संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पूर्वभाग- चतुर्थ पाद ५३५
- पूर्वभाग- चतुर्थ पाद * ५३५
स्कन्दपुराणकी विषयानुक्रमणिका, इस पुराणके पाठ, श्रवण एवं दानका माहात्म्य
श्रीब्रह्माजी कहते हैं—वत्स ! सुनो, अब मैं स्कन्दपुराणका वर्णन करता हूँ, जिसके पद-पदमें साक्षात् महादेवजी स्थित हैं। मैंने शतकोटि पुराणमें जो शिवकी महिमाका वर्णन किया है, उसके सारभूत अर्थका व्यासजीने स्कन्दपुराणमें वर्णन किया है। उसमें सात खण्ड किये गये हैं। सब पापोंका नाश करनेवाला स्कन्दपुराण इक्यासी हजार श्लोकोंसे युक्त है। जो इसका श्रवण अथवा पाठ करता है, वह साक्षात् भगवान् शिव ही है। इसमें स्कन्दके द्वारा उन शैव धर्मोंका प्रतिपादन किया गया है, जो तत्पुरुष कल्पमें प्रचलित थे। वे सब प्रकारकी सिद्धि प्रदान करनेवाले हैं। इसके पहले खण्डका नाम 'माहेश्वरखण्ड' है, जो सब पापोंका नाश करनेवाला है। इसमें बारह हजारसे कुछ कम श्लोक हैं। यह परम पवित्र तथा विशाल कथाओंसे परिपूर्ण है। इसमें सैकड़ों उत्तम चरित्र हैं तथा यह खण्ड स्कन्दस्वामीके माहात्म्यका सूचक है। माहेश्वरखण्डके भीतर केदारमाहात्म्यमें पुराणका आरम्भ हुआ है। इसमें पहले दक्षयज्ञकी कथा है। इसके बाद शिवलिङ्ग-पूजनका फल बताया गया है। इसके बाद समुद्र-मन्थनकी कथा और देवराज इन्द्रके चरित्रका वर्णन है। फिर पार्वतीका उपाख्यान और उनके विवाहका प्रसङ्ग है। तत्पश्चात् कुमारस्कन्दकी उत्पत्ति और तारकासुरके साथ उनके युद्धका वर्णन है। फिर पाशुपतका उपाख्यान और चण्डकी कथा है। फिर दूतकी नियुक्तिका कथन और नारदजीके साथ समागमका वृत्तान्त है। उसके बाद कुमार-माहात्म्यके प्रसङ्गमें पञ्चतीर्थकी कथा है। धर्मवर्मा राजाकी कथा तथा नदियों और समुद्रका वर्णन है। तदनन्तर इन्द्रद्युम्न और नाड़ीजङ्घकी कथा है। फिर महीनदीके प्रादुर्भाव और दमनककी कथा है। तत्पश्चात् मही-सागर-संगम और कुमारेशका वृत्तान्त है। इसके बाद नाना प्रकारके उपाख्यानोंसहित तारकयुद्ध और तारकासुरके वधका वर्णन है। फिर पञ्चलिङ्ग-स्थापनकी कथा आयी है। तदनन्तर द्वीपोंका पुण्यमय वर्णन, ऊपरके लोकोंकी स्थिति, ब्रह्माण्डकी स्थिति और उसका मान तथा वर्केरेशकी कथा है। महाकालका प्रादुर्भाव और उसकी परम अद्भुत कथा है। फिर वासुदेवका माहात्म्य और कोटितीर्थका वर्णन है। तदनन्तर गुप्तक्षेत्रमें नाना तीर्थोंका आख्यान कहा गया है। पाण्डवोंकी पुण्यमयी कथा और बर्बरीककी सहायतासे महाविद्याके साधनका प्रसङ्ग है। तत्पश्चात् तीर्थयात्राकी समाप्ति है। तदनन्तर अरुणाचलका माहात्म्य तथा सनक और ब्रह्माजीका संवाद है। गौरीकी तपस्याका वर्णन तथा वहाँके भिन्न-भिन्न तीर्थोंका वर्णन है। महिषासुरकी कथा और उसके वधका परम अद्भुत प्रसङ्ग कहा गया है। द्रोणाचल पर्वतपर भगवान् शिवका नित्य निवास बताया गया है। इस प्रकार स्कन्दपुराणमें यह अद्भुत 'माहेश्वरखण्ड' कहा गया है।
