संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
\ पूर्वभाग-तृतीय पाद ५०३
* पूर्वभाग-तृतीय पाद * ५०३
गोकुल जाते समय वसुदेवजीको मार्ग देनेके लिये यमुनाजीके जलका भेदन करनेवाले।
१५. व्रजवासी=व्रजमें निवास करनेवाले, १६. व्रजानन्दी=अपने शुभागमनसे सम्पूर्ण व्रजका आनन्द बढ़ानेवाले, १७. नन्दबालः=नन्दजीके पुत्र, १८. दयानिधिः=दयाके समुद्र, १९. लीलाबालः=लीलाके लिये बालरूपमें प्रकट, २०. पद्मनेत्रः=कमलसदृश नेत्रवाले, २१. गोकुलोत्सवः=गोकुलके लिये उत्सवरूप अथवा अपने जन्मसे गोकुलमें आनन्दोत्सवको बढ़ानेवाले, २२. ईश्वरः=सब प्रकारसे समर्थ।
२३. गोपिकानन्दनः=अपनी शैशवसुलभ चेष्टाओंसे यशोदा आदि गोपियोंको आनन्दित करनेवाले, २४. कृष्णः=सच्चिदानन्दस्वरूप अथवा सबको अपनी ओर खींचनेवाले, २५. गोपानन्दः=गोपोंके लिये मूर्तिमान् आनन्द, २६. सताङ्गतिः=साधु-महात्माओं तथा भक्तजनोंके आश्रय, २७. वकप्राणहरः=वकासुरके प्राण लेनेवाले, २८. विष्णुः=सर्वत्र व्यापक, २९. वकमुक्तिप्रदः=वकासुरको मोक्ष देनेवाले, ३०. हरिः=पाप, दुःख और अज्ञानको हर लेनेवाले।
३१. बलदोलाशयशयः=शेषस्वरूप बलरामरूपी हिंडोलेपर शयन करनेवाले, ३२. श्यामलः=श्यामवर्ण, ३३. सर्वसुन्दरः=पूर्ण सौन्दर्यके आश्रय, ३४. पद्मनाभः=जिनकी नाभिसे कमल प्रकट हुआ वे भगवान् विष्णु, ३५. हृषीकेशः=इन्द्रियोंके नियन्ता और प्रेरक, ३६. क्रीडामनुजबालकः=लीलाके लिये मनुष्य-बालकका रूप धारण किये हुए।
३७. लीलाविध्वस्तशकटः=अनायास ही चरणोंके स्पर्शसे छकड़ेको उलटकर उसमें स्थित असुरका नाश करनेवाले, ३८. वेदमन्त्राभिषेचितः=यशोदा मैयाकी प्रेरणासे बालारिष्टनिवारणके लिये ब्राह्मणोंद्वारा वेद-मन्त्रसे अभिषिक्त, ३९. यशोदानन्दनः=यशोदा मैयाको आनन्द देनेवाले, ४०. कान्तः=कमनीय स्वरूप, ४१. मुनिकोटिनिषेवितः=करोड़ों मुनियोंद्वारा सेवित।
४२. नित्यं मधुवनवासी=मधुवनमें नित्य निवास करनेवाले, ४३. वैकुण्ठः=वैकुण्ठधामके अधिपति विष्णु, ४४. सम्भवः=सबकी उत्पत्तिके स्थान, ४५. क्रतुः=यज्ञस्वरूप, ४६. रमापतिः=लक्ष्मीपति, ४७. यदुपतिः=यदुवंशियोंके स्वामी, ४८. मुरारिः=मुर दैत्यके नाशक, ४९. मधुसूदनः=मधु नामक दैत्यको मारनेवाले।
५०. माधवः=यदुवंशान्तर्गत मधुकुलमें प्रकट, ५१. मानहारी=अभिमान और अहंकारका नाश करनेवाले, ५२. श्रीपतिः=लक्ष्मीके स्वामी, ५३. भूधरः=शेषनागरूपसे पृथिवीको धारण करनेवाले, ५४. प्रभुः=सर्वसमर्थ, ५५. बृहद्वनमहालीलः=महावनमें बड़ी-बड़ी लीलाएँ करनेवाले, ५६. नन्दसूनुः=नन्दजीके पुत्र, ५७. महासनः=अनन्त शेषरूपी महान् आसनपर विराजनेवाले।
