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संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

पूर्वभाग-तृतीय पाद ५१९

  • पूर्वभाग-तृतीय पाद * ५१९

प्राप्त होनेवाली, १०८. स्थूलसूक्ष्मातिरूपिणी= स्थूल-सूक्ष्मसे विलक्षण चिदानन्दमय स्वरूपवाली, १०९. शिरीषपुष्पमृदुला= सिरसके फूलोंसे भी अधिक कोमल, ११०. गाङ्गेयमुकुरप्रभा= गङ्गाजल एवं दर्पणके समान निर्मल कान्तिवाली।

१११. नीलोत्पलजिताक्षी= कजरारे नेत्रोंकी शोभासे नीलकमलको परास्त करनेवाली, ११२. सद्रत्नकबरान्विता= सुन्दर रत्नोंसे अलंकृत चोटीवाली, ११३. प्रेमपर्यङ्कनिलया= प्रेमरूपी पर्यङ्कपर शयन करनेवाली, ११४. तेजोमण्डलमध्यगा= तेजपुञ्जके भीतर विराजमान।

११५. कृष्णाङ्गगोपनाभेदा= श्रीकृष्णके अङ्गोंको छिपानेके लिये उनसे अभिन्नरूपमें स्थित, ११६. लीलावरणानायिका= विभिन्न लीलाओंको स्वीकार करनेवाली प्रधान नायिका, ११७. सुधासिन्धुसमुल्लासा= प्रेमसुधाके समुद्रको समुल्लसित करनेवाली, ११८. अमृतस्यन्दविधायिनी= अमृतरसका स्रोत बहानेवाली।

११९. कृष्णचित्ता= अपना चित्त श्रीकृष्णको समर्पित कर देनेवाली, १२०. रासचित्ता= श्रीकृष्णकी प्रसन्नताके लिये रासमें मन लगानेवाली, १२१. प्रेमचित्ता= श्रीकृष्णप्रेममें मनको निमग्न रखनेवाली, १२२. हरिप्रिया= श्रीकृष्णकी प्रेयसी, १२३. अचिन्तनगुणग्रामा= अचिन्त्य गुण-समुदायवाली, १२४. कृष्णलीला= श्रीकृष्णलीलास्वरूपा, १२५. मलापहा= मनकी मलिनता एवं पाप-तापको धो बहानेवाली।

१२६. राससिन्धुशशाङ्का= रासरूपी समुद्रको उल्लसित करनेके लिये पूर्ण चन्द्रमाकी भाँति प्रकाशित, १२७. रासमण्डलमण्डिनी= अपनी उपस्थितिसे रासमण्डलकी अत्यन्त शोभा बढ़ानेवाली, १२८. नतव्रता= विनम्रस्वभाववाली, १२९, श्रीहरीच्छासुमूर्तिः= श्रीकृष्णइच्छाकी सुन्दर मूर्ति, १३०. सुरवन्दिता= देवताओंद्वारा वन्दित।

१३१. गोपीचूडामणिः= गोपाङ्गनाशिरोमणि, १३२. गोपीगणेड्या= गोपियोंके समुदायद्वारा स्तुत, १३३. विरजाधिका= गोलोकमें विरजासे अधिक सम्मानित पदपर स्थित, १३४. गोपप्रेष्ठा= गोपाल श्यामसुन्दरकी प्रियतमा, १३५. गोपकन्या= वृषभानुगोपकी पुत्री, १३६. गोपनारी= गोपकी वधू, १३७. सुगोपिका= श्रेष्ठ गोपी।

१३८. गोपधामा= गोलोक धाममें विराजमान, १३९. सुदामाम्बा= सुदामागोपके प्रति मातृ-स्नेह रखनेवाली, १४०. गोपाली= गोपी, १४१. गोपमोहिनी= गोपाल श्रीकृष्णको मोहनेवाली, १४२. गोपभूषा= गोपाल श्यामसुन्दर ही जिनके आभूषण हैं, १४३. कृष्णभूषा= श्रीकृष्णको विभूषित करनेवाली, १४४. श्रीवृन्दावनचन्द्रिका= श्रीवृन्दावनकी चाँदनी।