दूसरा 'वैष्णवखण्ड' है। अब उसके आख्यानोंका मुझसे श्रवण करो। पहले भूमि-वराह-संवादका वर्णन है, जिसमें वेङ्कटाचलका पापनाशक माहात्म्य बताया गया है। फिर कमलाकी पवित्र कथा और श्रीनिवासकी स्थितिका वर्णन है। तदनन्तर कुम्हारकी कथा तथा सुवर्णमुखरी नदीके माहात्म्यका वर्णन है। फिर अनेक उपाख्यानोंसे युक्त भरद्वाजकी अद्भुत कथा है। इसके बाद मतङ्ग और अञ्जनके पापनाशक संवादका वर्णन है। फिर उत्कलप्रदेशके पुरुषोत्तमक्षेत्रका माहात्म्य कहा गया है। तत्पश्चात् मार्कण्डेयजीकी कथा, राजा अम्बरीषका वृत्तान्त, इन्द्रद्युम्नका आख्यान और विद्यापतिकी शुभ कथाका उल्लेख है। ब्रह्मन् ! इसके बाद जैमिनि और नारदका आख्यान है,
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कार्तिकमासमें प्रत्येक दिनके कृत्यका वर्णन है। अन्तमें भीष्मपञ्चकव्रतका प्रतिपादन किया गया है, जो भोग और मोक्ष देनेवाला है।
तत्पश्चात् मार्गशीर्षके माहात्म्यमें स्नानकी विधि बतायी गयी है। फिर पुण्ड्रादि-कीर्तन और माला-धारणका पुण्य कहा गया है। भगवान्को पञ्चामृतसे स्नान करानेका तथा घण्टा बजाने आदिका पुण्य फल बताया गया है। नाना प्रकारके फूलोंसे भगवत्पूजनका फल और तुलसीदलका माहात्म्य कहा गया है। भगवान्को नैवेद्य लगानेकी महिमा, एकादशीके दिन कीर्तन, अखण्ड एकादशी-व्रत रहनेका पुण्य और एकादशीकी रातमें जागरण करनेका फल बताया गया है। इसके बाद मत्स्योत्सवका विधान और नाममाहात्म्यका कीर्तन है। भगवान्के ध्यान आदिका पुण्य तथा मथुराका माहात्म्य बताया गया है। मथुरातीर्थका उत्तम माहात्म्य अलग कहा गया है और वहाँके बारह वनोंकी महिमाका वर्णन किया गया है। तत्पश्चात् इस पुराणमें श्रीमद्भागवतके उत्तम माहात्म्यका प्रतिपादन किया गया है। इस प्रसङ्गमें वज्रनाभ और शाण्डिल्यके संवादका उल्लेख किया गया है, जो व्रजकी आन्तरिक लीलाओंका प्रकाशक है। तदनन्तर माघमासमें स्नान, दान और जप करनेका माहात्म्य बताया गया है, जो नाना प्रकारके आख्यानोंसे युक्त है। माघ-माहात्म्यका दस अध्यायोंमें प्रतिपादन किया गया है। तत्पश्चात् वैशाख-माहात्म्यमें शय्यादान आदिका फल कहा गया है। फिर जलदानकी विधि, कामोपाख्यान, शुकदेवचरित, व्याधकी अद्भुत कथा और अक्षयतृतीया आदिके पुण्यका विशेषरूपसे वर्णन है। इसके बाद अयोध्या-माहात्म्य प्रारम्भ करके उसमें चक्रतीर्थ, ब्रह्मतीर्थ, ऋणमोचनतीर्थ, पापमोचनतीर्थ, सहस्रधारातीर्थ, स्वर्गद्वारतीर्थ, चन्द्रहरितीर्थ, धर्महरितीर्थ, स्वर्णवृष्टितीर्थकी कथा और तिलोदा-सरयू-संगमका वर्णन है। तदनन्तर सीताकुण्ड, गुप्तहरितीर्थ, सरयू-घाघरा-संगम,