५८. तृणावर्तप्राणहारी=तृणावर्त नामक दैत्यको मारनेवाले, ५९. यशोदाविस्मयप्रदः=अपनी अद्भुत लीलाओंसे यशोदा मैयाको आश्चर्यमें डाल देनेवाले, ६०. त्रैलोक्यवक्त्रः=अपने मुखमें तीनों लोकोंको दिखानेवाले, ६१. पद्माक्षः=विकसित कमलदलके समान विशाल नेत्रोंवाले, ६२. पद्महस्तः=हाथमें कमल धारण करनेवाले, ६३. प्रियङ्करः=सबका प्रिय कार्य करनेवाले।
६४. ब्रह्मण्यः=ब्राह्मण-हितकारी, ६५. धर्मगोप्ता=धर्मकी रक्षा करनेवाले, ६६. भूपतिः=पृथिवीके स्वामी, ६७. श्रीधरः=वक्षःस्थलमें लक्ष्मीको धारण करनेवाले, ६८. स्वराट्=स्वयंप्रकाश, ६९.अजाध्यक्षः=ब्रह्माजीके स्वामी, ७०. शिवाध्यक्षः=भगवान् शिवके स्वामी, ७१. धर्माध्यक्षः=धर्मके अधिपति, ७२. महेश्वरः=परमेश्वर।
५०४ * संक्षिप्त नारदपुराण *
७३. वेदान्तवेद्यः= उपनिषदोंद्वारा जानने योग्य परमात्मा, ७४. ब्रह्मस्थः= वेदमें स्थित, ७५. प्रजापतिः= सम्पूर्ण जीवोंके पालक, ७६. अमोघदृक्= जिनकी दृष्टि कभी चूकती नहीं ऐसे सर्वसाक्षी, ७७. गोपीकरावलम्बी= गोपियोंके हाथको पकड़कर नाचनेवाले, ७८. गोपबालकसुप्रियः= गोपबालकोंके अत्यन्त प्रियतम।
७९. बलानुयायी= बलरामजीका अनुकरण करनेवाले, ८०. बलवान्= बली, ८१. श्रीदामप्रियः= श्रीदामाके प्रिय सखा, ८२. आत्मवान्= मनको वशमें करनेवाले, ८३. गोपीगृहाङ्गणरतिः= गोपियोंके घर और आँगनमें खेलनेवाले, ८४. भद्रः= कल्याणस्वरूप, ८५. सुश्लोकमङ्गलः= अपने लोकपावन सुयशसे सबका मङ्गल करनेवाले।
८६. नवनीतहरः= माखनका हरण करनेवाले, ८७. बालः= बाल्यावस्थासे विभूषित, ८८. नवनीतप्रियाशनः= मक्खन जिनका प्यारा भोजन है, ८९. बालवृन्दी= गोप-बालकोंके समुदायको साथ रखनेवाले, ९०. मर्कवृन्दी= वानरोंके झुंडके साथ खेलनेवाले, ९१. चकिताक्षः= आश्चर्ययुक्त चञ्चल नेत्रोंसे देखनेवाले, ९२. पलायितः= मैयाकी साँटीके भयसे भाग जानेवाले।
९३. यशोदातर्जितः= यशोदा मैयाकी डाँट सहनेवाले, ९४. कम्पी= मैया मारेगी इस भयसे काँपनेवाले, ९५. मायारुदितशोभनः= लीलाकृत रुदनसे सुशोभित, ९६. दामोदरः= मैयाद्वारा रस्सीसे कमरमें बाँधे जानेवाले, ९७. अप्रमेयात्मा= जिसकी कोई माप नहीं ऐसे स्वरूपसे युक्त, ९८. दयालुः= सबपर दया करनेवाले, ९९. भक्तवत्सलः= भक्तोंसे प्यार करनेवाले।
