संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पूर्वभाग-द्वितीय पाद ३२९
- पूर्वभाग-द्वितीय पाद * ३२९
हो तो दासकर्म करनेवाला, मकर-नवमांश हो तो पापस्वभाव, कुम्भ-नवमांश हो तो हिंसाके स्वभाववाला और मीन-नवमांश लग्नमें हो तो बुद्धिहीन होता है। किंतु यदि वर्गोत्तम नवमांश (अर्थात् जो राशि हो उसीका नवमांश भी) हो तो वह जातक इन (चोरस्वभाव आदि सब)-का शासक होता है। (जैसे मेष-नवमांशमें उत्पन्न मनुष्य चोरस्वभाव होता है, किंतु यदि मेष राशिमें मेषका नवमांश हो तो वह चोरस्वभाववालोंका शासक होता है, इत्यादि।) इसी प्रकार मेषादि राशियोंके द्वादशांशमें मेषादि राशियोंके समान फल प्राप्त होते हैं॥ २६७-२६८॥
(मङ्गल आदि ग्रहोंके त्रिंशांशफल—) मङ्गल अपने त्रिंशांशमें हो तो जातक स्त्री, बल, आभूषण तथा परिजनादिसे सम्पन्न, साहसी और तेजस्वी होता है। शनि अपने त्रिंशांशमें हो तो रोगी, स्त्रीके प्रति कुटिल, परस्त्रीमें आसक्त, दुःखी, वस्त्रादि आवश्यक सामग्रीसे सम्पन्न, किंतु मलिन होता है। गुरु अपने त्रिंशांशमें हो तो जातक सुखी, बुद्धिमान्, धनी, कीर्तिमान्, तेजस्वी, लोकमें मान्य, रोगहीन, उद्यमी और भोगी होता है। बुध अपने त्रिंशांशमें हो तो मनुष्य मेधावी, कलाकुशल, काव्य और शिल्पविद्याका ज्ञाता, विवादी, कपटी, शास्त्रतत्त्वज्ञ तथा साहसी होता है। शुक्र अपने त्रिंशांशमें हो तो जातक अधिक संतान, सुख, आरोग्य, सौन्दर्य और धनसे युक्त, मनोहर शरीरवाला तथा अजितेन्द्रिय होता है॥२६९–२७३॥
(सूर्य-चन्द्र-फल—) मङ्गलके त्रिंशांशमें सूर्य हो तो जातक शूरवीर, चन्द्रमा हो तो दीर्घसूत्री, बुधके त्रिंशांशमें सूर्य हो तो जातक कुटिल और चन्द्रमा हो तो हिंसाके स्वभाववाला होता है। गुरुके त्रिंशांशमें रवि हो तो गुणी और चन्द्रमा हो तो भी गुणी होता है। शुक्रके त्रिंशांशमें सूर्य हो तो बालक सुखी और चन्द्रमा हो तो विद्वान् होता है। शनिके त्रिंशांशमें रवि हो तो सुन्दर शरीरवाला तथा चन्द्रमा हो तो सर्वजनप्रिय होता है॥ २७४॥
(कारक ग्रह—) अपने-अपने मूल त्रिकोण, स्वराशि या स्वोच्चमें स्थित ग्रह यदि केन्द्रमें हों तो वे सब परस्पर कारक (शुभफलदायक) होते हैं, उनमें दशम स्थानमें रहनेवाला सबसे बढ़कर कारक होता है॥ २७५॥
(शुभजन्मलक्षण—) लग्न या चन्द्रमा वर्गोत्तम नवमांशमें हो या वेशि (सूर्यसे द्वितीय) स्थानमें शुभग्रह हो अथवा केन्द्रोंमें कारक ग्रह हों तो जन्म शुभप्रद होता है। अर्थात् इस स्थितिमें जन्म लेनेवाला बालक सुखी और यशस्वी होता है॥ २७६॥ गुरु, जन्मराशि और जन्म-लग्नश ये सभी या इनमेंसे एक भी केन्द्रमें हो तो जीवनके मध्यभागमें सुखप्रद होते हैं।* तथा पृष्ठोदय राशिमें रहनेवाला ग्रह वयस्के अन्तमें, द्विस्वभाव राशिस्थ ग्रह वयस्के मध्यमें और शीर्षोदय राशिस्थ ग्रह पूर्ववयस्में अपने-अपने फल देते हैं॥ २७७॥
(ग्रहगोचरफलसमय—) सूर्य और मङ्गल ये दोनों राशिमें प्रवेश करते ही अपने राशि-सम्बन्धी (गोचर) फल देते हैं। शुक्र और बृहस्पति राशिके मध्यमें जानेपर और चन्द्रमा तथा शनि ये दोनों राशिके अन्तिम तृतीयांशमें पहुँचनेपर अपने शुभ या अशुभ गोचर फल देते हैं। तथा बुध सर्वदा (आदि, मध्य, अन्तमें) अपने शुभाशुभ फलको देता है॥ २७८॥
(शुभाशुभ योग—) लग्न या चन्द्रमासे पञ्चम और सप्तम भाव शुभग्रह और अपने स्वामीसे युक्त या दृष्ट हों तो जातकको उन दोनों (पुत्र और स्त्री)-का सुख सुलभ होता है,
*आशय यह है कि पूर्वकेन्द्र (१ लग्न) में हों तो वयस्के आरम्भमें, मध्यकेन्द्र (४, १०)-में हों तो मध्य वयस् (युवावस्था)में, यदि पश्चिम केन्द्र (७)में हों तो अंतिम वयस्में सुखप्रद होते हैं। इससे सिद्ध है कि जिसके जन्म-समयमें तीन केन्द्रोंमें शुभग्रह हों, वह जीवनपर्यन्त सुखी रहता है।
