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संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

\ पूर्वभाग-प्रथम पाद ५३

* पूर्वभाग-प्रथम पाद * ५३


आपका स्वरूप है। आप निर्गुण एवं गुणस्वरूप हैं। आपको नमस्कार है। आप सम्पूर्ण जगत्के स्वामी और परम ज्ञानरूप हैं। श्रेष्ठ भक्तजनोंके प्रति वात्सल्यभाव सदा आपकी शोभा बढ़ाता रहता है। आप मङ्गलमय परमात्माको नमस्कार है। मुनीश्वरगण जिनके अवतार-स्वरूपोंकी सदा पूजा करते हैं, उन आदिपुरुष भगवान्‌को मैं अपने मनोरथकी सिद्धिके लिये प्रणाम करती हूँ। जिन्हें श्रुतियाँ नहीं जानतीं, उनके ज्ञाता विद्वान् पुरुष भी नहीं जानते, जो इस जगत्‌के कारण हैं तथा मायाको साथ रखते हुए भी मायासे सर्वथा पृथक् हैं, उन भगवान्‌को नमस्कार करती हूँ। जिनकी अद्भुत कृपादृष्टि मायाको दूर भगा देनेवाली है, जो जगत्‌के कारण तथा जगत्स्वरूप हैं, उन विश्ववन्दित भगवान्‌की मैं वन्दना करती हूँ। जिनके चरणारविन्दोंकी धूलके सेवनसे सुशोभित मस्तकवाले भक्तजन परम सिद्धिको प्राप्त हो चुके हैं, उन भगवान् कमलाकान्तको मैं नमस्कार करती हूँ। ब्रह्मा आदि देवता भी जिनकी महिमाको पूर्णरूपसे नहीं जानते तथा जो भक्तोंके अत्यन्त निकट रहते हैं, उन भक्तसङ्गी भगवान्‌को मैं प्रणाम करती हूँ। वे करुणासागर भगवान् जगत्‌के सङ्गका त्याग करके शान्तभावसे रहनेवाले भक्तजनोंको अपना सङ्ग प्रदान करते हैं, उन सङ्गरहित श्रीहरिको मैं प्रणाम करती हूँ। जो यज्ञोंके स्वामी, यज्ञोंके भोक्ता, यज्ञकर्मोंमें स्थित रहनेवाले यज्ञकर्मके बोधक तथा यज्ञोंके फलदाता हैं, उन भगवान्‌को मैं नमस्कार करती हूँ। पापात्मा अजामिल भी जिनके नामोच्चारणके पश्चात् परम धामको प्राप्त हो गया, उन लोकसाक्षी भगवान्‌को मैं प्रणाम करती हूँ। जो विष्णुरूपी शिव और शिवरूपी विष्णु होकर इस जगत्‌के संचालक हैं, उन जगद्गुरु भगवान् नारायणको मैं नमस्कार करती हूँ। ब्रह्मा आदि देवेश्वर भी जिनकी मायाके पाशमें बँधे होनेके कारण जिनके परमात्मभावको नहीं समझ पाते, उन भगवान् सर्वेश्वरको मैं प्रणाम करती हूँ। जो सबके हृदयकमलमें स्थित होकर भी अज्ञानी पुरुषोंको दूरस्थ-से प्रतीत होते हैं तथा जिनकी सत्ता प्रमाणोंसे परे है, उन ज्ञानसाक्षी परमेश्वरको मैं नमस्कार करती हूँ। जिनके मुखसे ब्राह्मण प्रकट हुआ है, दोनों भुजाओंसे क्षत्रियकी उत्पत्ति हुई है, ऊरुओंसे वैश्य उत्पन्न हुआ है और दोनों चरणोंसे शूद्रका जन्म हुआ है; जिनके मनसे चन्द्रमा प्रकट हुआ है, नेत्रसे सूर्यका प्रादुर्भाव हुआ है; मुखसे अग्नि और इन्द्रकी तथा कानोंसे वायुकी उत्पत्ति हुई है; ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद जिनके स्वरूप हैं, जो संगीतविषयक सातों स्वरोंके भी आत्मा हैं, व्याकरण आदि छः अङ्ग भी जिनके स्वरूप हैं, उन्हीं आप परमेश्वरको मेरा बारम्बार नमस्कार है। भगवन्! आप ही इन्द्र, वायु और चन्द्रमा हैं। आप ही ईशान (शिव) और आप ही यम हैं। अग्नि और निर्ऋति भी आप ही हैं। आप ही वरुण एवं सूर्य हैं। देवता, स्थावर वृक्ष आदि, पिशाच, राक्षस, सिद्ध, गन्धर्व, पर्वत, नदी, भूमि और समुद्र भी आपके स्वरूप हैं। आप ही जगदीश्वर हैं, जिनसे परात्पर तत्त्व दूसरा कोई नहीं है। देव! सम्पूर्ण जगत् आपका ही स्वरूप है, इसलिये सदा आपको नमस्कार है। नाथनाथ! सर्वज्ञ! आप ही सम्पूर्ण भूतोंके आदिकारण हैं। वेद आपका ही स्वरूप है। जनार्दन! दैत्योंद्वारा सताये हुए मेरे पुत्रोंकी रक्षा कीजिये।

इस प्रकार स्तुति करके देवमाता अदितिने भगवान्‌को बारम्बार प्रणाम किया और हाथ जोड़कर कहा। उस समय आनन्दके आँसुओंसे उनका वक्षःस्थल भीग रहा था। (वे बोलीं—) ‘देवेश! आप सबके आदिकारण हैं। मैं आपकी कृपाकी पात्र हूँ। मेरे देवलोकवासी पुत्रोंको