१००. उलूखले सुबद्धः= ऊखलमें अच्छी तरह बँधे हुए, १०१. नम्रशिरा= झुके मस्तकवाले, १०२. गोपीकदर्थितः= गोपियोंद्वारा यशोदा मैयाके पास जिनके बालचापल्यकी शिकायत की गयी है वे, १०३. वृक्षभङ्गी= यमलार्जुन नामक वृक्षोंको भङ्ग करनेवाले, १०४. शोकभङ्गी= स्वयं सुरक्षित रहकर स्वजनोंका शोक भङ्ग करनेवाले, १०५. धनदात्मजमोक्षणः= कुबेरपुत्रोंका उद्धार करनेवाले।
१०६. देवर्षिवचनश्लाघी= देवर्षि नारदके वचनका आदर करनेवाले, १०७. भक्तवात्सल्यसागरः= भक्तवत्सलताके समुद्र, १०८. व्रजकोलाहलकरः= अपनी बालोचित क्रीड़ाओंसे व्रजमें कोलाहल मचा देनेवाले, १०९. व्रजानन्दविवर्धनः= व्रजवासियोंके आनन्दकी वृद्धि करनेवाले।
११०. गोपात्मा= गोपस्वरूप, १११. प्रेरकः= इन्द्रिय, मन, बुद्धि आदिको प्रेरणा देनेवाले, ११२. साक्षी= अनन्त विश्वके सम्पूर्ण पदार्थों और भावोंके द्रष्टा, ११३. वृन्दावननिवासकृत्= वृन्दावनमें निवास करनेवाले, ११४. वत्सपालः= बछड़ोंको पालनेवाले, ११५. वत्सपतिः= बछड़ोंके स्वामी एवं रक्षक, ११६. गोपदारकमण्डनः= गोपबालकोंकी मण्डलीको सुशोभित करनेवाले।
११७. बालक्रीडः= बालोचित खेल खेलनेवाले, ११८. बालरतिः= गोपबालकोंसे प्रेम करनेवाले, ११९. बालकः= बालरूपधारी गोपाल, १२०. कनकाङ्गदी= सोनेका बाजूबंद पहननेवाले, १२१. पीताम्बरः= पीताम्बर पहननेवाले, १२२. हेममाली= सुवर्णमालाधारी, १२३. मणिमुक्ताविभूषणः= मणियों और मोतियोंके आभूषण धारण करनेवाले।
१२४. किङ्किणीकटकौ= कटिमें क्षुद्र घण्टिका और हाथोंमें कड़े पहननेवाले, १२५. सूत्री= बाल्यावस्थामें सूतकी करधनी और बड़े होनेपर यज्ञोपवीत धारण करनेवाले; १२६. नूपुरी= पैरोंमें नूपुर पहननेवाले, १२७. मुद्रिकान्वितः= हाथकी अंगुलियोंमें अंगूठी धारण करनेवाले, १२८. वत्सासुरप्रतिध्वंसी= वत्सासुरका विनाश
| * पूर्वभाग-तृतीय पाद * | ५०५ |
|---|
| करनेवाले, १२९. बकासुरविनाशनः= बकासुरका विनाश करनेवाले।<br>१३०. अघासुरविनाशी= अघासुर नामक सर्परूपधारी दैत्यका विनाश करनेवाले, १३१. विनिद्रीकृतबालकः= सर्पके विषसे मूर्च्छित गोपबालकोंको अपनी अमृतमयी दृष्टिसे जीवित करके जगानेवाले, १३२. आद्यः= सबके आदिकारण; १३३. आत्मप्रदः= प्रेमी भक्तोंके लिये अपने आत्मातकको दे डालनेवाले, १३४. सङ्गी= गोप-बालकोंके सङ्ग रहनेवाले, १३५. यमुनातीरभोजनः= यमुनाजीके तटपर ग्वालबालोंके साथ भोजन करनेवाले।<br>१३६. गोपालमण्डलीमध्यः= ग्वालबालोंकी मण्डलीके बीचमें बैठनेवाले, १३७. सर्वगोपाल-भूषणः= सम्पूर्ण ग्वालबालोंको विभूषित करनेवाले, १३८. कृतहस्ततलग्रासः= हथेलीमें अन्नका ग्रास लेनेवाले, १३९. व्यञ्जनाश्रितशाखिकः= वृक्षोंपर भोजन-सामग्री एवं व्यञ्जन रखनेवाले।