संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पूर्वभाग-द्वितीय पाद २७७
- पूर्वभाग-द्वितीय पाद * २७७
तावत्येव निशा तस्य विप्रेन्द्र परिकीर्तिता ॥ ६३ ॥
स्वयम्भुवः सृष्टगतानब्दान् सम्पिण्ड्य नारद।
खचरानयनं कार्यमथवेष्टयुगादितः ॥ ६४ ॥
विप्रवर! चारों युगोंका सम्मिलित मान तैंतालीस लाख बीस हजार वर्ष बतलाया गया है। उसके दशांशमें चारका गुणा करनेपर सत्ययुग नामक पाद होगा। (उसका मान १७ लाख २८ हजार वर्ष है)। दशांशमें तीनका गुणा करनेपर (१२९६००० वर्ष) त्रेता नामक पाद होता है। दशांशमें दोका गुणा करनेपर (८६४००० वर्ष) द्वापर नामक पाद होता है और उक्त दशांशको एकगुना ही रखनेपर (४३२००० वर्ष) कलियुग नामक पाद कहा गया है। कृताब्दसहित (एक सत्ययुग अधिक) इकहत्तर चतुर्युगका एक मन्वन्तर होता है ॥ ६१-६२ ॥ ब्रह्मन् ! ब्रह्माजीके एक दिनमें चौदह मनु होते हैं और उतने ही समयकी उनकी एक रात्रि होती है ॥ ६३ ॥ नारद! ब्रह्माजीके वर्तमान कल्पमें जितने वर्ष बीत गये हैं, उन्हें एकत्र करके ग्रहानयन (ग्रह-साधन) करना चाहिये। अथवा इष्ट युगादिसे ग्रह-साधन करे ॥ ६४ ॥
युगे सूर्यज्ञशुक्राणां खचतुष्करदार्णवाः ।
कुजार्किगुरुशीघ्राणां भगणाः पूर्वयायिनाम् ॥ ६५ ॥
इन्दो रसाग्नित्रित्रीषुसप्तभूधरमार्गणाः ।
दस्त्रत्र्यष्टरसाङ्गाक्षिलोचनानि कुजस्य तु ॥ ६६ ॥
बुधशीघ्रस्य शून्यर्तुखाद्रित्र्यङ्कनगेन्दवः ।
बृहस्पतेः खदस्त्राक्षिवेदषड्वह्रयस्तथा ॥ ६७ ॥
सितशीघ्रस्य षट्सप्तत्रियमाग्निशिखेभूधराः ।
शनेर्भुजङ्गषट्पञ्चरसवेदनिशाकराः ॥ ६८ ॥
चन्द्रोच्चस्याग्निशून्याश्विवसुसर्पार्णवा युगे।
वामं पातस्य वस्वग्नियमश्विशिखिदस्त्रकाः ॥ ६९ ॥
एक युगमें पूर्व दिशाकी ओर चलते हुए सूर्य, बुध और शुक्रके ४३२०००० 'भगण' होते हैं। तथा मङ्गल, शनि और बृहस्पतिके शीघ्रोच्च भगण भी उतने ही होते हैं ॥ ६५ ॥ एक युगमें चन्द्रमाके भगण ५७७५३३३६ होते हैं। भौमके २२९६८३२, बुधके शीघ्रोच्चके १७९३७०६०, बृहस्पतिके ३६४२२०, शुक्रके शीघ्रोच्चके ७०२२३७६, शनिके १४६५६८ तथा चन्द्रमाके उच्चके भगण ४८८२०३ होते हैं। चन्द्रमाके पातकी वामगतिसम्बन्धी भगणोंकी संख्या २३२२३८ है ॥ ६६-६९ ॥
उदयादुदयं भानोर्भूमिसावनवासराः।
वसुद्वयष्टाद्रिरूपाङ्क सप्तसाद्रितिथयो युगे ॥ ७० ॥
षड्वह्नित्रिहुताशाङ्कतिथयश्चाधिमासकाः ।
तिथिक्षया यमार्थ्याश्विद्वयष्टव्योमशराश्विनः ॥ ७१ ॥
खचतुष्कसमुद्राष्टकुपञ्च रविमासकाः ।
षट्त्र्यग्नित्रयवेदाग्निपञ्च शुभांशुमासकाः ॥ ७२ ॥
