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संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

\ उत्तरभाग \ ६०९

* उत्तरभाग * ६०९

महीपाल! चाण्डाल भी यदि भगवान् विष्णुका भक्त है तो वह द्विजसे भी बढ़कर है और द्विज भी यदि विष्णुभक्तिसे रहित है तो वह चाण्डालसे भी अधिक नीच है। भूपाल! इस पृथ्वीपर विष्णुभक्त राजा दुर्लभ हैं*। जो राजा भगवान् विष्णुका भक्त नहीं है, वह भूदेवी और लक्ष्मीदेवीकी कृपा नहीं प्राप्त कर सकता। तुमने भगवान् विष्णुकी आराधना करके न्यायोचित कर्तव्यका ही पालन किया है। नृपते! भगवान्की आराधनासे तुम धन्य हो गये हो और तुम्हारे दर्शनसे हम भी धन्य हो गये।'

वामदेवजीको ऐसी बातें करते देख नृपश्रेष्ठ रुक्माङ्गद, जो स्वभावसे ही विनयी थे, अत्यन्त नम्र होकर उनसे बोले—'द्विजश्रेष्ठ! आपसे क्षमा माँगता हूँ। भगवन्! आप जैसा कहते हैं, वैसा महान् मैं नहीं हूँ। विप्रवर! आपके चरणोंकी धूलके बराबर भी मैं नहीं हूँ। इस जगत्में देवता भी कभी ब्राह्मणोंसे बढ़कर नहीं हो सकते; क्योंकि ब्राह्मणोंके संतुष्ट होनेपर जीवकी भगवान् विष्णुमें भक्ति होती है।' तब वामदेवजीने उनसे कहा—'राजन्! इस समय तुम मेरे घरपर आये हो। तुम्हारे लिये कुछ भी अदेय नहीं है, अतः बोलो, मैं तुम्हें क्या दूँ? महीपाल! इस भूतलपर जो सबको अभीष्ट वस्तु प्रदान करता है और एकादशीके दिन डंका पीटकर प्रजाको भोजन करनेसे रोकता है, उसके लिये क्या नहीं दिया जा सकता।'

कर लिया।' राजा रुक्माङ्गदकी यह बात सुनकर वामदेवजी बड़े प्रसन्न हुए और कुशल-मङ्गल पूछकर बोले—'राजन्! तुम अत्यन्त पुण्यात्मा तथा भगवान् विष्णुके भक्त हो। महाभाग! तुम्हारी दृष्टि पड़नेसे मेरा यह आश्रम इस पृथ्वीपर अधिक पुण्यमय हो गया। भूमण्डलमें कौन ऐसा राजा होगा, जो तुम्हारी समानता कर सके। तुमने यमराजको जीतकर उनके लोकमें जानेका मार्ग ही नष्ट कर दिया। राजन्! सब लोगोंसे पापनाशिनी (एकादशीसंयुक्त) द्वादशीका व्रत कराकर सबको तुमने अविनाशी वैकुण्ठधाममें पहुँचा दिया। साम, दान, दण्ड और भेद—इन चार प्रकारके सुन्दर उपायोंसे भूमण्डलकी प्रजाको संयममें रखकर अपने कर्म या विपरीत कर्ममें लगी हुई सब प्रजाको तुमने भगवान् विष्णुके धाममें भेज दिया। नरेश्वर! हम भी तुम्हारे दर्शनकी इच्छा रखते थे, सो तुमने स्वयं दर्शन दे दिया।

तब राजाने हाथ जोड़कर विप्रवर वामदेवजीसे कहा—'ब्रह्मन्! आपके युगल चरणोंके दर्शनसे मैंने सब कुछ पा लिया। मेरे मनमें बहुत दिनोंसे एक संशय है। मैं उसीके विषयमें आपसे पूछता हूँ; क्योंकि आप सब संदेहोंका निवारण करनेवाले


* श्वपचोऽपि महीपाल विष्णुभक्तो द्विजाधिकः ॥
विष्णुभक्तविहीनस्तु द्विजोऽपि श्वपचाधिकः। दुर्लभा भूप राजानो विष्णुभक्ता महीतले ॥
(ना० उत्तर० १० । ३७-३८ )

