संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पूर्वभाग-द्वितीय पाद
- पूर्वभाग-द्वितीय पाद *
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छन्दसि' इस सूत्रसे 'स' का मूर्धन्य हुआ है। 'नृमणाः' इस पदमें 'छन्दस्युदवग्रहात्' सूत्रसे 'न' का 'ण' हुआ है। बाहुलक चार प्रकारके होते हैं—कहीं प्रवृत्ति होती है, कहीं अप्रवृत्ति होती है, कहीं वैकल्पिक विधि है और कहीं अन्यथाभाव होता है। इस प्रकार सम्पूर्ण वैदिक पद-समुदाय सिद्ध है। क्रियावाची 'भू' 'वा' आदि शब्दोंकी 'धातु' संज्ञा जाननी चाहिये। 'भू' आदि धातु परस्मैपदी माने गये हैं॥ १८-१९॥ 'एध' आदि छत्तीस धातु उदात्त एवं आत्मनेपदी हैं (इन्हें 'अनुदात्तेत्' माना गया है)। मुने! 'अत' आदि सैंतीस धातु परस्मैपदी हैं॥ २०॥ शी-कृ आदि बयालीस धातु आत्मनेपदमें परिगणित हुए हैं। फक्क आदि पचास धातु उदात्तेत् (परस्मैपदी) कहे गये हैं॥ २१॥ वर्च आदि इक्कीस धातु अनुदात्तेत् (आत्मनेपदी) बताये गये हैं। 'गुप्' आदि बयालीस धातु 'उदात्तेत्' (परस्मैपदी) कहे गये हैं॥ २२॥ 'घिणि' आदि दस धातु शाब्दिकोंद्वारा 'अनुदात्तेत्' कहे गये हैं। 'अण्' आदि सत्ताईस धातु 'उदात्तेत्' बताये गये हैं॥ २३॥ 'अय' आदि चौंतीस धातु वैयाकरणोंद्वारा अनुदात्तेत् (आत्मनेपदी) माने गये हैं। 'मव्य' आदि बहत्तर धातु उदात्तानुबन्धी कहे गये हैं॥ २४॥ 'धावु' धातु अकेला ही 'स्वरितेत्' कहा गया है। 'क्षुध्' आदि बावन धातु 'अनुदात्तेत्' कहे गये हैं॥ २५॥ 'घुषिर्' आदि अठासी धातु 'उदात्तेत्' माने गये हैं। 'द्युत' आदि बाईस धातु 'अनुदात्तेत्' स्वीकार किये गये हैं॥ २६॥ घटादिमें तेरह धातु 'षित्' और 'अनुदात्तेत्' कहे गये हैं। तदनन्तर 'ज्वर' आदि बावन धातु उदात्त बताये गये हैं॥ २७॥ 'राजू' धातु 'स्वरितेत्' है। उसके बाद 'भ्राजू' भ्राशू और भ्लाशू'—ये तीन धातु 'अनुदात्तेत्' कहे गये हैं। तदनन्तर 'स्यमु' धातुसे लेकरं आगे सभी आद्युदात्त एवं उदात्तेत् (परस्मैपदी) हैं॥ २८॥ फिर एकमात्र 'षह' धातु 'अनुदात्तेत्' तथा अकेला 'रम' धातु 'आत्मनेपदी' है। उसके बाद 'सद' आदि तीन धातु 'उदात्तेत्' हैं। फिर 'कुच' आदि चार धातु भी 'उदात्तेत्' (परस्मैपदी) ही हैं॥ २९॥ इसके बाद 'हिक्क' आदि पैंतीस धातु 'स्वरितेत्' हैं। 'श्रिय्' धातु स्वरितेत् है। 'भृञ्' आदि चार धातु भी स्वरितेत् ही हैं॥ ३०॥ 'धेट्' आदि छियालीस धातु परस्मैपदी कहे गये हैं। 'स्मिङ्' आदि अठारह धातु आत्मनेपदी माने गये हैं॥ ३१॥ फिर 'पूङ्' आदि तीन धातु अनुदात्तेत् कहे गये हैं। 'ह्व' धातु परस्मैपदी है। फिर 'गुप'से लेकर तीन धातु आत्मनेपदी हैं॥ ३२॥ 'रम' आदि धातु अनुदात्तेत् हैं और 'जिक्ष्विदा' उदात्तेत् है। स्कम्भु आदि पंद्रह धातु परस्मैपदी हैं॥ ३३॥ 'कित' धातु 'उदात्तेत्' है। 'दान' 'शान'—ये दो धातु उभयपदी हैं। 'पच' आदि नौ धातु स्वरितेत् (उभयपदी) हैं। वे परस्मैपदी (और आत्मनेपदी दोनों) माने गये हैं॥ ३४॥ फिर तीन स्वरितेत् धातु हैं। परिभाषणार्थक 'वद' और 'वच' धातु परस्मैपदी हैं। ये एक हजार छः धातु भ्वादि कहे गये हैं॥ ३५॥
