संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पूर्वभाग-प्रथम पाद ९९
- पूर्वभाग-प्रथम पाद * ९९
| रखनेवाले पुरुषोंको यह व्रत अवश्य करना चाहिये। ब्रह्मन्! यह व्रत सम्पूर्ण पापरूपी दुर्गम वनको जलानेके लिये दावानलके समान है। जो | मानव भगवान् नारायणके चिन्तनमें तत्पर हो भक्तिपूर्वक इस प्रसंगको सुनता है, वह महाघोर पातकोंसे मुक्त हो जाता है। |
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मासोपवास-व्रतकी विधि और महिमा
श्रीसनकजी कहते हैं—नारदजी! अब मैं मासोपवास नामक दूसरे श्रेष्ठ व्रतका वर्णन करूँगा; एकाग्रचित्त होकर सुनिये। वह सब पापोंको हर लेनेवाला, पवित्र तथा सब लोकोंका उपकार करनेवाला है। विप्रवर! आषाढ़, श्रावण, भादों अथवा आश्विन मासमें इस व्रतको करना चाहिये। इनमेंसे किसी एक मासके शुक्ल पक्षमें जितेन्द्रिय पुरुष पञ्चगव्य पीये और भगवान् विष्णुके समीप शयन करे। तदनन्तर प्रातःकाल उठकर नित्यकर्म समाप्त करनेके पश्चात् मन और इन्द्रियोंको वशमें करके क्रोधरहित हो, श्रद्धापूर्वक भगवान् विष्णुकी पूजा करे। विद्वानोंके साथ भगवान् विष्णुका यथोचित पूजन करके स्वस्तिवाचनपूर्वक यह संकल्प करे—
मासमेकं निराहारो ह्यद्यप्रभृति केशव।
<p align="right">(ना० पूर्व० २२। ६-७)</p>
मासान्ते पारणं कुर्वे देवदेव तवाज्ञया॥
तपोरूप नमस्तुभ्यं तपसां फलदायक।
ममाभीष्टफलं देहि सर्वविघ्नान् निवारय॥
'देवदेव! केशव! आजसे एक मासतक मैं निराहार रहकर मासके अन्तमें आपकी आज्ञासे पारण करूँगा। प्रभो! आप तपस्यारूप हैं और तपस्याके फल देनेवाले हैं। आपको नमस्कार है। आप मुझे अभीष्ट फल दें और मेरे सम्पूर्ण विघ्नोंका निवारण करें।'
इस प्रकार भगवान् विष्णुको शुभ मासव्रत समर्पण करके उस दिनसे लेकर महीनेके अन्ततक भगवान् विष्णुके मन्दिरमें निवास करे और प्रतिदिन पञ्चामृतकी विधिसे भगवानको स्नान करावे। उस महीनेमें निरन्तर भगवान्के मन्दिरमें दीप जलावे। नित्यप्रति अपामार्ग (ऊँगा—चिरचिरा)—की दातुन करे और भगवान् नारायणके चिन्तनमें रत हो विधिपूर्वक स्नान करे। तदनन्तर पहलेकी भाँति संयमपूर्वक भगवान् विष्णुको स्नान करावे और उनकी पूजा करे। इस प्रकार मासोपवास पूरा होनेपर भगवत्पूजनपूर्वक यथाशक्ति ब्राह्मणोंको भोजन करावे और भक्तिपूर्वक उन्हें दक्षिणा दे। फिर स्वयं भी इन्द्रियोंको वशमें करके बन्धुजनोंके साथ भोजन करे। इस प्रकार व्रती पुरुष तेरह बार मासोपवास अर्थात् प्रतिवर्ष एक मासोपवास-व्रत करता हुआ तेरह वर्षतक व्रत करे। उसके अन्तमें वेदवेत्ता ब्राह्मणको दक्षिणासहित गोदान करे। बारह ब्राह्मणोंको विधिपूर्वक भोजन करावे और अपनी शक्तिके
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अनुसार उन्हें वस्त्र, आभूषण तथा दक्षिणा दे।
