संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पूर्वभाग-द्वितीय पाद ३४९
- पूर्वभाग-द्वितीय पाद * ३४९
क्रूर, बुध अखिल (सम्पूर्ण), गुरु लघु, शुक्र मृदु और शनि तीक्ष्ण धर्मवाला है।
(वारोंमें तेल लगानेका फल—) जो मनुष्य रविवारको तेल लगाता है, वह रोगी होता है। सोमवारको तेल लगानेसे कान्ति बढ़ती है। मङ्गलको व्याधि होती है। बुधको तैलाभ्यङ्गसे सौभाग्यकी वृद्धि होती है। गुरुवारको सौभाग्यकी हानि होती है, शुक्रवारको भी हानि होती है तथा शनिवारको तेल लगानेसे धन-सम्पत्तिकी वृद्धि होती है॥ १५६-१५८॥
(रवि आदि वारोंका आरम्भकाल—) जिस समय लङ्कामें (भूमध्यरेखापर) सूर्योदय होता है, उसी समयसे सर्वत्र रवि आदि वारोंका आरम्भ होता है। उस समयसे देशान्तर (लङ्कोदयकालसे अपने उदय कालका अन्तर) और चरार्ध घटीतुल्य आगे या पीछे अन्य देशमें सूर्योदय हुआ करता है¹॥ १५९॥ जो ग्रह बलवान् होता है, उसके वारमें जो कोई भी कार्य किया जाता है, वह सिद्ध हुआ करता है; किंतु जो ग्रह बलहीन (जातक-अध्यायमें कहे हुए बलसे रहित) होता है, उसके वारमें बहुत यत्न करनेपर भी कार्य सिद्ध नहीं होता है॥ १६०॥ सोम, बुध, बृहस्पति और शुक्र सम्पूर्ण शुभ कार्योंमें शुभप्रद होते हैं, अन्य वार (शनि, रवि और मङ्गल) क्रूर कर्ममें इष्टसिद्धिदायक होते हैं॥ १६१॥
सूर्यका वर्ण लाल है, चन्द्रमा गौर वर्णके हैं, मङ्गल अधिक लाल हैं, बुधकी कान्ति दूर्वादलके समान श्याम है, गुरुका वर्ण सुवर्णके सदृश पीत है, शुक्र श्वेत और शनि कृष्ण वर्णके हैं; इसलिये उन ग्रहोंके वारोंमें इनके गुण और वर्णके अनुरूप कार्य ही सिद्ध एवं हितकर होते हैं।
(निन्द्य मुहूर्त—) रविवारसे आरम्भ करके—रविमें ७, ५, ४; सोममें ६, ४, ७; मङ्गलमें ५, ३, २; बुधमें ४, २, ५; गुरुवारमें ३, १, ८; शुक्रवारमें २, ७, ३ और शनिमें १, ६, ८—ये प्रहरार्ध क्रमशः कुलिक, उपकुलिक और वारवेला कहे गये हैं। इनका मान आधे पहरका समझना चाहिये॥ १६२-१६५॥
(प्रत्येक वारमें क्षणवार-कथन—) जिस वारमें क्षणवार जानना हो उस वारमें प्रथम क्षणवार उसी वारपतिका होता है। उससे छठे वारेशका द्वितीय, उससे भी छठेका तृतीय, इस प्रकार छठे-छठेके क्रमसे दिन-रातमें २४ क्षणवार (कालहोरा या होरा) होते हैं। एक-एक क्षणवारका मान ढाई-ढाई घटी (या १ घंटा) है²॥ १६६-१६७॥
(क्षणवारका प्रयोजन—) जिस वारमें जो
१. इससे सिद्ध होता है कि अपने-अपने सूर्योदयकालसे देशान्तर और चरार्धकाल आगे या पीछे वारप्रवेश हुआ करता है।
२. दिन-रातमें होरा जाननेका चक्र—
| होरा | रवि | सोम | मङ्गल | बुध | गुरु | शुक्र | शनि |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| १ | रवि | सोम | मङ्गल | बुध | गुरु | शुक्र | शनि |
| २ | शुक्र | शनि | रवि | सोम | मङ्गल | बुध | गुरु |
| ३ | बुध | गुरु | शुक्र | शनि | रवि | सोम | मङ्गल |
| ४ | सोम | मङ्गल | बुध | गुरु | शुक्र | शनि | रवि |
| ५ | शनि | रवि | सोम | मङ्गल | बुध | गुरु | शुक्र |
| ६ | गुरु | शुक्र | शनि | रवि | सोम | मङ्गल | बुध |
| ७ | मङ्गल | बुध | गुरु | शुक्र | शनि | रवि | सोम |
| ८ | रवि | सोम | मङ्गल | बुध | गुरु | शुक्र | शनि |
| ९ | शुक्र | शनि | रवि | सोम | मङ्गल | बुध | गुरु |
३५० * संक्षिप्त नारदपुराण *