'अद' और 'हन्' धातु परस्मैपदी कहे गये हैं। 'द्विष' आदि चार धातु स्वरितेत् माने गये हैं॥ ३६॥ यहाँ केवल 'चक्षिङ्' धातु आत्मनेपदी कहा गया है। फिर 'ईर' आदि तेरह धातु अनुदात्तेत् हैं॥ ३७॥ मुने! वैयाकरणोंने 'षूङ्' और 'शीङ्'—इन दो धातुओंको आत्मनेपदी कहा है। फिर 'षु' आदि सात धातु परस्मैपदी बताये गये हैं॥ ३८॥ मुनीश्वर! यहाँ एक 'ऊर्णुञ्' धातु स्वरितेत् कहा गया है। 'द्यु' आदि तीन धातु परस्मैपदी बताये गये हैं॥ ३९॥ नारद! केवल 'ष्टुञ्' धातुको शाब्दिकोंने उभयपदी कहा है॥ ४०॥ 'रा' आदि अठारह धातु परस्मैपदी माने गये हैं। नारद! फिर केवल 'इङ्' धातु आत्मनेपदी कहा गया है॥ ४१॥ उसके बाद 'विद' आदि चार धातु परस्मैपदी माने गये हैं। 'जिष्वप् शये' यह धातु परस्मैपदी कहा गया है॥ ४२॥ मुने! 'श्वस'
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आदि धातु मैंने तुम्हें परस्मैपदी कहे हैं। 'दीधीङ्' और 'वेवीङ्'—ये दो धातु आत्मनेपदी माने गये हैं॥ ४३॥ 'षस' आदि तीन धातु 'उदात्तेत्' हैं। मुनिश्रेष्ठ! 'चर्करीतं च' यह यङ्लुगन्तका प्रतीक है। यह अदादि माना गया है। 'हृङ्' धातु अनुदात्तेत् कहा गया है॥ ४४॥ इस प्रकार अदादि गणमें तिहत्तर धातु बताये गये हैं।
'हु' आदि चार धातु (हु, भी, ह्री और पृ) परस्मैपदी माने गये हैं॥ ४५॥ 'भृञ्' धातु स्वरितेत् और 'ओहाक्' धातु उदात्तेत् है। 'माङ्' और 'ओहाङ्'—ये दोनों धातु अनुदात्तेत् हैं। दानार्थक 'दा' और धारणार्थक 'धा'—इनमें स्वरितकी इत्संज्ञा हुई है॥ ४६॥ 'णिजिर्' आदि तीन धातु स्वरितेत् कहे गये हैं। 'घृ' आदि बारह धातु परस्मैपदी माने गये हैं॥ ४७॥ इस प्रकार ह्वादि (जुहोत्यादि) गणमें बाईस धातु कहे गये हैं।
'दिव्' आदि पचीस धातु परस्मैपदी कहे गये हैं॥ ४८॥ नारद! 'षूङ्' आदि 'दूङ्'—ये आत्मनेपदी हैं। 'षूङ्' आदि सात धातु ओदित् और आत्मनेपदी माने गये हैं॥ ४९॥ विप्रवर! 'लीङ्' आदि धातु यहाँ आत्मनेपदी बताये गये हैं। श्यति (शो) आदि चार धातु परस्मैपदी हैं॥ ५०॥ मुने! 'जनी' आदि पंद्रह धातु आत्मनेपदी हैं। 'मृष' आदि पाँच धातु 'स्वरितेत्' कहे गये हैं॥ ५१॥ 'पद' आदि ग्यारह धातु आत्मनेपदी हैं। यहाँ वृद्धि-अर्थमें ही अकर्मक 'राध' धातुका ग्रहण है। यह स्वादि और चुरादिगणमें भी पढ़ा गया है॥ ५२॥ राध आदि तेरह धातु उदात्तेत् कहे गये हैं। तत्पश्चात् रध आदि आठ धातु परस्मैपदी बताये गये हैं॥ ५३॥ शम आदि छियालीस धातु उदात्तेत् कहे गये हैं। इस प्रकार दिवादिमें एक सौ चालीस धातु माने गये हैं॥ ५४॥
