संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पूर्वभाग- चतुर्थ पाद ५३१
- पूर्वभाग- चतुर्थ पाद * ५३१
भविष्यपुराणका परिचय तथा उसके पाठ, श्रवण एवं दानका माहात्म्य
ब्रह्माजी कहते हैं— अब मैं तुम्हें सब प्रकारकी सिद्धि प्रदान करनेवाले भविष्यपुराणका वर्णन करता हूँ, जो सब लोगोंके अभीष्ट मनोरथको सिद्ध करनेवाला है; जिसमें मैं ब्रह्मा सम्पूर्ण देवताओंका आदि स्रष्टा बताया गया हूँ। पूर्वकालमें सृष्टिके लिये स्वयम्भू मनु उत्पन्न हुए। उन्होंने मुझे प्रणाम करके सर्वार्थसाधक धर्मके विषयमें प्रश्न किया। तब मैंने प्रसन्न होकर उन्हें धर्मसंहिताका उपदेश किया। परम बुद्धिमान् व्यास जब पुराणोंका विस्तार करने लगे तो उन्होंने उस धर्मसंहिताके पाँच विभाग किये। उनमें नाना प्रकारकी आश्चर्यजनक कथाओंसे युक्त अघोरकल्पका वृत्तान्त है। उस पुराणमें पहला पर्व 'ब्रह्मपर्व' के नामसे प्रसिद्ध है। इसीमें ग्रन्थका उपक्रम है। सूत-शौनक-संवादमें पुराणविषयक प्रश्न है। इसमें अधिकतर सूर्यदेवका ही चरित्र है। अन्य सब उपाख्यान भी इसमें आये हैं। इसमें सृष्टि आदिके लक्षण बताये गये हैं। शास्त्रोंका तो यह सर्वस्वरूप है। इसमें पुस्तक, लेखक और लेख्यका भी लक्षण दिया गया है। सब प्रकारके संस्कारोंका भी लक्षण बताया गया है। पक्षकी आदि सात तिथियोंके सात कल्प कहे गये हैं। अष्टमी आदि तिथियोंके शेष आठ कल्प 'वैष्णवपर्व' में बताये गये हैं। 'शैवपर्व' में ब्रह्मपर्वसे भिन्न कथाएँ हैं। 'सौरपर्व' में अन्तिम कथाओंका सम्बन्ध देखा जाता है। तत्पश्चात् 'प्रतिसर्ग पर्व' है, जिसमें पुराणके उपसंहारका वर्णन है। यह नाना प्रकारके उपाख्यानोंसे युक्त पाँचवाँ पर्व है। इन पाँच पर्वोंमेंसे पहलेमें मुझ ब्रह्माकी महिमा अधिक है। दूसरे और तीसरे पर्वोंमें धर्म, काम और मोक्ष विषयको लेकर क्रमशः भगवान् विष्णु तथा शिवकी महिमाका वर्णन है। चौथे पर्वमें सूर्यदेवकी महिमाका प्रतिपादन किया गया है। अन्तिम या पाँचवाँ पर्व प्रतिसर्ग नामसे प्रसिद्ध है। इसमें सब प्रकारकी कथाएँ हैं। बुद्धिमान् व्यासजीने इस पर्वका भविष्यकी कथाओंके साथ उल्लेख किया है। भविष्यपुराणकी श्लोक-संख्या चौदह हजार बतायी गयी है। इसमें ब्रह्मा, विष्णु आदि सब देवताओंकी समताका प्रतिपादन किया गया है। ब्रह्म सर्वत्र सम है। गुणोंके तारतम्यसे उसमें विषमता प्रतीत होती है। ऐसा श्रुतिका कथन है। जो विद्वान् ईर्ष्या-द्वेष छोड़कर सुवर्ण, वस्त्र, माला, आभूषण, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप और भक्ष्य-भोज्य आदि नैवेद्योंसे विधिपूर्वक वाचक और पुस्तककी पूजा करता है और भविष्यपुराणकी पुस्तकको लिखकर गुड़धेनुके साथ पौषकी पूर्णिमाको उसका दान करता है तथा जो जितेन्द्रिय, निराहार अथवा एक समय हविष्यभोजी एवं एकाग्रचित्त होकर इस पुराणका पाठ और श्रवण करता है, वह भयंकर पातकोंसे मुक्त होकर ब्रह्मलोकमें चला जाता है। जो भविष्यपुराणकी इस अनुक्रमणिकाका पाठ अथवा श्रवण करता है, वह भी भोग एवं मोक्ष प्राप्त कर लेता है।
५३२ * संक्षिप्त नारदपुराण *
ब्रह्मवैवर्तपुराणका परिचय तथा उसके पाठ, श्रवण एवं दान आदिकी महिमा