१४५. वीणादिघोषनिरता= वीणा आदिको बजानेमें संलग्न, १४६. रासोत्सवविकासिनी= रासोत्सवका विकास करनेवाली, १४७. कृष्णचेष्टा= श्रीकृष्णके अनुरूप चेष्टा करनेवाली, १४८. अपरिज्ञाता= पहचानमें न आनेवाली, १४९. कोटिकन्दर्पमोहिनी= करोड़ों कामदेवोंको मोहित करनेवाली।

१५०. श्रीकृष्णगुणगानाढ्या= श्रीकृष्णके गुणोंका गान करनेमें तत्पर, १५१. देवसुन्दरिमोहिनी= देवसुन्दरियोंको मोहनेवाली, १५२. कृष्णचन्द्रमनोज्ञा= श्रीकृष्णचन्द्रके मनोभावको जाननेवाली, १५३. कृष्णदेवसहोदरी= योगमाया रूपसे श्रीयशोदाके गर्भसे उत्पन्न होनेवाली।

१५४. कृष्णाभिलाषिणी= श्रीकृष्ण-मिलनकी इच्छा रखनेवाली, १५५. कृष्णप्रेमानुग्रहवाञ्छिनी= श्रीकृष्णके प्रेम और अनुग्रहको चाहनेवाली, १५६. क्षेमा= क्षेमस्वरूपा, १५७. मधुरालापा= मीठे वचन बोलनेवाली, १५८. भ्रूवोमाया= भौंहोंसे मायाको प्रकट करनेवाली, १५९. सुभद्रिका= परम कल्याणमयी।

५२० * संक्षिप्त नारदपुराण *

९६०. प्रकृतिः=श्रीकृष्णकी स्वरूपभूता ह्लादिनी शक्ति, ९६१. परमानन्दा=परमानन्दस्वरूपा, ९६२. नीपद्रुमतलस्थिता=कदम्बवृक्षके नीचे खड़ी होनेवाली, ९६३. कृपाकटाक्षा=कृपापूर्ण कटाक्षवाली, ९६४. विम्बोष्ठी=विम्बफलके समान लाल ओठवाली, ९६५. रम्भा=सर्वाधिक सुन्दरी होनेके कारण रम्भा नामसे प्रसिद्ध, ९६६. चारुनितम्बिनी=मनोहर नितम्बवाली।

९६७. स्मरकेलिनिधाना=प्रेमलीलाकी निधि, ९६८. गण्डताटङ्कमण्डिता=कपोलोंपर कर्णभूषणोंसे अलंकृत, ९६९. हेमाद्रिकान्तिरुचिरा=सुवर्णगिरि मेरुकी कान्तिके समान सुनहरी कान्तिसे सुशोभित परम सुन्दरी, ९७०. प्रेमाढ्या=प्रेमसे परिपूर्ण, ९७१. मदमन्थरा=प्रेममदसे मन्द गतिवाली।

९७२. कृष्णचिन्ता=श्रीकृष्णका चिन्तन करनेवाली, ९७३. प्रेमचिन्ता=श्रीकृष्ण-प्रेमका चिन्तन करनेवाली, ९७४. रतिचिन्ता=श्रीकृष्णरतिका चिन्तन करनेवाली, ९७५. कृष्णदा=श्रीकृष्णकी प्राप्ति करानेवाली, ९७६. रासचिन्ता=श्रीकृष्णके साथ रासका चिन्तन करनेवाली, ९७७. भावचिन्ता=प्रेम-भावका चिन्तन करनेवाली, ९७८. शुद्धचिन्ता=विशुद्ध चिन्तनवाली, ९७९. महारसा=अतिशय प्रेमस्वरूपा।

९८०. कृष्णदृष्टित्रुटियुगा=श्रीकृष्णको देखे बिना क्षणभरके विलम्बको भी एक युगके समान माननेवाली, ९८१. दृष्टिपक्ष्मविनिन्दिनी=श्रीकृष्णका दर्शन करते समय बाधा देनेवाली आँखकी पलकोंकी निन्दा करनेवाली, ९८२. कन्दर्पजननी=कामदेवको जन्म देनेवाली, ९८३. मुख्या=सर्वप्रधाना, ९८४. वैकुण्ठगतिदायिनी=वैकुण्ठ धामकी प्राप्ति करानेवाली।