'सु' आदि नौ धातु स्वरितेत् कहे गये हैं। मुने! 'दु' आदि सात धातु परस्मैपदी बताये गये हैं॥ ५५॥ 'अश' और 'ष्टिष' ये दो धातु अनुदात्तेत् कहे गये हैं। यहाँ 'तिक' आदि चौदह धातुओंको परस्मैपदी माना गया है॥ ५६॥ विप्रवर! स्वादिगणमें कुल बत्तीस धातु बताये गये हैं।
मुनिश्रेष्ठ! 'तुद' आदि छः स्वरितेत् हैं॥ ५७॥ 'ऋषी' धातु उदात्तेत् है और 'जुषी' आदि चार धातु आत्मनेपदी हैं। 'व्रश्च' आदि एक सौ पाँच धातु उदात्तेत् कहे गये हैं॥ ५८॥ मुनीश्वर! यहाँ केवल 'गुरी' धातु अनुदात्तेत् बताया गया है। 'णू' आदि चार धातु परस्मैपदी माने गये हैं॥ ५९॥ 'कुङ्' धातुको 'अनुदात्तेत्' कहा गया है। यहीं कुतादिगणकी पूर्ति हुई है। 'पृङ्' और 'मृङ्'—ये आत्मनेपदी धातु हैं। 'रि' और 'पि' से छः धातुतक परस्मैपदमें गिने गये हैं॥ ६०॥ 'दृङ्', 'धृङ्'—ये दो धातु आत्मनेपदी कहे गये हैं। मुने! 'प्रच्छ' आदि सोलह धातु परस्मैपदी बताये गये हैं॥ ६१॥ मुने! फिर 'मिल' आदि छः धातु स्वरितेत् कहे गये हैं। इसके बाद 'कृती' आदि तीन धातु परस्मैपदी हैं॥ ६२॥ इस प्रकार तुदादिमें एक सौ सत्तावन धातु हैं।
'रुध' आदि नौ धातु स्वरितेत् हैं। 'कृती' धातु परस्मैपदी है। 'जिइन्धी'से तीन धातुतक अनुदात्तेत् कहे गये हैं। तत्पश्चात् 'शिष पिष' आदि बारह धातु उदात्तेत् हैं। इस प्रकार रुधादि-गणमें कुल पचीस धातु हैं॥ ६३-६४॥
'तनु' धातुसे लेकर सात धातु 'स्वरितेत्' कहे गये हैं। 'मनु' और 'वनु'—ये दोनों आत्मनेपदी हैं। 'कृञ्' धातु स्वरितेत् कहा गया है॥ ६५॥ विप्रवर! इस प्रकार वैयाकरणोंने तनादिगणमें दस धातुओंकी गणना की है।
'क्री' आदि सात धातु उभयपदी हैं। मुनीश्वर! 'स्तम्भु' आदि चार सौत्र (सूत्रोक्त) धातु परस्मैपदी कहे गये हैं। 'क्रूञ्' आदि बाईस धातु उदात्तेत् कहे गये हैं॥ ६६-६७॥ 'वृङ्' धातु आत्मनेपदी है। 'श्रन्थ' आदि इक्कीस धातु परस्मैपदी हैं और 'ग्रह' धातु स्वरितेत् है॥ ६८॥ इस प्रकार विद्वानोंने क्र्यादिगणमें बावन धातु गिनाये हैं।
चुर आदि एक सौ छत्तीस धातु जित्
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(उभयपदी) माने गये हैं॥ ६९॥ मुने! चित आदि अठारह (या अड़तीस?) आत्मनेपदी माने गये हैं। 'चर्च' से लेकर 'धृष' धातुतक 'जित्' (उभयपदी) कहे गये हैं॥ ७०॥ इसके बाद अड़तालीस अदन्त धातु भी उभयपदी ही हैं। 'पद' आदि दस धातु आत्मनेपदमें परिगणित हुए हैं॥ ७१॥ यहाँ सूत्र आदि आठ धातुओंको भी मनीषी पुरुषोंने उभयपदी कहा है। प्रातिपदिकसे धात्वर्थमें णिच् और प्रायः सब बातें इष्ठ प्रत्ययकी भाँति होती हैं। तात्पर्य यह कि 'इष्ठ' प्रत्यय परे रहते जैसे प्रातिपदिक, पुंवद्भाव, रभाव, टिलोप, विन्मतुब्लोप, यणादिलोप, प्र, स्थ, स्फ आदि आदेश और भसंज्ञा आदि कार्य होते हैं, उसी प्रकार 'णि' परे रहते भी सब कार्य होंगे॥ ७२॥ 