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संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

पूर्वभाग-प्रथम पाद ६५

  • पूर्वभाग-प्रथम पाद * ६५

मन्वादि तिथि, युगादितिथि, सूर्यके आधे उदयके समय, सूर्यके पुष्यनक्षत्रपर रहते समय, रोहिणी और बुधके योगमें, शनि और रोहिणी तथा मङ्गल और अश्विनीके योगमें, शनि-अश्विनी, बुध-अश्विनी, शुक्र-रेवती योग, बुध-अनुराधा, श्रवण-सूर्य, सोमवार-श्रवण, हस्त-बृहस्पति, बुध-अष्टमी तथा बुध और आषाढ़ाके योगमें और दूसरे-दूसरे पवित्र दिनोंमें जो पुरुष शान्तचित्त, मौन और पवित्र होकर दूध, दही, घी और शहदसे श्रीविष्णुको स्नान कराता है, उसको प्राप्त होनेवाले फलका वर्णन सुनो। वह सब पापोंसे छूटकर सम्पूर्ण यज्ञोंका फल पाता और इक्कीस पीढ़ियोंके साथ वैकुण्ठधाममें निवास करता है। राजन्! फिर वहीं ज्ञान प्राप्त करके वह पुनरावृत्तिरहित और योगियोंके लिये भी दुर्लभ हरिका सायुज्य प्राप्त कर लेता है। भूपते! जो कृष्णपक्षमें चतुर्दशी तिथि और सोमवारके दिन भगवान् शङ्करको दूधसे नहलाता है, शिवका सायुज्य प्राप्त कर लेता है। अष्टमी अथवा सोमवारको भक्तिपूर्वक नारियलके जलसे भगवान् शिवको स्नान कराकर मनुष्य शिव-सायुज्यका अनुभव करता है। भूपते! शुक्लपक्षकी चतुर्दशी अथवा अष्टमीको घृत और मधुके द्वारा भगवान् शिवको स्नान कराकर मनुष्य उनका सारूप्य प्राप्त कर लेता है। तिलके तेलसे भगवान् विष्णु अथवा शिवको स्नान कराकर मनुष्य सात पीढ़ियोंके साथ उनका सारूप्य प्राप्त कर लेता है। जो शिवको भक्तिपूर्वक ईखके रससे स्नान कराता है, वह सात पीढ़ियोंके साथ एक कल्पतक भगवान् शिवके लोकमें निवास करता है। (फिर शिवका सायुज्य प्राप्त कर लेता है।)

नरेश! एकादशीके दिन सुगन्धित फूलोंसे भगवान् विष्णुकी पूजा करके मनुष्य दस हजार जन्मके पापोंसे छूट जाता और उनके परम धामको प्राप्त कर लेता है। महाराज! चम्पाके फूलोंसे भगवान् विष्णुकी और आकके फूलोंसे भगवान् शङ्करकी पूजा करके मनुष्य उन-उनका सालोक्य प्राप्त करता है। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक भगवान् शङ्कर अथवा विष्णुको धूपमें घृतयुक्त गुग्गुल मिलाकर देता है, वह सब पापोंसे छूट जाता है। नृपश्रेष्ठ! जो भगवान् विष्णु अथवा शङ्करको तिलके तेलसे युक्त दीपदान करता है, वह समस्त कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। जो भगवान् शिव अथवा विष्णुको घीका दीपक देता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो गङ्गा-स्नानका फल पाता है।

जो-जो अभीष्ट वस्तुएँ हैं, वह सब ब्राह्मणको दान कर दे—ऐसा मनुष्य पुनर्जन्मसे रहित भगवान् विष्णुके धाममें जाता है। अन्न और जलके समान दूसरा कोई दान न हुआ है; न होगा। अन्नदान करनेवाला प्राणदाता कहा गया है और जो प्राणदाता है, वह सब कुछ देनेवाला है। नृपश्रेष्ठ! इसलिये अन्नदान करनेवालेको सम्पूर्ण दानोंका फल मिलता है। जलदान तत्काल संतुष्ट करनेवाला माना गया है। नृपश्रेष्ठ! इसलिये ब्रह्मवादी मनुष्योंने जलदानको अन्नदानसे श्रेष्ठ बताया है। महापातक अथवा उपपातकोंसे युक्त मनुष्य भी यदि जलदान करनेवाला है तो वह उन सब पापोंसे मुक्त हो जाता है, यह ब्रह्माजीका कथन है। शरीरको अन्नसे उत्पन्न कहा गया है। प्राणोंको भी अन्नजनित ही मानते हैं; अतः पृथ्वीपते! जो अन्नदान देनेवाला है, उसे प्राणदाता समझना चाहिये; क्योंकि जो-जो तृप्तिकारक दान है, वह समस्त मनोवाञ्छित फलोंको देनेवाला है; अतः भूपाल! इस पृथ्वीपर अन्नदानके समान दूसरा कोई दान नहीं है। जो दरिद्र अथवा रोगी मनुष्यकी रक्षा करता है, उसपर प्रसन्न होकर भगवान् विष्णु उसकी सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण कर देते हैं। जो मन, वाणी और क्रियाद्वारा