ब्रह्माजी कहते हैं—वत्स! सुनो, अब मैं तुम्हें दसवें पुराण ब्रह्मवैवर्तका परिचय देता हूँ, जो वेदमार्गका साक्षात्कार करानेवाला है। जहाँ देवर्षि नारदको उनके प्रार्थना करनेपर भगवान् सावर्णिने सम्पूर्ण पुराणोक्त विषयका उपदेश किया था। यह पुराण अलौकिक एवं धर्म, अर्थ, काम और मोक्षका सारभूत है। इसके पाठ और श्रवणसे भगवान् विष्णु और शिवमें प्रीति होती है। उन दोनोंमें अभेद-सिद्धिके लिये इस उत्तम ब्रह्मवैवर्तपुराणका उपदेश किया गया है। मैंने रथन्तर कल्पका जो वृत्तान्त बताया था, उसीको वेदवेत्ता व्यासने संक्षिप्त करके शतकोटिपुराणमें कहा है। व्यासजीने ब्रह्मवैवर्तपुराणके चार भाग किये हैं, जिनके नाम हैं—'ब्रह्मखण्ड', 'प्रकृतिखण्ड' 'गणेशखण्ड' और 'श्रीकृष्णखण्ड'। इन चारों खण्डोंसे युक्त यह पुराण अठारह हजार श्लोकोंका बताया गया है। उसमें सूत और महर्षियोंके संवादमें पुराणका उपक्रम है। उसमें पहला प्रकरण सृष्टिवर्णनका है। फिर नारदके और मेरे महान् विवादका वर्णन है, जिसमें दोनोंका पराभव हुआ था। मरीचे! फिर नारदका शिवलोकगमन और भगवान् शिवसे नारदमुनिको ज्ञानकी प्राप्तिका कथन है। तदनन्तर शिवजीके कहनेसे ज्ञानलाभके लिये सावर्णिके सिद्धसेवित आश्रममें, जो परम पुण्यमय तथा त्रिलोकीको आश्चर्यमें डालनेवाला था, नारदजीके जानेकी बात कही गयी है। यह 'ब्रह्मखण्ड' है, जो श्रवण करनेपर सब पापोंका नाश कर देता है। तदनन्तर नारद-सावर्णि-संवादका वर्णन है। इसमें श्रीकृष्णका माहात्म्य तथा नाना प्रकारके आख्यान और कथाएँ हैं। प्रकृतिकी अंशभूत कलाओंके माहात्म्य और पूजन आदिका विस्तारपूर्वक यथावत् वर्णन किया गया है। यह 'प्रकृतिखण्ड' है, जो श्रवण करनेपर ऐश्वर्य प्रदान करता है। तदनन्तर गणेशजन्मके विषयमें प्रश्न किया गया है। पार्वतीजीके द्वारा पुण्यक नामक महाव्रतके अनुष्ठानकी चर्चा है। तत्पश्चात् कार्तिकेय और गणेशजीकी उत्पत्ति कही गयी है। इसके बाद कार्तवीर्य अर्जुन और जमदग्निनन्दन परशुरामजीके अद्भुत चरित्रका वर्णन है, फिर गणेश और परशुरामजीमें जो महान् विवाद हुआ था, उसका उल्लेख किया गया है। यह 'गणेशखण्ड' है, जो सब विघ्नोंका नाश करनेवाला है। तदनन्तर श्रीकृष्णजन्मके विषयमें प्रश्न और उनके जन्मकी अद्भुत कथा है। फिर गोकुलमें गमन तथा पूतना आदिके वधकी आश्चर्यमयी कथा है। तत्पश्चात् श्रीकृष्णकी बाल्यावस्था और कुमारावस्थाकी विविध लीलाओंका वर्णन है। उसके बाद शरत्पूर्णिमाकी रात्रिमें गोपसुन्दरियोंके साथ श्रीकृष्णकी रासक्रीड़ाका वर्णन है। रहस्यमें श्रीराधाके साथ उनकी क्रीड़ाका बहुत विस्तारके साथ प्रतिपादन किया गया है। तत्पश्चात् अक्रूरजीके साथ श्रीकृष्णके मथुरागमनकी कथा है। कंस आदिका वध हो जानेके बाद श्रीकृष्णके द्विजोचित संस्कारका उल्लेख है। फिर काश्य गोत्रोत्पन्न सान्दीपनि मुनिसे उनके विद्याग्रहणकी अद्भुत कथा है। तदनन्तर कालयवनका वध, श्रीकृष्णका द्वारकागमन तथा वहाँ उनके द्वारा की हुई नरकासुर आदिके वधकी अद्भुत लीलाओंका वर्णन है। ब्रह्मन्! यह 'श्रीकृष्णखण्ड' है, जो पढ़ने, सुनने, ध्यान करने, पूजा करने अथवा नमस्कार करनेपर भी मनुष्योंके संसार-दुःखका खण्डन करनेवाला है। व्यासजीके द्वारा कहे हुए इस प्राचीन और अलौकिक ब्रह्मवैवर्तपुराणका पाठ अथवा श्रवण करनेवाला मनुष्य ज्ञान-विज्ञानका नाश करनेवाले भयंकर संसार-सागरसे मुक्त हो जाता है। जो इस पुराणको लिखकर