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संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

\ पूर्वभाग-द्वितीय पाद

* पूर्वभाग-द्वितीय पाद *
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(बोलनेमें बहादुर)। वाक्+हरिः=वाग्घरिः^१ (वाणीरूप भगवान्) ॥२९॥

हरिशेते विभुश्चिन्त्यस्तच्छेषो यच्चरस्तथा।
प्रश्नस्त्वथ हरिष्षष्ठः कृष्णाष्टीकत इत्यपि ॥३०॥

हरिस्+शेते=हरिशेते^२ (श्रीहरि शयन करते हैं)। विभुस्+चिन्त्यः=विभुश्चिन्त्यः^३ (सर्वव्यापी परमेश्वर चिन्तन करने योग्य हैं)। तत्+शेषः=तच्छेषः^४ (उसका शेष)। यत्+चरः=यच्चरः^५ (जिसमें चलनेवाला)। प्रश्+नः=प्रश्नः^६ (सवाल)। हरिस्+षष्ठः=हरिष्षष्ठः^७ (श्रीहरि छठे हैं) तथा कृष्णः+टीकते=कृष्णाष्टीकते^८ (श्रीकृष्ण जाते हैं) इत्यादि ॥३०॥

भवान्षष्ठश्च षट् सन्तः षट् ते तल्लेप एव च।
चक्रिंश्छिन्धि भवाञ्छौरिर्भवाञ्शौरिरिहेत्यपि ॥३१॥

भवान्+षष्ठः (आप छठे हैं)। इसमें पूर्व नियमके अनुसार प्राप्त होनेपर तवर्गका टवर्ग नहीं होता^९। इसी तरह षट् सन्तः (छः सत्पुरुष) और षट् ते (वे छः हैं) इत्यादिमें भी ष्टुत्व नहीं हुआ है^{१०}। तत्+लेपः=तल्लेपः^{११} (उसका लेप)। चक्रिन्+छिन्धि=चक्रिंश्छिन्धि^{१२} (चक्रधारी प्रभो! मेरा बन्धन काटिये)। भवान्+शौरिः=भवाञ्छौरिः, भवाञ्शौरिः इह (आप श्रीकृष्ण यहाँ हैं), (भवाञ्छ्छौरिः, भवाञ्श्शौरिः) इस पदच्छेदमें ये चार रूप बनते हैं^{१३}॥३१॥

सम्यङ्ङनन्तोऽङ्गच्छाया कृष्णं वन्दे मुनीश्वर।
तेजांसि मंस्यते गङ्गा हरिश्चेत्तामरशिवः ॥३२॥

सम्यङ्+अनन्तः=सम्यङ्ङनन्तः (अच्छे शेषनाग), सुगण्+ईशः=सुगण्णीशः (अच्छे गणोंके स्वामी)। सन्+अच्युतः=सन्नच्युतः^{१४} (नित्य सत्वरूप श्रीहरि)। अङ्ग+छाया=अङ्गच्छाया^{१५} (शरीरकी परछाईं) कृष्णम्+वन्दे=कृष्णं वन्दे^{१६} (श्रीकृष्णको प्रणाम


