणादिकम्। मैं समुद्रके पार जाने आदिका भार तुम्हारे ही ऊपर
सुग्रीवः स्थाप्यते ह्यत्र मया सार्धं महामते ॥ १११ रखकर सुग्रीवको अपने साथ रखता हूँ। हनूमन् ! तुम
हनूमंस्तत्र गच्छ त्वं मत्प्रीतौ कृतनिश्चयः। मेरी, इन वानर-बन्धुओंकी और विशेषतः सुग्रीवकी
ज्ञातीनां च तथा प्रीतौ सुग्रीवस्य विशेषतः ॥ ११२ प्रसन्नताके लिये दृढ़ निश्चय करके वहाँ (लङ्कामें)
जाओ। महावीर ! प्रायः यही जान पड़ता है कि रावण
प्रायेण रक्षसा नीता भार्या मे जनकात्मजा। नामक राक्षस ही सीताको ले गया है; अतः जहाँ सीता
तत्र गच्छ महावीर यत्र सीता व्यवस्थिता ॥ ११३ रखी गयी हो, वहाँ जाना। यदि वे पूछें कि 'तुम जिनके
यदि पृच्छति सादृश्यं मदाकारमशेषतः। पाससे आते हो, उन श्रीराम और लक्ष्मणका स्वरूप
अतो निरीक्ष्य मां भूयो लक्ष्मणं च ममानुजम् ॥ ११४ कैसा है?' तो इसका उत्तर देनेके लिये तुम मेरे
शरीरको तथा मेरे छोटे भाई लक्ष्मणको भी अच्छी तरह
ज्ञात्वा सर्वाङ्गगं लक्ष्म सकलं चावयोरिह । देख लो। हम दोनोंके शरीरका प्रत्येक चिह्न देखकर
नान्यथा विश्वसेत्सीता इति मे मनसि स्थितम् ॥ ११५ उनसे बताना। नहीं तो सीता तुमपर विश्वास नहीं कर
सकतीं—यह मेरे मनका दृढ़ विचार है' ॥ १०८–११५॥
इत्युक्तो रामदेवेन प्रभञ्जनसुतो बली। भगवान् श्रीरामके यों कहनेपर महाबली वायुनन्दन
उत्थाय तत्पुरः स्थित्वा कृताञ्जलिरुवाच तम् ॥ ११६ हनुमान् उठकर उनके सामने खड़े हो गये और हाथ
जोड़कर उनसे बोले—'मैं आप दोनोंके सब लक्षण
जानामि लक्षणं सर्वं युवयोस्तु विशेषतः । विशेषरूपसे जानता हूँ; अब मैं वानरोंके साथ जा रहा हूँ,
गच्छामि कपिभिः सार्धं त्वं शोकं मा कुरुष्व वै ॥ ११७ आप खेद न करें। कमललोचन राजन् ! इसके अतिरिक्त
अन्यच्च देह्यभिज्ञानं विश्वासो येन मे भवेत् । आप मुझे कोई पहचानकी वस्तु दीजिये, जिससे आपकी
सीतायास्तव देव्यास्तु राजन् राजीवलोचन ॥ ११८ महारानी सीताका मुझपर विश्वास हो ॥ ११६–११८॥
इत्युक्तो वायुपुत्रेण रामः कमललोचनः । वायुनन्दन हनुमान्‌के इस प्रकार अनुरोध करनेपर
कमलनयन श्रीरामने अपनी अँगूठी निकालकर दे दी,
अङ्गुलीयकमुन्मुच्य दत्तवान् रामचिह्नितम् ॥ ११९ जिसपर 'राम' नाम खुदा हुआ था। उसे लेकर पवनकुमार
तद्गृहीत्वा तदा सोऽपि हनूमान्मारुतात्मजः। हनूमान्‌ने भी श्रीराम, लक्ष्मण और वानरराज सुग्रीवकी
रामं प्रदक्षिणीकृत्य लक्ष्मणं च कपीश्वरम् ॥ १२० परिक्रमा की। फिर उन्हें प्रणामकर वे अञ्जनीनन्दन हनूमान्
नत्वा ततो जगामाशु हनूमानञ्जनीसुतः । वहाँसे शीघ्रतापूर्वक चले। तब सुग्रीव भी अपने आज्ञाकारी
सुग्रीवोऽपि च ताञ्छ्रुत्वा वानरान् गन्तुमुद्यतान् ॥ १२१ एवं बलाभिमानी वानरोंके विषयमें यह जानकर कि वे
आज्ञेयानाज्ञापयति वानरान् बलदर्पितान् । जानेके लिये उद्यत हैं, उन्हें आदेश देते हुए बोले—'सभी
वानर इस समय मेरी आज्ञा सुन लें—तुम पर्वतों और
शृण्वन्तु वानराः सर्वे शासनं मम भाषितम् ॥ १२२ वनोंमें विलम मत जाना। शीघ्र जाकर महाभागा रामपत्नी
विलम्बनं न कर्तव्यं युष्माभिः पर्वतादिषु । पतिव्रता सीताका पता लगाकर लौट आना; मैं श्रीरामचन्द्रजी-
द्रुतं गत्वा तु तां वीक्ष्य आगन्तव्यमनिन्दिताम् ॥ १२३ के पास ठहरता हूँ। यदि तुम मेरी आज्ञाके विपरीत चलोगे
रामपत्नीं महाभागां स्थास्येऽहं रामसंनिधौ । तो मैं तुम्हारी नाक और कान काट लूँगा' ॥ ११९–१२४॥
कर्तनं वा करिष्यामि अन्यथा कर्णनास्योः ॥ १२४

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