<br>१४०. कृतबाहुशृङ्गयष्टिः= हाथोंमें सींग और छड़ी धारण करनेवाले, १४१. गुञ्जालंकृतकण्ठकः= गुञ्जाकी मालासे अपने कण्ठको विभूषित करनेवाले, १४२. मयूरपिच्छमुकुटः= मोरपंखका मुकुट धारण करनेवाले, १४३. वनमालाविभूषितः= वनमालासे अलंकृत।<br>१४४. गैरिकाचित्रितवपुः= गेरूसे अपने शरीरमें चित्रोंकी रचना करनेवाले, १४५. नवमेघवपुः= नवीन मेघ-घटाके समान श्याम शरीरवाले, १४६. स्मरः= कामदेवस्वरूप, १४७. कोटिकन्दर्पलावण्यः= करोड़ों कामदेवोंके समान सौन्दर्यशाली, १४८. लसन्मकरकुण्डलः= सुन्दर मकराकृति कुण्डल धारण करनेवाले।<br>१४९. आजानुबाहुः= घुटनेतक लंबी भुजावाले, १५०. भगवान्= ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य—इन छहों ऐश्वर्योंसे पूर्णतया युक्त, | १५१. निद्रारहितलोचनः= निद्राशून्य नेत्रोंवाले, १५२. कोटिसागरगाम्भीर्यः= करोड़ों समुद्रोंके समान गम्भीर, १५३. कालकालः= कालके भी महाकाल, १५४. सदाशिवः= नित्य कल्याणस्वरूप।<br>१५५. विरञ्चिमोहनवपुः= अपने अद्भुतरूपसे ब्रह्माजीको भी मोहमें डालनेवाले, १५६. गोप-वत्सवपुर्धरः= ग्वालबालों और बछड़ोंका रूप धारण करनेवाले, १५७. ब्रह्माण्डकोटिजनकः= करोड़ों ब्रह्माण्डोंके उत्पादक, १५८. ब्रह्ममोहविनाशकः= ब्रह्माजीके मोहका नाश करनेवाले।<br>१५९. ब्रह्मा= स्वयं ही ब्रह्माजीके रूपमें प्रकट, १६०. ब्रह्मेडितः= ब्रह्माजीके द्वारा स्तुत, १६१. स्वामी= सबके अधिपति, १६२. शक्रदर्पादिनाशनः= इन्द्रके घमण्ड आदिको नष्ट करनेवाले, १६३. गिरिपूजोपदेष्टा= गोवर्धन पर्वतकी पूजाका उपदेश देनेवाले, १६४. धृतगोवर्धनाचलः= गोवर्धन पर्वतको धारण करनेवाले।<br>१६५. पुरन्दरेडितः= इन्द्रके द्वारा स्तुत, १६६. पूज्यः= सबके लिये पूजनीय, १६७. कामधेनुप्रपूजितः= कामधेनुद्वारा पूजित, १६८. सर्वतीर्थाभिषिक्तः= सुरभिद्वारा सम्पूर्ण तीर्थोंके जलसे इन्द्रपदपर अभिषिक्त, १६९. गोविन्दः= गौओंके इन्द्र होनेपर गोविन्द नामसे प्रसिद्ध, १७०. गोपरक्षकः= गोपोंकी रक्षा करनेवाले।<br>१७१. कालियार्तिकरः= कालिय नागका दमन करनेवाले, १७२. क्रूरः= दुष्टोंको दण्ड देनेके लिये कठोर, १७३. नागपत्नीरितः= नागपत्नियोंद्वारा स्तुत, १७४. विराद्= विराट् पुरुष, १७५. धेनुकारिः= धेनुकासुरके शत्रु, १७६. प्रलम्बारिः= बलभद्ररूपसे प्रलम्ब नामक असुरका नाश करनेवाले, १७७. वृषासुरविमर्दनः= वृषभरूपधारी अरिष्टासुरका मर्दन करनेवाले।<br>१७८. मयासुरआत्मजध्वंसी= मयासुरके पुत्र |
