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संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

पूर्वभाग- चतुर्थ पाद ५५५

  • पूर्वभाग- चतुर्थ पाद * ५५५

गणेशजीकी प्रसन्नताको बढ़ानेवाला है। तत्पश्चात् दो दूर्वादल लेकर गन्ध, पुष्प और अक्षतके साथ गणेशजीपर चढ़ावे। इस प्रकार पूजा करके भक्तिभावसे नैवेद्यरूपमें पाँच लड्डू निवेदन करे। फिर आचमन कराकर नमस्कार और प्रार्थना करके देवताका विसर्जन करे। मुने! सब सामग्रियोंसहित गणेशजीकी स्वर्णमयी प्रतिमा आचार्यको अर्पित करे और ब्राह्मणोंको दक्षिणा दे। नारद! इस प्रकार पाँच वर्षोंतक भक्तिपूर्वक गणेशजीकी पूजा और उपासना करनेवाला पुरुष इस लोक और परलोकके शुभ भोगोंको प्राप्त कर लेता है। इस चतुर्थीकी रातमें कभी चन्द्रमाकी ओर न देखे। जो देखता है उसे झूठा कलङ्क प्राप्त होता है, इसमें संशय नहीं है। यदि चन्द्रमा दीख जाय तो उस दोषकी शान्तिके लिये इस पौराणिक मन्त्रका पाठ करे—
सिंहः प्रसेनमवधीत् सिंहो जाम्बवता हतः।
सुकुमारक मा रोदीस्तव ह्येष स्यमन्तकः ॥
(ना० पूर्व० १।३। ३९)

'सिंहने प्रसेनको मारा और सिंहको जाम्बवान्ने मार गिराया। सुकुमार बालक! तू रो मत। यह स्यमन्तक अब तेरा ही है।'

आश्विन शुक्ला चतुर्थीको पुरुषसूक्तद्वारा षोडशोपचारसे कपर्दीश विनायककी पूजा करे। कार्तिक कृष्ण चतुर्थीको 'कर्काचतुर्थी' (करवा चौथ)-का व्रत बताया गया है। इस व्रतमें केवल स्त्रियोंका ही अधिकार है। इसलिये उसका विधान बताया है—स्त्री स्नान करके वस्त्राभूषणोंसे विभूषित हो गणेशजीकी पूजा करे। उनके आगे पकवानसे भरे हुए दस करवे रखे और भक्तिसे पवित्रचित्त होकर उन्हें देवदेव गणेशजीको समर्पित करे। समर्पणके समय यह कहना चाहिये कि 'भगवान् कपर्दि गणेश मुझपर प्रसन्न हों।' तत्पश्चात् सुवासिनी स्त्रियों और ब्राह्मणोंको इच्छानुसार आदरपूर्वक उन करवोंको बाँट दे। इसके बाद रातमें चन्द्रोदय होनेपर चन्द्रमाको विधिपूर्वक अर्घ्य दे। व्रतकी पूर्तिके लिये स्वयं भी मिष्टान्न भोजन करे। इस व्रतको सोलह या बारह वर्षोंतक करके नारी इसका उद्यापन करे। उसके बाद इसे छोड़ दे अथवा स्त्रीको चाहिये कि सौभाग्यकी इच्छासे वह जीवनभर इस व्रतको करती रहे; क्योंकि स्त्रियोंके लिये इस व्रतके समान सौभाग्यदायक व्रत तीनों लोकोंमें दूसरा कोई नहीं है।

मुनीश्वर! मार्गशीर्ष शुक्ला चतुर्थीसे लेकर एक वर्षतकका समय प्रत्येक चतुर्थीको एकभुक्त (एक समय भोजन) करके बितावे और द्वितीय वर्ष उक्त तिथिको केवल रातमें एक बार भोजन करके व्यतीत करे। तृतीय वर्षमें प्रत्येक चतुर्थीको अयाचित (बिना माँगे मिले हुए) अन्न एक बार खाकर रहे और चौथा वर्ष उक्त तिथिको उपवासपूर्वक रहकर बितावे। इस प्रकार विधिपूर्वक व्रतका पालन करते हुए क्रमशः चार वर्ष पूरे करके अन्तमें व्रत-स्नान करे। उस समय महाव्रती मानव सोनेकी गणेशमूर्ति बनवावे। यदि असमर्थ हो तो वर्णक (हल्दी-चूर्ण)-द्वारा ही गणेश-प्रतिमा बना ले। तदनन्तर विविध रंगोंसे धरतीपर सुन्दर दलोंसहित कमल अङ्कित करके उसके ऊपर कलश स्थापित करे। कलशके ऊपर ताँबेका पात्र रखे। उस पात्रको सफेद चावलसे भर दे। चावलके ऊपर युगल वस्त्रसे आच्छादित गणेशजीको विराजमान करे। तदनन्तर गन्ध आदि सामग्रियोंद्वारा उनकी पूजा करे। फिर गणेशजी प्रसन्न हों, इस उद्देश्यसे लड्डुका नैवेद्य अर्पण करे। रातमें गीत, वाद्य और पुराण-कथा आदिके द्वारा जागरण करे। फिर निर्मल


