सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

उत्तरभाग ६६१

  • उत्तरभाग * ६६१

गोविन्द-द्वादशीके दिन स्नान करनेसे नष्ट कर दो।' यदि माघकी पूर्णिमाको मघा नक्षत्र या बृहस्पतिका योग हो तो उक्त तिथिका महत्त्व बहुत बढ़ जाता है। यदि यह योग गङ्गाजीमें सुलभ हो तब तो सौ सूर्यग्रहणके समान पुण्य होता है।

अब देशविशेषके योगसे गङ्गा-स्नानका फल बतलाया जाता है। गङ्गाजीमें जहाँ-कहीं भी स्नान किया जाय, वह कुरुक्षेत्रसे दसगुना पुण्य देनेवाली है; किंतु जहाँ वे विन्ध्याचल पर्वतसे संयुक्त होती हैं, वहाँ कुरुक्षेत्रकी अपेक्षा सौगुना पुण्य होता है। काशीपुरीमें गङ्गाजीका माहात्म्य विन्ध्याचलकी अपेक्षा सौगुना बताया गया है। यों तो गङ्गाजी सर्वत्र ही दुर्लभ हैं, किंतु गङ्गाद्वार, प्रयाग और गङ्गासागर-संगम—इन तीन स्थानोंमें उनका माहात्म्य बहुत अधिक है। गङ्गाद्वारमें कुशावर्ततीर्थके भीतर स्नान करनेसे सात राजसूय और दो अश्वमेध-यज्ञोंका फल मिलता है। उस तीर्थमें पंद्रह दिन निवास करनेसे छः विश्वजित् यज्ञोंका फल प्राप्त होता है। साथ ही विद्वानोंने वहाँ रहनेसे एक लाख गोदानका पुण्य बताया है। कुशावर्तमें भगवान् गोविन्दका और कनखलमें भगवान् रुद्रका दर्शन-पूजन करनेसे अथवा इन स्थानोंमें गङ्गा-स्नान करनेसे अक्षय पुण्यकी प्राप्ति होती है। जहाँ पूर्वकालमें वाराहरूपधारी भगवान् विष्णु प्रकट हुए थे, वहाँ स्नान करके मनुष्य सौ अग्निहोत्रका, दो ज्योतिष्टोम यज्ञका और एक हजार अग्निष्टोम यज्ञोंका पुण्य-फल पाता है। वहीं ब्रह्मतीर्थमें स्नान करनेवाला पुरुष दस हजार ज्योतिष्टोम यज्ञोंका और तीन अश्वमेध-यज्ञोंका पुण्य प्राप्त करता है। मोहिनी! कुब्ज नामसे प्रसिद्ध जो पापनाशक तीर्थ है, वहाँ स्नान करनेसे सम्पूर्ण रोग और सब जन्मोंके पातक नष्ट हो जाते हैं। हरिद्वारक्षेत्रमें ही एक दूसरा तीर्थ है, जो कपिलतीर्थके नामसे प्रसिद्ध है। शुभे! उसमें स्नान करनेवाला मानव अस्सी हजार कपिला गौओंके दानके समान पुण्य-फल पाता है। गङ्गाद्वार, कुशावर्त, बिल्वक, नीलपर्वत तथा कनखल-तीर्थमें स्नान करके मनुष्य पापरहित हो स्वर्गलोकमें जाता है। तदनन्तर पवित्र नामक तीर्थ है, जो सब तीर्थोंमें परम उत्तम है। वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य दो विश्वजित् यज्ञोंका पुण्य पाता है। तदनन्तर वेणीराज्य नामक तीर्थ है, जहाँ महापुण्यमयी सरयू उत्तम पुण्यस्वरूपा गङ्गासे इस प्रकार मिली हैं, जैसे एक बहिन अपनी दूसरी बहिनसे मिलती है। भगवान् विष्णुके दाहिने चरणारविन्दके पखारनेसे देवनदी गङ्गा प्रकट हुई हैं और बायें चरणसे मानस-नन्दिनी सरयूका प्रादुर्भाव हुआ है। उस तीर्थमें भगवान् शिव और विष्णुकी पूजा करनेवाला पुरुष विष्णुस्वरूप हो जाता है। वहाँका स्नान पाँच अश्वमेध-यज्ञोंका फल देनेवाला बताया गया है। तत्पश्चात् गाण्डवतीर्थ है, जहाँ गङ्गासे गण्डकी नदी मिली है। वहाँका स्नान और एक हजार गौओंका दान दोनों बराबर हैं। तदनन्तर रामतीर्थ है, जिसके समीप पुण्यमय वैकुण्ठ है। तत्पश्चात् परम पवित्र सोमतीर्थ है, जहाँ नकुल मुनि भगवान् शिवकी पूजा करके उनका ध्यान करते हुए गणस्वरूप हो गये। उसके बाद चम्पक नामक पुण्य तीर्थ है, जहाँ गङ्गाकी धारा उत्तर दिशाकी ओर बहती है। उसे मणिकर्णिकाके समान महापातकोंका नाश करनेवाला बताया गया है। तदनन्तर कलश-तीर्थ है, जहाँ कलशसे मुनिवर अगस्त्य प्रकट हुए थे। वहीं भगवान् रुद्रकी आराधना करके वे श्रेष्ठ मुनीश्वर हो गये। इसके बाद परम पुण्यमय सोमद्वीप-तीर्थ है, जिसका महत्त्व काशीपुरीके समान है। वहाँ भगवान् शङ्करकी आराधना करनेवाले चन्द्रमाको भगवान् रुद्रने सिरपर धारण किया था। वहीं विश्वामित्रकी भगिनी