फिर नीलकण्ठ और नृसिंहका वर्णन है। तदनन्तर अश्वमेध यज्ञकी कथा और राजाका ब्रह्मलोकमें गमन कहा गया है। तत्पश्चात् रथयात्रा-विधि और जप तथा स्नानकी विधि कही गयी है। फिर दक्षिणामूर्तिका उपाख्यान और गुण्डिचाकी कथा है। रथ-रक्षाकी विधि और भगवान्के शयनोत्सवका वर्णन है। इसके बाद राजा श्वेतका उपाख्यान कहा गया है। फिर पृथु-उत्सवका निरूपण है। भगवान्के दोलोत्सव तथा सांवत्सरिक-व्रतका वर्णन है। तदनन्तर उद्दालकके नियोगसे भगवान् विष्णुकी निष्काम पूजाका प्रतिपादन किया गया है। फिर मोक्ष-साधन बताकर नाना प्रकारके योगोंका निरूपण किया गया है। तत्पश्चात् दशावतारकी कथा और स्नान आदिका वर्णन है। इसके बाद बदरिकाश्रम-तीर्थका पापनाशक माहात्म्य बताया गया है। उस प्रसङ्गमें अग्नि आदि तीर्थों और गरुड़-शिलाकी महिमा है। वहाँ भगवान्के निवासका कारण बताया गया है। फिर कपालमोचन-तीर्थ, पञ्चधारा-तीर्थ और मेरुसंस्थानकी कथा है। तदनन्तर कार्तिकमासका माहात्म्य प्रारम्भ होता है। उसमें मदनालसके माहात्म्यका वर्णन है। धूम्रकेशका उपाख्यान और
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गोप्रचारतीर्थ, क्षीरोदकतीर्थ और बृहस्पतिकुण्ड आदि पाँच तीर्थोंकी महिमाका प्रतिपादन किया गया है। तत्पश्चात् घोषार्क आदि तेरह तीर्थोंका वर्णन है। फिर गयाकूपके सर्वपापनाशक माहात्म्यका कथन है। तदनन्तर माण्डव्याश्रम आदि, अजित आदि तथा मानस आदि तीर्थोंका वर्णन किया गया है। इस प्रकार यह दूसरा 'वैष्णवखण्ड' कहा गया है।
मरीचे ! इसके बाद परम पुण्यदायक 'ब्रह्म-खण्ड' का वर्णन सुनो, जिसमें पहले सेतुमाहात्म्य प्रारम्भ करके वहाँके स्नान और दर्शनका फल बताया गया है। फिर गालवकी तपस्या तथा राक्षसकी कथा है। तत्पश्चात् देवीपत्तनमें चक्रतीर्थ आदिकी महिमा, वेतालतीर्थका माहात्म्य और पापनाश आदिका वर्णन है। मङ्गल आदि तीर्थोंका माहात्म्य, ब्रह्मकुण्ड आदिका वर्णन, हनुमत्कुण्डकी महिमा तथा अगस्त्यतीर्थके फलका कथन है। रामतीर्थ आदिका वर्णन, लक्ष्मीतीर्थका निरूपण, शङ्ख आदि तीर्थोंकी महिमा तथा साध्यामृत आदि तीर्थोंके प्रभावका वर्णन है। इसके बाद धनुषकोटि आदिका माहात्म्य, क्षीरकुण्ड आदिकी महिमा तथा गायत्री आदि