| ५०६ | * संक्षिप्त नारदपुराण * |
|---|
व्योमासुरका नाश करनेवाले, १७९. केशिकण्ठविदारकः=केशीका कण्ठ विदीर्ण करनेवाले, १८०. गोपगोप्ता=ग्वालोंके रक्षक, १८१. दावाग्निपरिशोषकः=दावानलका शोषण करनेवाले।
१८२. गोपकन्यावस्त्रहारी=गोपकुमारियोंके चीर हरण करनेवाले, १८३. गोपकन्यावरप्रदः=गोपकन्याओंको वर देनेवाले, १८४. यज्ञपत्न्यन्नभोजी=यज्ञपत्नियोंके अन्न भोजन करनेवाले, १८५. मुनिमानापहारकः=अपनेको मुनि माननेवाले ब्राह्मणोंके अभिमानको दूर करनेवाले।
१८६. जलेशमानमथनः=जलके स्वामी वरुणका मान मर्दन करनेवाले, १८७. नन्दगोपालजीवनः=अजगरसे छुड़ाकर नन्दगोपको जीवन देनेवाले, १८८. गन्धर्वशापमोक्ता=अजगररूपमें आये हुए गन्धर्व (विद्याधर)-को शापसे छुड़ानेवाले, १८९. शङ्खचूडशिरोहरः=शङ्खचूड नामक गुह्यकका मस्तक काट लेनेवाले।
१९०. वंशीवटी=वंशीवटके समीप लीला करनेवाले, १९१. वेणुवादी=वंशी बजानेवाले, १९२. गोपीचिन्तापहारकः=गोपियोंकी चिन्ताको दूर करनेवाले, १९३. सर्वगोप्ता=सबके रक्षक, १९४. समाह्वानः=सबके द्वारा पुकारे जानेवाले, १९५. सर्वगोपीमनोरथः=सम्पूर्ण गोपाङ्गनाओंके अभीष्ट।
१९६. व्यङ्ग्यधर्मप्रवक्ता=व्यङ्ग्योक्तिद्वारा धर्मका उपदेश देनेवाले, १९७. गोपीमण्डलमोहनः=गोपसुन्दरियोंके समुदायको मोहित करनेवाले, १९८. रासक्रीडारसास्वादी=रासक्रीडाके रसका आस्वादन करनेवाले, १९९. रसिकः=रसका अनुभव करनेवाले, २००. राधिकाधवः=श्रीराधाके प्राणनाथ।
२०१. किशोरीप्राणनाथः=श्रीकिशोरीजीके प्राणवल्लभ, २०२. वृषभानुसुताप्रियः=वृषभानु-नन्दिनीके प्यारे, २०३. सर्वगोपीजनानन्दी=सम्पूर्ण गोपीजनोंको आनन्द देनेवाले, २०४. गोपीजन-विमोहनः=गोपाङ्गनाओंके मनको मोह लेनेवाले।
२०५. गोपिकागीतचरितः=गोपाङ्गनाओंद्वारा गाये हुए पावन चरित्रवाले, २०६. गोपीनर्तनलालसः=गोपियोंके रासनृत्यकी अभिलाषा रखनेवाले, २०७. गोपीस्कन्धाश्रितकरः=गोपीके कंधेपर हाथ रखकर चलनेवाले, २०८. गोपिकाचुम्बनप्रियः=यशोदा आदि मातृस्थानीया वात्सल्यवती गोपियोंके द्वारा किया जानेवाला मुखचुम्बन जिन्हें प्रिय है वे श्यामसुन्दर।
२०९. गोपिकामार्जितमुखः=गोपाङ्गनाएँ अपने अञ्चलसे जिनका मुख पोंछती हैं वे, २१०. गोपीव्यजनवीजितः=गोपियाँ जिन्हें पंखा डुलाकर आराम पहुँचाती हैं वे, २११. गोपिकाकेशसंस्कारी=गोपिकाके केशोंको सँवारनेवाले, २१२. गोपिकापुष्पसंस्तरः=गोपिकाका फूलोंसे शृङ्गार करनेवाले।