९८५. रासभावा=रासमण्डलमें आविर्भूत होनेवाली, ९८६. प्रियाश्लिष्टा=प्रियतम श्यामसुन्दरके द्वारा आश्लिष्ट, ९८७. प्रेष्ठा=श्रीकृष्णकी प्रेयसी, ९८८. प्रथमनायिका=श्रीकृष्णकी प्रधान नायिका, ९८९. शुद्धा=शुद्धस्वरूपा, ९९०. सुधादेहिनी=प्रेमामृतमय शरीरवाली, ९९१. श्रीरामा=लक्ष्मीके समान सुन्दर, ९९२. रसमञ्जरी=श्रीकृष्णप्रेम-रसको प्रकट करनेके लिये मञ्जरीके समान।

९९३ .सुप्रभावा=उत्तम प्रभावसे युक्त, ९९४. शुभाचारा=शुभ आचरणवाली, ९९५. स्वर्णदीनर्मदाम्बिका=गङ्गा तथा नर्मदाकी जननी, ९९६. गोमतीचन्द्रभागेडया=गोमती और चन्द्रभागाके द्वारा स्तवनीय, ९९७. सरयूताम्रपर्णीसूः=सरयू तथा ताम्रपर्णी नदीको प्रकट करनेवाली।

९९८. निष्कलङ्कचरित्रा=कलङ्कशून्य चरित्रवाली, ९९९. निर्गुणा=गुणातीत, १०००. निरञ्जना=निर्मलस्वरूपा। नारद! यह राधाकृष्णयुगलरूप भगवान्‌का सहस्रनाम स्तोत्र है।

इसका प्रयत्नपूर्वक पाठ करना चाहिये। यह वृन्दावनके रसकी प्राप्ति करानेवाला है। बड़े-से-बड़े पापोंको शान्त कर देता है। अभिलषित भोगोंको देनेवाला महान् साधन है। यह राधा-माधवकी भक्ति देनेवाला है। जिनकी मेधाशक्ति कभी कुण्ठित नहीं होती तथा जो श्रीराधा-प्रेमरूपी सुधासिन्धुमें नित्य विहार—सतत अवगाहन करते हैं, उन भगवान् श्रीकृष्णको नमस्कार है। श्रीराधादेवी संसारकी सृष्टि करती हैं। वे ही जगत्‌के पालनमें तत्पर रहती हैं और वे ही अन्तकालमें जगत्‌का संहार करनेवाली हैं। वे सबकी अधीश्वरी तथा सबकी जननी हैं। मुनीश्वर! यह उन्हीं श्रीराधाकृष्णका सहस्रनाम मैंने तुम्हें बताया है। यह दिव्य सहस्रनाम भोग और मोक्ष देनेवाला है। (नारदपुराण पूर्वभाग अध्याय ८२)

॥ तृतीय पाद सम्पूर्ण ॥

चतुर्थ पाद

नारद-सनातन-संवाद, ब्रह्माजीका मरीचिको ब्रह्मपुराणकी अनुक्रमणिका तथा उसके पाठश्रवण एवं दानका फल बताना

देवर्षि नारद विनीतभावसे सनातनजीको प्रणाम करके बोले— ब्रह्मन्! आप पुराणवेत्ताओंमें श्रेष्ठ और ज्ञान-विज्ञानमें तत्पर हैं, अतः मुझे पुराणोंके विभागका पूर्णरूपसे परिचय कराइये, जिसके श्रवण करनेपर सब कुछ सुन लिया जाता है, जिसका ज्ञान होनेपर सब कुछ ज्ञात हो जाता है और जिसे कर लेनेपर सब कुछ किया हुआ हो जाता है। पुराणोंके स्वाध्यायसे वर्णों और आश्रमोंके आचार-धर्मका साक्षात्कार हो जाता है। प्रभो! पुराण कितने हैं? उनकी संख्या कितनी है? और उनके श्लोकोंका मान क्या है? उन पुराणोंमें कौन-कौनसे आख्यान वर्णित हैं? यह सब मुझे बताइये। चारों वर्णोंसे सम्बन्ध रखनेवाली नाना प्रकारके व्रत आदिकी कथाएँ भी कहिये। सृष्टिक्रमसे विभिन्न वंशोंमें उत्पन्न हुए सत्पुरुषोंकी जीवनकथाको भी भलीभाँति प्रकाशित कीजिये; क्योंकि भगवन्! आपसे अधिक दूसरा कोई पौराणिक उपाख्यानोंका जानकार नहीं है। इसलिये सब संदेहोंका निराकरण करनेवाले पुराणोंका आप मुझसे वर्णन कीजिये।