है—'विकटाय नमः' से कनेरका पत्ता, 'इभतुण्डाय नमः' से अश्मातपत्र, 'विनायकाय नमः' से आकका पत्ता, 'कपिलाय नमः' से अर्जुनका पत्ता, 'वटवे नमः' से देवदारुका पत्ता, 'भालचन्द्राय नमः' से मरुआका पत्ता, 'सुराग्रजाय नमः' से गान्धारी-पत्र और 'सिद्धिविनायकाय नमः' से केतकी-पत्र अर्पण करे।

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प्रभात होनेपर स्नान करके तिल, चावल, जौ, पीली सरसों, घी और खाँड मिली हवनसामग्रीसे विधिपूर्वक होम करे। गण, गणाधिप, कूष्माण्ड, त्रिपुरान्तक, लम्बोदर, एकदन्त, रुक्मदंष्ट्र, विघ्नप, ब्रह्मा, यम, वरुण, सोम, सूर्य, हुताशन, गन्धमादी तथा परमेष्ठी—इन सोलह नामोंद्वारा प्रत्येकके आदिमें प्रणव और अन्तमें चतुर्थी विभक्ति और 'नमः' पद लगाकर अग्निमें एक-एक आहुति दे। इसके बाद 'वक्रतुण्डाय हुम्' इस मन्त्रके द्वारा एक-सौ आठ आहुति दे। तत्पश्चात् व्याहृतियोंद्वारा यथाशक्ति होम करके पूर्णाहुति दे। दिक्पालोंका पूजन करके चौबीस ब्राह्मणोंको लड्डू और खीर भोजन करावे। इसके बाद आचार्यको दक्षिणासहित सवत्सा गौ दान करे एवं दूसरे ब्राह्मणोंको यथाशक्ति भूयसी दक्षिणा दे। फिर प्रणाम और परिक्रमा करके उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको विदा करनेके पश्चात् स्वयं भी प्रसन्नचित्त होकर भाई-बन्धुओंके साथ भोजन करे। मनुष्य इस व्रतका पालन करके गणेशजीके प्रसादसे इहलोकमें उत्तम भोग भोगता और परलोकमें भगवान् विष्णुका सायुज्य लाभ करता है। नारद ! कुछ लोग इसका नाम 'वरव्रत' कहते हैं। इसका विधान भी यही है और फल भी उसके समान ही है। पौष मासकी चतुर्थीको भक्तिपूर्वक विघ्नेश्वर गणेशकी प्रार्थना करके एक ब्राह्मणको लड्डू भोजन करावे और दक्षिणा दे। मुने ! ऐसा करनेसे व्रती पुरुष धन-सम्पत्तिका भागी होता है।

माघ कृष्णा चतुर्थीको 'संकष्टव्रत' बतलाया जाता है। उसमें उपवासका संकल्प लेकर व्रती पुरुष सबेरेसे चन्द्रोदयकालतक नियमपूर्वक रहे। मनको काबूमें रखे। चन्द्रोदय होनेपर मिट्टीकी गणेशमूर्ति बनाकर उसे पीढ़ेपर स्थापित करे। गणेशजीके साथ उनके आयुध और वाहन भी होने चाहिये। मूर्तिमें गणेशजीकी स्थापना करके षोडशोपचारसे विधिपूर्वक उनका पूजन करे। फिर मोदक तथा गुड़में बने हुए तिलके लड्डूका नैवेद्य अर्पण करे। तत्पश्चात् ताँबेके पात्रमें लाल चन्दन, कुश, दूर्वा, फूल, अक्षत, शमीपत्र, दधि और जल एकत्र करके चन्द्रमाको अर्घ्य दे। उस समय निम्नाङ्कित मन्त्रका उच्चारण करे—