२१३. गोपिकाहृदयालम्बी=गोपीके हृदयका आश्रय लेनेवाले, २१४. गोपीवहनतत्परः=गोपी (श्रीराधा)-को कंधेपर बिठाकर ढोनेके लिये प्रस्तुत, २१५. गोपिकामदहारी=गोपाङ्गनाओंके अभिमानको चूर्ण करनेवाले, २१६. गोपिकापरमार्जितः=गोपाङ्गनाओंको परम फलके रूपमें प्राप्त।
२१७. गोपिकाकृतसल्लीलः=रासलीलामें अन्तर्धान हो जानेपर गोपिकाओंने जिनकी पवित्र लीलाओंका अनुकरण किया था वे श्रीकृष्ण, २१८. गोपिकासंस्मृतप्रियः=गोपिकाओंद्वारा निरन्तर चिन्तन किये जानेवाले प्रियतम, २१९. गोपिकावन्दितपदः=गोपाङ्गनाओंद्वारा वन्दित चरणोंवाले, २२०. गोपिकावशवर्तनः=गोपसुन्दरियोंके वशमें रहनेवाले।
२२१. राधापराजितः=श्रीराधारानीसे हार मान लेनेवाले, २२२. श्रीमान्=शोभाशाली,
- पूर्वभाग-तृतीय पाद * | ५०७
---|---
| २२३. निकुञ्जेसुविहारवान्=वृन्दावनके कुञ्जमें सुन्दर लीला करनेवाले, २२४. कुञ्जप्रियः=निकुञ्जके प्रेमी, २२५. कुञ्जवासी=कुञ्जमें निवास करनेवाले, २२६. वृन्दावनविकाशनः=वृन्दावनको प्रकाशित करनेवाले।<br><br>२२७. यमुनाजलसिक्ताङ्गः=यमुनाजीके जलसे अभिषिक्त अङ्गोंवाले, २२८. यमुनासौख्यदायकः=यमुनाजीको सुख देनेवाले, २२९. शशिसंस्तम्भनः=रासलीलाकी रात्रिमें चन्द्रमाकी गतिको रोक देनेवाले, २३०. शूरः=अखण्ड शौर्यसम्पन्न, २३१. कामी=प्रेमी भक्तोंसे मिलनेकी कामनावाले, २३२. कामविमोहनः=अपनी दिव्य लीलाओंसे कामदेवको विमोहित कर देनेवाले।<br><br>२३३. कामाद्यः=कामदेवके आदिकारण, २३४. कामनाथः=कामके स्वामी, २३५. काममानसभेदनः=कामदेवके भी हृदयका भेदन करनेवाले, २३६. कामदः=इच्छानुरूप भोग देनेवाले, २३७. कामरूपः=भक्तजनोंकी कामनाके अनुरूप रूप धारण करनेवाले, २३८. कामिनीकामसंचयः=गोपकामिनीयोंके प्रेमका संग्रह करनेवाले।<br><br>२३९. नित्यक्रीडः=नित्य खेल करनेवाले, २४०. महालीलः=महती लीला करनेवाले, २४१. सर्वः=सर्वस्वरूप, २४२. सर्वगतः=सर्वत्र व्यापक, २४३. परमात्मा=परब्रह्मस्वरूप, २४४. पराधीशः=परमेश्वर, २४५. सर्वकारणकारणः=समस्त कारणोंके भी कारण।<br><br>२४६. गृहीतनारदवचाः=नारदजीके वचन माननेवाले, २४७. अक्रूरपरिचिन्तितः=ब्रजमें जाते हुए अक्रूरजीके द्वारा मार्गमें जिनका विशेषरूपसे चिन्तन किया गया, वे श्रीकृष्ण, २४८. अक्रूरवन्दितपदः=अक्रूरजीके द्वारा वन्दित चरणोंवाले, २४९. गोपिकातोषकारकः=भावी विरहसे व्याकुल हुई गोपाङ्गनाओंको सान्त्वना देनेवाले। | २५०. अक्रूरवाक्यसंग्राही=अक्रूरजीके वचनोंको स्वीकार करनेवाले, २५१. मथुरावासकारणः=मथुरामें निवास करनेवाले, २५२. अक्रूरतापशमनः=अक्रूरजीका दुःख दूर करनेवाले, २५३. रजकायुः-प्रणाशनः=कंसके धोबीकी आयुको नष्ट करनेवाले।