संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
उत्तरभाग ७४३
- उत्तरभाग * ७४३
वर है।' मुनिके ऐसा कहनेपर भक्तोंको मनोवाञ्छित वर देनेवाले पार्वतीवल्लभ भगवान् शिवने उन्हें अपना सामीप्य प्रदान किया। भगवान् त्र्यम्बक उसी रूपसे वहीं निवास करने लगे। तभीसे वह पर्वत त्र्यम्बक कहलाने लगा। शुभगे! जो मानव भक्तिभावसे गोदावरी-गङ्गामें जाकर स्नान करते हैं, वे भवसागरसे मुक्त हो जाते हैं। जो लोग गोदावरीके जलमें स्नान करके उस पर्वतपर विराजमान भगवान् त्र्यम्बकका विविध उपचारोंसे पूजन करते हैं, वे साक्षात् महेश्वर हैं। मोहिनी! भगवान् त्र्यम्बकका यह माहात्म्य मैंने संक्षेपसे बताया है। तदनन्तर जहाँतक गोदावरीका साक्षात् दर्शन होता है, वहाँतक बहुत-से पुण्यमय आश्रम हैं। उन सबमें स्नान करके देवताओं तथा पितरोंका विधिपूर्वक तर्पण करनेसे मनुष्य मनोवाञ्छित कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। भद्रे ! गोदावरी कहीं प्रकट हैं और कहीं गुप्त हैं; फिर आगे जाकर पुण्यमयी गोदावरी नदीने इस पृथ्वीको आप्लावित किया है। मनुष्योंकी भक्तिसे जहाँ वे महेश्वरी देवी प्रकट हुई हैं, वहाँ महान् पुण्यतीर्थ है जो स्नानमात्रसे पापोंको हर लेनेवाला है। तदनन्तर गोदावरी देवी पञ्चवटीमें जाकर भलीभाँति प्रकाशमें आयी हैं। वहाँ वे सम्पूर्ण लोकोंको उत्तम गति प्रदान करती हैं। विधिनन्दिनि ! जो मनुष्य नियम एवं व्रतका पालन करते हुए पञ्चवटीकी गोदावरीमें स्नान करता है, वह अभीष्ट कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। जब त्रेतायुगमें भगवान् श्रीराम अपनी धर्मपत्नी सीता और छोटे भाई लक्ष्मणके साथ आकर रहने लगे, तबसे उन्होंने पञ्चवटीको और भी पुण्यमयी बना दिया। शुभे! इस प्रकार यह सब गौतमाश्रमका माहात्म्य कहा गया है।
पुण्डरीकपुरका माहात्म्य, जैमिनिद्वारा भगवान् शङ्करकी स्तुति
मोहिनी बोली— गुरुदेव ! आपने जो गौतम-आश्रम तथा महर्षि गौतमका पवित्र उपाख्यान कहा है, उसे मैंने सुना। अब मैं पुण्डरीकपुरका माहात्म्य सुनना चाहती हूँ।
पुरोहित वसुने कहा— महादेवजी भक्तोंके वशमें रहते हैं और उन्हें तत्काल वर देते हैं। वे भक्तोंके सम्मुख प्रकट होते और उनकी इच्छाके अनुसार कार्य करते हैं। एक समयकी बात है, व्यासजीके शिष्य मुनीश्वर जैमिनि अग्निवेश्य आदि शिष्योंके साथ तीर्थोंमें भ्रमण करते हुए पुण्डरीकपुरमें गये जो साक्षात् देवराज इन्द्रकी अमरावतीपुरीके समान सुशोभित था। उस नगरकी शोभा देखकर महर्षि जैमिनि बड़े प्रसन्न हुए। वहाँ सरोवरमें मुनिने स्नान करनेके पश्चात् संध्या-वन्दन आदि नित्यकर्म तथा देवताओं, ऋषियों और पितरोंका तर्पण किया। फिर पार्थिव लिङ्गका निर्माण करके पाद्य, अर्घ्य आदि विविध उपचारोंसे विधिपूर्वक उसका पूजन किया। पूजनके समय उनका चित्त पूर्णतः शान्त था; मनमें कोई व्यग्रता नहीं थी। गन्ध, सुगन्धित पुष्प, धूप, दीप तथा भाँति-भाँतिके नैवेद्योंसे भलीभाँति पूजन करके ज्यों ही महर्षि जैमिनि स्थिर होकर बैठे त्यों ही प्रसन्न होकर भगवान् शिव उनके नेत्रोंके समक्ष प्रकट हो गये।