सूतजी बोले— ब्राह्मणो! तदनन्तर नारदजीका वचन सुनकर वक्ताओंमें श्रेष्ठ सनातनजी एक क्षण भगवान् नारायणका ध्यान करके बोले।

सनातनजीने कहा— मुनिश्रेष्ठ! तुम्हें बार-बार साधुवाद है। पुराणोंका उपाख्यान जाननेके लिये जो तुम्हें निष्ठायुक्त बुद्धि प्राप्त हुई है, वह सम्पूर्ण लोकोंका उपकार करनेवाली है। पूर्वकालमें ब्रह्माजीने पुत्रस्नेहसे परिपूर्ण चित्त होकर मरीचि आदि ऋषियोंसे इस विषयमें जो कुछ कहा था, उसीका तुमसे वर्णन करता हूँ। एक समय ब्रह्माजीके पुत्र मरीचिने, जो स्वाध्याय और शास्त्रज्ञानसे सम्पन्न तथा वेद-वेदाङ्गोंके पारङ्गत विद्वान् हैं, अपने पिता लोकस्रष्टा ब्रह्माजीके पास जाकर उन्हें भक्तिपूर्वक प्रणाम किया। दूसरोंको मान देनेवाले मुनीश्वर! प्रणामके पश्चात् उन्होंने भी निर्मल पौराणिक उपाख्यानके विषयमें, जैसा कि तुम पूछते हो, यही प्रश्न किया था।

मरीचिने कहा— भगवन्! देवदेवेश्वर! आप सम्पूर्ण लोकोंकी उत्पत्ति और लयके कारण हैं। सर्वज्ञ, सबका कल्याण करनेवाले तथा सबके साक्षी हैं, आपको नमस्कार है। पिताजी! मुझे पुराणोंके बीज, लक्षण, प्रमाण, वक्ता और श्रोता बताइये। मैं वह सब सुननेको उत्सुक हूँ।

ब्रह्माजीने कहा— वत्स! सुनो, मैं पुराणोंका संग्रह बतला रहा हूँ, जिसके जान लेनेपर चर और अचरसहित सम्पूर्ण वाङ्मयका ज्ञान हो जाता है। मानद! सब कल्पोंमें एक ही पुराण था, जिसका

