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संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

श्रीराम-लक्ष्मणका संक्षिप्त चरित्र तथा लक्ष्मणाचलका माहात्म्य

  • उत्तरभाग * | ७५१
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उन गोकर्णनाथ महादेवके दर्शनसे सारे पाप मनुष्यको तत्काल छोड़कर चले जाते हैं। जिसके स्मरण करनेमात्रसे मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है, वह गोकर्ण नामक क्षेत्र सब तीर्थोंका निकेतन है। जो वहाँ काम-क्रोधादि दोषोंसे रहित होकर निवास करते हैं, वे थोड़े ही समयमें सिद्धि प्राप्त कर लेते हैं। सती मोहिनी! उस तीर्थमें किये हुए दान, होम, जप, श्राद्ध, देवपूजन तथा ब्राह्मण-समादर आदि कर्म अन्य तीर्थोंकी अपेक्षा कोटिगुने होकर फल देते हैं।


श्रीराम-लक्ष्मणका संक्षिप्त चरित्र तथा लक्ष्मणाचलका माहात्म्य

**मोहिनी बोली—**पुरोहितजी! गोकर्णतीर्थका पापनाशक माहात्म्य मैंने सुना; अब लक्ष्मणतीर्थका माहात्म्य बतानेकी कृपा करें।

**पुरोहित वसुने कहा—**प्राचीन कालकी बात है, ब्रह्मा आदि देवताओंके प्रार्थना करनेपर साक्षात् लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु ही राजा दशरथसे चार स्वरूपोंमें प्रकट हुए। वे ही राम-लक्ष्मण आदि नामोंसे प्रसिद्ध हुए। देवि! तत्पश्चात् कुछ कालके अनन्तर मुनीश्वर विश्वामित्र अयोध्यामें आये। उन्होंने अपने यज्ञकी रक्षाके लिये श्रीराम और लक्ष्मणको राजासे माँगा। तब राजा दशरथने मुनिके शापसे डरकर अपने प्राणोंसे भी प्रिय पुत्र श्रीराम और लक्ष्मणको उन्हें सौंप दिया। तब वे दोनों भाई मुनीश्वर विश्वामित्रके यज्ञमें जाकर उसकी रक्षा करने लगे। श्रीरामने ताड़कासहित सुबाहुको मारकर मारीचको मानवास्त्रसे दूर फेंक दिया; फिर मुनिने उनका बड़ा सत्कार किया। तदनन्तर विश्वामित्रजी उन्हें राजा विदेहके नगरमें ले गये। वहाँ महाराज जनकने विश्वामित्रजीका भलीभाँति सत्कार करके उनसे पूछा—'महर्षे! ये दोनों बालक किस क्षत्रिय-कुल-नरेशके पुत्र हैं?' तब मुनिवर विश्वामित्रने राजा जनकको यह बताया कि 'ये दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण महाराज दशरथके पुत्र हैं।' यह सुनकर विदेहराज जनक बड़े प्रसन्न हुए। फिर महर्षि विश्वामित्र जनकसे बोले—'इन्हें वह धनुष दिखाओ जो महादेवजीकी धरोहर है और सीताके स्वयंवरके लिये तोड़नेकी शर्तके साथ रखा गया है।' विश्वामित्रजीका यह वचन सुनकर राजा जनकने तत्काल तीन सौ सेवकोंद्वारा उस धनुषको मँगवाकर आदरपूर्वक उन्हें दिखाया। श्रीरामने महादेवजीके उस धनुषको उसी क्षण बायें हाथसे उठा लिया और उसपर प्रत्यञ्चा चढ़ाकर खींचते हुए सहसा उसे तोड़ डाला। इससे मिथिला-नरेशको बड़ी