६६२* संक्षिप्त नारदपुराण *

गङ्गामें मिली हैं। उसमें गोता लगानेवाला मनुष्य इन्द्रका प्रिय अतिथि होता है। मोहिनी ! जह्नुकुण्ड नामक महातीर्थमें स्नान करनेवाला मनुष्य निश्चय ही अपनी इक्कीस पीढ़ियोंका उद्धारक होता है। शुभगे ! तदनन्तर अदिति-तीर्थ है, जहाँ अदितिने कश्यपसे भगवान् विष्णुको वामनरूपमें प्राप्त किया था। वहाँ किये जानेवाले स्नानका फल महान् अभ्युदय बताया गया है। तत्पश्चात् शिलोच्चय नामक महातीर्थ है, जहाँ तपस्या करके समस्त प्रजा तृण आदिके साथ स्वर्गको चली जाती है; क्योंकि वह स्थान अनेक तीर्थोंका आश्रय है। तदनन्तर इन्द्राणी नामक तीर्थ है, जहाँ | इन्द्राणीने तपस्या करके इन्द्रको पतिरूपमें प्राप्त किया था। यह स्थान प्रयागके तुल्य सेवन करने योग्य है। उसके बाद पुण्यदायक स्नात तीर्थ है, जहाँ क्षत्रिय विश्वामित्रने तपस्या करके तीर्थ-सेवनके प्रभावसे ब्रह्मर्षिपदको प्राप्त किया था। तत्पश्चात् प्रद्युम्न-तीर्थ है, जो तपस्याके लिये प्रसिद्ध है। वहाँ कामदेव तपस्या करके भगवान् श्रीकृष्णके प्रद्युम्न नामक पुत्र हुए। उस तीर्थमें स्नान करनेसे महान् अभ्युदयकी प्राप्ति होती है। तदनन्तर दक्षप्रयाग है, जहाँ गङ्गासे यमुना मिली हैं। वहाँ स्नान करनेसे प्रयागकी ही भाँति अक्षय पुण्य होता है।

गङ्गाजीके तटपर किये जानेवाले स्नान, तर्पण, पूजन तथा विविध प्रकारके दानोंकी महिमा

पुरोहित वसु कहते हैं— राजपत्नी मोहिनी ! अब गङ्गाजीमें स्नान-तर्पण आदि कर्मोंका फल बतलाया जाता है। देवि ! यदि गङ्गाजीके तटपर संध्योपासना की जाय तो द्विजोंको पवित्र करनेवाली गायत्रीदेवी किसी साधारण स्थानकी अपेक्षा वहाँ लाख गुना पुण्य प्रकट करनेमें समर्थ होती हैं। मोहिनी ! यदि पुत्रगण श्रद्धापूर्वक गङ्गाजीमें पितरोंको जलाञ्जलि दें तो वे उन्हें अक्षय तथा दुर्लभ तृप्ति प्रदान करते हैं। गङ्गाजीमें तर्पण करते समय मनुष्य जितने तिल हाथमें लेता है, उतने सहस्र वर्षोंतक पितृगण स्वर्गवासी होते हैं। सब लोगोंके जो कोई भी पितर पितृलोकमें विद्यमान हैं, वे गङ्गाजीके शुभ जलसे तर्पण करनेपर परम तृप्तिको प्राप्त होते हैं। शुभानने ! जो जन्मकी सफलता अथवा संतति चाहता है, वह गङ्गाजीके समीप जाकर देवताओं तथा पितरोंका तर्पण करे। जो मनुष्य मृत्युको प्राप्त होकर दुर्गतिमें पड़े हैं, वे अपने वंशजोंद्वारा कुश, तिल और गङ्गाजलसे तृप्त किये जानेपर वैकुण्ठधाममें चले जाते हैं। जो | कोई पुण्यात्मा पितर स्वर्गलोकमें निवास करते हैं, उनके लिये यदि गङ्गाजलसे तर्पण किया जाय तो वे मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं, ऐसा ब्रह्माजीका कथन है। जो मनुष्य गङ्गाजीमें स्नान करके प्रतिदिन शिवलिङ्गकी पूजा करता है, वह निश्चय ही एक ही जन्ममें मोक्ष प्राप्त कर लेता है। अग्निहोत्र, वेद तथा बहुत दक्षिणावाले यज्ञ भी गङ्गाजीपर शिवलिङ्ग-पूजाके करोड़वें अंशके बराबर भी नहीं हैं। जो पितरों अथवा देवताओंके उद्देश्यसे गङ्गाजलद्वारा अभिषेक करता है, उसके नरकनिवासी पितर भी तत्काल तृप्त हो जाते हैं। मिट्टीके घड़ेकी अपेक्षा ताँबेके घड़ेसे किया हुआ स्नान दसगुना उत्तम माना गया है। इसी प्रकार अर्घ्य, नैवेद्य, बलि और पूजा आदिमें भी क्रमशः समझने चाहिये। उत्तरोत्तर पात्रमें विशेषता होनेके कारण फलमें भी विशेषता होती है। जो धन होते हुए भी मोहवश विस्तृत विधिका पालन नहीं करता, वह उस कर्मके फलका भागी नहीं होता।<br><br>देवताओंका दर्शन पुण्यमय होता है। दर्शनसे