१.उपर्युक्त 'झ'से 'प' तकके अक्षरोंके बाद यदि 'ह' हो तो उस 'ह' के स्थानमें पूर्ववर्ती अक्षरके वर्गका चौथा वर्ण हो जाता है। इस नियमके अनुसार उक्त उदाहरणमें 'क्' के बाद 'ह' होनेसे 'ह'के स्थानमें कवर्गका चौथा अक्षर 'घ्' हो गया है और 'क्' की जगह पूर्वोक्त नियमानुसार 'ग्' हो गया॥
२-३-४-५. शकार और चवर्गका योग होनेपर सकार और तवर्गके स्थानमें क्रमशः शकार और चवर्ग होते हैं। इस नियमके अनुसार पूर्व दो उदाहरणोंमें 'स्' की जगह 'श्' हुआ है और शेष दोमें तवर्गकी जगह चवर्ग हुआ है। शेषके शकारका छकार हुआ है। नियम 'वाक्छूरः में, बताया गया है। ६. शके बाद तवर्ग हो तो उसकी जगह चवर्ग नहीं होता; अतः 'प्रश्नः' में न ज्यों-का-त्यों रह गया है। ७-८. षकार और टवर्गसे संयोग होनेपर सकार और तवर्गके स्थानमें क्रमशः षकार और टवर्ग होते हैं। इस नियमके अनुसार दोनों उदाहरणोंमें 'स्' की जगह 'ष' हुआ है।
९. क्योंकि षकार परे रहनेपर तवर्गके टवर्ग होनेका निषेध है। १०. क्योंकि पदान्त टवर्गसे परे नाम्-भिन्न सकार और तवर्गके स्थानमें षकार और टवर्ग नहीं होते। ऐसा निषेध है। ११. यहाँ तकारके स्थानमें लकार आदेश हुआ। नियम यह है कि लकार परे रहनेपर तवर्गके स्थानमें 'ल्' हो जाता है।
१२. इसमें 'न्' के स्थानमें 'र्', 'र' का विसर्ग एवं उसका दन्त्य 'स्' होकर फिर छकारके योगमें उसका तालव्य 'श्' हो गया तथा उसके पूर्व अनुस्वार एवं अनुनासिक हुआ। नियम यह है कि छ, ठ, थ, च, ट, त-ये अक्षर परे हों तो नान्त पदके नकारका 'र्' हो, और उसके पूर्व स्वरका विकल्पसे अनुनासिक अथवा 'र्' से परे अनुस्वारका आगम हो। १३.नियम यह है कि शकार परे रहनेपर नान्त पदके आगे 'त्' बढ़ जाता है। शेष परिवर्तन पूर्वोक्त नियमके अनुसार होते हैं।
१४. इन उदाहरणोंमें ङ्, ण्, न् एकसे दो हो गये हैं। नियम यह है कि ह्रस्वसे परे यदि 'ङ' 'ण्' या 'न्' हो और उसके बाद भी कोई स्वर हो तो वे एकसे दो हो जाते हैं। १५. यहाँ छ के पहले आधा च् बढ़ गया है। नियम यह है कि ह्रस्वसे परे छ होनेपर उसके पहले आधा च् बढ़ जाता है। १६. यहाँ म् के स्थानमें अनुस्वार हो गया है। कोई भी हल् अक्षर परे हो तो पदान्तमें स्थित म् का अनुस्वार हो जाता है।

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  • संक्षिप्त नारदपुराण *

करता हूँ)। तेजान्+सि=तेजांसि (तेज), मन्+स्यते=मंस्यते^१ (मानेंगे)। गं+गा=गङ्गा^२ (देव-नदी गङ्गा)।

मुनीश्वर नारद! यहाँतक व्यञ्जन-सन्धिका वर्णन हुआ। अब विसर्ग-सन्धि प्रारम्भ करते हैं। हरिः+छेत्ता= हरिश्चेत्ता (श्रीहरि बन्धन काटनेवाले हैं)। अमरः+शिवः= अमरश्शिवः^३ (भगवान् शिव अमर हैं) ॥ ३२॥

राम काम्यः कृपःपूज्यो हरिः पूज्योऽर्च्य एव हि।
रामो दृष्टोऽबला अत्र सुप्ता दृष्टा इमा यतः॥ ३३॥

रामः+काम्यः=राम काम्यः (श्रीराम कमनीय हैं)। कृपः+पूज्यः=कृप पूज्यः^४ (कृपाचार्य पूज्य हैं)। पूज्यस्+अर्च्यः=पूज्योऽर्च्यः^५ (पूजनीय और अर्चनीय)। रामस्+दृष्टः=रामो दृष्टः^६ (राम देखे गये हैं)। अबलास्+अत्र=अबला अत्र (यहाँ अबलाएँ हैं)। सुप्तास्+दृष्टाः=सुप्ता दृष्टाः (सोयी देखी गयीं)। इमास्+अतः=इमायतः^७ (ये स्त्रियाँ हैं, अतः) ॥ ३३॥

विष्णुर्नम्यो रविरयं गी ≍ फलं प्रातरच्युतः।
भक्तैर्वन्द्योऽप्यन्तरात्मा भो भो एष हरिस्तथा।
एष शार्ङ्गी सैष रामः संहितैवं प्रकीर्तिता ॥३४॥