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प्रसन्नता हुई। उन्होंने श्रीराम और लक्ष्मणकी पूजा करके उन्हें वैदिक विधिके अनुसार अपनी दोनों कन्याएँ दे दीं। मुनिवर विश्वामित्रसे यह जानकर कि राजा दशरथके दो पुत्र और हैं, जनकने उन पुत्रोंके साथ महाराजको बुलवाया और अपने भाईकी दो पुत्रियोंका उन दोनों भाइयोंके साथ ब्याह कर दिया। तदनन्तर मिथिलानरेशके द्वारा भलीभाँति सम्मानित हो मुनिकी आज्ञा ले अपने चारों विवाहित पुत्रोंके साथ महाराज दशरथ अयोध्यापुरीके लिये प्रस्थित हुए। मार्गमें श्रीरामचन्द्रजीने भृगुपति परशुरामजीके गर्वको शान्त किया और पिता तथा भाइयोंके साथ वे बहुत वर्षोंतक आनन्दपूर्वक रहे।

तदनन्तर राजा दशरथ यह देखकर कि मेरे पुत्र श्रीराम जाननेयोग्य सभी तत्त्वोंको जान चुके हैं, उन्हें प्रसन्नतापूर्वक युवराजपदपर अभिषिक्त करनेके लिये उद्यत हुए। यह जानकर राजाकी सबसे अधिक प्रियतमा छोटी रानी कैकेयीने हठपूर्वक रामके राज्याभिषेकको रोका और अपने पुत्र भरतके लिये उस अभिषेकको पसंद किया। शुभे! तब माता कैकेयीकी प्रसन्नताके लिये पिताकी आज्ञा ले, श्रीरामचन्द्रजी अपनी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मणके साथ चित्रकूट पर्वतपर चले गये और वहीं मुनिवेष धारण करके उन्होंने कुछ कालतक निवास किया।

इधर भरतजी पिताके मरनेका समाचार सुनकर अपने नानाके घरसे अयोध्या आये। यहाँ उन्हें मालूम हुआ कि पिताजी 'हा राम ! हा राम !'-की रट लगाते हुए परलोकवासी हुए हैं; तब भरतजीने कैकेयीको धिक्कार देकर श्रीरामचन्द्रजीको लौटा लानेके लिये वनको प्रस्थान किया; किंतु वहाँसे श्रीरामने भरतको अपनी चरण-पादुका देकर अयोध्या लौटा दिया। श्रीराम क्रमशः अत्रि, सुतीक्ष्ण तथा अगस्त्यके आश्रमोंपर गये। इन सब स्थानोंमें बारह वर्ष बिताकर श्रीरघुनाथजी भाई और पत्नीके साथ पञ्चवटीमें गये और वहाँ रहने लगे। जनस्थानमें शूर्पणखा नामकी राक्षसी रहती थी। श्रीरामकी प्रेरणासे लक्ष्मणने उसकी नाक काटकर उसे विकृत बना दिया। तब उस राक्षसीसे प्रेरित होकर युद्धके लिये आये हुए चौदह हजार राक्षसोंसहित खर, दूषण और त्रिशिराको श्रीरामचन्द्रजीने नष्ट कर दिया। यह समाचार सुनकर राक्षसोंका राजा रावण वहाँ आया। उसने मारीचको सुवर्णमय मृगके रूपमें दिखाकर उसके पीछे दोनों भाइयोंको आश्रमसे दूर हटा दिया और सीताको हर लिया। उस समय जटायुने उसका मार्ग रोका, परंतु रावण उसे मारकर सीताको लंकामें ले गया। दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण जब लौटकर आश्रमपर आये तो सीताका हरण हो चुका था। अब वे सब ओर उनकी खोज करने लगे। मार्गमें जटायुको गिरा देख उसके मरनेपर दोनों भाइयोंने उसका दाह-संस्कार किया। फिर कबन्धको मारकर शबरीपर कृपा की। वहाँसे ऋष्यमूक पर्वतपर आये। तत्पश्चात् हनुमान्‌जीके कहनेसे अपने मित्र वानरराज सुग्रीवके शत्रु बालिका वध करके श्रीरामने सुग्रीवको