'उसे करता है, अथवा उसे कहता है' इस अर्थमें भी प्रातिपदिकसे णिच् प्रत्यय होता है। प्रयोजक व्यापारमें प्रेषण आदि वाच्य हों तो धातुसे णिच् होता है। कर्तृ-व्यापारके लिये जो करण है, उससे धात्वर्थमें णिच् होता है। चित्र आदि आठ धातु उदात्तेत् हैं। किंतु 'संग्राम' धातुको शब्दशास्त्रके विद्वानोंने अनुदात्तेत् माना है। स्तोभ आदि सोलह धातु अदन्त धातुओंके निदर्शन हैं॥ ७३-७४॥ 'बहुलमेतन्निदर्शनम्'—इसमें जो बहुल शब्द आया है, उससे अन्य जो सूत्रोक्त लौकिक और वैदिक धातु हैं, उन सबका ग्रहण होता है। सभी धातु सब गणोंमें हैं और सबके अनेक अर्थ हैं॥ ७५॥ इन धातुओंके अतिरिक्त सनादि* प्रत्यय जिनके अन्तमें हों, उनकी भी धातु-संज्ञा होती है। नामधातु भी धातु ही हैं। नारद! इस प्रकार अनन्त धातुओंकी उद्भावना हो सकती है। यहाँ संक्षेपसे सब कुछ बताया गया है। इसका विस्तार तत्सम्बन्धी ग्रन्थोंमें है॥ ७६॥
(उपदेशावस्थामें एकाच् अनुदात्त धातुसे परे वलादि आर्धधातुकको इट्का आगम नहीं होता। जिनमें यह निषेध लागू होता है, उन धातुओंको 'अनिट्' कहते हैं। उन्हीं अनिट् या एकाच् अनुदात्त धातुओंका यहाँ संग्रह किया जाता है—) अजन्त धातुओंमें—ऊकारान्त, ऋकारान्त, यु, रु, क्ष्णु, शीङ्, स्रु, नु, क्षु, श्वि, डीङ्, श्रिञ्, वृङ्, वृञ्—इन सबको छोड़कर शेष सभी अनुदात्त (अर्थात् अनिट्) माने गये हैं॥ ७७॥ शक्ल्, पच्, मुच्, रिच्, वच्, विच्, सिच्, प्रच्छ्, त्यज्, निजिर्, भज्, भञ्ज्, भुज्, भ्रस्ज्, मस्ज्, यज्, युज्, रुज्, रञ्ज्, विजिर्, स्वञ्ज्, सञ्ज्, सृज्॥ ७८॥ अद्, क्षुद्, खिद्, छिद्, तुद्, नुद्, पद्, भिद्, विद् (सत्ता), विद् (विचारणे), शद्, सद्, स्विद्, स्कन्द्, हद्, क्रुध्, क्षुध्, बुध्॥ ७९॥ बन्ध्, युध्, रुध्, राध्, व्यध्, शुध्, साध्, सिध्, मन् (दिवादि), हन्, आप्, क्षिप्, क्षुप्, तप्, तिप्, स्तृप्, दृप्॥ ८०॥ लिप्, लुप्, वप्, शप्, स्वप्, सृप्, यभ्, रभ्, लभ्, गम्, नम्, यम्, रम्, क्रुश्, दंश्, दिश्, दृश्, मृश्, रिश्, रुश्, लिश, विश्, स्पृश्, कृष्॥ ८१॥ त्विष्, तुष्, द्विष्, दुष्, पुष्, पिष्, विष्, शिष्, शुष्, श्लिष्, घस्, वस्, दह, दिह, दुह, नह, मिह्, रुह्, लिह तथा वह॥ ८२॥ ये हलन्तोंमें एक सौ दो धातु अनुदात्त माने गये हैं। 'च' आदिकी निपात संज्ञा होती है। 'प्र' आदि उपसर्ग 'गति' कहलाते हैं। भिन्न-भिन्न दिशा, देश और कालमें प्रकट हुए शब्द अनेक अर्थोंके बोधक होते हैं। विप्रवर! वे देश-कालके भेदसे सभी लिङ्गोंमें प्रयुक्त होते हैं। यहाँ गणपाठ, सूत्रपाठ, धातुपाठ तथा अनुनासिकपाठ— 'पारायण' कहा गया है। नारद! वैदिक और लौकिक सभी शब्द नित्यसिद्ध हैं॥ ८३—८५॥ फिर वैयाकरणोंद्वारा जो शब्दोंका संग्रह किया जाता है, उसमें उन शब्दोंका पारायण ही मुख्य
* सन्, क्यच्, काम्यच्, क्यङ्, क्यष्, आचारक्विप्, णिच्, यङ्, यक्, आय, ईयङ्, णिङ्—ये बारह प्रत्यय सनादि कहलाते हैं।