तीर्थोंके माहात्म्यका वर्णन है। फिर रामेश्वरकी महिमा, तत्त्वज्ञानका उपदेश तथा सेतु-यात्रा-विधिका वर्णन है, जो मनुष्योंको मोक्ष देनेवाला है। तत्पश्चात् धर्मारण्यका उत्तम माहात्म्य बताया गया है, जिसमें भगवान् शिवने स्कन्दको तत्त्वका उपदेश किया है। फिर धर्मारण्यका प्रादुर्भाव, उसके पुण्यका वर्णन, कर्मसिद्धिका उपाख्यान तथा ऋषिवंशका निरूपण है। तदनन्तर वहाँ अप्सरा-सम्बन्धी मुख्य तीर्थोंका माहात्म्य कहा गया है। इसके बाद वर्णाश्रम-धर्मके तत्त्वका निरूपण किया गया है। तदनन्तर देवस्थान-विभाग और बकुलादित्यकी शुभ कथाका वर्णन है। वहाँ छत्रानन्दा, शान्ता, श्रीमाता, मातङ्गिनी और पुण्यदा—ये पाँच देवियाँ सदा स्थित बतायी गयी हैं। इसके बाद वहाँ इन्द्रेश्वर आदिकी महिमा तथा द्वारका आदिका निरूपण है। लोहासुरकी कथा, गङ्गाकूपका वर्णन, श्रीरामचन्द्रजीका चरित्र तथा सत्यमन्दिरका वर्णन है। फिर जीर्णोद्धारकी महिमाका कथन, आसन-दान, जातिभेद-वर्णन तथा स्मृति-धर्मका निरूपण है। तत्पश्चात् अनेक उपाख्यानोंसे युक्त वैष्णव-धर्मोंका वर्णन है। तदनन्तर पुण्यमय चातुर्मास्यका माहात्म्य प्रारम्भ करके उसमें पालन करने योग्य सब धर्मोंका निरूपण किया गया है। फिर दानकी प्रशंसा, व्रतकी महिमा, तपस्या और पूजाका माहात्म्य तथा सच्छूद्रका कथन है। तदनन्तर प्रकृतियोंके भेदका वर्णन, शालग्रामके तत्त्वका निरूपण, तारकासुरके वधका उपाय, गरुड़-पूजनकी महिमा, विष्णुका शाप, वृक्षभावकी प्राप्ति, पार्वतीका अनुनय, भगवान् शिवका ताण्डवनृत्य, राम-नामकी महिमाका निरूपण, शिव-लिङ्गपतनकी कथा, पैजवन शूद्रकी कथा, पार्वतीजीका जन्म और चरित्र, तारकासुरका अद्भुत वध, प्रणवके ऐश्वर्यका कथन, तारकासुरके चरित्रका पुनर्वर्णन, दक्ष-यज्ञकी समाप्ति, द्वादशाक्षरमन्त्रका निरूपण, ज्ञानयोगका वर्णन, द्वादश सूर्योंकी महिमा तथा चातुर्मास्य-माहात्म्यके श्रवण आदिके पुण्यका वर्णन किया गया है, जो मनुष्योंके लिये कल्याणदायक है। तदनन्तर ब्राह्मोत्तर भागमें भगवान् शिवकी अद्भुत महिमा, पञ्चाक्षर-मन्त्रके माहात्म्य तथा गोकर्णकी महिमाका वर्णन है। तत्पश्चात् शिवरात्रिकी महिमा, प्रदोषव्रतका वर्णन तथा सोमवार-व्रतकी महिमा एवं सीमन्तिनीकी कथा है। फिर भद्रायुकी उत्पत्तिका वर्णन, सदाचार-निरूपण, शिवकवचका उपदेश, भद्रायुके विवाहका वर्णन, भद्रायुकी महिमा, भस्म-माहात्म्य-वर्णन, शबरका उपाख्यान, उमा-महेश्वर-व्रतकी महिमा, रुद्राक्षका माहात्म्य, रुद्राध्यायके पुण्य तथा ब्रह्मखण्डके श्रवण आदिकी पुण्यमयी महिमाका वर्णन है। इस प्रकार यह