संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
\ उत्तरभाग \ ६२५
* उत्तरभाग * ६२५
पुत्रके साथ खड़ी हुई जेठी रानीके समीप मोहिनीका यह वचन सुनकर राजा रुक्माङ्गद बहुत लज्जित हुए। तब धर्माङ्गदने कहा—'माताओ! मेरे पिताको मोहिनीदेवी तुम सबसे अधिक प्रिय है। वे मन्दराचलके शिखरसे उस बालाको अपने साथ क्रीडाके लिये ले आये हैं। (अतः ईर्ष्या छोड़कर तुम सब लोग पिताके सुखमें योग दो।)'
पुत्रकी यह बात सुनकर सब माताएँ बोलीं—'बेटा! तुम्हारे न्याययुक्त वचनका पालन हम अवश्य करेंगी।'
माताओंकी यह बात सुनकर राजकुमार धर्माङ्गदने प्रसन्नचित्तसे एक-एकके लिये एक-एक करोड़से अधिक स्वर्णमुद्राएँ, हजार-हजार नगर और गाँव तथा आठ-आठ सुवर्णमण्डित रथ प्रदान किये। एक-एक रानीको उन्होंने दस-दस हजार बहुमूल्य वस्त्र दिये, जिनमेंसे प्रत्येकका मूल्य सौ स्वर्णमुद्रासे अधिक था। मेरुपर्वतकी खानसे निकले हुए शुद्ध एवं अक्षय सुवर्णकी ढाली हुई एक-एक लाख मुद्राएँ उन्होंने प्रत्येक माताको अर्पित कीं। साथ ही एक-एकके लिये सौसे अधिक दासियाँ भी दीं। घड़ेके समान थनवाली दस-दस हजार दुधारू गायें और एक-एक हजार बैल भी दिये। तदनन्तर भक्तिभावसे राजकुमारने सभी माताओंको एक-एक हजार सोनेके आभूषण दिये, जिनमें हीरे जड़े हुए थे। आँवले बराबर मोतीके बने हुए प्रकाशमान हारोंकी कई ढेरियाँ लगाकर उन माताओंको दे दीं। सभीको पाँच-पाँच या सात-सात वलय (कड़े) भी दिये। महीपते! महारानी संध्यावलीके पास चन्द्रमाके समान चमकीले ढाई सौ मोतीके हार थे। धर्माङ्गदने एक-एक माताको दो-दो मनोहर हार दिये। प्रत्येकको चौबीस सौ सोनेकी थालियाँ और इतने ही घड़े प्रदान किये। राजन्! हर एक माताके लिये सौ-सौ सुन्दर पालकियाँ और उनके ढोनेवाले मोटे-ताजे शीघ्रगामी कहार दिये। इस प्रकार कुबेरके समान शोभा पानेवाले उस धन्य राजकुमारने बहुत-सी माताओंको बहुत-सा धन देकर उन सबकी परिक्रमा की और हाथ जोड़कर यह वचन कहा—'माताओ! मैं आपके चरणोंमें मस्तक रखकर प्रणाम करता हूँ। आप सब लोग मेरे अनुरोधसे पतिके सुखकी इच्छा रखकर मेरे पितासे आज ही चलकर कहें कि—'नरेश्वर! ब्रह्मकुमारी मोहिनी बड़ी सुशीला हैं। आप इनके साथ सैकड़ों वर्षोंतक सुखसे एकान्तमें निवास करें।'
पुत्रका यह वचन सुनकर सबके शरीरमें हर्षातिरेकसे रोमाञ्च हो आया। उन सबने महाराजसे जाकर कहा—'आर्यपुत्र! आप ब्रह्मकुमारी मोहिनीके साथ दीर्घकालतक निवास करें। आपके पुत्रके तेजसे हमारी हार्दिक भावना दुःखरहित हो गयी है, इसलिये हमने आपसे यह बात कही है। आप इसपर विश्वास कीजिये।'
६२६ * संक्षिप्त नारदपुराण *
राजाका अपने पुत्रको राज्य सौंपकर नीतिका उपदेश देना और धर्माङ्गदके सुराज्यकी स्थिति