तदनन्तर जैमिनि साक्षात् भगवान् उमापतिको प्रकट हुआ देख उनके आगे दण्डकी भाँति पृथ्वीपर पड़ गये। फिर सहसा उठकर हाथ जोड़ शरणागतोंकी पीड़ा दूर करनेवाले तथा आधे अङ्गमें हरि और आधेमें हररूपसे प्रकट हुए भगवान् शिवसे बोले।
जैमिनिने कहा— देवदेव जगत्पते ! मैं धन्य हूँ, कृतकृत्य हूँ; क्योंकि आप ब्रह्मा आदिके भी
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ध्यान करनेयोग्य साक्षात् महेश्वर मेरी दृष्टिके सम्मुख प्रकट हैं।
तब प्रसन्न होकर भगवान् शिवने उनके मस्तकपर अपना हाथ रखा और कहा—'बेटा! बोलो, तुम क्या चाहते हो?' भगवान् शिवका यह वचन सुनकर जैमिनिने उत्तर दिया—'भगवन्! मैं माता पार्वती, विघ्नराज गणेश तथा कुमार कार्तिकेयजीके साथ आपका दर्शन करना चाहता हूँ।' तब पार्वतीदेवी तथा अपने दोनों पुत्रोंके साथ भगवान् शङ्करने उन्हें दर्शन दिया। तत्पश्चात् प्रसन्नचित्त हो भगवान् शिवने फिर पूछा—'बेटा! कहो, अब क्या चाहते हो?' जैमिनिने जगद्गुरु शङ्करकी यह दयालुता देखकर मुस्कराते हुए कहा—'मैं आपके ताण्डवनृत्यकी झाँकी देखना चाहता हूँ।' तब उनकी इच्छा पूर्ण करनेके लिये भगवान् अम्बिकापतिने भाँति-भाँतिकी क्रीडामें कुशल समस्त प्रमथगणोंका स्मरण किया। उनके स्मरण करते ही वे नन्दी-भृङ्गी आदि सब लोग कौतूहलमें भरकर वहाँ आये और गणेश, कार्तिकेय तथा पार्वतीसहित भगवान् शिवको नमस्कार करके देवदेव महादेवजीके आदेशकी प्रतीक्षा करते हुए चुपचाप हाथ जोड़कर खड़े हो गये।
तदनन्तर भगवान् रुद्र अद्भुत रूप बनाकर ताण्डवनृत्य करनेको उद्यत हुए। उस समय वे विचित्र वेश-भूषासे विभूषित हो अद्भुत शोभा पा रहे थे। उन्होंने चञ्चल नागरूपी बेलसे अपनी कमर कस ली थी। मुखपर कुछ-कुछ मुसकराहट खेल रही थी। ललाटमें आधे चन्द्रमाकी रेखा सुशोभित थी। सिरके बाल ऊपरकी ओर खड़े थे। उन्होंने अपने सुन्दर नेत्रकी तथा शरीरमें रमायी हुई विभूतिकी उज्ज्वल प्रभासे चन्द्रमा और उसकी चाँदनीको मात कर दिया था। नृत्यके समय उनके जटा-जूटसे झरती हुई गङ्गाके जलसे भगवान्का सारा अङ्ग भीग रहा था। ताण्डवकालमें बार-बार अपने चरणारविन्दोंके आघातसे वे समूची पृथ्वीको कम्पित किये देते थे। उत्तम वाद्य बज रहे थे और हर्षातिरेकसे भगवान्के अङ्गोंमें रोमाञ्च हो आया था। देवताओं तथा दैत्योंके अधिपतिगण अपने मुकुटकी मणियोंके प्रकाशसे भगवान् शिवके चरणकमलोंकी शोभा बढ़ाते थे। गणेश, कार्तिकेय तथा गिरिराजनन्दिनी पार्वतीके नेत्र भगवान्के मुखपर लगे थे। भक्तोंके हृदयमें हर्षकी बाढ़-सी आ गयी थी और बड़े उत्साहसे जय-जयकार कर रहे थे। इस प्रकार भगवान् शिव अपने ताण्डवनृत्यसे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रकाशित करते हुए शोभा पा रहे थे।
तदनन्तर महेश्वरका ताण्डवनृत्य देखकर महर्षि जैमिनि आनन्दके समुद्रमें डूब गये और एकाग्रचित्त हो वेदपादस्तोत्रों*से उनकी स्तुति करने लगे—
* इस स्तुतिमें प्रत्येक श्लोकके अन्तमें वैदिक मन्त्रका एक पाद रखा गया है, इसलिये इसे 'वेदपादशिवस्तुति' कहते हैं।