गगनार्णवमाणिक्य चन्द्र दाक्षायणीपते।
गृहाणार्घ्यं मया दत्तं गणेशप्रतिरूपक॥
(ना० पूर्व० ११३। ७७)

'गगनरूपी समुद्रके माणिक्य चन्द्रमा ! दक्षकन्या रोहिणीके प्रियतम ! गणेशके प्रतिबिम्ब ! आप मेरा दिया हुआ यह अर्घ्य स्वीकार कीजिये।'

इस प्रकार गणेशजीको यह दिव्य तथा पापनाशक अर्घ्य देकर यथाशक्ति उत्तम ब्राह्मणोंको भोजन करानेके पश्चात् स्वयं भी उनकी आज्ञा लेकर भोजन करे। ब्रह्मन् ! इस प्रकार कल्याणकारी 'संकष्टव्रत' का पालन करके मनुष्य धन-धान्यसे सम्पन्न होता है। वह कभी कष्टमें नहीं पड़ता। माघ शुक्ला चतुर्थीको परम उत्तम गौरीव्रत किया जाता है। उस दिन योगिनी-गणोंसहित गौरीजीकी पूजा करनी चाहिये। मनुष्यों और उनमें भी विशेषतः स्त्रियोंको कुन्द, पुष्प, कुङ्कुम, लाल सूत्र, लाल फूल, महावर, धूप, दीप, बलि, गुड़, अदरख, दूध, खीर, नमक और पालक आदिसे गौरीजीकी पूजा करनी चाहिये। अपनी सौभाग्यवृद्धिके लिये सौभाग्यवती स्त्रियों और उत्तम ब्राह्मणोंकी भी पूजा करनी चाहिये। उसके बाद बन्धु-बान्धवोंके साथ स्वयं भी भोजन करे। विप्रवर ! यह सौभाग्य तथा आरोग्य बढ़ानेवाला 'गौरीव्रत' है। स्त्रियों और पुरुषोंको प्रतिवर्ष इसका पालन करना चाहिये। कुछ लोग इसे 'ढुण्ढिव्रत' कहते हैं। किन्हीं-किन्हींके मतमें इसका नाम 'कुण्ड-व्रत' है। कुछ दूसरे लोग इसे 'ललिताव्रत' अथवा 'शान्तिव्रत' भी कहते हैं। मुने ! इस तिथिमें किया हुआ स्नान, दान, जप और होम सब कुछ गणेशजीकी कृपासे सदाके लिये सहस्रगुना हो जाता है। फाल्गुन मासकी चतुर्थीको

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मङ्गलमय 'ढुण्ढिराजव्रत' बताया गया है। उस दिन तिलके पीठसे ब्राह्मणोंको भोजन कराकर मनुष्य स्वयं भी भोजन करे। गणेशजीकी आराधनामें संलग्न होकर तिलोंसे ही दान, होम और पूजन आदि करनेपर मनुष्य गणेशके प्रसादसे सिद्धि प्राप्त कर लेता है। मनुष्यको चाहिये कि सोनेकी गणेशमूर्ति बनाकर यत्नपूर्वक उसकी पूजा करे और श्रेष्ठ ब्राह्मणको उसका दान कर दे। इससे समस्त सम्पदाओंकी वृद्धि होती है। विप्रेन्द्र! जिस किसी मासमें भी चतुर्थी तिथि रविवार या मङ्गलवारसे युक्त हो तो वह विशेष फल देनेवाली होती है। शुक्ल या कृष्ण पक्षकी सभी चतुर्थी तिथियोंमें भक्तिपरायण पुरुषोंको देवेश्वर गणेशका ही पूजन करना चाहिये।