६१० * संक्षिप्त नारदपुराण *


ब्राह्मणशिरोमणि हैं। मुझे किस सत्कर्मके फलसे त्रिभुवनसुन्दरी पत्नी प्राप्त हुई है, जो सदा मुझे अपनी दृष्टिसे कामदेवसे भी अधिक सुन्दर देखती है। परम सुन्दरी देवी सन्ध्यावली जहाँ-जहाँ पैर रखती है, वहाँ-वहाँ पृथ्वी छिपी हुई निधि प्रकाशित कर देती है। उसके अङ्गोंमें बुढ़ापेका प्रवेश नहीं होता। मुनिश्रेष्ठ! वह सदा शरत्कालके चन्द्रमाकी प्रभाके समान सुशोभित होती है। विप्रवर! बिना आगके भी वह षड्रस भोजन तैयार कर लेती है और यदि थोड़ी भी रसोई बनाती है तो उसमें करोड़ों मनुष्य भोजन कर लेते हैं। वह पतिव्रता, दानशीला तथा समस्त प्राणियोंको सुख देनेवाली है। ब्रह्मन्! उसने सोते समय भी वाणीमात्रके द्वारा भी कभी मेरी अवहेलना नहीं की है। उसके गर्भसे जो पुत्र उत्पन्न हुआ है, वह सदा मेरी आज्ञाके पालनमें तत्पर रहता है। द्विजश्रेष्ठ! ऐसा लगता है, इस भूतलपर केवल मैं ही पुत्रवान् हूँ, जिसका पुत्र पिताका भक्त है और गुणोंके संग्रहमें पितासे भी बढ़ गया है। मैं भूमण्डलमें केवल एक द्वीपके स्वामीरूपसे प्रसिद्ध था; किंतु मेरा पुत्र मुझसे बढ़ गया। वह सातों द्वीपोंकी पृथ्वीका पालक है। विप्रवर! वह मेरे लिये विद्युल्लेखा नामसे विख्यात राजकुमारीको ले आया था और युद्धमें उसने विपक्षी राजाओंको परास्त कर दिया था। वह रूप-सम्पत्तिसे भी सुशोभित है। उसने सेनापति होकर छः महीनेतक युद्ध किया और शत्रुपक्षके सैनिकोंको जीतकर सबको अस्त्रहीन कर दिया। स्त्रीराज्यमें जाकर उसने वहाँकी स्त्रियोंको युद्धमें जीता और उनमेंसे आठ सुन्दरियोंको लाकर मुझे समर्पित किया तथा उन सबको मातृभावसे उसने बारम्बार मस्तक झुकाया। पृथ्वीपर उसने जो-जो दिव्य वस्त्र तथा दिव्य रत्न प्राप्त किये, उन सबको लाकर मुझे दे दिया। इससे उसकी माताने उसकी बड़ी प्रशंसा की। वह एक ही दिनमें अनेक योजन विस्तृत समूची पृथ्वीको लाँघकर रातको मेरे पैरोंमें तेल मालिश करनेके लिये पुनः घर लौट आता है। आधी रातमें मेरे शरीरकी सेवा करके वह द्वारपर कवच धारण करके खड़ा हो जाता है और नींदसे व्याकुल इन्द्रियोंवाले सेवकोंको जगाता रहता है। मुनिश्रेष्ठ! मेरा यह शरीर भी नीरोग रहता है। मुझे अनन्त सुख प्राप्त है और घरमें मेरी प्यारी पत्नी सदा मेरे अधीन रहती है। पृथ्वीपर सब लोग मेरी आज्ञाका पालन करनेवाले हैं। किस कर्मके प्रभावसे इस समय मुझे यह सुख मिला है? वह सत्कर्म इस जन्मका किया हुआ है या दूसरे जन्मका? ब्रह्मन्! आप अपनी बुद्धिसे विचारकर मेरा पुण्य मुझे बताइये। मेरे शरीरमें रोग नहीं है। मेरी पत्नी मेरे वशमें रहनेवाली है। घरमें अनन्त ऐश्वर्य है। भगवान्‌के चरणोंमें मेरी भक्ति है। विद्वानोंमें मेरा आदर है और ब्राह्मणोंको दान देनेकी मुझमें शक्ति है। अतः मैं ऐसा मानता हूँ कि यह सब किसी (विशेष) पुण्यकर्मका फल है।'

वामदेवजीका पूर्वजन्ममें किये हुए 'अशून्यशयनव्रत' को राजाके वर्तमान सुखका कारण बताना, राजाका मन्दराचलपर जाकर मोहिनीके गीत तथा रूप-दर्शनसे मोहित होकर गिरना और मोहिनीद्वारा उन्हें आश्वासन प्राप्त होना

वसिष्ठजी कहते हैं—राजाका यह वचन सुनकर महाज्ञानी मुनीश्वर वामदेवजीने एक क्षणतक कुछ चिन्तन किया। फिर राजाके सुख-सौभाग्यका कारण जानकर वे इस प्रकार बोले।