संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
\ पूर्वभाग-प्रथम पाद \ १११
* पूर्वभाग-प्रथम पाद * १११
न हो, ऐसी जीविकाका चिन्तन करे। दिनमें या संध्याके समय कानपर जनेऊ चढ़ाकर उत्तरकी ओर मुँह करके मल-मूत्रका त्याग करना चाहिये। यदि रातमें इसका अवसर आवे तो दक्षिणकी ओर मुँह करके बैठना चाहिये। द्विज सिरको वस्त्रसे ढककर और भूमिपर तृण बिछाकर शौचके लिये बैठे और उसके होनेतक मौन रहे। मार्गमें, गोशालामें, नदीके तटपर, पोखरे और घरके समीप, पेड़की छायामें, दुर्गम स्थानमें, अग्निके समीप, देवालयके निकट, बगीचेमें, जोते हुए खेतमें, चौराहेपर; ब्राह्मण, गाय, गुरुजन तथा स्त्रियोंके समीप; भूसी, अंगार, खप्पर या खोपड़ीमें तथा जलके भीतर—इत्यादि स्थानोंमें मल-मूत्र न करे। शौच (शुद्धि)-के लिये सदा यत्न करना चाहिये। शौच ही द्विजत्वका मूल है। जो शौचाचारसे रहित है उसके सब कर्म निष्फल होते हैं*। शौच दो प्रकारका कहा गया है—एक बाह्य शौच और दूसरा आभ्यन्तर-शौच। मिट्टी और जलसे जो ऊपर-ऊपरकी शुद्धि की जाती है, वही बाह्य-शौच है और भीतरके भावोंकी जो पवित्रता है उसे ही आभ्यन्तर-शौच कहा गया है। मलत्यागके पश्चात् उठकर शुद्धिके लिये मिट्टी लावे। चूहे आदिकी खोदी हुई, फारसे उलाटी हुई तथा बावड़ी, कुँआ और पोखरेसे निकाली हुई मिट्टी शौचके लिये न लावे। अच्छी मिट्टी लेकर यत्नसे शुद्धिका सम्पादन करे। लिङ्गमें एक बार या तीन बार मिट्टी लगाकर धोये और अण्डकोषोंमें दो बार मिट्टी लगाकर जलसे धोये। मनीषी पुरुषोंने मूत्रत्यागके पश्चात् इस प्रकार शुद्धिका विधान किया है। लिङ्गमें एक बार, गुदाद्वारमें पाँच बार, बायें हाथमें दस बार, फिर दोनों हाथोंमें सात बार तथा दोनों पैरोंमें तीन बार पृथक् मिट्टी लगानी और धोनी चाहिये। यह मल-त्यागके पश्चात् उसके लेप और दुर्गन्धको दूर करनेके लिये शुद्धिका विधान किया गया है। ब्रह्मचारियोंके लिये इससे दुगुने शौचका विधान है। वानप्रस्थियोंके लिये तिगुना और संन्यासियोंके लिये गृहस्थकी अपेक्षा चौगुना शौच बताया गया है। मुनिश्रेष्ठ! कहीं रास्तेमें हो तो आधा ही पालन करे। रोगीके लिये या बड़ी भारी विपत्ति पड़नेपर भी नियमका बन्धन नहीं रहता। स्त्रियों और उपनयनरहित द्विजकुमारोंके लिये भी लेप और दुर्गन्ध दूर होनेतक ही शौचकी सीमा है। उसके बाद किसी श्रेष्ठ वृक्षकी छिलकेसहित लकड़ी लेकर उससे दाँतुन करे। बेल, असना, अपामार्ग (ऊँगा या चिरचिरा) नीम, आम और अर्क आदि वृक्षोंका दाँतुन होना चाहिये। पहले उसे जलसे धोकर निम्नाङ्कित मन्त्रसे अभिमन्त्रित करे—
आयुर्बलं यशो वर्चः प्रजाः पशुवसूनि च।
ब्रह्म प्रज्ञां च मेधां च त्वं नो देहि वनस्पते॥
(ना० पूर्व० २७। २५)
‘वनस्पते! तुम हमें आयु, यश, बल, तेज, प्रजा, पशु, धन, वेद, बुद्धि तथा धारणाशक्ति प्रदान करो।’
कनिष्ठिकाके अग्रभागके समान मोटा और दस अंगुल लंबा दाँतुन ब्राह्मण करे। क्षत्रिय नौ अंगुल, वैश्य आठ अंगुल, शूद्र और स्त्रियोंको चार अंगुलका दाँतुन करना चाहिये। दाँतुन न मिलनेपर बारह कुल्लोंसे मुख शुद्धि कर लेनी चाहिये। उसके बाद नदी आदिके निर्मल जलमें स्नान करे। वहाँ तीर्थोंको प्रणाम करके सूर्यमण्डलमें भगवान् नारायणका आवाहन करे। फिर गन्ध आदिसे मण्डल बनाकर उन्हीं भगवान् जनार्दनका ध्यान करे। नारदजी! तदनन्तर पवित्र मन्त्रों और
* शौचे यत्नः सदा कार्यः शौचमूलो द्विजः स्मृतः। शौचाचारविहीनस्य समस्तं कर्म निष्फलम्॥
(ना० पूर्व० २७। ८)
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* संक्षिप्त नारदपुराण *
तीर्थोंका स्मरण करते हुए स्नान करना चाहिये—
गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् संनिधिं कुरु ॥
पुष्कराद्यानि तीर्थानि गङ्गाद्याः सरितस्तथा।
आगच्छन्तु महाभागाः स्नानकाले सदा मम ॥
अयोध्या मथुरा माया काशी काञ्ची ह्यवन्तिका।
पुरी द्वारावती ज्ञेयाः सप्तैता मोक्षदायिकाः ॥
(ना० पूर्व० २७। ३३-३५)
'गङ्गा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु तथा कावेरी नामवाली नदियाँ इस जलमें निवास करें। पुष्कर आदि तीर्थ और गङ्गा आदि परम सौभाग्यवती नदियाँ सदा मेरे स्नानकालमें यहाँ पधारें। अयोध्या, मथुरा, हरद्वार, काशी, काञ्ची, अवन्ती (उज्जैन) और द्वारकापुरी—इन सातोंको मोक्षदायिनी समझना चाहिये।'
तदनन्तर श्वासको रोके हुए पानीमें डुबकी लगावे और अघमर्षण सूक्तका जप करे। फिर स्नानाङ्ग-तर्पण करके आचमनके पश्चात् सूर्यदेवको अर्घ्य दे। नारदजी! उसके बाद सूर्यभगवान्का ध्यान करके जलसे बाहर निकलकर बिना फटा हुआ शुद्ध धौतवस्त्र धारण करे। ऊपरसे दूसरा वस्त्र (चादर) भी ओढ़ ले। तत्पश्चात् कुशासनपर बैठकर संध्याकर्म प्रारम्भ करे। ब्रह्मन् ! ईशानकोणकी ओर मुख करके गायत्री-मन्त्रसे आचमन करे, फिर 'ऋतञ्च' इत्यादि मन्त्रका उच्चारण करके विद्वान् पुरुष दुबारा आचमन करे। तदनन्तर अपने चारों ओर जल छिड़ककर अपने-आपको उस जलसे आवेष्टित करे। अपने शरीरपर भी जल सींचे। फिर प्राणायामका संकल्प लेकर प्रणवका उच्चारण करनेके बाद प्रणवसहित सातों व्याहृतियोंके तथा गायत्री-मन्त्रके ऋषि, छन्द और देवताओंका स्मरण¹ करते हुए (विनियोग करते हुए) भूः आदि सात व्याहृतियोंद्वारा मस्तकपर जलसे अभिषेक करे। तत्पश्चात् मन्त्रज्ञ पुरुष पृथक्-पृथक् करन्यास और अङ्गन्यास करे। पहले हृदयमें प्रणवका न्यास करके मस्तकपर भूःका न्यास करे। फिर शिखामें भुवःका, कवचमें स्वःका, नेत्रोंमें भूर्भुवःका तथा दिशाओंमें भूर्भुवः स्वः—इन तीनों व्याहृतियोंका और अस्त्रका न्यास करे। तीन बार हथेलीपर ताल देना ही अस्त्रन्यास है²। तदनन्तर प्रातःकाल
१. ॐकारसहित व्याहृतियोंका, गायत्री-मन्त्रका तथा शिरोमन्त्रका विनियोग या उनके ऋषि, छन्द और देवताओंका स्मरण इस प्रकार है—
ॐकारस्य ब्रह्म ऋषिर्देवी गायत्री छन्दः परमात्मा देवता, सप्तव्याहृतीनां प्रजापतिऋषिर्गायत्र्युष्णिगनुष्टुब्बृहती-पङ्क्तित्रिष्टुब्जगत्यश्छन्दांस्यग्निवायुसूर्यबृहस्पतिवरुणेन्द्रविश्वेदेवा देवताः, तत्सवितुरिति विश्वामित्रऋषिर्गायत्री छन्दः सविता देवता, आपो ज्योतिरिति शिरसः प्रजापतिऋषिर्यजुश्छन्दो ब्रह्माग्निवायुसूर्या देवताः प्राणायामे विनियोगः।
२. आधुनिक संध्याकी प्रतियोंमें न्यासकी विधि सूर्योपस्थानके बाद दी हुई है। परंतु नारदपुराणके अनुसार प्राणायामके पहले तथा जपके पहले भी न्यास करना चाहिये। मूलमें करन्यास और अङ्गन्यास दोनोंकी चर्चा की गयी है। पर विधि केवल अङ्गन्यासकी ही दी गयी है। जिसका प्रयोग इस प्रकार होता है—
ॐ हृदयाय नमः। ॐ भूः शिरसे स्वाहा। ॐ भुवः शिखायै वषट्। ॐ स्वः कवचाय हुम्। ॐ भूर्भुवः नेत्राभ्यां वौषट्। ॐ भूर्भुवः स्वः अस्त्राय फट्।
उपर्युक्त छः मन्त्रवाक्य अङ्गन्यासके हैं। इनमेंसे पहले वाक्यका उच्चारण करके दाहिने हाथकी हथेलीसे हृदयका स्पर्श करे। दूसरे वाक्यको पढ़कर अँगूठेसे मस्तकका स्पर्श करना चाहिये। तीसरे वाक्यका उच्चारण करके अंगुलियोंके अग्रभागसे शिखाका स्पर्श करे। चतुर्थ वाक्य पढ़कर दाहिने हाथकी अंगुलियोंसे बायीं भुजाका और बायें हाथकी अंगुलियोंसे दाहिनी भुजाका स्पर्श करे। पञ्चम वाक्यसे अनामिका और अङ्गुष्ठद्वारा दोनों नेत्रोंका स्पर्श करना चाहिये। छठा वाक्य बोलकर दाहिने हाथको बायीं ओरसे पीछेकी ओर ले जाकर दाहिने ओरसे