विष्णुः+नम्यः=विष्णुर्नम्यः (श्रीविष्णु प्रणामके योग्य हैं)। रविः+अयम्=रविरयम् (ये सूर्य हैं) गीः+फलम्=गीष्फलम् (वाणीका फल)। प्रातर्+अच्युतः=प्रातरच्युतः (प्रातःकाल श्रीहरि)। भक्तैस्+वन्द्यः=भक्तैर्वन्द्यः (भक्तजनोंके द्वारा वन्दनीय हैं)। अन्तर्+आत्मा=अन्तरात्मा (जीवात्मा या अन्तर्यामी परमात्मा)। भोस्+भोः=भो भोः (हे हे)—ये सब उदाहरण पूर्वोक्त नियमोंसे ही बन जाते हैं। एषस्+हरिः=एष हरिः (ये श्रीहरि हैं)। एषस्+शार्ङ्गी=एष शार्ङ्गी (ये शार्ङ्गधारी हरि हैं)। सस्+एषस्+रामः=सैष


१. यहाँ अपदान्त न् का अनुस्वार हुआ है। नियम यह है कि झल् परे रहनेपर अपदान्त न् म् का अनुस्वार होता है। झल्‌में इतने अक्षर आते हैं—झ, भ, घ, ढ, ध, ज, ब, ग, ड, द, ख, फ, छ, ठ, थ, च, ट, त, क, प, श, ष, स, ह। २. यहाँ अपदान्त अनुस्वारका परसवर्ण हुआ है। र, श, ष, स, ह—इनको छोड़कर कोई भी हल् अक्षर परे रहनेपर अपदान्त अनुस्वारका नित्य परसवर्ण (परवर्ती अक्षरके वर्गका पञ्चम वर्ण) होता है—यह नियम है। ३. इन दोनों उदाहरणोंमें विसर्गके स्थानमें दन्त्य 'स्' होकर श्चुत्व सन्धिका नियमसे तालव्य 'श्' हो गया। नियम यह है कि विसर्गके स्थानमें स् हो जाता है खर् परे रहनेपर। उपर्युक्त अक्षरोंमें 'ख' से 'स' तकके अक्षरोंको खर कहते हैं। ४. यहाँ विसर्गके स्थानमें ऐसा ≍ चिह्न हो गया है। विसर्गके बाद क, ख, या प, फ होनेपर विसर्गकी यह अवस्था होती है। ५. यहाँ 'स्' के स्थानमें 'रु' होकर 'रु' के स्थानमें 'उ' हुआ है। फिर गुणसन्धिका नियमसे ओकार होनेपर 'अर्च्यः' के अकारका पूर्वरूप हो गया है। यहाँ नया नियम यह जानना है कि पदान्त 'स्' के स्थानमें 'रु' होता है और अप्लुत अकारसे परे होनेपर उस 'रु' का 'उ' हो जाता है। ऐसा तभी होता है, जब उस 'रु' के बाद भी कोई अप्लुत अकार या 'हश्' हो। ह, य, व, र, ल, ञ, म, ङ, ण, न, झ, भ, घ, ढ, ध, ज, ब, ग, ड, द—इन अक्षरोंके समुदायको 'हश्' कहते हैं। ६. यहाँ अभी बताये गये नियमके अनुसार 'स' को 'रु' करके फिर उसका उत्व हुआ। तत्पश्चात् गुण होकर 'रामो' बना। ७. इन सब उदाहरणोंमें 'स्' के स्थानमें पूर्ववत् 'रु' होता है; फिर 'रु' के स्थानमें 'य्' होकर पूर्व दो उदाहरणोंमें उसका लोप हो जाता है। और अन्तिम उदाहरणमें 'य्' 'अ' में मिल जाता है। यहाँ स्मरण रखने योग्य नियम यह है—भो, भगो, अघो तथा अवर्णपूर्वक 'रु' के स्थानमें 'य्' होता है अश् परे रहनेपर। और हल् परे रहनेपर उस 'य्'का लोप हो जाता है। सम्पूर्ण स्वरवर्ण तथा ह, य, व, र, ल, ञ, म, ङ, ण, न, झ, भ, घ, ढ, ध, ज, ब, ग, ड, द—ये सभी अक्षर 'अश्' के अन्तर्गत हैं।

८. एतत् और तत् शब्दोंसे परे 'सु' विभक्तिके 'स' कारका लोप हो जाता है हल् परे रहनेपर। इस नियमके अनुसार यहाँ 'स्' का लोप हो गया है।