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* संक्षिप्त नारदपुराण *

अकण्टक राज्यलक्ष्मी दीजिये। अन्तर्यामिन्! विश्वरूप! सर्वज्ञ! परमेश्वर! लक्ष्मीपते! आपसे क्या छिपा हुआ है? प्रभो! आप मुझसे पूछकर मुझे क्यों मोहमें डाल रहे हैं? तथा आपकी आज्ञाका पालन करनेके लिये मेरे मनमें जो अभिलाषा है, वह आपको बताऊँगी। देवेश्वर! मैं दैत्योंसे पीड़ित हो रही हूँ। मेरे पुत्र इस समय मेरी रक्षा न कर सकनेके कारण व्यर्थ हो गये हैं। मैं दैत्योंका भी वध करना नहीं चाहती, क्योंकि वे भी मेरे पुत्र ही हैं। सुरेश्वर! उन दैत्योंको मारे बिना ही मेरे पुत्रोंको सम्पत्ति दे दीजिये।' नारदजी! अदितिके ऐसा कहनेपर देवदेवेश्वर भगवान् विष्णु पुनः बहुत प्रसन्न हुए और देवमाताको आनन्दित करते हुए आदरपूर्वक बोले।

श्रीभगवान्ने कहा— देवि! मैं प्रसन्न हूँ। तुम्हारा कल्याण हो। मैं स्वयं ही तुम्हारा पुत्र बनूँगा; क्योंकि सौतके पुत्रोंपर इतना वात्सल्य तुम्हारे सिवा अन्यत्र दुर्लभ है। तुमने जो स्तुति की है, उसको जो मनुष्य पढ़ेंगे, उन्हें श्रेष्ठ सम्पत्ति प्राप्त होगी और उनके पुत्र कभी हीन दशामें नहीं पड़ेंगे। जो अपने तथा दूसरेके पुत्रपर समानभाव रखता है, उसे कभी पुत्रका शोक नहीं होता—यह सनातन धर्म है*।

अदिति बोलीं— देव! आप सबके आदिकारण और परम पुरुष हैं। मैं आपको अपने गर्भमें धारण करनेमें असमर्थ हूँ। आपके एक-एक रोममें असंख्य ब्रह्माण्ड हैं। आप सबके ईश्वर तथा कारण हैं। प्रभो! सम्पूर्ण देवता और श्रुतियाँ भी जिनके प्रभावको नहीं जानतीं, उन्हीं देवाधिदेव भगवान्‌को मैं गर्भमें कैसे धारण करूँगी? आप सूक्ष्मसे भी अत्यन्त सूक्ष्म, अजन्मा तथा परात्पर परमेश्वर हैं। देव! आप पुरुषोत्तमको मैं कैसे गर्भमें धारण करूँगी? महापातकी मनुष्य भी जिनके नाम-स्मरणमात्रसे मुक्त हो जाता है, वे परमात्मा ग्राम्यजनोंके बीच जन्म कैसे धारण कर सकते हैं? प्रभो! जैसे आपके मत्स्य और शूकर अवतार हो गये हैं, वैसा ही यह भी होगा। विश्वेश! आपकी लीलाको कौन जानता है? देव! मैं आपके चरणारविन्दोंमें प्रणत होकर आपके ही नाम-स्मरणमें लगी हुई सदा आपका ही चिन्तन करती हूँ। आपकी जैसी रुचि हो, वैसा करें।

श्रीसनकजीने कहा— अदितिका वचन सुनकर देवताओंके भी देवता भगवान् जनार्दनने देवमाताको अभयदान दिया और इस प्रकार कहा।

श्रीभगवान् बोले— महाभागे! तुमने सत्य कहा है। इसमें संशय नहीं है। शुभे! तथापि मैं तुम्हें एक गोपनीयसे भी गोपनीय रहस्य बतलाता हूँ, सुनो। जो राग-द्वेषसे शून्य, दूसरोंमें कभी दोष नहीं देखनेवाले और दम्भसे दूर रहनेवाले मेरे शरणागत भक्त हैं, वे सदा मुझे धारण कर सकते हैं। जो दूसरोंको पीड़ा नहीं देते, भगवान् शिवके भजनमें लगे रहते और मेरी कथा सुननेमें अनुराग रखते हैं, वे सदा मुझे अपने हृदयमें धारण करते हैं। देवि! जिन्होंने पति-भक्तिका आश्रय लिया है, पति ही जिनका प्राण है और जो आपसमें कभी डाह नहीं रखतीं, ऐसी पतिव्रता स्त्रियाँ भी सदा मुझे अपने भीतर धारण कर सकती हैं। जो माता-पिताका सेवक, गुरुभक्त, अतिथियोंका प्रेमी और ब्राह्मणोंका हितकारी है, वह सदा मुझे धारण करता है। जो सदा पुण्यतीर्थोंका सेवन करते, सत्सङ्गमें लगे रहते और स्वभावसे ही सम्पूर्ण जगत्‌पर कृपा रखते हैं, वे मुझे सदा अपने हृदयमें धारण करते हैं। जो परोपकारमें तत्पर, पराये धनके लोभसे विमुख और परायी स्त्रियोंके


* स्वात्मजे वान्यपुत्रे वा यः समत्वेन वर्तते। न तस्य पुत्रशोकः स्यादेष धर्मः सनातनः॥ (ना० पूर्व० ११।४८)