प्राग्गतेः सूर्यमन्दस्य कल्पे सप्ताष्टवह्नयः ।
कौजस्य वेदखयमा बौधस्याष्टर्तुवह्रयः ॥ ७३ ॥
खखरन्धाणि जैवस्य शौक्रस्यार्थगुणेषवः ।
गोऽग्नयः शनिमन्दस्य पातानामथ वामतः ॥ ७४ ॥
मनुदस्त्रास्तु कौजस्य बौधस्याष्टाष्टसागराः ।
कृताद्रिचन्द्रा जैवस्य शौक्रस्याग्निखनन्दकाः ॥ ७५ ॥
शनिपातस्य भगणाः कल्पे यमरसर्तवः ।
सूर्यके एक उदयसे दूसरे उदयपर्यन्त जो दिनका मान होता है, उसे भौमवासर या सावन वासर कहते हैं। वे एक महायुग (चतुर्युग)-में १५७७९१७८२८ होते हैं। (चान्द्र दिवस १६०३००००८० होते हैं)। अधिमास १५९३३३६ होते हैं तथा तिथिक्षय २५०८२२५२ होते हैं ॥ ७०-७१ ॥ रविमासोंकी संख्या ५१८४०००० है। चान्द्र मास ५३४३३३३६ होते हैं ॥ ७२ ॥ पूर्वाभिमुख गतिके क्रमसे एक कल्पमें सूर्यके मन्दोच्च भगण ३८७, मङ्गलके मन्दोच्च भगण, २०४, बुधके मन्दोच्च ३६८, गुरुके मन्दोच्च ९००, शुक्रके मन्दोच्च ५३५ तथा शनिके मन्दोच्च भगण ३९ होते हैं। अब मङ्गल आदि ग्रहोंके पातोंकी विलोमगति (पश्चिम-गमन)-के अनुसार एक कल्पमें होनेवाले भगण बताये जाते हैं ॥ ७३-७४ ॥ भौमपातके भगण २१४, बुधपातके भगण ४८८, गुरुपातके भगण १७४, भृगुपातके
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भगण ९०३ तथा शनिपातके भगण ६६२ होते हैं॥ ७५ १/२॥
वर्तमानयुगे याता वत्सरा भगणाभिधाः॥ ७६॥
मासीकृता युता मासैर्मधुशुक्लादिभिर्गतैः।
पृथक्स्थास्तेऽधिमासघ्नाः सूर्यमासविभाजिताः॥ ७७॥
लब्धाधिमासकैर्युक्ता दिनीकृत्य दिनान्विता।
द्विष्ठास्तिथिक्षयाभ्यस्ताश्चान्द्रवासरभाजिताः॥ ७८॥
लब्धोनरात्रिरहिता लङ्कायामर्धरात्रिकः।
सावनो द्युगणः सूर्याद् दिनमासाबदपास्ततः॥ ७९॥
सप्तभिः क्षयितः शेषः सूर्याद्यो वास्रेश्वरः।
मासाबद्दिनसंख्यानं द्वित्रिघ्नं रूपसंयुतम्॥ ८०॥
सप्तोद्धृतावशेषौ तौ विज्ञेयौ मासवर्षपौ।
वर्तमान युग (जिस युगमें, जिस समयके अहर्गण या ग्रहादिका ज्ञान करना हो उस समय)-में सृष्ट्यादि काल या युगादिकालसे अबतक जितने वर्ष बीत चुके हों, वे सूर्यके भगण होते हैं। भगणको बारहसे गुणा करके मास बनाना चाहिये। उसमें 'वर्तमान वर्षके' चैत्र शुक्ल प्रतिपदासे लेकर वर्तमान मासतक जितने मास बीते हों, उनकी संख्या जोड़कर योगफलको दो स्थानोंमें रखना चाहिये। द्वितीय स्थानमें रखे हुए मासगणको युगके उपर्युक्त अधिमासोंकी संख्यासे गुणा करके गुणनफलमें युगके सूर्यमासोंकी संख्यासे भाग दे। फिर जो लब्धि हो, उसे अधिमासकी संख्या माने और उसको प्रथम स्थानस्थित मासगणमें जोड़े। (योगफल