वसिष्ठजी कहते हैं—राजन्! अपनी पत्नियोंके इस प्रकार अनुमति देनेपर महाराज रुक्माङ्गदके हर्षकी सीमा न रही। वे अपने पुत्र धर्माङ्गदसे इस प्रकार बोले—'बेटा! इस सात द्वीपोंवाली पृथ्वीका पालन करो। सदा उद्यमशील और सावधान रहना। किस अवसरपर क्या करना उचित है, इसका सदा ध्यान रखना। सदाचारका पालन हो रहा है या नहीं, इसकी ओर दृष्टि रखना। सदा सचेत रहना और वाणिज्य-व्यवसायको सदा प्रिय कार्य समझकर उसे बढ़ाना। राज्यमें सदा भ्रमण करते रहना, निरन्तर दानमें अनुरक्त रहना, कुटिलतासे सदा दूर ही रहना और नित्य-निरन्तर सदाचारके पालनमें संलग्न रहना। बेटा! राजाओंके लिये सर्वत्र अविश्वास रखना ही उत्तम बताया जाता है। खजानेकी जानकारी रखना आवश्यक है।'
पिताकी यह बात सुनकर उत्तम बुद्धिवाले धर्माङ्गदने भक्तिभावसे मातासहित उन्हें प्रणाम किया। फिर उस राजकुमारने उन नृपश्रेष्ठ रुक्माङ्गदको असंख्य धन दिया। उनकी आज्ञाका पालन करनेके लिये बहुत-से सेवकों और कण्ठमें सुवर्णका हार धारण करनेवाली बहुत-सी दासियोंको नियुक्त किया। इस प्रकार पिताको सुख पहुँचानेके लिये पुत्रने सारी व्यवस्था की। फिर उसने पृथ्वीकी रक्षाका कार्य सँभाला। तदनन्तर अनेक राजाओंसे घिरे हुए राजा धर्माङ्गद सातों द्वीपोंसे युक्त सम्पूर्ण पृथ्वीपर भ्रमण करने लगे। उनके भ्रमण करनेसे परिणाम यह होता था कि जनताके मनमें पापबुद्धि नहीं आती थी। उनके राज्यमें कोई भी वृक्ष फल और फूलसे हीन नहीं था। कोई भी खेत ऐसा नहीं था जिसमें जौ या धान आदिकी खेती लहलहाती न हो। उस राज्यकी सभी गौएँ घड़ाभर दूध देती थीं। उस दूधमें घीका अंश अधिक होता था और उसमें शक्करके समान मिठास रहती थी। वह दूध उत्तम पेय, सब रोगोंका नाशक, पापनिवारक तथा पुष्टिवर्धक होता था। कोई भी मनुष्य अपने धनको छिपाकर नहीं रखता था। पत्नी अपने पतिसे कटुवचन नहीं बोलती थी। पुत्र विनयशील तथा पिताकी आज्ञाके पालनमें तत्पर होता था। पुत्रवधू सासके हाथमें रहती थी। साधारण लोग ब्राह्मणोंके उपदेशके अनुसार चलते थे। श्रेष्ठ द्विज वेदोक्त धर्मोंका पालन करते थे। मनुष्य एकादशीके दिन भोजन नहीं करते थे। पृथ्वीपर नदियाँ कभी सूखती नहीं थीं। धर्माङ्गदके राज्यपालनमें प्रवृत्त होनेपर सम्पूर्ण जगत् पुण्यात्मा हो गया था। भगवान्के दिन एकादशी-व्रतका सेवन करनेसे सब लोग इस जगत्में सुख भोगकर अन्तमें भगवान् विष्णुके वैकुण्ठधाममें जाते थे। भूपाल! चोर और लुटेरोंका भय नहीं था। अतः अँधेरी रातमें भी कोई अपने घरके दरवाजे नहीं बंद करते थे। इच्छानुसार विचरनेवाले अतिथि घरपर आकर ठहरते थे। (किसीके लिये कहीं रोक-टोक नहीं थी।) हल चलाये बिना ही सब ओर अन्नकी अच्छी उपज होती थी। केवल माताके दूधसे बच्चे खूब हृष्ट-पुष्ट रहते थे और पतिके संयोगसे युवतियाँ भी पुष्ट और संतुष्ट रहती थीं। राजाओंसे सुरक्षित होकर समस्त जनता हृष्ट-पुष्ट रहती थी तथा शक्तिसहित धर्मका भी भलीभाँति पोषण होता था। इस प्रकार सब लोगोंमें धर्म-प्रेमकी प्रधानता थी। सभी भगवान् विष्णुकी भक्तिमें लगे रहते थे। राजकुमार धर्माङ्गदके द्वारा सारी जनता सुरक्षित थी और सबका समय बड़े सुखसे बीत रहा था।
उधर राजा रुक्माङ्गद नीरोग रहकर सब प्रकारके ऐश्वर्यसे सम्पन्न हो प्रचुर दानकी वर्षा करते और उत्सव मनाते थे। वे मोहिनीकी चेष्टाओंके सुखसे अत्यन्त मुग्ध थे।