६६ * संक्षिप्त नारदपुराण *


रोगीकी रक्षा करता है, वह सब पापोंसे छूटकर सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। महीपाल! जो ब्राह्मणको निवास-स्थान देता है, उसपर प्रसन्न हो देवेश्वर भगवान् विष्णु उसे अपना लोक देते हैं। जो ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मणको दूध देनेवाली गाय दान करता है, वह ब्रह्मलोकमें जाता है तथा जो वेदवेत्ता ब्राह्मणको कपिला गाय दान देता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो रुद्रस्वरूप हो जाता है। जो भयसे व्याकुलचित्तवाले पुरुषोंको अभय दान देता है, राजन्! उसके पुण्यफलका यथार्थ वर्णन करता हूँ, सुनो; एक ओर तो पूर्णरूपसे उत्तम दक्षिणा देकर सम्पन्न किये हुए सभी यज्ञ हैं और दूसरी ओर भयभीत मनुष्यकी प्राणरक्षा है (ये दोनों समान हैं)। महीपाल! जो भयविह्वल ब्राह्मणकी रक्षा करता है, वह सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नान कर चुका और सम्पूर्ण यज्ञोंकी दीक्षा ले चुका। वस्त्रदान करनेवाला रुद्रलोकमें और कन्यादाता ब्रह्मलोकमें जाता है।

भूपते! कार्तिक अथवा आषाढ़की पूर्णिमाको जो मानव भगवान् शिवकी प्रसन्नताके लिये वृषोत्सर्ग कर्म करता है, उसका फल सुनो—वह सात जन्मोंके पापोंसे मुक्त हो रुद्रका स्वरूप प्राप्त कर लेता है। नृपश्रेष्ठ! जो भैंसेको शिवलिङ्गसे चिह्नित करके छोड़ता है, उसे कभी यमयातना (नरक) नहीं प्राप्त होती है। नृपसत्तम! जो शक्तिके अनुसार ताम्बूल दान करता है, उसपर प्रसन्न हो भगवान् विष्णु उसे आयु, यश तथा लक्ष्मी प्रदान करते हैं। दूध, दही, घी और मधुका दान करनेवाला मनुष्य दस हजार दिव्य वर्षोंतक स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। नृपोत्तम! ईख दान करनेवाला मनुष्य ब्रह्मलोकमें जाता है। गन्ध एवं पवित्र फल देनेवाला पुरुष भी ब्रह्मधाममें जाता है। गुड़ और ईखका रस देनेवाला मनुष्य क्षीरसागरको प्राप्त होता है। विद्यादान करनेसे मनुष्यको भगवान् विष्णुका सायुज्य प्राप्त होता है।

विद्यादान, भूमिदान और गोदान—ये उत्तम-से-उत्तम तीन दान क्रमशः जप, जोतने-बोनेकी सुविधा और दूध दुहनेके कारण नरकसे उद्धार करनेवाले होते हैं। नृपोत्तम! सम्पूर्ण दानोंमें विद्यादान श्रेष्ठ है। विद्यादानसे मनुष्य भगवान् विष्णुका सायुज्य प्राप्त कर लेता है। ईंधन दान करनेसे मनुष्यको उपपातकोंसे छुटकारा मिलता है। शालग्राम शिलाका दान महादान बताया गया है। उसका दान करके मनुष्य मोक्ष प्राप्त करता है। शिवलिङ्ग-दान भी ऐसा ही माना गया है। प्रभो! जो मनुष्य श्रेष्ठ पुरुषोंको घर दान देता है, राजन्! उसे गङ्गास्नानका फल अवश्य प्राप्त होता है।

नृपश्रेष्ठ! जो रत्नयुक्त सुवर्णका दान करता है, वह भोग और मोक्ष—दोनों प्राप्त कर लेता है; क्योंकि स्वर्णदान महादान माना गया है। माणिक्यदान करनेसे मनुष्य परममोक्षको प्राप्त होता है। वज्रमणीके दानसे मानव ध्रुवलोकमें जाता है। मूँगा दान करनेसे स्वर्ग एवं रुद्रलोककी प्राप्ति होती है। सवारी देने और मुक्तादान करनेसे दाता चन्द्रलोक प्राप्त करता है। वैदूर्य और पद्मरागमणि देनेवाला मनुष्य रुद्रलोकमें जाता है। पद्मरागमणिके दानसे सर्वत्र सुखकी प्राप्ति होती है। राजन्! घोड़ा दान करनेवाला दीर्घकालके लिये अश्विनीकुमारोंके समीप जाता है। हाथी-दान महादान है। उससे मनुष्य सब कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। सवारी दान करनेसे मनुष्य स्वर्गीय विमानमें बैठकर स्वर्गलोकमें जाता है। भैंस देनेवाला निस्संदेह अपमृत्युको जीत लेता है। गौओंको घास देनेसे रुद्रलोककी प्राप्ति होती है। महीपते! नमक देनेवाला पुरुष वरुणलोकमें जाता है।

जो अपने आश्रमोचित आचारके पालनमें संलग्न, सम्पूर्ण भूतोंके हितमें तत्पर तथा दम्भ और असूयासे रहित हैं, वे ब्रह्मलोकमें जाते हैं। जो वीतराग और ईर्ष्यारहित हो दूसरोंको परमार्थका