बीते हुए चान्द्रमासोंकी संख्याका सूचक होता है) उस संख्याको तीससे गुणा करे (तो गुणनफल तिथि-संख्याका सूचक होता है), उसमें वर्तमान मासकी शुक्ल प्रतिपदासे इष्टतिथितककी संख्या जोड़े, (जोड़नेसे चान्द्र दिनकी संख्या ज्ञात होती है) इसको भी दो स्थानोंमें रखे। दूसरे स्थानमें स्थित संख्याको युगके लिये कथित तिथिक्षय-संख्यासे गुणा करे। गुणनफलमें युगकी चान्द्र दिन (तिथि) संख्याके द्वारा भाग दे। जो लब्धि हो, वही तिथिक्षय-संख्या है, उसको प्रथम स्थानमें स्थित चान्द्र दिन-संख्यामेंसे घटा दे तो अभीष्ट दिनका लंकाधरात्रिकालिक सावन दिनगण (अहर्गण) होता है¹। इससे दिनपति, मासपति और वर्षपतिका ज्ञान करे॥ ७६-७९॥ यथा— दिनगणमें ७ से भाग देनेपर शेष बचे हुए १ आदि संख्याके अनुसार रवि आदि वारपति समझने चाहिये। तथा दिनगणमें ३० से भाग देकर लब्धिको २ से गुणा करके गुणनफलमें १ जोड़ दे। फिर उसमें ७ से भाग देकर १ आदि शेष होनेपर रवि आदि मासपति समझे। इसी प्रकार दिनगणमें ३६० से भाग देकर लब्धिको ३ से
१. इस प्रकार अहर्गण-साधनमें कदाचित् एक दिन अधिक या न्यून भी होता है, उस स्थितिमें १ घटाकर या जोड़कर अहर्गण ग्रहण करे।
कलियुगादिसे अहर्गणका उदाहरण—शाके १८७५ कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा शुक्रवारको अहर्गण बनाना है तो कलियुगादिसे गत युधिष्ठिरसंवत्की वर्षसंख्या ३१७९ में शाके १८७५ जोड़नेसे ५०५४ हुआ; इसको १२ गुणा करनेसे ६०६४८ हुआ। इसमें चैत्र शुक्ल प्रतिपदासे गत मास-संख्या ७ जोड़नेपर ६०६५५ सौर मासगण हुए। इसको पृथक् युगकी अधिमास-संख्या १५९३३३६ से गुणा करनेपर ९६६४३७९५०८० हुआ। इसमें युगकी सौर माससंख्या ५१८४०००० से भाग देनेपर लब्धि अधिमास-संख्या १८६४ को पृथक्स्थित सौर मासगण ६०६५५ में जोड़नेसे ६२५१९ यह चन्द्र मास-संख्या हुई। इसको ३० से गुणा करके गुणनफलमें तिथिसंख्या १५ जोड़नेसे १८७५५८५ यह चन्द्र दिनसंख्या हुई। इसको युगकी क्षय-तिथिसंख्या २५०८२२५२ से गुणा करके गुणनफल ४७०४३८९५६१७४२० में युगकी चन्द्र दिनसंख्या १६०३००००८० से भाग देनेपर लब्धि तिथिक्षयसंख्या २९३४७ को उपर्युक्त चन्द्र दिनसंख्या १८७५५८५ में घटानेसे १८४६२३८ अहर्गण हुए। इसमें ७ का भाग देनेसे २ शेष बचते हैं; जिससे शुक्र आदि गणनाके अनुसार शनिवार आता है; किंतु होना चाहिये १ शेष (शुक्रवार); इसलिये इसमें १ घटाकर वास्तविक अहर्गण १८४६२३७ हुआ। प्रस्तुत उदाहरणमें पूर्णिमाका क्षय होनेके कारण १ दिनका अन्तर पड़ा है।