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अन्यथा नहीं। तथा कन्या लग्नमें रवि और मीन लग्नमें शनि हो तो ये दोनों स्त्रीका नाश करनेवाले होते हैं। इसी प्रकार पञ्चम भाव (मेष-वृश्चिकसे अतिरिक्त राशि)-में मङ्गल हो तो पुत्रका नाश करनेवाला होता है। यदि शुक्रसे केन्द्र (१, ४, ७, १०)-में पापग्रह हों अथवा दो पापग्रहोंके बीचमें शुक्र हों, उनपर शुभग्रहका योग या दृष्टि नहीं हो तो उस जातककी स्त्रीका मरण अग्निसे या गिरनेसे होता है। लग्नसे १२, ६ भावोंमें चन्द्रमा और सूर्य हों तो वह स्त्रीसहित* एक नेत्रवाले (काण) पुरुषको जन्म देता है। ऐसा मुनियोंने कहा है। लग्नसे सप्तम या नवम, पञ्चममें शुक्र और सूर्य दोनों हों तो उस जातककी स्त्री विकल (अङ्गहीना) होती है॥ २७९-२८२॥
शनि लग्नमें और शुक्र सप्तम भावमें राशिसन्धि (कर्क, वृश्चिक, मीनके अन्तिमांश) में हों तो वह जातक वन्ध्या स्त्रीका पति होता है। यदि पञ्चम भाव शुभग्रहसे युक्त या दृष्ट न हो, लग्नसे १२, ७वें और लग्नमें यदि पापग्रह हों तथा पञ्चम भावमें क्षीण चन्द्रमा स्थित हों तो वह पुरुष पुत्र और स्त्रीसे रहित होता है। शनिके वर्ग (राशि-नवांश)-में शुक्र सप्तम भावमें हो और शनिसे दृष्ट हो तो वह जातक परस्त्रीमें आसक्त होता है। यदि वे दोनों (शनि और शुक्र) चन्द्रमाके साथ हों तो वह स्वयं परस्त्रीमें आसक्त और उसकी पत्नी परपुरुषमें आसक्त होती है॥ २८३-२८४ १/२॥
शुक्र और चन्द्रमा दोनों सप्तम भावमें हों तो जातक स्त्रीहीन अथवा पुत्रहीन होता है। पुरुष और स्त्री ग्रह सप्तम भावमें हों और उनपर शुभग्रहोंकी दृष्टि हो तो पति-पत्नी दोनों परिणताङ्ग (परमायुर्दाय भोगकर वृद्धावस्थातक जीनेवाले) होते हैं। दशम, सप्तम और चतुर्थ भावमें क्रमशः चन्द्रमा, शुक्र और पापग्रह हों तो जातक वंशका नाशक होता है। अर्थात् उसका वंश नष्ट हो जाता है। बुध जिस द्रेष्काणमें हो उसपर यदि केन्द्र-स्थित शनिकी दृष्टि हो तो जातक शिल्पकलामें कुशल होता है। शुक्र यदि शनिके नवमांशमें होकर द्वादश भावमें स्थित हो तो जातक दासीका पुत्र होता है। सूर्य और चन्द्रमा दोनों सप्तम भावमें रहकर शनिसे दृष्ट हों तो जातक नीच स्वभाववाला होता है। शुक्र और मङ्गल दोनों सप्तम भावमें स्थित हों और उनपर पापग्रहकी दृष्टि हो तो जातक वातरोगी होता है। कर्क या वृश्चिकके नवमांशमें स्थित चन्द्रमा यदि पापग्रहसे युक्त हो तो बालक गुह्य रोगसे ग्रस्त होता है। चन्द्रमा यदि पापग्रहोंके बीचमें रहकर लग्नमें स्थित हो तो उत्पन्न शिशु कुष्ठरोगी होता है। चन्द्रमा दशम भावमें, मङ्गल सप्तम भावमें और शनि यदि वेशि (सूर्यसे द्वितीय) स्थानमें हो तो जातक विकल (अङ्गहीन) होता है। सूर्य और चन्द्रमा दोनों परस्पर नवमांशमें हों तो बालक शूलरोगी होता है। यदि दोनों किसी एक ही स्थानमें हों तो कृश (क्षीणशरीर) होता है। यदि सूर्य, चन्द्रमा, मङ्गल और शनि—ये चारों क्रमशः ८, ६, २, १२ भावोंमें स्थित हों तो इनमें जो बली हो, उस ग्रहके दोष (कफ, पित्त और वात-सम्बन्धी विकार)-से जातक नेत्रहीन होता है। यदि ९, ११, ३, ५—इन भावोंमें पापग्रह हों तथा उनपर शुभग्रहकी दृष्टि नहीं हो तो वे उत्पन्न शिशुके लिये कर्णरोग उत्पन्न करनेवाले होते हैं। सप्तम भावमें स्थित पापग्रह यदि शुभग्रहसे दृष्ट न हों तो वे दन्तरोग उत्पन्न करते हैं। लग्नमें गुरु और सप्तम भावमें शनि हो तो जातक वातरोगसे पीड़ित होता है। ४ या ७ भावमें मङ्गल और लग्नमें बृहस्पति हो अथवा शनि लग्नमें और मङ्गल ९, ५, ७ भावमें हो अथवा बुधसहित चन्द्रमा १२ भावमें हो तो जातक उन्मादरोगसे पीड़ित होता है॥ २८५-२९३ १/२॥
यदि ५, ९, २ और १२ भावोंमें पापग्रह हों
*सारांश यह कि पुरुष तो काना होता ही है, उसे स्त्री भी कानी ही मिलती है।