<br><br>२५४. मथुरानन्ददायी=मथुरावासियोंको आनन्द देनेवाले, २५५. कंसवस्त्रविलुण्ठनः=कंसके कपड़ोंको लूट लेनेवाले, २५६. कंसवस्त्रपरीधानः=कंसके वस्त्र पहननेवाले, २५७. गोपवस्त्रप्रदायकः=ग्वालबालोंको वस्त्र देनेवाले।<br><br>२५८. सुदामगृहगामी=सुदामा मालीके घर जानेवाले, २५९. सुदामपरिपूजितः=सुदामा मालीके द्वारा पूजित, २६०. तन्तुवायकसम्प्रीतः=दर्जीके ऊपर प्रसन्न, २६१. कुब्जाचन्दनलेपनः=कुब्जाके घिसे हुए चन्दनको अपने श्रीअङ्गोंमें लगानेवाले।<br><br>२६२. कुब्जारूपप्रदः=कुब्जाको सुन्दर रूप देनेवाले, २६३. विज्ञः=विशिष्ट ज्ञानवान्, २६४. मुकुन्दः=मोक्ष देनेवाले, २६५. विष्टरश्रवाः=विस्तृत सुयश एवं कानोंवाले, २६६. सर्वज्ञः=सब कुछ जाननेवाले, २६७. मधुरालोकी=मथुरानगरीका दर्शन करनेवाले, २६८. सर्वलोकाभिनन्दनः=सब लोगोंसे अभिनन्दन (सम्मान) पानेवाले।<br><br>२६९. कृपाकटाक्षदर्शी=कृपापूर्ण कटाक्षसे सबकी ओर देखनेवाले, २७०. दैत्यारिः=दैत्योंके शत्रु, २७१. देवपालकः=देवताओंके रक्षक, २७२. सर्वदुःखप्रशमनः=सबके सम्पूर्ण दुःखोंका नाश करनेवाले, २७३. धनुर्भङ्गी=धनुष तोड़नेवाले, २७४. महोत्सवः=महान् उत्सवरूप।<br><br>२७५. कुवलयापीडहन्ता=कुवलयापीड नामक हाथीका वध करनेवाले, २७६. दन्तस्कन्धः=हाथीके तोड़े हुए दाँतोंको कंधेपर धारण करनेवाले, २७७. बलाग्रणी=बलरामजीको आगे करके चलनेवाले, २७८. कल्पस्वरूपधरः=विभिन्न लोगोंके |
५०८
- संक्षिप्त नारदपुराण *
लिये उनकी भावनाके अनुसार रूप धारण करनेवाले, २७९. धीरः=अविचल धैर्यसे सम्पन्न, २८०. दिव्यवस्त्रानुलेपनः=दिव्य वस्त्र तथा दिव्य अङ्गराग धारण करनेवाले।
२८१. मल्लरूपः=कंसके अखाड़ेमें पहलवानके रूपमें उपस्थित, २८२. महाकालः=महान् कालरूप, २८३. कामरूपी=इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले, २८४. बलान्वितः=अनन्त बलसम्पन्न, २८५. कंसत्रासकरः=कंसको भयभीत कर देनेवाले, २८६. भीमः=कंसके लिये भयंकर, २८७. मुष्टिकान्तः=बलभद्ररूपसे मुष्टिकके जीवनका अन्त कर देनेवाले, २८८. कंसहा=कंसका वध करनेवाले।