सभी मासोंकी पञ्चमी तिथियोंमें करने योग्य व्रत-पूजन आदिका वर्णन

सनातनजी कहते हैं— ब्रह्मन्! सुनो, अब मैं तुम्हें पञ्चमीके व्रत कहता हूँ, जिनका भक्तिपूर्वक पालन करनेपर मनुष्य सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। चैत्रके शुक्लपक्षकी पञ्चमी तिथिको 'मत्स्यजयन्ती' कहते हैं। इसमें भक्तोंको मत्स्यावतार-विग्रहकी पूजा और तत्सम्बन्धी महोत्सव करने चाहिये। इसे 'श्रीपञ्चमी' भी कहते हैं। अतः उस दिन गन्ध आदि उपचारों तथा खीर आदि नैवेद्योंद्वारा श्रीलक्ष्मीजीका भी पूजन करना चाहिये। जो उस दिन लक्ष्मीजीकी पूजा करता है, उसे लक्ष्मी कभी नहीं छोड़तीं। उसी दिन 'पृथ्वीव्रत', 'चान्द्र-व्रत' तथा 'हयग्रीवव्रत' भी होता है। अतः उनकी पृथक्-पृथक् सिद्धि चाहनेवाले पुरुषोंको शास्त्रोक्त विधिसे उन-उन व्रतोंका पालन करना चाहिये। जो मनुष्य वैशाखकी पञ्चमीको सम्पूर्ण नागगणोंसे युक्त शेषनागकी पूजा करता है, वह मनोवाञ्छित फल पाता है। इसी प्रकार विद्वान् पुरुष ज्येष्ठकी पञ्चमी तिथिको पितरोंका पूजन करे। उस दिन ब्राह्मण-भोजन करानेसे सम्पूर्ण कामनाओं और अभीष्ट फलकी प्राप्ति होती है। मुने! आषाढ़ शुक्ल पञ्चमीको सर्वव्यापी वायुकी परीक्षा की जाती है। गाँवसे बाहर निकलकर धरतीपर खड़ा रहे और वहाँ एक बाँस खड़ा करे। बाँसके डंडेके अग्रभागमें पञ्चाङ्गी पताका लगा ले। तदनन्तर बाँसके मूल भागमें सब दिशाओंकी ओर लोकपालोंकी स्थापना एवं पूजा करके वायुकी परीक्षा करे। प्रथम आदि यामों (प्रहरों)-में जिस-जिस दिशाकी ओरसे वायु चलती है, उसी-उसी दिक्पाल या लोकपालकी भलीभाँति पूजा करे। इस प्रकार चार प्रहरतक वहाँ निराहार रहकर सायंकाल अपने घर आवे और थोड़ा भोजन करके एकाग्रचित्त हो लोकपालोंको नमस्कार करके पवित्र भूमिपर सो जाय। उस दिन रातके चौथे प्रहरमें जो स्वप्न होता है, वह निश्चय ही सत्य होता है— यह भगवान् शिवका कथन है। यदि अशुभ स्वप्न हो तो भगवान् शिवकी पूजामें तत्पर हो उपवासपूर्वक आठ पहर

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वितावे। फिर आठ ब्राह्मणोंको भोजन कराकर मनुष्य शुभ फलका भागी होता है। यह 'शुभाशुभ-निदर्शनव्रत' कहा गया है, जो मनुष्योंके इहलोक और परलोकमें भी सौभाग्यजनक होता है।

श्रावण मासके कृष्णपक्षकी चतुर्थीको जब थोड़ा दिन शेष रहे तो कच्चा अन्न (जितना दान देना हो) पृथक्-पृथक् पात्रोंमें रखकर विद्वान् पुरुष उन पात्रोंमें जल भर दे। तदनन्तर वह सब जल निकाल दे। फिर दूसरे दिन सबेरे सूर्योदय होनेपर विधिवत् स्नान करके देवताओं, ऋषियों तथा पितरोंका भलीभाँति पूजन करे। उनके आगे नैवेद्य स्थापित करे और वह पहले दिनका धोया हुआ कच्चा अन्न प्रसन्नतापूर्वक याचकोंको देवे। तत्पश्चात् प्रदोषकालमें शिवमन्दिरमें जाकर लिङ्गस्वरूप भगवान् शिवका गन्ध, पुष्प आदि सामग्रियोंके द्वारा सम्यक् पूजन करे। फिर सहस्र या सौ बार पञ्चाक्षरी विद्या ('नमः शिवाय' मन्त्र)-का जप करे। तदनन्तर उनका स्तवन करे। फिर सदा अन्नकी सिद्धिके लिये भगवान् शिवसे प्रार्थना करे। इसके बाद अपने घर आकर ब्राह्मण आदिको पकवान देकर स्वयं भी मौनभावसे भोजन करे। विप्रवर! यह 'अन्नव्रत' है, मनुष्योंद्वारा विधिपूर्वक इसका पालन होनेपर यह सम्पूर्ण अन्नसम्पत्तियोंका उत्पादक और परलोकमें सद्गति देनेवाला होता है।