कर्म शुभ या अशुभ कहा गया है, वह उसके क्षणवारमें भी उसी प्रकार शुभ-अशुभ समझना चाहिये॥ १६७ १/२ ॥
(नक्षत्राधिपति-कथन—) १ दस्र (अश्विनीकुमार), २ यम, ३ अग्नि, ४ ब्रह्मा, ५ चन्द्र, ६ शिव, ७ अदिति, ८ गुरु, ९ सर्प, १० पितर, ११ भग, १२ अर्यमा, १३ सूर्य, १४ विश्वकर्मा, १५ वायु, १६ इन्द्र और अग्नि, १७ मित्र, १८ इन्द्र, १९ राक्षस (निर्ऋति), २० जल, २१ विश्वेदेव, २२ ब्रह्मा, २३ विष्णु, २४ वसु, २५ वरुण, २६ अजैकपाद, २७ अहिर्बुध्न्य और २८ पूषा—ये क्रमशः (अभिजित्सहित) अश्विनी आदि २८ नक्षत्रोंके स्वामी कहे गये हैं॥ १६८-१७०॥
(नक्षत्रोंके मुख—) पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वाषाढ़, पूर्व भाद्रपद, मघा, आश्लेषा, कृत्तिका, विशाखा, भरणी, मूल—ये नौ नक्षत्र अधोमुख (नीचे मुखवाले) हैं। इनमें बिलप्रवेश (कुआँ, भूविवर या पाताल आदिमें जाना), गणित, भूतसाधन, लेखन, शिल्प (चित्र आदि) कला, कुआँ खोदना तथा गाड़े हुए धनको निकालना आदि सब कार्य सिद्ध होते हैं॥ १७१-१७२॥
अनुराधा, मृगशिरा, चित्रा, हस्त, ज्येष्ठा, पुनर्वसु, रेवती, अश्विनी और स्वाती—ये नौ नक्षत्र तिर्यक् (सामने) मुखवाले हैं। इनमें हल जोतना, यात्रा करना, गाड़ी बनाना, पत्र लिखकर भेजना, हाथी, ऊँट आदिकी सवारी करना, गदहे, बैल आदिसे चलनेवाले रथ बनाना, नौकापर चलना तथा भैंस, घोड़े आदि-सम्बन्धी कार्य करने चाहिये ॥ १७३-१७४ ॥
रोहिणी, श्रवण, आर्द्रा, पुष्य, शतभिषा, धनिष्ठा, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़ तथा उत्तर भाद्रपद—ये नौ नक्षत्र ऊर्ध्वमुख (ऊपर मुखवाले) कहे गये हैं। इनमें राज्याभिषेक, मङ्गल (विवाहादि)-कार्य, गजारोहण, ध्वजारोपण, मन्दिर-निर्माण, तोरण (फाटक) बनाना, बगीचे लगाना और चहारदीवारी बनवाना आदि कार्य सिद्ध होते हैं॥ १७५-१७६॥
| १० | बुध | गुरु | शुक्र | शनि | रवि | सोम | मङ्गल |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ११ | सोम | मङ्गल | बुध | गुरु | शुक्र | शनि | रवि |
| १२ | शनि | रवि | सोम | मङ्गल | बुध | गुरु | शुक्र |
| १३ | गुरु | शुक्र | शनि | रवि | सोम | मङ्गल | बुध |
| १४ | मङ्गल | बुध | गुरु | शुक्र | शनि | रवि | सोम |
| १५ | रवि | सोम | मङ्गल | बुध | गुरु | शुक्र | शनि |
| १६ | शुक्र | शनि | रवि | सोम | मङ्गल | बुध | गुरु |
| १७ | बुध | गुरु | शुक्र | शनि | रवि | सोम | मङ्गल |
| १८ | सोम | मङ्गल | बुध | गुरु | शुक्र | शनि | रवि |
| १९ | शनि | रवि | सोम | मङ्गल | बुध | गुरु | शुक्र |
| २० | गुरु | शुक्र | शनि | रवि | सोम | मङ्गल | बुध |
| २१ | मङ्गल | बुध | गुरु | शुक्र | शनि | रवि | सोम |
| २२ | रवि | सोम | मङ्गल | बुध | गुरु | शुक्र | शनि |
| २३ | शुक्र | शनि | रवि | सोम | मङ्गल | बुध | गुरु |
| २४ | बुध | गुरु | शुक्र | शनि | रवि | सोम | मङ्गल |
क्षणवार (होरेश) जाननेका प्रकार यह है कि जिस दिन होरेश (क्षणवार)-का विचार करना हो, उस दिनका प्रथम घंटा उसी दिनका क्षणवार होता है। इससे आगे उससे छठे-छठे दिनका क्षणवार समझे। जैसे रविवारमें वारप्रवेश-कालसे पहला घंटा रविका, दूसरा घंटा रविसे छठे शुक्रका, तीसरा घंटा शुक्रसे छठे बुधका इत्यादि क्रमसे ऊपर चक्रमें देखिये।