२८९. चाणूरघ्नः=चाणूरका नाश करनेवाले, २९०. भयहरः=भय हर लेनेवाले, २९१. शलारिः=शलके शत्रु, २९२. तोशलान्तकः=तोशलका अन्त करनेवाले, २९३. वैकुण्ठवासी=विष्णुरूपसे वैकुण्ठधाममें निवास करनेवाले, २९४. कंसारिः=कंसके शत्रु, २९५. सर्वदुष्टनिषूदनः=सब दुष्टोंका संहार करनेवाले।
२९६. देवदुन्दुभिनिर्घोषी=देव-दुन्दुभिघोषके कारण, २९७. पितृशोकनिवारणः=पिता-माता (वसुदेव-देवकी)-का शोक दूर करनेवाले, २९८. यादवेन्द्रः=यदुकुलके स्वामी, २९९. सतां नाथः=सत्पुरुषोंके रक्षक, ३००. यादवारिप्रमर्दनः=यादवोंके शत्रुओंका मर्दन करनेवाले।
३०१. शौरिशोकविनाशी=वसुदेवजीके शोकका नाश करनेवाले, ३०२. देवकीतापनाशनः=देवकीका संताप नष्ट करनेवाले, ३०३. उग्रसेनपरित्राता=उग्रसेनके रक्षक, ३०४. उग्रसेनाभिपूजितः=उग्रसेनद्वारा पूजित।
३०५. उग्रसेनाभिषेकी=उग्रसेनका राज्याभिषेक करनेवाले, ३०६. उग्रसेनदयापरः=उग्रसेनके प्रति दयाभाव बनाये रखनेवाले, ३०७. सर्वसात्वतसाक्षी=सम्पूर्ण यदुवंशियोंकी देख-भाल करनेवाले, ३०८. यदूनामभिनन्दनः=यदुवंशियोंको आनन्दित करनेवाले।
३०९. सर्वमाथुरसंसेव्यः=सम्पूर्ण मथुरावासियोंद्वारा सेवन करने योग्य, ३१०. करुणः=दयालु, ३११. भक्तबान्धवः=भक्तोंके भाई-बन्धु, ३१२. सर्वगोपालधनदः=सम्पूर्ण ग्वालोंको धन देनेवाले, ३१३. गोपीगोपाललालसः=गोपियों और ग्वालोंसे मिलनेके लिये उत्सुक रहनेवाले।
३१४. शौरिदत्तोपवीती=वसुदेवजीके द्वारा उपनयन-संस्कारमें दिये हुए यज्ञोपवीतको धारण करनेवाले, ३१५. उग्रसेनदयाकरः=उग्रसेनपर दया करनेवाले, ३१६. गुरुभक्तः=गुरु सान्दीपतिके प्रति भक्तिभावसे युक्त, ३१७. ब्रह्मचारी=गुरुकुलमें रहकर ब्रह्मचर्यका पालन करनेवाले, ३१८. निगमाध्ययने रतः=वेदाध्ययनपरायण।
३१९. संकर्षणसहाध्यायी=बलरामजीके सहपाठी, ३२०. सुदामसुहृत्=सुदामा ब्राह्मणके सखा, ३२१. विद्यानिधिः=विद्याके भण्डार, ३२२. कलाकोषः= सम्पूर्ण कलाओंके कोषागार, ३२३. मृतपुत्रप्रदः= मरे हुए गुरुपुत्रोंको यमलोकसे जीवित लाकर गुरुकी सेवामें अर्पित करनेवाले।
३२४. चक्री=सुदर्शन चक्रधारी, ३२५. पाञ्चजनी=पाञ्चजन्य शङ्ख धारण करनेवाले, ३२६. सर्वनारकिमोचनः=सम्पूर्ण नरकवासियोंका उद्धार करनेवाले, ३२७. यमार्चितः=यमराजद्वारा पूजित, ३२८. परः=सर्वोत्कृष्ट, ३२९. देवः=द्युतिमान्, ३३०. नामोच्चारवशः=अपने नामके उच्चारणमात्रसे वशमें हो जानेवाले, ३३१. अच्युतः=अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले।
३३२. कुब्जाविलासी=कुब्जाके कुबड़ेपनको मिटानेकी लीला करनेवाले, ३३३. सुभगः=पूर्ण सौभाग्यशाली, ३३४. दीनबन्धुः=दीन-दुःखियों