श्रावण मासके शुक्लपक्षकी पञ्चमीके दिन आस्तिक मनुष्योंको चाहिये कि वे अपने दरवाजेके दोनों ओर गोबरसे सर्पोंकी आकृति बनावें और गन्ध, पुष्प आदिसे उनकी पूजा करें। तत्पश्चात् इन्द्राणीदेवीकी पूजा करें। सोने, चाँदी, दही, अक्षत, कुश, जल, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य आदिसे उन सबकी पूजा करके परिक्रमा करे और उस द्रव्यको प्रणाम करके भक्तिभावसे प्रार्थनापूर्वक श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको समर्पित करे। नारद! इस प्रकार भक्तिभावसे द्रव्य दान करनेवाले पुरुषपर स्वर्ण आदि समृद्धियोंके दाता धनाध्यक्ष कुबेर प्रसन्न होते हैं। फिर भक्तिभावसे ब्राह्मणोंको भोजन करानेके पश्चात् स्वयं भी स्त्री-पुत्र और सगे-सम्बन्धियोंके साथ भोजन करे।

भाद्रपद मासके कृष्ण पक्षकी पञ्चमीको दूधसे नागोंको तृप्त करे। जो ऐसा करता है उसकी सात पीढ़ियोंतकके लोग साँपसे निर्भय हो जाते हैं। भाद्रपदके शुक्ल पक्षकी पञ्चमीको श्रेष्ठ ऋषियोंकी पूजा करनी चाहिये। प्रातःकाल नदी आदिके तटपर जाकर सदा आलस्यरहित हो स्नान करे। फिर घर आकर यत्नपूर्वक मिट्टीकी वेदी बनावे। उसे गोबरसे लीपकर पुष्पोंसे सुशोभित करे। इसके बाद कुशा बिछाकर उसके ऊपर गन्ध, नाना प्रकारके पुष्प, धूप और सुन्दर दीप आदिके द्वारा सात ऋषियोंका पूजन करे। कश्यप, अत्रि, भरद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वसिष्ठ—ये सात ऋषि माने गये हैं। इनके लिये विधिवत् अर्घ्य तैयार करके अर्घ्यदान दे। बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि उनके लिये बिना जोते-बोये उत्पन्न हुए श्यामाक (साँवाके चावल) आदिसे नैवेद्य तैयार करे। वह नैवेद्य उन्हें अर्पण करके उन ऋषियोंका विसर्जन करनेके पश्चात् स्वयं भी वही प्रसादस्वरूप अन्न भोजन करे। इस व्रतका पालन करके मनुष्य मनोवाञ्छित फल भोगता और सप्तर्षियोंके प्रसादसे श्रेष्ठ विमानपर बैठकर दिव्यलोकमें जाता है।

आश्विन शुक्ला पञ्चमीको 'उपाङ्गललिताव्रत' होता है। नारद! यथाशक्ति ललिताजीकी स्वर्णमयी मूर्ति बनाकर षोडशोपचारसे उनकी विधिवत् पूजा करे। व्रतकी पूर्तिके लिये श्रेष्ठ ब्राह्मणको पकवान, फल, घी और दक्षिणा दान करे। तत्पश्चात् निम्नाङ्कितरूपसे प्रार्थना एवं विसर्जन करे—

सवाहना शक्तियुता वरदा पूजिता मया।
मातर्मामनुगृह्णाथ गम्यतां निजमन्दिरम्॥
(ना० पूर्व० ११४। ५२)

'मैंने वाहन और शक्तियोंसे युक्त वरदायिनी

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ललितादेवीका पूजन किया है। माँ! तुम मुझपर अनुग्रह करके अपने मन्दिरको पधारो।'