५२२ * संक्षिप्त नारदपुराण *


विस्तार सौ करोड़ श्लोकोंमें था। वह धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—चारों पुरुषार्थोंका बीज माना गया है। सब शास्त्रोंकी प्रवृत्ति पुराणसे ही हुई है, अतः समयानुसार लोकमें पुराणोंका ग्रहण न होता देख परम बुद्धिमान् भगवान् विष्णु प्रत्येक युगमें व्यासरूपसे प्रकट होते हैं। वे प्रत्येक द्वापरमें चार लाख श्लोकोंके पुराणका संग्रह करके उसके अठारह विभाग कर देते हैं और भूलोकमें उन्हींका प्रचार करते हैं। आज भी देवलोकमें सौ करोड़ श्लोकोंका विस्तृत पुराण विद्यमान है। उसीके सारभागका चार लाख श्लोकोंद्वारा वर्णन किया जाता है। ब्रह्मपुराण, पद्मपुराण, विष्णुपुराण, वायुपुराण, भागवतपुराण, नारदपुराण, मार्कण्डेयपुराण, अग्निपुराण, भविष्यपुराण, ब्रह्मवैवर्तपुराण, लिङ्गपुराण, वाराहपुराण, स्कन्दपुराण, वामनपुराण, कूर्मपुराण, मत्स्यपुराण, गरुड़पुराण तथा ब्रह्माण्डपुराण—ये अठारह पुराण हैं। अब सूत्ररूपसे एक-एकका कथानक तथा उसके वक्ता और श्रोताके नाम संक्षेपसे बतलाता हूँ। एकाग्रचित्त होकर सुनो। वेदवेत्ता महात्मा व्यासजीने सम्पूर्ण लोकोंके हितके लिये पहले ब्रह्मपुराणका संकलन किया। वह सब पुराणोंमें प्रथम और धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष देनेवाला है। उसमें नाना प्रकारके आख्यान और इतिहास हैं। उसकी श्लोक-संख्या दस हजार बतायी जाती है। मुनीश्वर! उसमें देवताओं, असुरों और दक्ष आदि प्रजापतियोंकी उत्पत्ति कही गयी है। तदनन्तर उसमें लोकेश्वर भगवान् सूर्यके पुण्यमय वंशका वर्णन किया गया है, जो महापातकोंका नाश करनेवाला है। उसी वंशमें परमानन्दस्वरूप तथा चतुर्व्यूहावतारी भगवान् श्रीरामचन्द्रजीके अवतारकी कथा कही गयी है। तदनन्तर उस पुराणमें चन्द्रवंशका वर्णन आया है और जगदीश्वर श्रीकृष्णके पापनाशक चरित्रका भी वर्णन किया गया है। सम्पूर्ण द्वीपों, समस्त वर्षों तथा पाताल और स्वर्गलोकका वर्णन भी उस पुराणमें देखा जाता है। नरकोंका वर्णन, सूर्यदेवकी स्तुति और कथा एवं पार्वतीजीके जन्म तथा विवाहका प्रतिपादन किया गया है। तदनन्तर दक्ष प्रजापतिकी कथा और एकाग्रकक्षेत्रका वर्णन है। नारद! इस प्रकार इस ब्रह्मपुराणके पूर्व भागका निरूपण किया गया है। इसके उत्तर भागमें तीर्थयात्रा-विधिपूर्वक पुरुषोत्तम क्षेत्रका विस्तारके साथ वर्णन किया गया है। इसीमें श्रीकृष्णचरित्रका विस्तारपूर्वक उल्लेख हुआ है। यमलोकका वर्णन तथा पितरोंके श्राद्धकी विधि है। इस उत्तर भागमें ही वर्णों और आश्रमोंके धर्मोंका विस्तारपूर्वक निरूपण किया गया है। वैष्णव-धर्मका प्रतिपादन, युगोंका निरूपण तथा प्रलयका भी वर्णन आया है। योगोंका निरूपण, सांख्यसिद्धान्तोंका प्रतिपादन, ब्रह्मवादका दिग्दर्शन तथा पुराणकी प्रशंसा आदि विषय आये हैं। इस प्रकार दो भागोंसे युक्त ब्रह्मपुराणका वर्णन किया गया है, जो सब पापोंका नाशक और सब प्रकारके सुख देनेवाला है। इसमें सूत और शौनकका संवाद है। यह पुराण भोग और मोक्ष देनेवाला है। जो इस पुराणको लिखकर वैशाखकी पूर्णिमाको अन्न, वस्त्र और आभूषणोंद्वारा पौराणिक ब्राह्मणकी पूजा करके उसे सुवर्ण और जलधेनुसहित इस लिखे हुए पुराणका भक्तिपूर्वक दान करता है, वह चन्द्रमा, सूर्य और तारोंकी स्थिति-कालतक ब्रह्मलोकमें वास करता है। ब्रह्मन्! जो ब्रह्मपुराणकी इस अनुक्रमणिका (विषय-सूची)—का पाठ अथवा श्रवण करता है, वह भी समस्त पुराणके पाठ और श्रवणका फल पा लेता है। जो अपनी इन्द्रियोंको वशमें करके हविष्यान्न भोजन करते हुए नियमपूर्वक समूचे ब्रह्मपुराणका श्रवण करता है, वह ब्रह्मपदको प्राप्त होता है। वत्स! इस विषयमें अधिक कहनेसे क्या लाभ? इस पुराणके कीर्तनसे मनुष्य जो-जो चाहता है, वह सब पा लेता है।