इस प्रकार जो मनुष्य इन्द्रियसंयमपूर्वक तेरह पराक पूर्ण कर लेता है, वह परमानन्द पदको प्राप्त होता है, जहाँ जाकर कोई शोक नहीं करता। मासोपवास-व्रतमें लगे हुए, गङ्गास्नानमें तत्पर तथा धर्ममार्गका उपदेश करनेवाले मनुष्य निस्संदेह मुक्त ही हैं। विधवा स्त्रियों, संन्यासियों, ब्रह्मचारियों और विशेषतः वानप्रस्थियोंको यह मासोपवास-व्रत करना चाहिये। स्त्री हो या पुरुष, इस परम दुर्लभ व्रतका अनुष्ठान करके मोक्ष प्राप्त कर लेता है, जो योगियोंके लिये भी दुर्लभ है। गृहस्थ हो या वानप्रस्थ, ब्रह्मचारी हो या संन्यासी तथा मूर्ख हो या पण्डित—इस प्रसंगको सुनकर कल्याणका भागी होता है। जो भगवान् नारायणकी शरण होकर इस पुण्यमय व्रतका वर्णन सुनता अथवा पढ़ता है, वह पापोंसे मुक्त हो जाता है।
एकादशी-व्रतकी विधि और महिमा—भद्रशीलकी कथा
श्रीसनकजी कहते हैं— नारदजी! अब मैं इस अन्य व्रतका, जो तीनों लोकोंमें विख्यात है, वर्णन करूँगा। यह सब पापोंका नाश करनेवाला तथा सम्पूर्ण मनोवाञ्छित फलोंको देनेवाला है। इसका नाम है—एकादशी-व्रत। यह भगवान् विष्णुको विशेष प्रिय है। ब्रह्मन्! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और स्त्री—जो भी भक्तिपूर्वक इस व्रतका पालन करते हैं, उनको यह मोक्ष देनेवाला है। यह मनुष्योंको उनकी समस्त अभीष्ट वस्तुएँ प्रदान करता है। विप्रवर! सब प्रकारसे इस व्रतका पालन करना चाहिये; क्योंकि यह भगवान् विष्णुको प्रसन्न करनेवाला है। दोनों पक्षकी एकादशीको भोजन न करे। जो भोजन कर लेता है, वह इस लोकमें बड़ा भारी पापी है। परलोकमें उसे नरककी प्राप्ति होती है। मुनीश्वर! मनुष्य यदि मुक्तिकी अभिलाषा रखता है तो वह दशमी और द्वादशीको एक समय भोजन करे और एकादशीको सर्वथा निराहार रहे। महापातकों अथवा सब प्रकारके पातकोंसे युक्त मनुष्य भी यदि एकादशीको निराहार रहे तो वह परम गतिको प्राप्त होता है। एकादशी परम पुण्यमयी तिथि है। यह भगवान् विष्णुको बहुत प्रिय है। संसार-बन्धनका उच्छेद करनेकी इच्छावाले ब्राह्मणोंको सर्वथा इसका सेवन करना चाहिये। दशमीको प्रातःकाल उठकर दन्तधावनपूर्वक स्नान करे और इन्द्रियोंको वशमें रखते हुए विधिपूर्वक भगवान् विष्णुका पूजन करे। रातमें भगवान् नारायणका चिन्तन करते हुए उन्हींके समीप शयन करे। एकादशीको सबेरे उठकर शौच-स्नानके अनन्तर गन्ध, पुष्प आदि सामग्रियोंद्वारा भगवान् विष्णुकी विधिपूर्वक पूजा करके इस प्रकार कहे—
एकादश्यां निराहारः स्थित्वाह्याहं परेऽहनि।
भोक्ष्यामि पुण्डरीकाक्ष शरणं मे भवाच्युत॥
(ना० पूर्व० २३। १५)
'कमलनयन अच्युत! आज एकादशीको निराहार रहकर मैं दूसरे दिन भोजन करूँगा। आप मेरे लिये शरणदाता हों।'
सुदर्शनचक्रधारी देवदेव भगवान् विष्णुके समीप भक्तिभावसे उक्त मन्त्रका उच्चारण करके संतुष्टचित्त हो उन्हें एकादशीका उपवास समर्पित करे। व्रती पुरुष नियमपूर्वक रहकर भगवान् विष्णुके समक्ष गीत, वाद्य, नृत्य तथा पुराणश्रवण आदिके द्वारा रातमें जागरण करे। तदनन्तर द्वादशीके दिन प्रातःकाल उठकर व्रतधारी पुरुष स्नान करे और इन्द्रियोंको वशमें रखते हुए विधिपूर्वक भगवान् विष्णुकी पूजा करे। विप्रवर! जो एकादशीके दिन भगवान् जनार्दनको पञ्चामृतसे स्नान कराकर द्वादशीको दूधसे नहलाता है, वह श्रीहरिका सारूप्य प्राप्त कर लेता है। (पूजनके पश्चात् इस प्रकार प्रार्थना करे—)