द्विजश्रेष्ठ! कार्तिक शुक्ला पञ्चमीको सब पापोंका नाश करनेके लिये श्रद्धापूर्वक परम उत्तम 'जया-व्रत' करना चाहिये। ब्रह्मन्! एकाग्रचित्त हो विधिपूर्वक षोडशोपचारसे जयादेवीकी पूजा करके पवित्र तथा वस्त्राभूषणोंसे अलंकृत हो एक ब्राह्मणको भोजन करावे और दक्षिणा देकर उसे विदा करे। तत्पश्चात् स्वयं मौन होकर भोजन करे। जो भक्तिपूर्वक जयाके दिन स्नान करता है, उसके सब पाप नष्ट हो जाते हैं। विप्रवर! अश्वमेध यज्ञके अन्तमें स्नान करनेसे जो फल बताया गया है, वही जयाके दिन भी स्नान करनेसे प्राप्त होता है। मार्गशीर्ष शुक्ला पञ्चमीको विधिपूर्वक नागोंकी पूजा करके मनुष्य उनसे अभय पाकर बन्धु-बान्धवोंके साथ प्रसन्न रहता है। पौष मासके शुक्ल पक्षकी पञ्चमीको भगवान् मधुसूदनकी पूजा करके मनुष्य मनोवाञ्छित कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। (इसी प्रकार माघ और फाल्गुनके लिये समझना चाहिये) नारद! प्रत्येक मासके शुक्ल और कृष्णपक्षमें भी पञ्चमीको पितरों और नागोंकी पूजा सर्वथा उत्तम मानी गयी है।

वर्षभरकी षष्ठी तिथियोंमें पालनीय व्रत एवं देवपूजन आदिकी विधि और महिमा

सनातनजी कहते हैं—विप्रवर! सुनो, अब मैं तुमसे षष्ठीके व्रतोंका वर्णन करता हूँ, जिनका यथार्थरूपसे अनुष्ठान करके मनुष्य यहाँ सम्पूर्ण मनोरथोंको प्राप्त कर लेता है। चैत्र शुक्ला षष्ठीको परम उत्तम 'कुमारव्रत' का विधान किया गया है। उसमें नाना प्रकारकी पूजा-विधिसे भगवान् षडाननकी^१ आराधना करके मनुष्य सर्वगुणसम्पन्न एवं चिरंजीवी पुत्र प्राप्त कर लेता है। वैशाख शुक्ला षष्ठीको कार्तिकेयजीकी पूजा करके मनुष्य मातृसुखलाभ करता है। ज्येष्ठ मासके शुक्ल पक्षकी षष्ठीको विधिपूर्वक सूर्यदेवकी पूजा करके उनकी कृपासे मनुष्य मनोवाञ्छित भोग पाता है। आषाढ़ शुक्ला षष्ठीको परम उत्तम 'स्कन्दव्रत'^२ करना चाहिये। उस दिन उपवास करके शिव तथा पार्वतीके प्रिय पुत्र स्कन्दजीकी पूजा करनेसे मनुष्य पुत्र-पौत्रादि सन्तानों और मनोवाञ्छित भोगोंको प्राप्त कर लेता है। श्रावण शुक्ला षष्ठीको उत्तम भक्तिभावसे युक्त हो षोडशोपचारद्वारा शरजन्मा भगवान् स्कन्दकी आराधना करनी चाहिये। ऐसा करनेवाला पुरुष षडाननकी कृपासे अभीष्ट मनोरथ प्राप्त कर लेता है। भाद्रपद मासके कृष्ण पक्षकी षष्ठीको 'ललिताव्रत' बताया गया है। उस दिन नारी विधिपूर्वक प्रातःकाल स्नान करनेके पश्चात् श्वेत वस्त्र धारण करके श्वेत मालासे अलंकृत हो नदी-संगमकी बालुका लेकर उसके पिण्ड बनाकर बाँसके पात्रमें रखे। इस प्रकार पाँच पिण्ड रखकर उसमें वन-विलासिनी ललितादेवीका ध्यान करे। फिर कमल, कनेर, नेवारी (वनमल्लिका), मालती, नील कमल, केतकी और तगरका संग्रह करके इनमेंसे एक-एकके एक सौ आठ या अट्ठाईस फूल ग्रहण करे। उन फूलोंकी अक्षत-कलिकाएँ ग्रहण करके उन्हींसे देवीकी पूजा करनी चाहिये। पूजनके पश्चात् सामने खड़े होकर उन शिवप्रिया ललितादेवीकी इस प्रकार प्रार्थना करे—

गङ्गाद्वारे कुशावर्ते बिल्वके नीलपर्वते।
स्नात्वा कनखले देवि हरं लब्धवती पतिम्॥
ललिते सुभगे देवि सुखसौभाग्यदायिनि।
अनन्तं देहि सौभाग्यं मह्यं तुभ्यं नमो नमः॥
(ना० पूर्व० ११५। १३-१५)

'देवि! आपने गङ्गाद्वार, कुशावर्त, बिल्वक, नीलपर्वत और कनखल तीर्थमें स्नान करके भगवान् शिवको पतिरूपमें प्राप्त किया है। सुख


१-२ कार्तिकेय।